“मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ ‘ग़ालिब’ (Tribute to Father of Poetry Mirza Asadullah Khan ‘Ghalib’)

जैसे ज़िस्म अधूरा है, रूह के बिना
जैसे दिन अधूरा है, रात के बिना ।

जैसे हुस्न अधूरा है, यार के बिना
जैसे वस्ल अधूरा है, दीदार के बिना ।

जैसे ख़्वाब अधूरा है, ख़्याल के बिना
जैसे जवाब अधूरा है, सवाल के बिना ।

जैसे आसमां अधूरा है, सितारों के बिना
जैसे बागबां अधूरा है, बहारों के बिना ।

वैसे ही अदब अधूरा है, ग़ालिब के बिना…

इक शख़्स नही, मुकम्मल अंदाज़ था वो
फ़क़त रक्स नही, मुसल्सल साज़ था वो

उर्दू फ़ारसी में ग़ुरूब, ख़ामोशी सुनता हुआ
शायरी के मौज़ूअ में, सरगोशी चुनता हुआ

अशआर कहे जो भी, ज़ाविदां वो शेर बन गए
इक़रार लिखे जो भी, दर्द वो सब ग़ैर बन गए ।

फ़क़त नौशा यूँही नही, बेहतरीन दर्ज़ा था वो
लक़ब असद यूँही नही, ज़हीन मिर्ज़ा था वो ।

रातों में ताबीर हुआ, रूह की तहरीर हुआ
कागज़ के पन्नों पर, हर्फ़ की तसवीर हुआ ।

अल्फ़ाज़ कहे जो भी, बा-अदब वो अफ़जल हुए
अहसास लिखे जो भी,उम्दा नज़्म-ओ-ग़ज़ल हुए

जैसे अक्स अधूरा है, आईने के बिना
जैसे लफ़्ज़ अधूरा है, मायने के बिना ।

जैसे जाम अधूरा है, लब के बिना
जैसे नाम अधूरा है, रब के बिना ।

जैसे मर्द अधूरा है, औरत के बिना
जैसे फ़र्द अधूरा है, कुव्वत के बिना ।

जैसे क़ल्ब अधूरा है, धङकन के बिना
जैसे इश्क़ अधूरा है, तङपन के बिना ।

वैसे ही सुख़न अधूरा है, ग़ालिब के बिना…

ऐसे अज़ीम-ओ-शान शायर को मेरा सलाम
ऐसे अज़ीम-ओ-शान शायर पर मेरा कलाम ।।

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कौन हूँ मैं ?

कौन हूँ मैं ? कहाँ है मेरा जहां ?
अपनी ही तलाश में हो गया हूँ लापता ।

अनदेखे पहलुओ में, यूँही भटकता रहा
जाने किस अहसास में हो रहा हूँ गुमशुदा ।

परछाई मेरी यहाँ, साथ अब देती नहीं
अजनबी हालात में हो रहा हूँ मुब्तिला ।

गहरे ये सन्नाटे, साथ चलते हर कदम
रूहानी इक ख़लिश में खो रहा हूँ यहाँ ।

अनजानी सब राहें, पास अपने बुलाये
जाने किस गर्दिश में हो रहा हूँ धुँआ ।

मिलता नहीं मेरा, कहीं कोई भी निशां
वक़्त की साज़िश में हो रहा हूँ फ़ना ।

कौन हूँ मैं ? कहाँ है मेरा जहां ?
अपनी ही तलाश में हो गया हूँ लापता ।।

“पीठ पर शदीद गुनाहों का बोझ ढ़ो रहा हूँ”

पीठ पर शदीद गुनाहों का बोझ ढ़ो रहा हूँ,
ना जाने कितनी सदियों से यूँही रो रहा हूँ ।

चाहत का पेङ था जिस ज़मीं पर कभी,
उस ज़मीं पर आज नफ़रत के बीज बो रहा हूँ ।

हक़ीक़त को खुद से नज़रअंदाज़ करते हुए,
यूँ आईने के पीछे कब से दीवाना हो रहा हूँ ।

ख़्वाब में भी ख़्वाब अब तलक आते नहीं,
जागती आँखों के दरमियान कहीं सो रहा हूँ ।

दर्द का अहसास वो भूल ना जाये दिल कहीं !
तेज़ाब से उन ज़ख़्मों के निशान सब धो रहा हूँ ।

पाया था जितना भी मैंने खुद को ‘इरफ़ान’,
धीरे धीरे रफ़्ता रफ़्ता शख़्स वो अब खो रहा हूँ ।।

शदीद – अत्यंत, बहुत ज्यादा
गुनाह – पाप
हक़ीक़त – वास्तविकता
नज़रअंदाज़ – अनदेखी
रफ़्ता रफ़्ता – धीमे धीमे
शख़्स – व्यक्ति

“ज़िंदगी का तू मेरी कामयाब फलसफ़ा लिख दे”

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ज़िंदगी का तू मेरी कामयाब फलसफ़ा लिख दे
बन जाए बिगङी मेरी, तक़दीर इस दफ़ा लिख दे

जो भी हूँ जिस हाल में, नामा-ए-आमाल में
गुनाहों को नेकियों से बदलकर, सौ फ़ीसद नफ़ा लिख दे

हादसों की मार से, सहमा हुआ है दिल मेरा
ज़िंदगी के सफ़र में, हमसफ़र नेक वफ़ा लिख दे

बहुत देख ली दुनियादारी, ग़मों की लाइलाज बीमारी
किस्मत में मेरी तू अब, दीदार-ए-मुस्तफ़ा लिख दे

बेहतरीन कारसाज़ है तू, सुन ले मेरी आवाज़ तू
मर्ज़-ए-रूह है या मौला, कामिल शिफ़ा लिख दे ।।

‪#‎RockShayar‬

फलसफ़ा – Philosophy
नामा-ए-आमाल – कर्मो का लेखाजोखा
दीदार – दर्शन
मुस्तफ़ा – पवित्र, निर्मल, स्वच्छ, पुनीत, शुद्ध, हज़रत मुहम्मद साहब का ख़िताब
कारसाज़ – करने वाला
मर्ज़-ए-रूह – आत्मा की बीमारी
मौला – खुदा
कामिल शिफ़ा – पूरी तरह से राहत

