“सर्दियाँ दा लेज़ीपन” (Laziness of Winters)

This is my first Poetic effort in in Punjabi language. I don’t know Punjabi, but i like it so much. That’s why I’m trying mixed poetry flavor of Hindi-Urdu-Punjabi. Sorry, If there are any error in this poem. I just write my imagination in form of poetry.
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किन्ना सोणा लगदा, सर्दियाँ दा लेज़ीपन
गुलाबी मौसम होर, नाल क्रेज़ी मेरा मन
स्वेरे स्वेरे उठना ऐंवे, एवेरेस्ट दी चढ़ाई
नहान दी जब सोच्या, अक्खां भर आई
छात ते बरसदी है, गुनगुनी सुहानी धूप
जाड़ों विच्च अक्सर, छाँह लगदी है रूड
अदरक वाली चाय, विद कुरकुरे समोसे
प्लेट हो चाहे फुल, लगदे फिर भी थोड़े से
दिन लगदे छोटे ते, रातां वे लम्बी लम्बी
रज़ाई विच्च होवें ते, बातां वे लम्बी लम्बी
जैकेट, मफ़लर, जर्सी, कोट, होर दस्ताने
इक इक करके, लगदे सबा नु याद आने
सहर दे रूख़ पे छाया, धुंध दा पहरा घना   
बर्फ़ नु सांसें जमे, हर तरफ कोहरा घना
किन्ना सोणा लगदा, ऍ सर्दियों दा लेज़ीपन
ठण्ड दा मौसम होर, नाल स्नोवी मेरा मन

     © RockShayar Irfan Ali Khan   
       (ਰੋਕ੍ਕ੍ਸ਼ਾਯਰ ਇਰਫਾਨ ਅਲੀ ਖਾਨ)

ऍ सर्दियाँ दा लेज़ीपन – ये सर्दियों का आलस्य
किन्ना सोणा लगदा – कितना प्यारा लगता
होर – और
नाल – साथ में
स्वेरे स्वेरे – सुबह सुबह
ऐंवे  – यूँही
नहान दी जब सोच्या – नहाने की जब भी सोचू
अक्खां – आँखें
छात ते बरसदी – छत पर बरसती
जाड़ों विच्च – सर्दियों में
छाँह लगदी है रूड – छाँव लगती है रूखी  
दिन लगदे छोटे ते – दिन लगते छोटे से
रज़ाई विच्च होवें ते – रज़ाई में होवें फिर
सबा नु  – सब ही
सहर दे रूख़ पे- सुबह के चेहरें पे
स्नोवी – हिमाच्छादित

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“इक शख़्स जो मुझमें कहीं”

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कत्ल हुआ था, इक शख़्स जो मुझमें कहीं
लहू का रेज़ा मगर, बहता नही मुझमें कहीं

मंज़र हुए सब हैरां, बंजर ख़्वाबों का जहां
लापता वो कब से, मिलता नही मुझमें कहीं

दर्द-ओ-ग़म की आँधियाँ, रोज आकर यूँ बिखेरे
ज़ख़्मी है साया मेरा, खिलता नही मुझमें कहीं

ज़िन्दगी को तकता हूँ, घने अंधियारों से मैं
नूर का वो दरिया यूँ, बहता नही मुझमें कहीं

आग से जल जाने का, मौत से मर जाने का
एहसास अब जरा भी, रहता नही मुझमें कहीं

ख़ामोशी कहती है सदा, मुझसे ये ‘इरफ़ान’
कहा है वो शख़्स जो, दिखता नहीं मुझमें कहीं

             © RockShayar

“दी कॉलेज डेज (The College Days)”


