“फ़साने मोहब्बत के”

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जमाने से ना रही, यूँ तो मोहब्बत की दरकार
जमाने मोहब्बत के मगर, लिखता है वो हर बार

मुस्कुराहटें और खुशियां, औरों को देकर
हाँ खुद के लिए कुछ दर्द, रखता है वो हर बार

नासाज़ करे है दिल को, दावत-ए-इश्क़ सदा
ज़ायका फिर भी मगर, चखता है वो हर बार

मिली हो ठोकर, जिस दर पे दर दर की यहाँ
दर पे उसी के अपना, सर रखता है वो हर बार

यूँ तो महरूम रहा, ताउम्र मोहब्बत से ‘इरफ़ान’
फ़साने मोहब्बत के मगर, लिखता है वो हर बार ।।
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#RockShayar I. A. Khan

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“तू ही”

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हो के भी तू नहीं है शायद
खो के भी तू यहीं है शायद

दिन भी तू ही रात भी तू ही
मुझमें हर जज़्बात भी तू ही

लब पे तू ही शब में तू ही
जो भी है हाँ सब में तू ही

जुनूं में तू ही सुकूं में तू ही
सज़्दे और रूकूअ में तू ही

चाँद में तू ही ख़्वाब में तू ही
जलते हुए आफ़ताब में तू ही

सितारों में तू ही बहारो में तू ही
तक़दीर के सब नज़ारो में तू ही

मौत में तू ही ज़िंदगी में तू ही
बंदे की असल बंदगी में तू ही

बशर में तू ही शज़र में तू ही
कायनात की हर नज़र में तू ही

हो के भी तू नहीं है शायद
खो के भी तू यहीं है शायद ।।

‪#‎RockShayar

“रॉकशायर इन एलियन मोड”

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एलियन वज़ूद पर लगे,
अपने हर लॉक को तू अनलॉक कर दे
रॉक कर कुछ ऐसा के,
फिर हर शॉक को तू खुद ही शॉक कर दे

ई.एम.आई. में जीना छोड़ दे,
और ध्यान से सुन ओ बेख़बर बरखुर्दार
तन्हाई का मटका फोड़ दे,
और ध्यान से चुन वो कनखजूरे किरदार

ज़िंदगी है ये आख़िर,
सेल में मिली कोई डिस्काउंटेड चीज नहीं
फुल ऑन जियो इसे,
मसालेदार है मूवी कोई हॉरर हॉन्टेड नहीं

अलहदा शऊर पर लगे,
अपने हर ब्लॉक को तू अनब्लॉक कर दे
रॉक कर कुछ ऐसा के,
फिर हर शॉक को यूँ खुद ही शॉक कर दे ।।
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#RockShayar

“Yes, I’m a casual guy”

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It is my first attempt to write a poem in english.
If you find any grammatical error
then don’t be judgemental, be sentimental.
Issued in public interest….

Yes, I’m a casual guy
Simpler, but never shy
Whenever you think so it
Do more and let me try
Life gonna be crazy
Whenever make it easy
Come on, wanna free drive
Problems like children cry
Yes, I’m a rocking guy
Blooming, yet never die
Whenever you touch soul
Do sure and let me fly
Journey gonna much easy
Whenever make you crazy
Come on, wanna free dive
Emotions like chicken fry
Everyday i meet myself
Standing in front of mirror
Say proudly yeah loudly
Yes, I’m a casual guy
Yes, I’m a casual guy.
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Penned By:- RockShayar I. A. Khan
For more tast just log on:-
http://www.rockshayar.wordpress.com

“नज़रिया”


इस क़दर बदला है नज़रिया
जीवन में बरसी प्रेम बदरिया

धूप भी अब तो लगे है सावन
नदियाँ लगे मुझको मेरा मन

दिशा मुझे नित नई दिखाती
अदा मुझे हर रोज सिखाती

जाने कहाँ से आई वो खुशी
आँचल बनकर छाई वो खुशी

बातें उसकी सच्ची लगती है
आँखें उसकी अच्छी लगती है

हाँ उम्र में भले ही कम है वो
लफ़्ज़ हूँ मैं और कलम है वो

इस क़दर बदला है नज़रिया
आँगन में बरसी प्रेम बदरिया

धूप भी अब तो लगे है सावन
बगिया लगे मुझको मेरा मन ।।

“एग्जाम सेल”