“गाँव मेरा है लोडियाना” (My Village: Lodiyana)

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

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रंग रंगीले राजस्थान के बीचों बीच एक ठिकाना
जिला है अजमेर, और गाँव मेरा है लोडियाना

ग्राम पंचायत है ये, आबादी नही कोई इसकी ज्यादा
शोरगुल से कोसों दूर, जीते यहाँ सब जीवन सादा

पंचायत समिति मसूदा, तहसील है बिजयनगर
दोनों शहरों से जुङी हैं, प्रगति की एक नई डगर

कहने को तो बिजली यहाँ, चौबीसों घंटे आती है
यूँ कह दीजिए जैसे कोई, दुल्हन नई शर्माती है

चौराहे पर दो पीपल पुराने, याद दिलाये गुज़रे ज़माने
पास उन्ही के धर्मी तालाब, आती जहाँ रोज धूप नहाने

प्राथमिक और माध्यमिक, दोनों विद्यालय हैं आस पास
प्रांगण में जिनके सदा, खिलती आई साक्षरता की आस

गाँव से शहर को हाँ, अब भी जाती है वही सङक
मुहाने पर जिसके यहाँ, मिलती है वो चाय कङक

क़ब्रिस्तान के पास वाले मैदान में, साईकिल चलाना सीखी
उतर आई यूँ काग़ज़ पर आज, वो यादें बचपन सरीखी

कहने वाले यूँही तो नहीं, कहते इसे बम्बई का बच्चा
निकले यहाँ से सूरमा कई, पढ़कर लाइफ़ का पाठ सच्चा

खेतों में लहलहाती फसल, जैसे किसी शायर की ग़ज़ल
इस तरह गुनगुनाती है फिर, बरसे वो सावन की शक़ल

धङकता हुआ दिन, और तारों भरी रात यही मिलती है
कच्चे पक्के आँगन में, मुस्कुराहट भी तो यही खिलती है

खेतों में क्रिकेट खेलना, तालाब में पत्थर फेंकना
याद है सर्दी के मौसम में, तप करके हाथ सेंकना

शहर में रहता हूँ भले, पुरख़े तो आज भी वही रहते हैं
भूल ना जाना मिट्टी को, माँ बाबा हमेशा यही कहते हैं

मातृभूमि का ये मेरी, हैं बस इतना सा फ़साना
जिला है अजमेर, और गाँव मेरा है लोडियाना ।।

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“खुद से भी कभी कुछ बात की जाए”

खुद से भी कभी कुछ बात की जाए
कौन है भीतर ? चलो मुलाकात की जाए
खुद को ही आज खुद से यूँ मात दी जाए
कौन है भीतर ? चलो मुलाकात की जाए ।

हटा दो अक्ल के पहरे तुम सब
हटा दो शक्ल सुनहरे तुम अब
देखो ग़ौर से, दिल की कोर से
हटा दो नक्ल के चेहरे तुम सब

दिखावे की मालो दौलत ख़ैरात की जाए
कौन है भीतर ? चलो मुलाकात की जाए
खुद से भी कभी कुछ बात की जाए
कौन है भीतर ? चलो मुलाकात की जाए ।

ख़ामोशी की आवाज़ सुनो ना तुम
ख़यालों पर अल्फ़ाज़ बुनो ना तुम
ग़ैरों को ना देखो, मन के पासे फेंको
खुद ही अपने अंदाज़ चुनो ना तुम

ज़ेहन से आओ अपने ख़ुराफ़ात की जाए
कौन है भीतर ? चलो मुलाकात की जाए
खुद से भी कभी कुछ बात की जाए
कौन है भीतर ? चलो मुलाकात की जाए ।।

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“गई भैंस पानी में”

गई भैंस पानी में
लुट गए जवानी में
इंटरवल के बाद यारों
ट्विस्ट आया कहानी में
गई भैंस पानी में…

ना कोई राजा, ना कोई रानी
वाइफ थी देसी, खङूस खानदानी
हमको इमोशनल फूल बनाकर
करती रही अपनी मनमानी
गई भैंस पानी में…

जोश जोश में शादी कर ली
अपनी लाइफ आधी कर ली
अरेंज्ड मैरिज के चक्कर में
साॅलिड वाली बर्बादी कर ली
गई भैंस पानी में…

कान खोलकर सुन लो तुम सब
गुरू मंतर ये सीख लो तुम अब
अपने दिल की सुनना सदा
ज़िंदगी दूसरा मौका दे फिर कब

गई भैंस पानी में
लुट गए जवानी में
इंटरवल के बाद यारों
ट्विस्ट आया कहानी में ।।

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“अहसास को भी अहसास ना हो”

अहसास को भी अहसास ना हो
कुछ ऐसा बना दे तू मुझ को
महसूस ना हो कोई दर्द-ओ-ग़म
कुछ ऐसा बना दे तू मुझ को
अहसास को भी अहसास ना हो
कुछ ऐसा बना दे तू मुझ को
अहसास को भी अहसास ना हो ।

बहुत सह लिया, अब और नहीं
बहुत कह लिया, अब और नहीं
भीङ के साथ साथ, बांधकर अपने हाथ
बहुत बह लिया, अब और नहीं
ना हो कोई सितम इस रूह पर
सितमगर ऐसा बना दे तू मुझ को
अहसास को भी अहसास ना हो
कुछ ऐसा बना दे तू मुझ को
अहसास को भी अहसास ना हो ।

कहने को तो पूरी एक कहानी है
बाक़ी ना मुझ में मेरी निशानी है
ना हो अब और कोई दिल्लगी
इतनी यादें जो दिल में छुपानी है
अहसास को भी अहसास ना हो
कुछ ऐसा बना दे तू मुझ को
महसूस ना हो कोई रंज़-ओ-ग़म
कुछ ऐसा बना दे तू मुझ को
अहसास को भी अहसास ना हो ।

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“तुझे सब पता है”

मांगू मैं क्या, तुझे सब पता है
चाहूं मैं क्या, सब तेरी अता है
कहूं मैं क्या, हुई मोसे ख़ता है
हूँ तो मैं क्या, नहीं कुछ पता है
मौला मेरे…..सुन मौला मेरे
दिल की दुआ….सुन मौला मेरे ।

