“हमसफ़र फिर से मिल जाये कोई”

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इस कदर रूह से, मिल जाये कोई
हमसफ़र फिर से, मिल जाये कोई

अब और नही, सहा जाता ये दर्द
हमबशर फिर से, मिल जाये कोई

कत्ल हो चुका, यूँ तो अरसा पहले
हमनज़र फिर से, मिल जाये कोई

दिन हुए वीरान, रातें यूँ शमशान
हमसहर फिर से, मिल जाये कोई

रहगुज़र ना कोई, ना कोई साथी
हमशहर फिर से, मिल जाये कोई

देखने में हूँ ज़िंदा, नादान परिंदा
हमपहर फिर से, मिल जाये कोई

सीने में आज भी, क़ैद है ज़िन्दगी
हमलहर फिर से, मिल जाये कोई

बस इतनी, ग़ुज़ारिश मेरी ‘इरफ़ान’
हमसफ़र फिर से, मिल जाये कोई

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“गुनाहों में डूबा हूँ, कर दो या मौला क़रम”

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पर्वरदिगार-ए-आलम, मुझपे हो तेरा क़रम
नापाक मैं, खाक़ मैं, कर दो मुझ पर क़रम

मालिक़ुलमुल्क़ है आप, वाहिबुलख़ुल्क़ है आप
नासाफ़ मैं, जाफ़ मैं, मिटा दो मन के भरम

ग़फ़ूरूर्रहीम है आप, वाहिदुलहकीम है आप
नाकाम मै, शाम मैं, भर दो दिल के ज़ख़म

आलिमुलग़ैब है आप, हाक़िमुलफ़ैज़ है आप
नाचार मैं, ख़्वार मैं, बुला लो मुझको हरम

कातिबेअज़ल है आप, साहिबेफ़ज़्ल है आप
नासाज़ मैं, शाज़ मैं, बुझा दो जलते वहम

रब्बुलआलमीन है आप, हामिदुलआमीन है आप
नाशाद मैं, बर्बाद मैं, हटा दो रूह से सितम

वाहिबुलअताया है आप, वाहिदुलखुदाया है आप
नाकसा मैं, हादसा मैं, कर दो मुझपे रहम

नूर-ए-कायनात, विर्द बता मैं क्याँ करू
गुनाहों में डूबा हूँ, कर दो या मौला क़रम

****शब्द सन्दर्भ****

पर्वरदिगार-ए-आलम – संसार का पालनहार
क़रम – कृपा, मेहरबानी, दया दृष्टि
नापाक – अपवित्र
खाक़ – मिट्टी
मौला – मालिक, प्रभु
मालिक़ुलमुल्क़ – दुनिया का स्वामी
वाहिबुलख़ुल्क़ – सबको देने वाला
नासाफ़ – अशुद्ध
जाफ़ – बेहोशी, अक़्ल की कमी
ग़फ़ूरूर्रहीम – बहुत ज्यादा दयालु, मोक्षदाता
वाहिदुल हकीम – हर मर्ज़ का एकमात्र इलाज
आलिमुलग़ैब – अंतर्यामी
हाक़िमुलफ़ैज़ – बादशाही यश कीर्ति
नाचार – बेबस, असहाय
ख़्वार – अपमानित, तिरस्कृत
हरम – खुदा का पवित्र घर, मक्का शरीफ
कातिबेअज़ल – भाग्य लेखक
साहिबेफ़ज़्ल – दया करने वाला, बुज़ुर्गी वाला
नासाज़ – प्रतिकूल
शाज़ – अकेला,  एकाकी
रब्बुलआलमीन – सारे ब्रह्मांड का स्वामी
हामिदुलआमीन – तथास्तु करने वाला
नाशाद – खिन्न, अभागा
वाहिबुलअताया – पुरस्कार देने वाला, रब
वाहिदुलखुदाया – एक खुदा, एकेश्वरवाद
नाकसा – पतित, अधम
नूर – प्रकाश
कायनात – सृष्टि
विर्द – बार बार पढ़ना, दोहराना

“दिल लगाने की, यूँ भूल मत करना”

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भूल से भी कभी, यूँ भूल मत करना
हमें चाहने की कोई, भूल मत करना    