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ज़िन्दगी में है, गर कुछ रियल क्रेज़
तो वो है, ऑनली दी कॉलेज डेज
ख़्वाबों ख़ाहिशों की, ये दुनिया गज़ब
पलभर में जाने यूँ, गुज़र जाती है कब
नये नये चेहरों से, होता है इन्ट्रो यहाँ
कोई इक्का, तो कोई छुपा मैस्ट्रो यहाँ
बर्थडे पार्टी मस्ती धमाल, जब भी छाये
घर से ज्यादा मन को, हॉस्टल ही भाये
क्लास में बैठना है, हमेशा लास्ट राॅ में
ध्यान मगर, अटका रहता फर्स्ट राॅ में
सोचते रहते, ऊफ्फ कब ऑवर होगा ये लेक्चर
लंच में आख़िर, देखनी भी है वो अधूरी पिक्चर
कैन्टीन ही है यहाँ, सबका फेवरेट अड्डा
रोज तैयार मिलता जहाँ, नया एक फड्डा
फर्स्ट ईयर में, सीनियर्स का ख़ौफ़ सताये
फ्रेशर्स में मगर, वोही सब तो गले लगाये
एग्जाम्स के दिनों में, नक्शा ही बदल जाता
एन्टी ग्रुप हर वक़्त, साथ साथ नज़र आता
किताबें नोट्स, हर तरफ रहता जिनका बोलबाला
पेपर ज्योंही खत्म हुए, लग जायेगा इन पर ताला
मस्तियाँ शरारतें, तूफ़ानिया अदावतें
शैतानियाँ हिमाकतें, लड़कपन वो चाहतें
कॉलेज लाईफ, मिक्सचर है इन सबका
हो गर बात से मेरी, आप सब जो एग्री
तो दिल से बोलो, फिर एक बार ये भी
ज़िन्दगी में है, गर कुछ रियल क्रेज़
तो वो है, ऑनली दी कॉलेज डेज
© RockShayar

“मैटलैब”

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(MATRIX LABORATORY: An Engineering Tool)

मैथवर्क्स ने बनाया, एक लाजवाब ऐप
कहते है जिसको, हम सब मैटलैब
वैरिएबल्स का करे, एग्जेक्ट सिमुलेशन
टूल्स में इसकी, अच्छी खासी रेप्युटेशन
हार्डवेयर-साॅफ्टवेयर, गले सब को लगाये
एनालिसिस का ग्राफ, यूँ चुटकियों में बनाये
टूलबाॅक्स तो सब, लगते है जादुई पिटारे
इंजीनियर्स की आँखों के, ये चहेते सितारें
प्लॉटिंग हो कैसी भी, पल भर में कर दे
लोडिंग वो डाटा की, मैट्रिक्स में भर दे
सिमुलिंक्स हो जैसे, अलादीन का चिराग
सिस्टम डिजाइन करो, गाओं अपना राग
यूजर को देता ये, सुपर्ब फ्लेक्सिबिलिटी
एज यू केन, दिखाओ अपनी क्रियेटिविटी
मैथ्स-इंजीनियरिंग का, काॅम्बो दी ग्रेट
कहते है जिसको, हम सब मैटलैब

© RockShayar

“क्रेज़ी बन्दे”

“A true friend is not the one who admire your smartness..but the one who always be with you in your every stupidity and craziness…”

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मिल जाये जब ये दोनो तो
नामुमकिन फिर कुछ नही
हर लम्हा वो मुकाम छूते
मुकाम जहाँ कोई पहुँचा नही
हर बन्दिश से आज़ाद है ये दो परिन्दे
जमाना कहता जिन्हें क्रेज़ी बन्दे

साथ हो गर तो राॅक कर दे
मुश्किल को खुद शाॅक कर दे
हर उस ख्वाब को हक़ीक़त बनाते
ख्वाब जो देखे ना किसी ने कभी
हौसलो से तोङे मुसीबतों के फन्दे
जमाना कहता जिन्हें क्रेज़ी बन्दे

टाइमिंग है इनकी सुपर्ब काॅम्बिनेशन
काम में दिखता 100% डेडिकेशन
हर उस पल को यादगार बना देते
पल जो मिल जाते अक्सर यूँही
खुशीयों से ग़म की आँखें ये मूंदे
जमाना कहता जिन्हें क्रेज़ी बन्दे

भीङ से हमेशा अलहदा ही करते
एटिट्यूड अपना कभी ना बदलते
हर उस दर्द को हथियार बना लेते
दर्द जो मिल जाते मुकद्दर से यूँही
उम्मीदों से ऊंची उङान भरे परिन्दे
जमाना कहता जिन्हें क्रेज़ी बन्दे