दिल के हाल, सब जानता है तू
मुझको मुझ में, पहचानता है तू
लिखू मैं क्या, तुझे सब पता है
बोलू मैं क्या, सब तेरी अता है
कहूं मैं क्या, हुई मोसे ख़ता है
हूँ तो मैं कहाँ, नहीं कुछ पता है
मौला मेरे…..सुन मौला मेरे
दिल की दुआ….सुन मौला मेरे ।

हर शय पर कादिर है तू
हर जगह यूँ ज़ाहिर है तू
रोऊँ मैं कितना, तुझे सब पता है
बोऊँ मैं कितना, सब तेरी अता है
कहूं मैं इतना, हुई मोसे ख़ता है
हूँ तो मैं कौन, नहीं कुछ पता है
मौला मेरे…..सुन मौला मेरे
दिल की दुआ….सुन मौला मेरे ।।

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“युद्ध कर”

युद्ध कर युद्ध कर, खुद से तू युद्ध कर
शुद्ध कर शुद्ध कर, खुद को तू शुद्ध कर
भीतर की बुराइयों से तू युद्ध कर
मैली सी परछाइयों को तू शुद्ध कर
युद्ध कर युद्ध कर, खुद से तू युद्ध कर
शुद्ध कर शुद्ध कर, खुद को तू शुद्ध कर ।

आत्मबल है अस्त्र तेरा, बाहुबल है शस्त्र तेरा
पृथ्वी आकाश अग्नि तू, वायु जल है वस्त्र तेरा
निर्बलता को त्याग कर, ज्ञान को प्रबुद्ध कर
युद्ध कर युद्ध कर, खुद से तू युद्ध कर
शुद्ध कर शुद्ध कर, खुद को तू शुद्ध कर ।

साम दाम वो दंड भेद, पढ़ ले सारे मन के वेद
ज्ञान चक्षु खोल अपना, ना रहे फिर कोई भेद
अहम को त्याग कर, पतन को अवरूद्ध कर
युद्ध कर युद्ध कर, खुद से तू युद्ध कर
शुद्ध कर शुद्ध कर, खुद को तू शुद्ध कर ।

इरादों के दम पर अब, लिख दे इतिहास नया
खुद को पाकर तुझे, होगा फिर अहसास नया
नींद से जागकर, स्वयं को प्रबुद्ध कर
युद्ध कर युद्ध कर, खुद से तू युद्ध कर
शुद्ध कर शुद्ध कर, खुद को तू शुद्ध कर ।

युद्ध कर युद्ध कर, खुद से तू युद्ध कर
शुद्ध कर शुद्ध कर, खुद को तू शुद्ध कर
भीतर की बुराइयों से तू युद्ध कर
मैली सी परछाइयों को तू शुद्ध कर
युद्ध कर युद्ध कर, खुद से तू युद्ध कर
शुद्ध कर शुद्ध कर, खुद को तू शुद्ध कर ।

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“ये दिल क्या करे”

रो रोकर भी जब दिल ना भरे
बाद उसके ये दिल क्या करे ।

हद से ज्यादा जब किसी की याद सताये
खुद से ज्यादा खुद को जब कोई और भाये
रूह को जलाकर भी जब ये दिल ना भरे
बाद उसके ये दिल क्या करे

रो रोकर भी जब दिल ना भरे
बाद उसके ये दिल क्या करे ।

बीते लम्हों की कसक जब सीने में गहराये
फिर हौले हौले से वो पलकों पर उतर आये
दिल को तङपाकर भी जब ये दिल ना भरे
बाद उसके ये दिल क्या करे

रो रोकर भी जब दिल ना भरे
बाद उसके ये दिल क्या करे ।

जख्म जब कभी हरे हो जाते हैं
वक्त के साथ और गहरे हो जाते हैं
खुद को मिटाकर भी जब ये दिल ना भरे
बाद उसके ये दिल क्या करे ।

रो रोकर भी जब दिल ना भरे
बाद उसके ये दिल क्या करे ।।

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“ज़िंदगी जीने का हुनर ना आया कभी”

ज़िंदगी जीने का हुनर ना आया कभी
खुद को सताया, तो आज़माया कभी
ज़िंदगी जीने का हुनर ना आया कभी
खुद को रूलाया, तो हँसाया कभी
ज़िंदगी जीने का हुनर ना आया कभी ।

हर दफ़ा खुद को पाने की कोशिश करता रहा
बिखरी वो यादें भुलाने की कोशिश करता रहा
ज़िंदगी को दूर से तकते हुए फिर
कुछ पास आने की कोशिश करता रहा ।

अजनबी सफ़र में, तन्हाइयों के घर में
खुद को पाया, तो खोया कभी
ज़िंदगी जीने का हुनर ना आया कभी
खुद को सताया, तो आज़माया कभी ।

उङ चला नादां परिंदा, फिर मिला ना कभी
मुरझा गया वो पौधा, फिर खिला ना कभी
वक्त की साज़िश में, दर्द की बारिश में
बुझ गया वो दिया, फिर जला ना कभी ।

ख़्वाहिशों के आसमां में, रंज़-ओ-ग़म की शमां में
खुद को जलाया, तो बुझाया कभी
ज़िंदगी जीने का हुनर ना आया कभी
खुद को बनाया, तो मिटाया कभी ।

ज़िंदगी जीने का हुनर ना आया कभी
खुद को सताया, तो आज़माया कभी ।।

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“खुद से भी कभी इश्क़ कर”

खुद से भी कभी इश्क़ कर
खुद पे भी कभी कर यक़ीं
आसमां भी तुझ में दिखे
तुझ में खिले तेरी जमीं ।

ग़ैरों से मोहब्बत में तो, चाँद तारे तोङ लाता है
और खुद की जब बात आए, तो बेवजह शर्माता है
जाने क्यूँ ये बात कभी, तू समझ नहीं पाता है
खुद कंगाल होकर, मोहब्बत ग़ैरों पर लुटाता है

खुद से भी कभी इश्क़ कर
खुद पे भी कभी कर यक़ीं
ज़िंदगी तुझसे कहे ये
आकर गले तू लग कभी