आग सी सिफ़त लिए, जल रहे है हम  
पास आने की कभी, भूल मत करना

खुद को पहचान, है जब तलक जान
खुद को भुलाने की, भूल मत करना

ख़ामोश जज़्बात, तन्हा ये दिन रात
फिर याद आने की, भूल मत करना

दिलदार नहीं, दिलजला मैं ‘इरफ़ान’
दिल लगाने की, यूँ भूल मत करना  

“दे नहीं सकता कोई, तेरे सिवा शिकस्त तुझे”

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देनी है अगर, शिकस्त को यूँ शिकस्त तुझे  
दिल पे रखना होगा, फिर तो दर्दे दस्त तुझे

खुद पर कर यक़ीं, और ख़ुदा से मांग कभी
मिलेगी तब जाकर, क़ुव्वत जबरदस्त तुझे

अख़्लाक़ हो सब तेरे, पुरनूर इस कदर यहाँ
कि कहने लगे खुद, हक़ भी हक़ परस्त तुझे

खुद को पाने की यहाँ, शर्त रही है यही सदा
रूह में उतरकर ही, होना है ख़ुदा परस्त तुझे

बात ये इतनी सी, दिल में उतार ले ‘इरफ़ान’
दे नहीं सकता कोई, तेरे सिवा शिकस्त तुझे

#रॉकशायर

शिकस्त – पराजय
दर्दे दस्त  – दर्द का हाथ
क़ुव्वत  – शक्ति
अख़्लाक़ – नैतिक आचरण
पुरनूर – प्रकाशवान
हक़ – सत्य
हक़ परस्त – सत्य को समर्पित
ख़ुदा परस्त – खुदा को मानने वाला

“दर्द को यूँ धुआँ करना आ गया”

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अंगारों पर यहाँ चलना आ गया
बंजारों सा वो भटकना आ गया

खुद से लङते लङते यूँ आख़िर
खुद को ज़िन्दा रखना आ गया

बेज़ुबां होकर जो सितम थे झेले
बङे सख़्त से वो तन्हाई के मेले

जला जलाकर रूह ये ‘इरफ़ान’
दर्द को यूँ धुआँ करना आ गया

“चलो ना, लम्हों की कुछ बार्गेनिंग करे “

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चलो ना, लम्हों की कुछ बार्गेनिंग करे

अनदेखे ख़्वाबों की, यूँ हार्वेस्टिंग करे

 खुशीयों के, कस्टमाइज्ड घरौंदे बनाये

लाईफ की कैसेट, रिवाइंड कर चलाये

बदहवास लम्हों को, स्किप कर भगाये

खुशनुमा यादों पर, यूँ पाॅज बटन दबाये

ब्लर्ड एहसास को, धीरे धीरे साफ करे

हार्डकोर मिस्टेक्स को, अब माफ़ करे

चलो ना, लम्हों की कुछ बार्गेनिंग करे

अनछुँवे ख़्यालों की, यूँ मार्केटिंग करे…

ना कल कि फ़िक्र, ना कल का ज़िक्र

आज के होने पर, हो आज यूँ ज़िक्र

ना टेंशन का होना, ना मेंशन का रोना

हैप्पीनेस जाॅय की, चाबी फुल भरना

उदासी के बादल, मन से उतार फेंकों

ग़मों का काजल, रूह से बुहार फेंकों

चलो ना, लम्हों की कुछ बार्गेनिंग करे

बिखरे जज़्बातों की, यूँ हार्वेस्टिंग करे ।।

 

 

“टीम इंडिया के लिए”

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शिखर ने रण जीत लिया
मोहित ने मन मीत लिया

बाॅलर्स को ठेंगा दिखाकर
रहाणे ने दिल जीत लिया

गेंद घुमाकर अश्विन ने यूँ
यक़ीन सबका जीत लिया

शमी की रफ़्तार ने फिर
दिल ये आज जीत लिया

धोनी की अगुवाई में फिर
मैच वो हमने जीत लिया

“आग और पानी”

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आग और पानी का नाता
इक जलाये दूजा बुझाता

हमदम गर होना भी चाहे
सिफ़ात हरदम आङे आये

पानी बना लेता खुद राहें
आग में जलती सब आहें

मिलन जब भी यहाँ होता
दोनों ही का वुज़ूद खोता

पानी से सरसब्ज़ शाख
आग से हर लम्स राख

दोनों की आदत पुरानी
आँखों की राहत चुरानी

पानी ढूँढ लेता हैं समंदर
आग जले यूँ अंदर अंदर

आग और पानी का नाता
इक जलाये दूजा बुझाता

मरहम गर होना भी चाहे
सिफ़ात हरदम आङे आये

“छुपालो खुद को यूँ, फिर भी देखेंगे हम”

