“परवाज़”

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बाज़ूओं पर हौसलों के पर लगाकर
उङ चला फिर से बँजारा मन मेरा
भटकते हुए नादां परिंदे की तरह
ख्वाबों के जहां से कई दफ़ा गिरा
आसमां छूने सौ बार फङफङाया
आखिर में परवाज़ का हुनर आ ही गया
हर चोट में सदा-ए-ज़िन्दगी नुमायाँ
मुश्किल हालात ने जीना सिखाया
रूह की ज़ीनत बन गया हैं जूनून
सिफ़ात होने लगी फिर शायराना
दर्द पीने की वो सलाहीयत आ गई
ज़ईफ होने लगी ख़लिश की दीवारें
साँसों से आ रही यूँ ख़ुशबू रूहानी
मौला के इश्क़ में बन गया मैं सूफ़ी
इरादों में हिम्मती ज़ज्बा जगाकर
बह चला फिर से आवारा मन मेरा
छलकते मचलते दरिया की तरह
कई दफ़ा बुझा साज़िश के झोंके से
बुलन्दी छूने हर बार फङफङाया
आखिर में परवाज़ का हुनर आ ही गया

 

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“ख्वाज़ा पिया”

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लग्ज़िशों से भरा हैं क़ल्ब मेरा
हसरत-ए-दीदार की ख़्वाहिश लिये
भटक रहा इक अरसे से यहाँ
तेरी गली जो आया हूँ ख्वाज़ा पिया
सूफ़ी रंग में मुझको मैं नज़र आया
पिघलकर बहने लगे कच्चे करम
मैली ये रूह शफ़्फ़ाक होने लगी फिर
शाम-ओ-सहर तलाशता रहा मैं जिसको
वो एहसास मुझको अब तेरे दर पर मिला…
गुनाहों से ज़र्द हैं वज़ूद मेरा
दुआ-ए-मग़फ़िरत की गुज़ारिश लिये
जल रहा कई बरसो से यहाँ
तेरी गली जो आया हूँ ख्वाज़ा पिया
सूफ़ी रंग में मुझको मैं नज़र आया
झड़कर गिरने लगे झूठे भरम
क़ैद से साँसे आज़ाद होने लगी फिर
दर बदर भटकता रहा मैं जिसके लिए
वो ‘इरफ़ान’ मुझको यूँ तेरे दर पर मिला

आओं चलें इरफ़ान की गली

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On birthday of my dear brother Irfan Ali Khan (The Rockshayar) I wtote a poetry for him…

लफ्ज़ो को हँसते मुस्कुराते ,
गमगीन हो आंसू बहाते ..
किसी ने देखा है कभी…

गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली …
आओं चलें फिर इरफ़ान की गली…

समन्दर से वसीह दिल में.. लहरों की तरह जज़्बात उठते
उन लहरों से उठते जज़्बातों को लफ़्ज़ों में तब्दील करते
किसी को देखा है कभी…“
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली …
आओं चलें फिर इरफ़ान की गली…

रूहानियत की कलम में स्याही शिद्दत की भरकर
इक कोरे कागज़ को अनमोल बनाते
किसी को देखा है कभी..
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली …
आओं चलें फिर इरफ़ान की गली…

एक शख़्श में छुपी हजार शख्शियतें
एक इन्सां को एलियन में तब्दील होते
उम्र गुज़ार खुद में अंदाज़-अलहदा पाते
किसी को देखा हैं कभीं..
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली …
आओं चलें फिर इरफ़ान की गली…

गर्दिशों के सियाह अंधेरो में चश्मा-ए-नूर बहाते
हादसों में खुद ही को खुद का हौसलां बढ़ाते..
हर गम की ख़ुशी मनाकर…गम को confuse करते
किसी को देखा है कभी..
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली…
आओं चलें फिर इरफ़ान की गली..

    (c) Ashif Khan

 

 

“फ़ुतूर”

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ना मेरा दर्द महसूस किया
ना मेरा इश्क़ कभी
फिर भी ये पागल दिल
ज़िद किये बैंठा हैं, बस तेरी
लाख कोशिश करके, मैं हार गया
फ़ुतूर मगर अब भी यूँही हैं, मुझमें कहीं
ख़त्म ही नहीं होता
वक़्त का लम्बा सफ़र
हर दफ़ा बेरुख़ी के साये
यूँ आकर रूह जलाते रहते
ना मेरे एहसास को छुआ
ना मेरे जज़्बात कभी
फिर भी ये नादां दिल
आरज़ू लिए बैंठा हैं, बस तेरी
लाख मिन्नत करके, मैं हार गया
फ़ुतूर मगर आज भी यूँही हैं, मुझमें कहीं
ख़त्म ही नहीं होता
वक़्त का लम्बा सफ़र
हर दफ़ा तन्हाई के वक़्फ़े
यूँ आकर मुझे जलाते रहते