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पेपर फाइलों की है ये एक अनोखी जेल
कहते है जिसको हम सब एग्जाम सेल

लगे यूँ हर तरफ आंसर शीट्स के ढ़ेर
जंगल में हो सोये जैसे कागज़ के शेर

जोर से बोलना यहाँ नहीं है अलाउड
लास्ट डेट पर तगड़ा मचता है क्राउड

काउंटर पर साक्षात प्रभु नज़र आते
रसीदों पर उंगलिया सर वो खुजाते

नाम से इसके यहाँ घबराते है सब
काम से इसके यहाँ कतराते है सब

रिकॉर्ड में जिसके कोई पास कोई फेल
कहते है उसको हम सब एग्जाम सेल ।।
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© सर्वाधिकार सुरक्षित
रॉकशायर इरफ़ान अली खान

“विचारो की जलकुम्भी”

मस्तिष्क की आद्र दीवारो पर
विचारो की जलकुम्भी उगी है
खुलकर जब भी सांस लेता हूँ
विस्तारित होने लगती है यह
यादृच्छिक है जिसका स्वरूप
युगों से सूखा गहरा कोई कूप
भिन्न भिन्न से भित्तिचित्र
दृश्य पटल पर उगे चलचित्र
अतीत के वो कटु प्रतिबिम्ब
रक्तरंजित है जिनका बिम्ब
आत्मा के अदृश्य अंगो पर
विचारो की जलकुम्भी उगी है
छूकर जब भी कुछ लिखता हूँ
विस्तारित होने लगती है यह ।।
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रॉकशायर इरफ़ान अली खान
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“दिल के दर पर दस्तक”

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बरसो बाद फिर दस्तक दी है
दिल के दर पर किसी ने आज
झिझकते हुए दरवाजा खोला
ठिठकते हुए मन कुछ बोला
इजाज़त नही है तुझको सुन
बहार वफ़ा ना ये खुशबू चुन
झोंका है तू तो एक आवारा
नही खुद तेरा कोई किनारा
रहने दे खुद को तन्हाई में तू
बहने दे रूह को परछाई में तू
खुद में क़ैद हुए जमाना हुआ
ख़ामोशी में गुम फ़साना हुआ
बरसो बाद फिर दस्तक दी है
दिल के दर पर किसी ने आज ।।

“हाँ ईमान को भी झुठलाया उसीने” 

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लहू किया था वो आदतन जिसने
दायर किया खुद मुकदमा उसीने

गवाह ख़रीदे और अदालत बिठाई
हाँ फैसला भी सुनाया खुद उसीने

जिरह सब फ़रेबी गिरह हो के भी
बिछाए हर दफ़ा खुद जाल उसीने

सबूत मिटाकर यूँ इल्ज़ाम लगाये
और दागी दलीलें वो झूठी उसीने

ताउम्र कहलाया जो शख़्स क़ाज़ी
हाँ ईमान को भी झुठलाया उसीने ।।

‪#‎RockShayar‬

“आबादी जब भी बढ़ी, पेड़ों की तादाद घटी”

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आबादी जब भी बढ़ी, पेड़ों की तादाद घटी
कुदरत की तबाही में, इंसां की इम्दाद बढ़ी

ख़्वाहिशें हद से ज्यादा, फ़रमाइशें रब से ज्यादा
दीन दुनिया भूलकर, आज़माइशें सब से ज्यादा

तरक्की जब भी बढ़ी, ज़मीं की तादाद घटी
कुदरत की तबाही में, इंसां की इम्दाद बढ़ी ।।

‪#‎RockShayar‬

इम्दाद – मदद, योगदान

“याद रखना मैं इक दिन याद आऊंगा”