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कहते जो आये हर दफ़ा, कि देखेंगे हम
आज तलक भी कहते हैं वो, देखेंगे हम

मिलोगे किस मोड़ पे, पूछा ये जब हमने
मुस्कुराकर बस इतना कहा, देखेंगे हम

बिन सोचा सवाल तू, रेशमी ख़्याल तू
तूही हैं मुझमें कहीं, तुझको देखेंगे हम

नज़र को नज़र की, नज़र ना लगे कभी
छुपालो खुद को यूँ, फिर भी देखेंगे हम

“ना हुए जो अब तक, वो काफ़िये ढूँढता हूँ”

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रूह से रदीफ़ वो, क़ुलूब से क़ाफ़िये ढूँढता हूँ
ज़िंदगी की किताब में, बस हाशिये ढूँढता हूँ

ग़ज़ल से मुहब्बत मेरी, बढ़ रही हर रोज यूँ
ग़ज़ल की तख़्लीक़ के, वो वाक़िये ढूँढता हूँ

लफ़्ज़ों का दिल में, उतरना हैं बेहद जरूरी
एहसास के ख़त लिए, मैं डाकिये ढूँढता हूँ

साँसों से आती हैं बू, आँखों से टपके वो खूं
सीने में दफ़न कब से, वो ताज़िये ढूँढता हूँ

अंधेरों में उजालों की, जिद लिए बैठा यहाँ
नूर की तहरीर से पुरनूर, वाक़िये ढूँढता हूँ

गज़लसरा नहीं, ना कोई कातिब ‘इरफ़ान’
ना हुए जो अब तक, वो काफ़िये ढूँढता हूँ

‪#‎राॅकशायर‬

रूह – आत्मा
रदीफ़ – वह समांत शब्द जो ग़ज़ल के हर शेर के अंत में आता है
क़ुलूब – ह्रदय, दिल
काफ़िया – तुक, ग़ज़ल के शेर में तुकांत शब्द
ग़ज़ल – अरबी साहित्य की प्रसिद्ध काव्य विधा
तख़्लीक़ – रचना
वाक़िया – घटना
लफ़्ज़ – शब्द
ख़त – चिट्ठी, पत्र
डाकिया – संदेशवाहक
बू – गंध
खूं – रक्त, लहू, खून
ताज़िया – मकबरे के आकार का प्रतीक
नूर – प्रकाश
तहरीर – लिखित दस्तावेज
पुरनूर – प्रकाशमान, जगमग
गज़लसरा – अच्छी गज़ल पढ़ने वाला
कातिब – लेखक

“डर को भी खुद डर लगे”

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डर को भी खुद डर लगे
हौसलो के जब पर लगे

दिल में हो गर तलब सच्ची
जंगल भी फिर घर लगे

लक्ष्य पाना हो अगर तो
सावन भी दोपहर लगे

नज़र में नज़र हो इतनी
बंजर भी वो शज़र लगे

आदत को आदत ना हो
आदत ही इस कदर लगे

लौ तेरी यूँ हो ‘इरफ़ान’
सूरज भी तेरा सर लगे

“दिल से निकली हैं आवाज़, दिल तक पहुँचेगी”

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दिल से निकली हैं आवाज़, दिल तक पहुँचेगी
रूह इक परवाज़ हैं, खुद मंजिल तक पहुँचेगी

बोलने लगे पत्थर जहाँ, खोलने लगे राहें वहाँ
छू ना सके कोई जिसे, उस दिल तक पहुँचेगी

हो क़ैफ़ियत इतनी, आलिम भी तलबगार लगे
बिना ज़रिये ये खुद ही, महफ़िल तक पहुँचेगी

जुनूं से वाबस्ता, निदा-ए-क़ल्ब ये ‘इरफ़ान’
कागज़ पर उतर कर, खुद दिल तक पहुँचेगी

‪#‎राॅकशायर‬

रूह – आत्मा
परवाज़ – उङान
क़ैफ़ियत – स्थिति, हालत
आलिम – विद्वान
तलबगार – सीखने का इच्छुक, विद्यार्थी
वाबस्ता – सम्बंधित
निदा-ए-क़ल्ब – दिल की आवाज़