खुद से भी कभी इश्क़ कर
खुद पे भी कभी कर यक़ीं
आसमां भी तुझ में दिखे
तुझ में खिले तेरी जमीं ।

कुछ पल मिले हैं तुझको, क्यूँ तू इनको गंवाता है
अच्छा बुरा वक्त है मेहमां, एक दिन गुज़र जाता है
देखकर भी यह हकीकत, अनदेखी कर जाता है
शीशे के महल में अक्सर, खुद से ही घबराता है

खुद से भी कभी इश्क़ कर
खुद पे भी कभी कर यक़ीं
आसमां भी तुझ में दिखे
तुझ में खिले तेरी जमीं ।।

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“मिट्टी मेरे गाँव की”

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जन्नत कहते है जिसे, वो धूल है माँ के पाँव की
जङे मेरी रहती जहाँ, वो मिट्टी है मेरे गाँव की ।

सुकून मिलता है जहाँ, बूढ़े बरगद की छाँव में
पुराने पीपल के नीचे, कौओं की कांव काँव में
सांझ ढ़ले गौधूलि वेला, लगता है बच्चों का मेला
अहसास होता हर दिन ये, शहर में हूँ कितना अकेला

रहमत कहते है जिसे, वो धूल है माँ के पाँव की
इंसान बना मैं जहाँ, वो स्कूल है मेरे गाँव की
जन्नत कहते है जिसे, वो धूल है माँ के पाँव की
जङे मेरी रहती जहाँ, वो मिट्टी है मेरे गाँव की ।

सुख साधन भले हो कम, नहीं है इसका कोई ग़म
धीरे धीरे विकसित हुआ, नहीं अब किसी से कम
स्वच्छ हवा स्वच्छ पानी, होती हर गाँव की निशानी
लौ लगाकर सुनो कभी, कहता ये खुद अपनी कहानी

राहत कहते है जिसे, वो धूप है ममता भरी छाँव की
जङे मेरी पनपी जहाँ, वो मिट्टी है मेरे गाँव की
जन्नत कहते है जिसे, वो धूल है माँ के पाँव की
जङे मेरी रहती जहाँ, वो मिट्टी है मेरे गाँव की ।।

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“दफ़्तर की नौकरी”

दफ़्तर की नौकरी
बोरिंग कोई छोकरी
बिना बात के चिपकी है
बिना याद कि हिचकी है
ऊपर से कर ले मेकअप
अंदर से तो पिचकी है
दफ़्तर की नौकरी
बोरिंग कोई छोकरी ।

हर वक़्त बस काम ही काम
मिलता नहीं दो पल आराम
पूछे जो कोई तुमसे तो
कहो के चल रहा है काम
दफ़्तर की नौकरी
बोरिंग कोई छोकरी ।

बाॅस ही यहाँ का कर्ता धर्ता
मेहनत से उसे फर्क़ नी पङता
ज्योंही नहीं की खुशामद तुमने
देखो फिर कैसे है अकङता
दफ़्तर की नौकरी
बोरिंग कोई छोकरी ।

दफ़्तर की नौकरी
बोरिंग कोई छोकरी
बिना बात के चिपकी है
बिना याद कि हिचकी है
ऊपर से कर ले मेकअप
अंदर से तो पिचकी है
दफ़्तर की नौकरी
बोरिंग कोई छोकरी ।।

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“खुद को पाने की ज़िद कर बैठा”

खुद को पाने की ज़िद कर बैठा,
मैं किस्मत आज़माने की ज़िद कर बैठा ।

तोङकर वो सारे बंधन अब,
आसमान पर छाने की ज़िद कर बैठा ।

औरों के घर बचाते बचाते आख़िर,
खुद अपना घर जलाने की ज़िद कर बैठा ।

खुली आँखों से देखा जो हर ख़्वाब तो, 
ख़्वाब सच कर जाने की ज़िद कर बैठा ।

खुद को दर्द पर दर्द दिए इस क़दर,
के सितम को ही सताने की ज़िद कर बैठा ।

ग़ैरों की चाहत में यूँ खुद से दूर होकर,
दूरियों को पास लाने की ज़िद कर बैठा ।

खुदग़र्ज़ इतना हुआ के ‘इरफ़ान’ वो,
खुद ही को मिटाने की ज़िद कर बैठा ।।

#RockShayar

“वो शब्द”

पूरे का पूरा शब्दकोश छान मारा,
मगर वो शब्द कहीं नहीं मिला मुझे ।

वो शब्द जिसे मैं बरसों से ढूँढ रहा हूँ,
वो शब्द जिसे मैं सपनों में खोज रहा हूँ ।

पता नहीं वो शब्द है भी के या नहीं ?
पता नहीं वो उपलब्ध है भी के या नहीं ?

हो सकता है यह मेरे मन का कोई भ्रम हो !
या भाग्य के दृश्य का अदृश्य कोई क्रम हो !

हो सकता है यह केवल मात्र एक कल्पना हो !
या खुली आँखों में बंद अधूरा कोई सपना हो !

पता नहीं उसकी ओर यूँ हौले हौले बढ़ रहा हूँ ?
या मन ही मन फिर से कहानी कोई गढ़ रहा हूँ ?

हो सकता है यह खोई हुई कहीं कोई दिशा हो !
या कई रातों से ना जागी ना सोई हुई निशा हो !

हो सकता है यह नियमित कालरूपी चक्र हो !
या असमय कुछ समय की चाल यूँही वक्र हो !