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याद रखना मैं इक दिन याद आऊंगा
पढोगे जब भी ग़ज़ल मैं याद आऊंगा

झोंका जब आये कोई यूँ समझ लेना
यक़ीनन फिर उसके ही बाद आऊंगा

लिखे है लफ़्ज़ कई नूर में डूबे फ़साने
छुओगे जब भी ख़त हाँ याद आऊंगा

शायरी वोह मेरी जला देना पूरी तरह
शायद इसी बहाने कुछ याद आऊंगा

डायरी के पन्नो में ज़िंदा है ‘इरफ़ान’
छुआ करोगे जब भी हाँ याद आऊंगा ।।
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#RockShayar

“मुझमें सुलग रही जाने ये कैसी आग है”

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ज़ेहन की कोंख में पल रहा कोई नाग है
मुझमें सुलग रही जाने ये कैसी आग है

अंगारे है सब ख़याली, राख़ उड़े है काली काली
अधजगी अँखियों से, ख़्वाब जुड़े है ख़ाली ख़ाली

धधक रहा है सीने में कहीं, सदियों से सुर्ख़ लावा
इंतकाम लेने का फिर, करता है हर रोज ये दावा

उड़ाती फिरे धुआँ, लोबान की तरह ये गर्म साँसें
सिखाती फिरे जुआ, ज़िंदगी की ये अनजान राहें

ज़ेहन की ओंख में पल रहा कोई नाग है
मुझमें सुलग रही जाने ये कैसी आग है ।।

#RockShayar

“दर्द तू इतने दे मुझको, कि दर्द ही आदत बन जाए”

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दर्द तू इतने दे मुझको, कि दर्द ही आदत बन जाए
तड़पते हुए यूँ हर पल, जीना भी इबादत बन जाए

क़रम इतना कर मुझ पे, छलनी कर सीना चुप से
लहू कर ऐसा कि, क़त्ल भी मेरी शहादत बन जाए ।।

“खुद पर भी ऐतबार खुद किया नहीं है अब तक”

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तेरी बेरूख़ी का ज़हर पिया नहीं है अब तक
बाद उसके कोई लम्हा जिया नहीं है अब तक

दिल के किसी हिस्से पर चोट इतनी गहरी लगी 
के खुद से फिर कोई वादा किया नहीं है अब तक

वक़्त की साज़िश के चलते चाक हुआ ये सीना इक दिन
उधड़ा हुआ है तब से हाँ सिया नहीं है अब तक

खुद को ना समझने की सज़ा कुछ ऐसी मिली 
के खुद पर भी ऐतबार खुद किया नहीं है अब तक

नाकाम हुआ है जब से इक काम में ‘इरफ़ान’
खुद को फिर कोई काम दिया नहीं है अब तक ।।
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#RockShayar ‘IrFaN’ Ali KhaN

“क्या है रोटी”

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भूखा है कई दिनों से जो, पूछो उससे क्या है रोटी ?
रहता है फुटपाथ पर जो, पूछो उससे क्या है रोटी ?

दिखने लगी है पसलिया, चटकने लगी अंतड़िया
बदन हड्डियो का ढांचा, खटकने लगी अंतड़िया

जान हलक़ में है अटकी, सांस फ़लक पे है पटकी
हालत कुछ ऐसी हुई, के फांस हलक़ में है अटकी

दर पर खड़ा भिखारी जो, पूछो उससे क्या है रोटी ?
बताएगा वही तो ‘इरफ़ान’, असल में क्या है रोटी ?