इरादों में हिम्मती ज़ज्बा रखते
ख़्वाहिशों का पूरा मजा चखते
हर पल जुनून का दरिया बहाते
जुनून जो बसता है रूह में कहीं
शर्तों पर अपनी ही ज़िन्दगी जीते
जमाना कहता जिन्हें क्रेज़ी बन्दे

“जिद कर, तू खुद को पाने की”

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हो पथ चाहे काँटों भरा
रथ तू उस पर ही बढा
प्रतिरोध करे चाहे पवन
या पंख जला दे सूर्य अगन
स्वीकार ना कर बन्धन कोई
ना रहे दर्द का कम्पन कोई
सितारें सब तोङ लाने की
फ़लक पे ज़मीं बनाने की
अलहदा कुछ कर जाने की
जिद कर, तू खुद को पाने की

हो लक्ष्य चाहे दूर खङा
आँख तू उस पर ही गङा
विचलित करे चाहे ये मन
या धूल उङा दे रौद्र गगन
आरम्भ ना कर रूदन कोई
ना हो चोट का क्रन्दन कोई
हार को फिर जीत लाने की
मन के अंधियारे मिटाने की
निराशा में आशा जगाने की
जिद कर, तू खुद को पाने की

हो सागर चाहे खूब बङा
नाव तू उस पर ही बढा
प्रतिरोध करे चाहे लहर
या दिशा भुला दे तीव्र भँवर
स्वीकार ना कर पतन कोई
ना हो वुज़ूद का दमन कोई
तूफ़ान से खुद टकराने की
अश्क़ों से आग जलाने की
बंजर में गुल खिलाने की
जिद कर, तू खुद को पाने की

हो समय चाहे क्रूर बङा
धैर्य तू हर पल ही बढा
उपहास करे चाहे ये जग
या हस्ती मिटा दे काल खग
स्वीकार ना कर बन्धन कोई
ना रहे दर्द का कम्पन कोई
तकदीर को आज़माने की
सपने सच कर दिखाने की
रूह पे अल्फ़ाज़ सज़ाने की
जिद कर, तू खुद को पाने की

© RockShayar
Irfan Ali Khan

पथ – रास्ता
जिद – हठ
प्रतिरोध – विरोध
सूर्य अगन- सूरज की आग
कम्पन – सिरहन
फ़लक – आसमान
अलहदा – अलग
विचलित – ध्यान भटकाना
रौद्र गगन – भयंकर आकाश
रूदन – रोना धोना
क्रन्दन – विलाप
भँवर – चक्कर
पतन – बरबादी
वुज़ूद – अस्तित्व
दमन – शोषण
अश्क़ – आंसू
बंजर – बाँझ
गुल – फूल
क्रूर – निर्दयी
उपहास – मजाक
जग – दुनिया
काल खग – मृत्यु पक्षी
रूह – आत्मा
अल्फ़ाज़ – शब्द

“वो पोस्ट ग्रेजुएट यादें” (Memories of M.Tech.)

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कॉलेज डेज की मस्तियाँ, कुछ मीठी नमकीन बातें
ज़िंदा हों रही है आज फिर, वो पोस्ट ग्रेजुएट यादें
मचता जो हर वीकेंड पर, असाइनमेंट्स का शोर
लास्ट डेट को ही लगाते, सब अपना अपना ज़ोर
एम. टेक. स्टूडेंट्स की, दास्तां ये सबसे निराली
सिर पे रहती हर वक़्त, प्रेशर की बन्दूक दुनाली
इक हाथ में जॉब थे पकड़े, दूजे में डिग्री की थाली
एग्जाम्स के दिनों में, करते थे वो सब रातें काली
थीसिस अप्रूव हो जाये बस, हो तभी अपनी दिवाली
गुस्से में अक्सर, लाल पीला हो जाता ये दिल
क्लासेज का शिड्यूल, जब भी करता संडे किल
बावज़ूद इनके मगर, लाजवाब था वो दौर अपना
ज़िंदगी के सफ़र का, है जो सबसे प्यारा सपना
खुशियाँ बिखेरते लम्हें, और कुछ खूबसूरत वादें
ज़िंदा हों रही आज फिर, वो पोस्ट ग्रेजुएट यादें