“तू बस चक दे इंडिया”

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जीत का ये ताज़, उम्मीदों पर रख दे इंडिया
दुआ हैं यही अब तो, तू बस चक दे इंडिया

विजय रथ पे हो सवार, सपना सच यूँ हर बार
दुआ हैं यही अब तो, तू बस चक दे इंडिया

किरदार वो अपना अपना, निभाते रहना सभी
दुआ हैं यही अब तो, तू बस चक दे इंडिया

मेहनत और लगन से, हासिल कर ले लक्ष्य वो
दुआ हैं यही अब तो, तू बस चक दे इंडिया

जश्न हो फिर जीत का, हर रोज यूँही ‘इरफ़ान’
दुआ हैं यही अब तो, तू बस चक दे इंडिया

“इश्क़ दा साया”

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ज़र्रे ज़र्रे में सदा, इश्क़ नुमायां
हर बशर यहाँ, इश्क़ दा साया

बरस रहा हैं हर सू, अब्र-ए-नूर
दामन में जिसके, सुकूं समाया

रूह से रूह का, तारूफ़ हैं ये
जुनून-ए-इश्क़, रब दा साया

उल्फ़त की बातें, रेशम सी रातें
आँखों की जुबां, और हमसाया

रेज़े रेज़े में सदा, इश्क़ नुमायां
हर नज़र यहाँ, इश्क़ दा साया

‪#‎राॅकशायर‬

ज़र्रा – कण
इश्क़ – प्रेम
नुमायां – प्रत्यक्ष, जाहिर
बशर – मनुष्य
साया- परछाई
सू – जगह, तरफ
अब्र – बादल
नूर – प्रकाश, रौशनी
तारूफ़ – परिचय
उल्फ़त – प्रेम
रेज़ा – कण

“अम्मी दी दुआवा ऐत्थे, हर शहर इक जैसी लगदी”

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मिट्टी दी खुशबू ऐत्थे, हर शहर इक जैसी लगदी
यारां दी जुस्तजू ऐत्थे, हर शहर इक जैसी लगदी

जगत ऐ सारा घूम लित्ता, दर बदर सब नाप लित्ता
अम्मी दी दुआवा ऐत्थे, हर शहर इक जैसी लगदी

रूहा नु सौ दफ़ा जलाणा, अक्खां वे सब राज छुपाणा
इश्क़ दी आरज़ू ऐत्थे, हर शहर इक जैसी लगदी

हर्फ़ नु हर्फ़ ना मिलया, सुकूं दा शर्फ़ ना मिलया
दिल दी कसक ऐत्थे, हर शहर इक जैसी लगदी

गुनाहा दी माफ़ी असी, मंगदा रेंदा हैं ‘इरफ़ान’
बंदे दी अरज़ ऐत्थे, हर शहर इक जैसी लगदी

“कोई कहानी सुनाओ ना अम्मी”

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कोई कहानी सुनाओ ना अम्मी
आज मुझे नींद नही आ रही हैं
आँखों में इक बैचेनी सी हैं
साँसों में इक हैरानी सी हैं
जैसे बचपन में सुनाया करती थी तुम
वैसे ही कोई कहानी सुनाओ ना अम्मी
आज मुझे नींद नही आ रही हैं
कोई कहानी सुनाओ ना अम्मी

दुनिया के लिए भले ही बङा हो गया हूँ
तेरे लिए तो आज भी वही बच्चा ही हूँ
बचपन से तूने ही हर कदम चलना सिखाया
हालात के मुताबिक हरदम ढलना सिखाया
मुश्किलों में फँसा हूँ मैं आज
जंजालों में धँसा हूँ मैं आज
नज़र ढूँढ रही हैं बस तुझे ही
हर दफ़ा पूछ रही हैं अब तुझे ही
दे रहा हैं दिल, दिलासे यही बार बार
कि तू फट से आयेगी शायद इस बार
माथे को मेरे, यूँ हौले हौले सहलायेगी
और फिर मुझे, वही कहानी सुनायेगी
जिसे सुनकर, खिल उठता था मैं बचपन में कभी