“जल रहा है ये दिल दिये की तरह”

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रात की तन्हाई पलकों पर लिए हुए
जल रहा है ये दिल दिये की तरह

कभी भभकता भी है, कभी दमकता भी है
शब के उन अंधेरों में, कभी चमकता भी है

कहने को तो ख़्वावों ख़यालों का दरिया है
दिल तो है दिल, आख़िर जीने का ज़रिया है

चोट भी खाई है इसने, दर्द भी झेले है इसने
हर मौसम धूप और सर्द, सब झेले है इसने

फिर भी कभी क्यूँ ये कुछ नहीं कहता है
ज़िंदगी के रंजो ग़म सब खुद ही सहता है

रात की अंगङाई सीने पर लिए हुए
जल रहा है ये दिल दिये की तरह
जल रहा है ये दिल दिये की तरह ।।

‪#‎RockShayar‬ Irfan Ali Khan

“मेरा कोई हमज़बाँ नही”

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सियाहरोज़ हूँ मगर सियाहज़बाँ नही
जिगरसोज़ हूँ मेरा कोई हमज़बाँ नही ।।

सियाहरोज़ – जिसका बुरा दौर चल रहा हो
सियाहज़बाँ – शापसिद्द, काली ज़बान वाला
जिगरसोज़ – दुखदायी
हमज़बाँ – एक राय

“क्यां है इश्क़”

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कोई भी नहीं समझा अब तक, के क्यां है इश्क़
दर्द से नजात है, या फिर दर्द की दुआ है इश्क़

ना कोई है शर्त इसमें, ना है कोई क़रार इसमें
दिल को जो बैचैन कर दे, हाँ वोह अदा है इश्क़

नज़ीर क्यां पेश की जाए, खुद बेनज़ीर है वोह
शहद की तरह कुछ मीठी, उर्दू ज़ुबाँ है इश्क़

कायनात के हर ज़र्रे में, नुमायाँ है नक़्श जो
इंतिहा से लेकर इब्तिदा, सारा जहाँ है इश्क़

हुए हो चाहे इसके यहाँ, दीवाने कई ‘इरफ़ान’
पाया वोह सबने ही, वफ़ा ज़फ़ा और शफ़ा है इश्क़ ।।
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#RockShayar ‘Irfan’ Ali Khan

नजात – मुक्तिं
क़रार – अनुबंध
नज़ीर – उदहारण
बेनज़ीर – अनुपम, बेजोड़
ज़ुबाँ – भाषा
कायनात – सृष्टि
ज़र्रा – कण
नुमायाँ – प्रकट
नक़्श – चेहरा
इंतिहा – अंत
इब्तिदा – आरम्भ
वफ़ा – विश्वास भाव
ज़फ़ा – अन्याय
शफ़ा – इलाज

“दो अज़ीज दोस्त: जिनके नाम ये कलाम”

For you guys….you both are amazing…

ना जाने क्याँ किस्सा है उन दोनों का उनसे
ना जाने क्याँ हिस्सा है उन दोनों का मुझमें

कभी कभी मैं जब सोचता हूँ उनके बारे में
लफ़्ज़ कभी ख़याल ना मिलते उनके बारे में

दोनों ही वोह मुझको बेइंतहा प्यारे लगते है
देखकर जिन्हें माँगू दुआ वोह तारे लगते है

लङते झगङते है बनते बिगङते है हँसते रोते है
सो जाये चाहे रात मगर खुद कभी नही सोते है

इक दूजे की कमी पकङ इक दूजे पर झल्लाते
लाख रूठे फोन टूटे बात करे बिन ना रह पाते

कैसा अजब ये रिश्ता है कैसा अजब ये नाता है
पसंद जो चाहे मैं कर लू दोनों ही को वोह भाता है

ना जाने क्याँ किस्सा है उन दोनों का मुझसे
ना जाने क्याँ हिस्सा है उन दोनों का मुझमें

कभी कभी मैं जब लिखता हूँ उनके के बारे में
कलम कभी अल्फ़ाज़ ना मिलते उनके बारे में ।।

© RockShayar

“ग़ज़ल हो मेरी मुकम्मल तभी ये ‘इरफ़ान”

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ज़ुल्फ़ों के घने पहरे यूँ आहिस्ता आहिस्ता
पलकों पे तेरी ठहरे यूँ आहिस्ता आहिस्ता