पूरे का पूरा शब्दकोश छान मारा,
मगर वो शब्द कहीं नहीं मिला मुझे ।

वो शब्द जिसे मैं सदियों से ढूँढ रहा हूँ,
वो शब्द जिसे मैं स्वयं में खोज रहा हूँ ।

तुम्हें मिले कहीं
तो बताना मुझे
वो शब्द…

वो शब्द…
जिसके लिए
कहने को मेरे पास
कोई शब्द नहीं ।।

#RockShayar

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं
प्रेम विरह करूणा तङपन
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।

जो कुछ मैं सोच रहा हूँ
जो कुछ मैं देख रहा हूँ
ज़रूरी तो नहीं वो सच हो
ज़रूरी तो नहीं वो कुछ हो ।

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं
राग द्वेष प्रकृति उपवन
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।

हज़ारों ख़याल आते हैं दिल में
हज़ारों सवाल उठते हैं दिल में
किसे थामू और किसे बुझाऊ ?
हज़ारों मशाल जलते हैं दिल में ।

कभी दर्द अपना सा लगता है
कभी इश्क़ अपना सा लगता है
बदलते रहते हैं मन के मिज़ाज
लिखना कोई सपना सा लगता है ।

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं
नदी पहाङ खेत आँगन
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।

काग़ज़ पर चंद लकीरें
ज़िंदगी को है जो उकेरे
मुझ को रिंझाती है यूँ
जैसे बीन बजाते सँपेरे ।

कभी कोई वजह मिल जाती है
कभी कोई अदा मिल जाती है
मन के अंधेरों से कोसों दूर
रात को जैसे सुबह मिल जाती है ।

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं
जन्म मृत्यु भाग्य जीवन
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।।

@rockshayar.wordpress.com

“सोमवार (Monday)”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

लाल तमतमाती आँखें, उस पर चेहरा रौबदार
हर प्राणी घबराये जिससे, दिन है वो सोमवार

बाद संडे के आता है जो, दिल में बेचैनी जगाता है वो
नींद की भी नींद उङ जाए, गीत ऐसे गुनगुनाता है वो

सुबह सुबह होङ मचती है, ओलम्पिक की दौङ मचती है
हर कोई भागता फिरता है, ज़िंदगी हर मोङ नचती है

हफ़्ते की शुरूआत इसी से, एनर्जेटिक जज़्बात इसी से
कामकाज़ का ये हमराज़, ऑफिशियल हर बात इसी से

सातों दिनों का ये सरदार, जैसे कोई तुग़लकी सरकार
मीठे मीठे झाँसे देकर, लगता और भी सनकी हर बार

स्कूल में जब हम पढ़ते थे, हाँ रोज बहाने गढ़ते थे
छुटकारा पाने के लिए इससे, झूठे फ़साने गढ़ते थे

हर रविवार की रात जो, डरावने सपने सा लगता है
बस एक अपनी ही रात वो, लुभावने अपने सा लगता है

कुसूर बस इतना, वार है ना कोई फ़ित्ना सा है
दिन होते हैं जैसे सब, ये भी कुछ उतना सा है

कूंदती फांदती साँसें, उस पर चेहरा रौबदार
हर मानव घबराये जिससे, दिन है वो सोमवार ।।

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Irfan Ali Khan
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“मुझे कुछ नही होगा पापा”

आपके होते हुए
मुझे कुछ नही होगा पापा
मैं जानता हूँ
हर पल आपको
मेरी कितनी फ़िक्र रहती है
हर दिन सोचता भी हूँ
बहुत इस बारे में
पर शायद कभी समझ नही पाऊंगा इसे ।

फोन पर रोज शाम को
जब आप बात करते हो
तब भी बस जल्दी से हालचाल पूछ कर
अम्मी को थमा देते हो मोबाइल ।

मुझे सब मालूम है पापा
आप उस वक्त कितने परेशान हो जाते है
जब कभी मैं फोन उठाने में देरी करता हूँ
जब कभी मैं बाइक पर होता हूँ
जब कभी मैं कहीं बाहर होता हूँ
जब तक आप मेरी आवाज़ नही सुन लेते है
तब तक चैन से बैठ नही पाते है ।

अम्मी से तो रोज खुलकर बात हो जाती है
जाने क्यूँ आपसे वो सब कह नही पाता हूँ
सीने में दबे हुए जो
मेरे अनछुँवे जज़्बात ।

जब कभी मैं घर आता हूँ
आपके चेहरे पर एक अलग ही खुशी दिखती है
सब कुछ मेरी पसंद का बनवाते है आप
अम्मी को कहते रहते है
हर घड़ी हर पल
आज ये बनाना, कल वो बनाना
जितने दिन भी यहाँ है
इसका ध्यान रखना
देखो बाहर का खाना खा खाकर
कैसा कमज़ोर हो गया है ।

घर से वापस जब रवाना होता हूँ
तब भी आप ख़ुदा हाफिज़ कहकर
नज़रों को यूँ फेर लेते हो
इधर उधर जल्दी से
ताकि मैं उन
गीली होती हुई पलकों को ना देख पाऊ ।

आपके होते हुए
मुझे कुछ नही होगा पापा
मैं जानता हूँ
हर पल आपको
मेरी कितनी फ़िक्र रहती है
हर दिन सोचता भी हूँ
बहुत इस बारे में
पर शायद कभी समझ नही पाऊंगा इसे ।

हाँ इतना ज़रुर जानता हूँ पापा
के मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ
पापा मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ ।।

#इरफ़ान

“टाइम अपना वहीं वेस्ट करो तुम”

टाइम अपना वहीं वेस्ट करो तुम
जहाँ कि अपना बेस्ट करो तुम
ना गिङगिङाओ ना रिक्वेस्ट करो तुम
बस इतना याद रखो कि अपना बेस्ट करो तुम
टाइम अपना वहीं वेस्ट करो तुम
जहाँ कि अपना बेस्ट करो तुम ।

जमके गाओ सबक ये पढ़ते जाओ
चलते जाओ बस आगे बढ़ते जाओ
ना ठहरो कहीं ना रेस्ट करो तुम
टाइम अपना वहीं वेस्ट करो तुम
जहाँ कि अपना बेस्ट करो तुम ।

दिल कहे जो काम वही करते जाना
अपनी नज़रों में खुद को आज़माना
कुछ भी ना विदाउट इंट्रेस्ट करो तुम
टाइम अपना वहीं वेस्ट करो तुम
जहाँ कि अपना बेस्ट करो तुम ।

हर सुबह उठकर करो अपने रब का शुक्राना 
खिलखिलाकर हँसने में तो नहीं कोई जुर्माना
हर दिन कुछ अलग कुछ नया टेस्ट करो तुम
टाइम अपना वहीं वेस्ट करो तुम
जहाँ कि अपना बेस्ट करो तुम