हाँ वही कहानी सुनाओ ना अम्मी
आज मुझे नींद नही आ रही हैं
कोई कहानी सुनाओ ना अम्मी
आज मुझे नींद नही आ रही हैं ।।

#रॉकशायर

“आ जरा आसमां खरोंच ले”

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ज़ख़्म अपने सारे नोंच ले
टूटे हुये किनारे दबोच ले
बहुत कुरेद ली ज़मीं तूने
आ जरा आसमां खरोंच ले…

ख़्वाबों का तू एक परिंदा
रातों में होता हैं ज़िंदा
जाना अभी बहुत दूर तुझे
सुनता जा अपनी ही निंदा

नामुमकिन कुछ भी नहीं
तलब हो गर सच्ची तुझमें
नाहासिल कुछ भी नहीं
तड़प हो गर सच्ची तुझमें

मुश्किलों के साये नोच ले
रूठे हुए किनारे दबोच ले
बहुत कुरेद ली ज़मीं तूने
आ जरा आसमां खरोंच ले…

बाज़ यहाँ कई मँडरा रहे हैं  
घात तुझपे वो लगा रहे हैं
सिखा दे तू इनको परवाज़
दिखा दे तू इनको आज

नामुमकिन कुछ भी नहीं
लगन हो गर सच्ची तुझमें
नावाकिफ़ कुछ भी नहीं
अगन हो गर सच्ची तुझमें

नाकाम सब आहें नोच ले
रूठे हुए नज़ारे दबोच ले
बहुत कुरेद ली ज़मीं तूने
आ जरा आसमां खरोंच ले..

#रॉकशायर

“मिलता नही कहीं भी, अब वो तेरा निशां”

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तन्हा सफ़र यूँ, तन्हाई ने खुद मुँह मोङा
दिल बंजर यूँ, आशनाई ने भी साथ छोङा

चुभा खंजर जो, यक़ीं ने खुद यक़ीं तोङा
जला मंज़र वो, तक़दीर ने भी साथ छोङा

जाये तो आख़िर, किस दिशा, किस छोर
मिलता नही कहीं भी, अब वो तेरा निशां

रास्ते हैं जितने यहाँ, उतनी ही यहाँ मंजिलें
वास्ते किसके यहाँ, अधूरी ये सब महफ़िले

सब कुछ पाकर भी, सब कुछ अधूरा लगे
मुकम्मल होकर भी, कुछ भी ना पूरा लगे

जाये तो आख़िर, किस दिशा, किस छोर
मिलता नही कहीं भी, अब वो तेरा निशां

अक्स हैं जितने यहाँ, उतनी ही यहाँ ख़ाहिशें
लम्स हैं जितने यहाँ, उतने ही यहाँ बारिशें

सब कुछ जीकर भी, सब कुछ अधूरा लगे
दर्द वो सब पीकर भी, कुछ भी ना पूरा लगे

जाये तो आख़िर, किस दिशा किस छोर
मिलता नही कहीं भी, अब वो तेरा निशां
मिलता नही कहीं भी, अब जो तेरा निशां ।।

“चाँद की साँसों से, उठ रहा हैं धुआँ”

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आज फिर कोई जला हैं, रात भर
चाँद की साँसों से, उठ रहा हैं धुआँ

ख्वाबों की राख, अधजली वो शाख
तन्हा सी रातों से, उठ रहा हैं धुआँ

गुज़र गया हैं जो, लौटा कभी ना वो
बीती हुई बातों से, उठ रहा हैं धुआँ

दर्द, कसक, आहें, तड़पन, ज़िंदा हुए
यादों, जज्बातों से, उठ रहा हैं धुआँ

आज फिर कोई जला हैं, रात भर
चाँद की आँखों से, उठ रहा हैं धुआँ

“मुझको ढूँढता हैं, घर मेरा”

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ख्वाज़ा का दर हैं घर मेरा
गुनाहों में डूबा हैं सर मेरा

ख़्वाब टूटा, तो पता चला
मुझसे ही डरा हैं डर मेरा

परिंदों सा नही, दिखता वो   
हौसलो में छुपा हैं पर मेरा

तपिश भी ये, ख़लिश भी ये   
रूह से ही हैं, जिस्म तर मेरा

ना सहरा में, ना सावन में
मुझमें ही मिला हैं दर मेरा

हर लम्हा, हर सू ‘इरफ़ान’
मुझको ढूँढता हैं, घर मेरा  

“शब्दों की हैं, दुनिया अलबेली”