© RockShayar

“वक़्त अब आ गया”

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अपने फ़र्ज़ को निभाने का, वक़्त अब आ गया
अधूरे क़र्ज़ वो चुकाने का, वक़्त अब आ गया

यूँ तो जी ली तूने, शफ़्फ़ाक़ इक ज़िन्दगी यहाँ
सियाह मौत को हराने का, वक़्त अब आ गया

मिटाया वो जिसने भी, तेरा नामोनिशान यहाँ
उस शख़्स को मिटाने का, वक़्त अब आ गया

सीने में दबी है जो तेरे, इक आग सदियों से यहाँ
उस आग को भड़काने का, वक़्त अब आ गया

वुज़ूद की वो अहमियत, क्यां है तेरी ‘इरफ़ान’
ज़माने को ये दिखाने का, वक़्त अब आ गया

 

“मैच्योर हो गया है, ये बचपन आजकल”

(Children’s Day Special)

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ज़िन्दगी की पोटली से फिसलकर
वक्त की टेढी मेढी पगडंडियों पर कहीं
लुढक गया है वो बचपन
कहीं कोई निशां नही मिलता है, अब उसका
ना वो मासूमियत, ना वो शरारतें
ना वो भोलापन, ना वो अदावतें
ना वो तुतलापन, ना वो हिमाकतें
कुछ भी तो नही ऐसा
देखकर जिसे, कोई कह सके
ये बचपना है
ख्वाहिशों के ट्रैक पर यूँही भागते भागते
मैच्योर हो गया है, ये बचपन आजकल

पैदाईश से ही
उस रेस का हिस्सा बन चुका है
जिसकी कोई फिनिश लाईन नही
पोईम्स की जगह, कानों मे
गूँजता है, बेतुके गानों का शोर
खिलौनों की जगह, हाथों मे
थिरकते है, मोबाइल, टेबलेट
पलक झपकते, एक क्लिक में
नन्ही नन्ही सी ये उंगलियाँ
घर के बङे बूढों को
स्मार्टफोन ऑपरेट करना सिखा देती है

दादाजी अक्सर झेंप जाते है
जब उनका पोता
टिपिकल इंग्लिश में
पूँछता है, उनसे कई सवाल
और फिर सारे जवाब
खुद ही दे जाता है
एक साँस में फटाफट
आख़िर एटीट्यूड का सवाल जो ठहरा
स्टैंडर्डस को यूँही फाॅलोव करते करते
मैच्योर हो गया है, ये बचपन आजकल

दिनभर, दबा कुचला सा रहता ये
भारी भरकम बस्तें
और ट्यूशन के दरमियां
खेलने तक की फुर्सत नही मिलती
हाँ, गर होमवर्क पूरा हो जाये
तो शायद, इज़ाज़त मिल सकती है
पापा के मोबाइल पर
कैण्डीक्रश, एंग्रीबर्ड गेम खेलने की
मगर, वो भी सिर्फ एक राउण्ड
क्यूँकी मिट्टी में खेलेंगे
तो कपङे गन्दे हो जायेंगे
धूल से इन्फेक्शन का खतरा अलग
और धूप से एलर्जी भी तो हो सकती है
वक्त की साइट को यूँही सर्फ करते करते
मैच्योर हो गया है, ये बचपन आजकल

सोते वक्त अब ये, माँ से कहानियाँ नही सुनता
आख़िर वो इंग्लिश नाॅवल भी तो पढने है
खरीदें है जो सारे, अमेजन डाॅट काॅम से
और फिर फेसबुक, व्हाट्स अप की
एबीसीडी सीखना भी लाज़िमी है
वरना क्लास में रेप्युटेशन कैसे बनेगी
ना जाने कौनसी तलब लगी है
नन्ही इन कोपलों को आजकल
पलभर में, बङा सा पेङ बनना चाहती है ये
हँसने, मुस्कुराने, सीखने, खिलखिलाने की जगह
प्रेक्टिकल लाईफ में बिलीव करने लगी है ये
हर चीज का लाॅजिक ढूँढती रहती, बस
टाईम की मैराथन में यूँही दौङते दौङते
मैच्योर हो गया है, ये बचपन आजकल