ना गिङगिङाओ ना रिक्वेस्ट करो तुम
बस इतना याद रखो कि अपना बेस्ट करो तुम
टाइम अपना वहीं वेस्ट करो तुम
जहाँ कि अपना बेस्ट करो तुम ।।

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“तेरा ही तो अंश हूँ मैं”

सर्प ना कोई दंश हूँ मैं, तेरा ही तो वंश हूँ मैं
जुदा ना कर मुझको यूँ, तेरा ही तो अंश हूँ मैं ।

तुझसे मिली ये ज़िंदगी, तुझसे मिला ये नाम
उँगली पकङकर तेरी ही, सीखा है मैंने हर काम
रूख़ से नज़रें फेरकर, ना देखे क्यूँ देखकर
सर्प ना कोई दंश हूँ मैं, तेरा ही तो वंश हूँ मैं
जुदा ना कर मुझको यूँ, तेरा ही तो अंश हूँ मैं ।

आदतें तेरी सब हैं मेरी, ताकतें तेरी सब हैं मेरी
तुझसे सीखा आगे बढ़ना, चाहतें तेरी सब हैं मेरी
फिर भी यूँ आँखें खोलकर, बोले ना कुछ बोलकर
सर्प ना कोई दंश हूँ मैं, तेरा ही तो वंश हूँ मैं
जुदा ना कर मुझको यूँ, तेरा ही तो अंश हूँ मैं ।

मान ले तू भी जान ले तू भी
तेरा ही हूँ मैं पहचान ले तू भी
सीने से लगा ले आँखों में बसा ले
दिल से अपना मान ले तू भी
सर्प ना कोई दंश हूँ मैं, तेरा ही तो वंश हूँ मैं
जुदा ना कर मुझको यूँ, तेरा ही तो अंश हूँ मैं ।।

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“ख़्वाब तेरे बुलाये तुझे”

ख़्वाब तेरे बुलाये तुझे, नींद से यूँ जगाये तुझे
दिन तेरा रातें तेरी, खुद से हो बातें तेरी
दर्द तेरा आहें तेरी, खुद से हो राहें तेरी
ख़्वाब तेरे बुलाये तुझे, नींद से यूँ जगाये तुझे ।

बादलों के पार है जो, वतन गुलज़ार है जो
औरों से नहीं फ़क़त, खुद से प्यार है जो
प्यार वही बुलाये तुझे, बाहों में अपनी सुलाये तुझे
ख़्वाब तेरे बुलाये तुझे, नींद से यूँ जगाये तुझे ।

दिल की सुन ले तू, ख़्वाब नये बुन ले तू
औरों की नहीं फ़क़त, अपनी ही सुन ले तू
आवाज़ वही बुलाये तुझे, नींद से यूँ जगाये तुझे
ख़्वाब तेरे बुलाये तुझे, नींद से यूँ जगाये तुझे

मन तेरा यादें तेरी, तुझ से हो बातें तेरी
मैं तेरा तू है तेरी, खुद से हो मुलाकातें तेरी
ख़्वाब तेरे बुलाये तुझे, नींद से यूँ जगाये तुझे
दिन तेरा रातें तेरी, खुद से हो बातें तेरी
दर्द तेरा आहें तेरी, खुद से हो राहें तेरी ।।

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“भूल कभी ना भूल से”

भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से
इरादे हो तेरे गर आसमानी
हो चाहे हर शय की ज़बानी
चलते चलते यूँ बेफ़िजूल से
मिलना है इक दिन धूल से
भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से ।

कमा ले जितनी मालो दौलत
बना ले जितनी शानो शौकत
रह जायेगी सब धरी की धरी
बात समझ ले यह ख़री ख़री 
गिरते पङते यूँही उसूल से
मिलना है इक दिन धूल से
भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से ।

ज़िंदगी तूने जैसे भी जी
बंदगी तूने कैसे भी की
हिसाब होगा हर एक चीज का
बोये गए हर एक बीज का
फलते फूलते यूँही फिजूल से
मिलना है इक दिन धूल से
भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से ।

भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से
इरादे हो तेरे गर आसमानी
हो चाहे हर शय की ज़बानी
चलते चलते यूँ बेफ़िजूल से
मिलना है इक दिन धूल से
भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से ।।

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“अभी तय करने हैं सफ़र कई”

अभी तय करने हैं सफ़र कई
बाक़ी हैं अभी मंज़िलें कई
अभी तो मैदान जीता है
पहाङो पर बने हैं किले कई
अभी तय करने हैं सफ़र कई
बाक़ी हैं अभी मंज़िलें कई ।

मेहनत करो तो सब मिलता है
जब चाहो वो तब मिलता है
कह गए वो सब पीर फ़कीर 
चाहत हो सच्ची तो रब मिलता है
अभी फ़तह करने हैं डर कई
बाक़ी हैं सहमे हिस्से कई
अभी तो उन्वान लिखा है
बाक़ी है अभी तो किस्से कई 
अभी तय करने हैं सफ़र कई
बाक़ी हैं अभी मंज़िलें कई ।

दिल की सुनो है वही सच्चा
जैसे हो कोई मासूम बच्चा
खुद को बना लो मज़बूत इतना
के ना रहे फिर कोई घाव कच्चा
अभी जय करने है सिकंदर कई
सीने में छुपे बवंडर कई
अभी तय करने हैं सफ़र कई
बाक़ी हैं अभी मंज़िलें कई ।

अभी तय करने हैं सफ़र कई
बाक़ी हैं अभी मंज़िलें कई
अभी तो मैदान जीता है
पहाङो पर बने हैं किले कई
अभी तय करने हैं सफ़र कई
बाक़ी हैं अभी मंज़िलें कई ।।

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“वीडियो मेरा यूट्यूब पर, वायरल हो गया”

हो गया जी हो गया, वायरल हो गया
वीडियो मेरा यूट्यूब पर, वायरल हो गया

ताबड़तोड़ लाइक्स मिले
देख के जिनको चिक्स खिले
फैन फॉलोइंग ऐसी हुई
के सारे वो क्रिटिक्स हिले