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शब्दों की हैं, दुनिया अलबेली
जितनी पुरानी, उतनी नवेली

गागर में, सागर लिए चलती
मन मलंग संग करे अठखेली

जीवन पथ पर, सदा निरंतर
बहती हैं, नदियाँ सी अकेली

संवेदनाओं से, परी पूरित ये  
भावनाओं की, प्यारी सहेली

आत्मा की, दुर्लभ परिभाषा
विचारों की हैं, अबूझ पहेली

“तेरा साया”

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चलता हूँ जब भी, तेरा साया चले यूँ साथ साथ
ढलता हूँ जब भी, तेरा साया ढले यूँ साथ साथ

ज़िस्म तेरा यूँ मुझमें रवां, रूह मेरी तुझमें बयां
हर पल हर लम्हा यहाँ, तू ही तू अब मेरी हयात

जलता हूँ जब भी, तेरा साया जले यूँ साथ साथ
ढलता हूँ जब भी, तेरा साया ढले यूँ साथ साथ..

शाम के साथ अक्सर, बङी हो जाती हैं परछाई
थाम कर हाथ, फिर से खङी हो जाती हैं परछाई

कहीं भी चला जाऊँ मैं, नज़र वही आ जाती हैं
आहिस्ता आहिस्ता फिर, ज़हन पर छा जाती हैं

चलता हूँ जब भी, तेरा साया चले यूँ साथ साथ
ढलता हूँ जब भी, तेरा साया ढले यूँ साथ साथ..

सुबह सुबह अक्सर ही, गीली लगती हैं परछाई
ओस में नहाई हुई फिर, सीली लगती हैं परछाई

कहीं भी चला जाऊँ मैं, नज़र वही आ जाती हैं
हौले हौले रफ्ता रफ्ता, यूँ ज़हन पर छा जाती हैं

चलता हूँ जब भी, तेरा साया चले यूँ साथ साथ
ढलता हूँ जब भी, तेरा साया ढले यूँ साथ साथ

“ग़ज़ल से हो रिश्ता, वो मीर जैसा”

Walls engraved with the musings of Mir
Will see poesies of poets, going asitr 

#RunUp2DPF15 #DelhiPoetryFestival #DPF #PoetsCorner

ग़ज़ल से हो रिश्ता, वो मीर जैसा
जिस्म से रूह वाबस्ता, पीर जैसा

अक़ीदा हो तेरा, इस कदर पुख़्ता
सरहद पे खींची हुई, लकीर जैसा

अल्फ़ाज़, अंदाज़, और एहसास
लगे हर्फ़ रूहानी यूँ, फ़क़ीर जैसा…

ग़ज़ल – उर्दू कविता का एक रूप
रूह – आत्मा
जिस्म – शरीर
वाबस्ता – संबंधित, जुड़ा हुआ
पीर – संत, महात्मा
अक़ीदा – आस्था, विश्वास
पुख़्ता – मजबूत, ठोस
सरहद – सीमा
अल्फ़ाज़ – शब्द (बहुवचन)
हर्फ़ – अक्षर
रूहानी – आध्यात्मिक
फ़क़ीर – दरवेश, साधु

 
 

“हद से गुज़र जाने की, जिद लिये बैठा हैं”

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हद से गुज़र जाने की, जिद लिये बैठा हैं
दिल हैं कि सिर्फ तेरी, जिद किये बैठा हैं

मिट जायेगा इक रोज, जानता हैं फिर भी
आतिश के हवाले यहाँ, मोम किये बैठा हैं

तशनगी के साये, कोसों दूर रहते इससे
मयक़दा निगाहों के, दो जाम पिये बैठा हैं

मुक़रना भी गर चाहे तो, कैसे मुक़रे आख़िर
आँखों को आँखों की, जुबान दिये बैठा हैं

मौत से इसको, डर नही लगता आजकल
ज़िन्दगी फ़क़त तेरे, हवाले किये बैठा हैं

सहरा में, साहिल पे, कहीं नही तू ‘इरफ़ान’
दिल हैं कि फिर भी, तेरी जिद किये बैठा हैं

#राॅकशायर इरफ़ान

“ज़िन्दगी जाने कहाँ छूट गई”

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रिहाई की वो उम्मीद टूट गई
पलकों से फिर नमी छूट गई