© RockShayar
Irfan Ali Khan

“जुनून”

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फ़िक्र को उड़ा दे तू
ज़िक्र को बढ़ा दे तू

ज़िस्म को सज़ा दे तू
रूह को मज़ा दे तू

इश्क़ को वफ़ा दे तू
रश्क़ को जफ़ा दे तू

राह को पता दे तू
आह को सता दे तू

वक़्त को दिखा दे तू
रक्त वो बहा दे तू

छाँव को जला दे तू
घाव वो भुला दे तू

जख्म को हवा दे तू
अश्क़ वो सुखा दे तू

ग़र्द को हटा दे तू
दर्द वो मिटा दे तू

अक्स को बढ़ा दे तू
रक्स वो चढ़ा दे तू

राग को तोड़ दे तू
आग वो मोड़ दे तू

जो चाहे कर ले तू
दिल में हो गर जुनूं

© RockShayar

ज़िक्र – उल्लेख
ज़िस्म – शरीर
रूह – आत्मा
वफ़ा – निष्ठा
रश्क़ – ईर्ष्या
जफ़ा – द्धेष
अश्क़ – आंसू
ग़र्द – धूल
अक्स – परछाई
रक्स – नृत्य

“वो शख़्स कभी मरता नहीं”

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तन्हाईयों से, डरता नहीं
शायर कभी, मरता नहीं

ज़ख्म मिले, जो अपनों से
घाव कभी, भरता नहीं

मेरा तो है, मुझ पर वो
ऐतबार कभी, करता नहीं

रातों से कर ले, यारी जो
आहें वो फिर, भरता नहीं

बहता था चश्मा, जो कभी
आजकल, वो झरता नहीं

ज़िंदा है जो, लफ़्ज़ों में यहाँ
वो शख़्स कभी, मरता नहीं

© रॉकशायर

“सौंधे ज़ज़्बात”

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सौंधे ज़ज़्बात सब यूँ बह गये
मिट्टी के वो दिये जब ढह गये

रोशनी में डूबे हुए चन्द कतरे
आये और अलविदा कह गये

मन में छुपे है जो राज़ गहरे
तन्हाई वो चुपचाप सह गये

उजाले तो है, हर तरफ ‘इरफ़ान’
दिलों में फिर क्यूँ अन्धेरें रह गये

“डायरी से निकलकर, बाहर आ गई वो नज़्म”

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पढ़ रहा था कल
मैं जब
अपनी इक नज़्म को
दिलवालों के शहर की
सब्ज़ हसीन वादियों में
टाईटल था जिसका
“एक ज़िंदा नज़्म है वो”
उसे पढ़ते हुए, मैने वहाँ
एक नज़्म और देखी
ठीक सामने बैठी हुई
मद्धम हल्की मुस्कान
निगाहें मयक़दा जाम
लब यूँ ख़ामोश पैग़ाम
ज़ुल्फ़ें वो लहराती शाम
ना जाने क्यूँ
मेरी नज़्म की
वो सारी खूबियां
मैच हो रही थी
उसमें एकदम
यूँ लग रहा था
मानो
डायरी से निकलकर
बाहर आ गई वो नज़्म
कुछ देर धूप सेंकने
बड़े दिनों से
जो क़ैद थी
कागज़ की पनाहों में
इसीलिए शायद
जगह जगह से
सिकुड़ गए है
पन्नें सभी

मुख़्तलिफ़ चेहरे बैठे थे
हुजूम बना कर यहाँ वहाँ
मगर, ज़हन में मेरे
बस, वो ही एक चेहरा
तैर रहा था यूँ
जैसे, आसमां में
तैरता है चाँद
और, रोशनी में जिसकी
ओझल हो जाते है
सब सितारें

नज़्म पूरी हुई
तो ख़्याल आया
अरे, ये तो वही नज़्म है
अक्सर
ख़्वाबों में आकर
हर रोज मुझसे
जो बातें करती है
बाद उसके
एक ग़ज़ल, और पढ़ी मैंने
जिक्र था जिसमे
अपनी तन्हा रातों का