हो गया जी हो गया, प्रोफेशनल हो गया
वीडियो मेरा यूट्यूब पर, वायरल हो गया

फेसबुक ट्विटर पर छाया
सबके मन को बड़ा ये भाया
व्यूज इत्ते सारे मिले
के लेकर सेल्फ़ी मैं इतराया

हो गया जी हो गया, प्रोमोशनल हो गया
वीडियो मेरा यूट्यूब पर, वायरल हो गया

सेलेब्रिटी सी फीलिंग आई
अब जाकर वो हीलिंग आई
सीने में हलचल ऐसी हुई
के मिला हो जैसे बिछुड़ा भाई

हो गया जी हो गया, अनबीटेबल हो गया
वीडियो मेरा यूट्यूब पर, सेंसेशनल हो गया

हो गया जी हो गया, वायरल हो गया
वीडियो मेरा यूट्यूब पर, वायरल हो गया ।।

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“ज़िंदगी का सफ़र नया नया सा लगे”

हर दिन कुछ नया नया सा लगे
ज़िंदगी का सफ़र नया नया सा लगे
सपने हज़ार लिए आँखों में कहीं
हर सपना कुछ नया नया सा लगे    
हर दिन कुछ नया नया सा लगे
ज़िंदगी का सफ़र नया नया सा लगे ।

पल हैं जितने भी, जी ले इन्हे 
खुशियाँ हो ग़म चाहे, पी ले इन्हे
हर सुबह नींद से इस तरह उठ 
के नज़ारा वो खुद नया नया सा लगे
हर दिन कुछ नया नया सा लगे
ज़िंदगी का सफ़र नया नया सा लगे ।

आज कल और आज में है तू
याद रख बस इतना, आज में है तू
हर दिशा पंख अपने यूँ फैला ज़रा
के मंज़र वो खुद अलहदा सा लगे   
हर दिन कुछ नया नया सा लगे
ज़िंदगी का सफ़र नया नया सा लगे ।

सफ़र ही खुद हमसफ़र हमनवा सा लगे
ख़्वाहिशें हज़ार पाले हुए आँखों में कहीं  
हर ख़्वाहिश में तू नया नया सा लगे
हर दिन कुछ नया नया सा लगे
ज़िंदगी का सफ़र नया नया सा लगे ।।

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“सैलाब आ गया”

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उजङ गई वो बस्तियां
डूब गई सब कश्तियां
पशु पक्षी और इंसान
बह रहे हैं निर्जीव समान
ज़मी पर ग़ालिब है कुदरत
लगता है फिर सैलाब आ गया
लगता है फिर सैलाब आ गया ।

हर तरफ पानी ही पानी
कायनात लग रही है फ़ानी
नदी दरिया और समंदर
बन गए सब मौत के खंज़र
इंसां के लिए ज़ाहिर है इबरत
लगता है फिर सैलाब आ गया
लगता है फिर सैलाब आ गया ।

वबा फैली है चारो ओर
थम रहा साँसों का शोर
पेङ जंगल और पहाङ
बाक़ी बचा केवल उजाङ
आसमां से नाज़िल है आफ़त
लगता है फिर सैलाब आ गया
लगता है फिर सैलाब आ गया ।

जिधर देखो लाशों के ढ़ेर
सिर नहीं, कहीं नहीं है पैर
झुग्गी झोपङी और मक़ान
ग़रक़ हो गए खेत दुकान
इंसां से ख़फ़ा है कुदरत
लगता है फिर सैलाब आ गया
लगता है फिर सैलाब आ गया ।।

#राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान
Audio Poem

“Comedy Nights with Kapil”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

Comedy-nights-with-kapil poem cmpressed.jpg

हँसी ठहाकों की बारिश में, झूमे नाचे गाए ये दिल
टीवी शोज में न. वन, कॉमेडी नाइट्स विद कपिल

कलर्स पर हर संडे को, लगती है खुशियों की सेल
ज़िंदगी के रंज़ो ग़म को, कहते जहाँ सब गो टू हेल

जीतेंगे हम अपनी बाज़ी, कहते आए सिद्धू पाजी
रॉकिंग है शायरी इनकी, थोको गुरु ताली वाह जी

कभी बिट्टू, कभी सिट्टू, कभी बने जो शमशेर
ब्लॉकबस्टर बंदा कपिल, उसके आगे सब है ढ़ेर

एक्टर प्रोड्यूसर सिंगर क्रिकेटर, या हो बॉलीवुड ब्यूटीज
इस घर में सब आते है, विदाउट नख़रा फॉर्मल ड्यूटीज

पलक और गुत्थी की जोङी, जैसे भागे उल्टी घोङी
मेहमानों की टांग खींचे, डांस की तो कमर है तोङी

कहती है यूँ तो खुद को, ट्वेंटी टू यर ओल्ड बुआ
देखा ज्योंही चिकना मुंडा, दिल से उठता है धुआँ

बुनियाद है मजबूत जिसकी, वो है टल्ली डॉली दादी
शगुन की पप्पी लेकर, हाँ बनती है फिर भोली भाली

नेशनल हाईवे की तरह, होंठ है जिसके वर्ल्ड वाइड
शर्माजी की पत्नी मंजू, करती है हर रोज ही फाइट

पतीले सा मुँह है जिसका, वो है नौकर राजू इनका
दूध दे ना दे बकरी, पर खाती है लाखों का तिनका

कहानी में एक यू टर्न, नाम है उसका रामू दुबई रिटर्न
पैसों की कोई कमी नहीं हैं, भरता रोज आयकर रिटर्न

खटारा बस की तरह, वाइब्रेट करता है चड्डा ठाला
फोन आ रहा है मेरा, कहके कट लेता है बुड्ढा साला

हँसी ठहाकों की बारिश में, झूमे नाचे गाए ये दिल
टीवी शोज में न. वन, कॉमेडी नाइट्स विद कपिल ।।

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“लहू के चंद क़तरे”