“फितरत-ए-इन्सां”

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Dedicated to the victims of Gaza Strip Conflict which included mostly children and women…
COME LIGHT, LIGHT OF GOD, GIVE LIGHT TO CREATION
ENLIGHTEN OUR HEARTS AND REMAIN WITH YOUR WORLD

तौबा करके फिर वो गुनाह करता हैं
ज़िन्दगी को बस यूँही फ़ना करता हैं

सियाह आमालों पर पर्दा डालकर
नेकियों की तक़रीर सुना करता हैं

नफ़्स की वहशत में अँधा होकर
कायनात के मन्ज़र तबाह करता हैं

मज़हब के तराज़ू में ना तोलो इसे
शैतान क्यां कभी फ़लाह करता हैं

ताउम्र नफ़रत का सौदागर रहा वो
दहशतगर्द मगफ़िरत की दुआ करता हैं

क़यामत की घड़ी नज़दीक हैं इरफ़ान
इन्सां अब इन्सां को ज़िबह करता हैं

(c) RockShayar

तौबा – Regret फ़ना – Destroy
सियाह – Dark आमाल – Doing
तक़रीर – Speech नफ़्स – Sense
वहशत – Wildness कायनात – Universe
मन्ज़र – Scene फ़लाह – Virtue
दहशतगर्द – Terrorist मगफ़िरत – Forgiveness
क़यामत – Day of Judgement
ज़िबह – Murder

“सादगी”

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तेरी पलकों पर हया रहती हैं
सुरमई दो आँखें दुआ करती हैं

सादगी का एहसास हैं रूह
नमाज़ी की तरह सना पढती हैं

शैदा हो जब साँसों का दौर
खुशबू में तेरी वफ़ा बहती हैं

ख़्वाब में पलभर मुलाकात
दर्द से मुझको शिफ़ा देती हैं

पेशानी पर रखा इक चाँद
नूर से जिसके सुबह होती हैं

रूख़ की मासूमियत छूकर
ख़ामोशी यूँ मरहबा कहती हैं

“शाम”

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बादल छुप गए सुनहरी ओंट में
सूरज की साँसों से उठ रहा ग़ुबार
परिंदों के हुज़ूम घर लौटने लगे
शाम ढलने का यूँ हुआ एहसास 

“साहिर-ए-हर्फ़” (My little poetic feel for The Legendary Gulzar Sahab)

My little poetic feel for The Legendary Gulzar Sahab……Wish you a very happy birthday sir….
 
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अर्श से पिघलकर
नूर का इक कतरा
छलका था ज़मीं पर कहीं
उसी मिट्टी से बना हैं ये शख़्स
अल्फ़ाज़ यूँ सब महकते इसके
जैसे साँसों में बह रहा हो ख़ुमार
कलम को जब वो छुए
बेज़ान पुर्ज़े ज़िन्दा होने लगे
एहसास को पीकर
शबनम का इक बादल
बरसा था कायनात में कहीं
उसी बारिश में उगा हैं ये शख़्स
लफ़्ज़ यूँ संग थिरकते इसके
जैसे साहिर बदल रहा हो ख़्याल
कागज़ पर जब हर्फ़ रखे
ख़ामोश लम्हें बात करने लगे
रूहानियत का वो रहबर
खुशबू जिसकी “गुलज़ार”

“लफ़्ज़ तराश”

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इन्सां हूँ इन्सानियत की बात करता हूँ
मैं दिल जोङने की वकालात करता हूँ

रूह की बेचैनी को औज़ार बनाकर
मैं लफ़्ज़ तराशने का काम करता हूँ

ज़िन्दगी का सुर्ख़ अर्क़ निचोड़ते हुए
यूँ बयां क़ैफ़ियत के साथ करता हूँ

ज़हन से टपकते ख़्याल बटोरकर
कागज़ पे सब्ज़ एहसास भरता हूँ

माशरे के हालात को महसूस कर
कलम से बुराई पर वार करता हूँ

अशरफ़ुल मख्लूक़ हूँ याद रखते हुए
ये हयात सच्चाई के नाम करता हूँ

“शैदाई”

 

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शरीक हैं तेरा साया मुझमें इस कदर
ज़र्रे ज़र्रे में अब तू ही तू शाम-ओ-सहर

साँसों की खुशबू तेरे होने का एहसास
सोहबत यूँ पाकर ज़िंदा हुए अल्फ़ाज़

मुहब्बत कहूँ इसे या कहूँ मैं इबादत
इक रूह के लिए शैदाई मेरा किरदार

नुमाया हैं तेरा वज़ूद मुझमें इस कदर
ज़िस्म-ओ-जां में तू ही तू अब हर पहर..