सब कुछ वैसे ही हुआ
जैसा सोचा था मैंने
बस, एक करिश्मा
पहली दफ़ा देखा
अपनी नज़्म को
यूँ, अपने से ही
नज़रें चुराते देखा
दिल मेरा
फिसल गया
उस वक़्त
वही पर कहीं
जब डायरी से निकलकर
बाहर आ गई वो नज़्म
और मैं यूँही
टकटकी बाँधे
बस
देखता ही जा रहा था उसे
तकता ही जा रहा था उसे

© RockShayar
(Irfan Ali Khan)

“तआरूफ़” (Introduction)

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एहसास है वो, क़िरदार मेरा
अल्फ़ाज़ जो है, घर बार मेरा

जीता हूँ, अपनी शर्तों पर
परवाज़ तो है, खुद यार मेरा

बन्दिशों से मैं, डरता नही
अन्दाज़ में ये, इक़रार मेरा

रहता हूँ, ज़िस्मानी साये में
रूहानी मगर, इज़हार मेरा

तआरूफ़ फ़क़त, इतना सा
शायराना अब, हर वार मेरा

“थम सी गई है, ज़िन्दगी क्यूँ आजकल”

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थम सी गई है
ज़िन्दगी क्यूँ आजकल
मुस्कुराना गर ये चाहे तो
परमिशन लेनी पड़ती है
सोच के बेतरतीब पुर्ज़ों से
उड़ते रहते है, अक्सर जो
ख़्यालों के बोझिल दायरे में
हर दफ़ा ना सुनकर
मायूस हो जाती है ये
ख़ामोश सी
यूँ, गुमसुम रहती है आजकल
शायद
इसी से, कोई राह निकल आये नई
फिर से, सफ़र की चाह निकल आये नई
थम सी गई है
ज़िन्दगी क्यूँ आजकल

© RockShayar

“कसम है मुझे”

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तेरी बेरहम उन बद्दुआओं की, कसम है मुझे
हस्ती यूँ मिटाऊंगा, एहसास तक ना होगा तुझे

दाँव कई चले जो तूने, चली वो गहरी चालें कई
घाव कई दिये जो तूने, दिये वो फरेबी झांसे कई

नकाब ओढ़ लेने से, किरदार वो छुप नहीं सकता
सफेदपोश चोगे में, गुनहगार वो छुप नहीं सकता

हर इक आमाल का यहाँ, होना है हिसाब एक दिन
ख़ुदा की नज़र से, शियाकार वो छुप नहीं सकता

रंजिशें कई बुनी जो तूने, बुनी वो गहरी साज़िशें कई  
बंदिशें कई चुनी जो तूने, चुनी वो फरेबी आतिशें कई  

हिजाब पहन लेने से, किरदार वो छुप नहीं सकता
रंग बिरंगे धोखे में, कसूरवार वो छुप नहीं सकता

हर इक आमाल का यहाँ, होना है हिसाब एक दिन
अल्लाह के कहर से, बदकार वो छुप नहीं सकता

तेरी जहरीली उन निगाहों की, कसम है मुझे
हस्ती यूँ मिटाऊंगा, एहसास तक ना होगा तुझे

                    © RockShayar

“निदा-ए-कर्बला”

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शहादत को उनकी, आज तुमने भुला दिया
मातम को भी, ज़श्न-ए-महफ़िल बना दिया

हक़ की ख़ातिर जिन्होंने, निसार कर दी जां
याद में उनकी आज, उनको ही रुस्वा किया

ना कर सको गर नेकी तो, बदी भी ना करो
ज़हालत ने आज फिर, इल्म को हरा दिया

सदियों से चीख रहा, मैदान-ए-कर्बला यहाँ
हसन-हुसैन को तुमने, ये कैसा सिला दिया

बस इतनी सी गुज़ारिश, कर रहा है ‘इरफ़ान’
ना भूले वो क़ुर्बानी, जिसने हमें ईमां दिया

© RockShayar

निदा – आवाज़
शहादत – बलिदान, क़ुर्बानी
मातम – शोक
हक़ – सच्चाई
ज़श्न-ए-महफ़िल – ख़ुशी का आयोजन
रुस्वा – अपमानित
नेकी – अच्छाई
बदी – बुराई
जहालत – अज्ञानता
इल्म – ज्ञान
मैदान-ए-कर्बला – वह मैदान जहाँ हज़रत हसन हुसैन शहीद हुए
गुज़ारिश – प्रार्थना