लबों के दरमियान आये जब नाम तुम्हारा
मन में उठे है लहरे यूँ आहिस्ता आहिस्ता

मासूम चेहरे ने बना दिया मुझको शैदाई
जिये है पल सुनहरे यूँ आहिस्ता आहिस्ता

आँखों ने आँखों पर लिखा है सूफ़ी कलाम
दरिया के जैसे गहरे यूँ आहिस्ता आहिस्ता

ग़ज़ल हो मेरी मुकम्मल तभी ये ‘इरफ़ान’
नज़रो से तेरी गुज़रे यूँ आहिस्ता आहिस्ता ।।
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“फ़क़त लम्हों की गुज़ारिश है तू”

32

गुलमोहर सी घनी गुज़ारिश है तू
साँसों की सतरंगी सिफ़ारिश है तू

बता के बिन तेरे कैसे जिया जाए
नसीब की नायाब निगारिश है तू

ज़िंदा होकर भी ना रही ये ज़िंदगी
बंजर हूँ मैं और मेरी बारिश है तू

मुहब्बत ना सही तो ना ‘इरफ़ान’
फ़क़त लम्हों की गुज़ारिश है तू ।।

#RockShayar Irfan Ali Khan

निगारिश – लिखित वर्णन

“खुद ही से हर घड़ी भागता है तू”

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खुद ही से हर घड़ी भागता है तू
ज़िंदगी से ज़िंदगी मांगता है तू

ख़्वाब नहीं आते हर शब फिर भी
ख़्वाबों के दरमियां जागता है तू

खुदी से इश्क़ के करता है दावे हजार
और अंगारे रूह पर दागता है तू

जानता है ये फ़ना हो जाएगी इक दिन
फिर भी छूने इसको भागता है तू ।।

“देखा ना किसी ने वोह देखा करता है”

29

देखकर भी खुद को अनदेखा करता है
वज़ूद को तू अपने अनदेखा करता है

सोच भी पड़ जाए खुद सोच में यहाँ
आईने में खुद को ऐसे देखा करता है

पलकों पर सजाकर लफ़्ज़ सुनहरे
बंद आँखों से ये जहाँ देखा करता है

खुद में खुद को तलाशते हुए ‘इरफ़ान’
देखा ना किसी ने वोह देखा करता है ।।

“छुपा लिया है खुद को बंजरो में इरफ़ान”

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नज़र को नज़र की नज़र ना लग जाए
आदत वोह तेरी इस क़दर ना लग जाए

छुपा लिया है खुद को बंजरो में ‘इरफ़ान’
चाहत का पौधा कोई शजर ना लग जाए ।।

“कहना मैं चाहूँ बाय रे गर्मी”

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गर्मी गर्मी पङे हाय रे गर्मी
कहना मैं चाहूँ बाय रे गर्मी

ऐ.सी. कूलर हुए सब फेल
रूम बन गये तिहाङ जेल

बिजली पानी की कटौती
लगने लगा मौसम पनौती

उगल रहा सूरज यूँ शोले
नयन हो जैसे तीजा खोले

रात दिन सनसनाती है लू
हाङ मांस ये जलाती है लू

गर्मी गर्मी पङे हाय रे गर्मी
कहना मैं चाहूँ बाय रे गर्मी ।।

“खुद को पाना है तो खुद को मिटाना है”

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ना कोई उन्वान है ना कोई फ़साना है
ग़ज़ल की गिरह में खुद को छुपाना है

फ़रामोश हूँ यूँ तो सदियों से यहाँ मैं
ना कोई पहचान है ना कोई ठिकाना है

परवाह नही करता मैं ग़ैरों की कभी
अपनों से पर मुझे खुद को बचाना है

रेज़ा रेज़ा ये मंज़र कहता फिरे हर सू
तन्हाई में हर शब रूह को जलाना है

सुर्ख़ निगाहों पर लिखा है ये ‘इरफ़ान’
खुद को पाना है तो खुद को मिटाना है ।।

उन्वान – शीर्षक
फ़साना – कहानी
गिरह – बंधन
फ़रामोश – विस्मृत
रेज़ा रेज़ा – कण कण
मंज़र – दृश्य
सू – तरफ
शब – रात