After Blood Donation….Emotions…

Blood donat2.jpg

लहू के चंद क़तरे देकर
आज मैंने ये जाना है
इंसानियत से बढ़कर कुछ नहीं है
आज मैंने ये माना है
बह जाता है अक्सर जो
झगड़े फसाद में हर रोज
बचा सके गर ज़िन्दगी वो
इससे बेहतर और क्यां है
ख़ुदग़र्ज़ियों में जीते जीते
ख़ामोशियों को पीते पीते
खूं की वो उम्दा अहमियत
रूह की वो ज़िंदा कैफ़ियत
रिश्तों से बड़ी इंसानियत
आज मैंने ये जाना है
आज मैंने ये माना है ।।

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“The College Days”

‪#‎ObjectOrientedPoems(OOPs)

College Days poem.jpg

       “दी कॉलेज डेज”

ज़िंदगी में है गर कुछ रियल क्रेज़
तो वो है ऑनली दी कॉलेज डेज

ख़्वाबों ख़ाहिशों की ये दुनिया गज़ब
पलभर में जाने यूँ गुज़र जाती है कब

नये नये चेहरों से होता है इन्ट्रो यहाँ
कोई इक्का तो कोई छुपा मैस्ट्रो यहाँ

बर्थडे पार्टी मस्ती धमाल जब भी छाये
घर से ज्यादा मन को हॉस्टल ही भाये

क्लास में बैठना है हमेशा लास्ट रॉ में
ध्यान मगर अटका रहता है फर्स्ट रॉ में

सोचते रहते ऊफ्फ कब ऑवर होगा ये लेक्चर
लंच में आख़िर देखनी भी तो है वो अधूरी पिक्चर

कैन्टीन ही है यहाँ सबका फेवरेट अड्डा
तैयार मिलता जहाँ रोज एक नया फड्डा

फर्स्ट ईयर में सीनियर्स का ख़ौफ़ सताये
फ्रेशर्स में मगर वोही सब तो गले लगाये

एग्जाम्स के दिनों में नक्शा ही बदल जाता
एन्टी ग्रुप भी हर वक़्त तभी साथ नज़र आता

किताबें नोट्स हर तरफ रहता जिनका बोलबाला
पेपर ज्योंही खत्म हुए लग जायेगा इन पर ताला

मस्तियाँ शरारतें तूफ़ानिया अदावतें
शैतानियाँ हिमाकतें, लड़कपन वो चाहतें
कॉलेज लाइफ मिक्सचर है इन सबका

हो गर मेरी बात से आप सब जो एग्री
तो दिल से बोलो ना फिर एक बार ये भी

के ज़िंदगी में है गर कुछ रियल क्रेज़
तो वो है ऑनली दी कॉलेज डेज
तो वो है ऑनली दी कॉलेज डेज ।।
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“सुना है तू दिलों के हाल जानता है”

सुना है तू दिलों के हाल जानता है
मुझको मुझसे ज्यादा पहचानता है
बस इतना बता दे मुझको मेरे मौला
ये मन मेरी क्यों नहीं मानता है
सुना है तू दिलों के हाल जानता है
मुझको मुझसे ज्यादा पहचानता है ।

इबादत करके तेरी मैं क्या जताऊ
रंज़-ओ-ग़म तुम्हें अपना कैसे बताऊ
दर्द बहुत उठता है सीने में या रब
खुद को अब और कितना सताऊ
बस इतना बता दे मुझको मेरे मौला
खुद को अब मैं कैसे समझाऊं ।

सुना है तू दिलों के हाल जानता है
मुझको मुझसे ज्यादा पहचानता है
बस इतना बता दे मुझको मेरे मौला
ये मन मेरी क्यों नहीं मानता है ।

तमाम कोशिश करके मैं हार गया
आँखों में है मगर वो इक़रार बयां
सुन ले खुदाया तू अब मेरी पुकार
खुद से लङते लङते मैं हार गया
बस इतना बता दे मुझको मेरे मौला
कहाँ इस ज़िंदगी का क़रार गया ।

सुना है तू दिलों के हाल जानता है
मुझको मुझसे ज्यादा पहचानता है
बस इतना बता दे मुझको मेरे मौला
ये मन मेरी क्यों नहीं मानता है ।।

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“क्यों ठहर गया है तू चलते चलते”

क्यों ठहर गया है तू चलते चलते
क्यों बुझ गया है तू जलते जलते 

अभी तो कई सफ़र बाक़ी हैं
अभी तो कई डगर बाक़ी हैं
रूकना तेरी कुदरत में नहीं
अभी तो कई शहर बाक़ी हैं

क्यों ठहर गया है तू चलते चलते
क्यों बुझ गया है तू जलते जलते ।

किस बात का डर है तुझे 
किसलिए तू घबरा रहा है
किस अंजाम़ की फ़िक्र है तुझे
किसलिए तू कतरा रहा है
सीखा है चलना यूँ गिरते सम्भलते
क्यों ठहर गया है तू चलते चलते
क्यों बुझ गया है तू जलते जलते ।

खुद पर यक़ीन क्यों नहीं करता है
परछाइयों से अपनी क्यों नहीं लङता है
जो करना है, तुझे करना है
खुद से ये इक़रार क्यों नहीं करता है
पाया है खुद को यूँ गिरते सम्भलते
क्यों ठहर गया है तू चलते चलते
क्यों बुझ गया है तू जलते जलते ।।

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“कोशिश है, कुछ नया करने की”

कोशिश है, कुछ नया करने की
देखा नहीं जो, वो बयां करने की
पता नहीं इसका अंज़ाम क्या होगा
पता नहीं इसका नाम क्या होगा

एक ख़ाहिश है दिल की सुनने की
आज़ाद राहें अपने लिए चुनने की
कोशिश है, कुछ नया करने की
देखा नहीं जो, वो बयां करने की ।

चाहे कुछ भी करो, डर से ना डरो
टूटोगे ना कभी, खुद से ये वादा करो
जब तक तुम कहीं आगे नहीं बढ़ोगे
दास्तान वो अपनी खुद कैसे गढ़ोगे

एक आज़्माइश है ख़्वाब बुनने की
अपने भीतर की आवाज़ सुनने की
कोशिश है, कुछ नया करने की
सबसे जुदा, अलहदा करने की

कोशिश है, कुछ नया करने की
देखा नहीं जो, वो बयां करने की
ज़िंदगी का हक़ अदा करने की
कोशिश है कुछ नया करने की ।।

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