अंधेरों के समन्दर में आकर
इक कश्ती थी, वो भी टूट गई

बैचेनीयों से लङते लङते यूँ
तन्हाई मुझे शब भर लूट गई

खुद की तलाश में ‘इरफ़ान’
ज़िन्दगी जाने कहाँ छूट गई

“कुछ देर और अब, जीना चाहता हूँ मैं”

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जीना चाहता हूँ मैं
कुछ देर और अब, जीना चाहता हूँ मैं

चंद लम्हें, चंद सपने
चंद खुशीयां, चंद अपने
ना कोई दर्द, ना कोई अश्क़
ना कोई ख़लिश, ना कोई रश्क़

बस, जीना चाहता हूँ मैं
कुछ देर और अब, जीना चाहता हूँ मैं

चंद रातें, चंद यादें
चंद बातें, चंद वादे
ना कोई बेरूखी, ना कोई बेबसी
ना कोई बेसुधी, ना कोई बेकसी

बस, जीना चाहता हूँ मैं
कुछ देर और अब, जीना चाहता हूँ मैं

चंद ग़ज़ल, चंद लफ़्ज़
चंद नज़म, चंद हर्फ़
ना कोई शिकवा, ना कोई गिला
ना कोई खामोशी, ना कोई ख़ला

बस, जीना चाहता हूँ मैं
कुछ देर और अब, जीना चाहता हूँ मैं
कुछ देर और बस, जीना चाहता हूँ मैं

“मर्ज़ी से जीने की वो अब, मर्ज़ी नही मिलती यहाँ”

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मर्ज़ी से जीने की वो अब, मर्ज़ी नही मिलती यहाँ
बंजर सी रूह मेरी, कली नही कोई खिलती यहाँ

नोची गई हमेशा से यहाँ, खरोंची गई ये हर दफ़ा
तर करे जो फिर इसे, बदली नही वो मिलती यहाँ

खाक़ छानी हैं सहराओं में, राह नही यूँ गुमराहों में
भटक रहा हूँ कब से मैं, गली नही वो मिलती यहाँ

जलाई थी शमांए जो, दिल के सुर्ख़ आंगन में कभी
बुझ चुकी वो सारी ही, जली ना कोई मिलती यहाँ

दर्द की इन्तेहा का बयान, फ़क़त यही हैं ‘इरफ़ान’
जल चुकी रूह मेरी, कली नही कोई खिलती यहाँ

“हर्फ़ मदहोश हो गए”

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ज़हन की गहराईयों में, इस कदर रूपोश हो गए
चंद एहसास ज्योंही उड़ेले, हर्फ़ मदहोश हो गए

#रॉकशायर

ज़हन – दिमाग, मस्तिष्क
रूपोश – भूमिगत, दफ़्न हुआ  
हर्फ़ – अक्षर

“ज़िन्दा नही मैं अब”

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ज़िन्दा नही मैं अब, रूहो का बसेरा हूँ
सियाह सर्द अब्र वो, मौत सा घनेरा हूँ

ज़ख़्मों के ज़र्द निशां, आँखों में हैैं बयां
लहू में डूबा हुआ, जुनूनी इक सवेरा हूँ

ना हैं कोई घर मेरा, ना हैैं कोई दर मेरा
खुद से रूठा हुआ, वीरां सा इक डेरा हूँ

दास्तान मेरी, हैं बस इतनी ‘इरफ़ान’
तन्हाई का साया, ख़्यालों का लुटेरा हूँ

‪#‎राॅकशायर‬ ‘इरफ़ान’

“मैं उस शहर का बाशिंदा हूँ” (Home – Ajmer, Work – Jaipur)

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इल्म-ओ-अदब का साया वो
सूफ़ियाना हैं खुशबू जिसकी

मैं उस शज़र का पत्ता हूँ
गरीब नवाज़ हैं अता जिसकी

तहज़ीब का सरमाया वो
शायराना हैं खुशबू जिसकी

मैं उस शहर का बाशिंदा हूँ
गुलाबी हैं फ़िज़ा जिसकी  

#रॉकशायर इरफ़ान

इल्म – ज्ञान
अदब – साहित्य
शज़र – पेड़
तहज़ीब – संस्कृति
सरमाया – पूँजी
बाशिंदा – निवासी
फ़िज़ा – वातावरण