“हरी भरी सी ये घास”

हरी भरी सी ये घास
मन को बहुत भाती है
सुबह सुबह, जब इस पर
नंगे पाँव चलता हूँ
आँखें चमक उठती है
साँसें महकने लगती है
ओंस में भीगी हुई, ये घास
रूह को बेहद सुकूं देती है
देखकर जिसे
यूँ लगता है मानो
मिट्टी के सिर पर
गुँथे हो, हरे रंग के कई बाल
अलग अलग, अंदाज में

मैं अक्सर, जब भी
इस पर लेटे लेटे
यूँ, आसमां को देखता हूँ
वो, बातें करता है मुझसे
बहुत मन करता है उसका
हरी भरी घास पर लेटने का
मगर, वो आसमां जो ठहरा
ज़मीं का सौंधा एहसास
उसके नसीब में कहाँ
उदास हो जाता है, ये सोचकर

घास के बदन पर
दौङती रहती है, चीटियां
दिनभर, यहाँ से वहाँ
जैसे, कोई रेस लगी हो मैराथन
घास की जङो में है, इनके मकां
शायद, वही से कुव्वत मिलती है इतनी

कहीं कहीं पर
सूखे हुए कुछ तिनके, बिखरे पङे है
और, उनके साथ
कुछ ज़र्द पत्ते भी
गिरे थे जो कभी
शाखों से टूटकर यहाँ
इस मंज़र को देखकर
सब्ज़ घास, मायूस हो जाती है
अक्सर, कुछ इस तरह
जैसे कोई ख़्वाब टूटा हो
सवेरे का
और, मन रूख़ा रूख़ा सा रहे

लेकिन, फिर भी
कभी यूँ, ज़ाहिर नही होने देती
अपने बहार से सीने में
दबे हुए, ख़ुश्क़ दर्द को
जीवन में, हर दिन, हर घङी
बस खुशहाली ही फैलाती है
हरी भरी सी ये घास
ज़िन्दगी को, हर पल, हर लम्हा
यूँही ज़िन्दा रखना सिखलाती है ॥

© RockShayar

“रातें मगर कटती नही”

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दिन कट जाता है यूँही, रातें मगर कटती नही
इन्तज़ार में किसके, ये साँसें मगर घटती नही

सितारें भी यहाँ, चाँद भी यहाँ, जुगनू भी यहाँ
सब कुछ है यहाँ, ख़्वाहिशें मगर मिटती नही

नींद के बादलों में, रहता है जो शायर सयाना
लिखता है वो लफ़्ज़ सभी, आहें मगर घटती नही

यूँ तो कट जाता है सफ़र, जागते हुए ‘इरफ़ान’
दीदार के लिए फ़क़त, निगाहें मगर हटती नही

© रॉकशायर

“कहाँ है तू, खुदाया मेरे”

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साँसों में घुल रही है आहें
दुआ के लिए फैली ये बाहें
हर पल ढूंढें तुझको निगाहें
चाहूँ मैं फिर से तेरी पनाहें
ईमान की वो सब नेक राहें
कहाँ है तू, ख़ुदाया मेरे

बंज़र सी है दिल की ज़मीं
आँखों में बस रहती नमी
जल चुके वो ख़्वाब सारे
ढल चुके है मन के तारें
कोई किरन, तू दिखला रे
ज़ख्मों से रिस रही है आहें
दुआ के लिए फैली ये बाहें
हर पल ढूंढें तुझको निगाहें
कहाँ है तू, ख़ुदाया मेरे

दर बदर भटकता ही रहा
बेचैनियों से लड़ता ही रहा
ज़र्द हो चुके वो सब नज़ारे
फ़र्द खो चुके वो मुझमे सारे
कोई उम्मीद, तू दिखला रे
अश्क़ों से बह रही है आहें
दुआ के लिए फैली ये बाहें
हर पल ढूंढें तुझको निगाहें
कहाँ है तू, ख़ुदाया मेरे
कहाँ है तू, ख़ुदाया मेरे ।। …..

© RockShayar