आँखों की रंगत होश खोने का इक़रार
ख्वाबों पर हक़ीक़त से ज्यादा ऐतबार

चाहत कहूँ इसे या कहूँ मैं अक़ीदत
इक शख़्स के लिए दिल रहे बेक़रार

शामिल हैं तेरा अक्स मुझमें इस कदर
हर बशर में यहॉं तू ही तू शाम-ओ-सहर

 

“तराना-ए-हिन्द”

 

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ज़श्न-ए-आज़ादी कुछ ऐसे मनायें हम
सरफ़रोशी की शमां दिल में जलाये हम

अपना फ़र्ज़ ईमान से अदा करते हुए
हिन्द को दुनिया का सरताज़ बनाये हम

मुल्क़ में फैली बुराईयों के ख़िलाफ़
इंक़िलाब का बिगुल फिर से बजाये हम

शहीदों की क़ुर्बानी याद करते हुए
मुक़द्दस तिरंगा शान से फहराये हम

वतन की मुहब्बत का ज़ज़्बा लिए
अपनी प्रतिभा ज़माने को दिखायें हम

सरहद की हिफाज़त में डटें हुए
रणबांकुरों को सर आँखों पर बिठायें हम

देश के लिए जान-ओ-तन लुटाकर
मिटटी का क़र्ज़ अब लहू से चुकायें हम

हँसते हँसते जां निसार करते गए
शहादत के वो किस्से फ़ख़्र से सुनाये हम

सबको बराबरी का हक़ दिलाते हुए
आज़ादी के सही मायने सिखलाये हम

मेहनत और लगन से आगे बढ़ते हुए
हर सूबे में अपना परचम लहराये हम

मज़हब, जुबां, नस्ल से ऊपर उठकर
तराना-ए-हिन्द आज यूँ गुनगुनाये हम

जश्न-ए-आज़ादी कुछ ऐसे मनाये हम
ग़ुल हैं हिन्दोस्तां आओं इसे सजाये हम

Copyright (c) RockShayar 2014
All rights reserved

 

 

“मशाल”

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ख़ामोश रहने का अब वक़्त नहीं
सुना फिर कोई फड़कती दास्तां
अँधेरा तुझे निगलने को बेताब हैं
बन जा तू एक दहकती मशाल
हर ओर छाये साज़िश के बादल
इरादों की लपट से इन्हे पिघला
वज़ूद मिटाने को तैयार शातिर
नाकाम कर उसकी हर ख़्वाहिश
खाक़ छानकर किस्मत चमका
दर्द का क़तरा ना बाक़ी रहे फिर
आँसू बहाने का अब वक़्त नहीं
साँसों में भर ले हिम्मती तूफ़ान
मायूसी तुझे निगलने को बेक़रार हैं
जला दे तू फिर वो बुझती मशाल

“रहनुमा”

 

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चाहत का बादल, पलकों पर ठहर जाता हैं
मुझको तेरा साया, हर शै में नज़र आता हैं

साँसों में महफूज़ हैं, अब तक वो एहसास
जब भी मैं सोचता हूँ, रूह में उतर आता हैं

दर बदर भटका बहुत, ना मिल पाया सुकूं
दिल को जाने क्यूँ, बस तेरा शहर भाता हैं

सितारों का शामियाना, रातभर ओढ़े हुए
चाँद तेरे दीदार को, ज़मीं पर उतर आता हैं

सुरमई इन निगाहो में, जब कभी डूबता हूँ
रौशनी से धुला, इक रहनुमा उभर आता हैं

ग़ज़ल की ज़ुबां में, बयां कर रहा इरफ़ान
मुझको तेरा नक्श, हर लफ्ज़ में नज़र आता हैं

“इब्तिदा-ए-इश्क़”

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तेरा दूर होकर भी मेरे पास होना
आँखों आँखों में वो सब कह देना
तन्हाई में रेशमी ख़्वाब बुन लेना
चाँदनी को रूख़ पर यूँ सजा देना
इब्तिदा-ए-इश्क़ का आलम हैं ये

ज़िस्म को छूकर रूह महकने लगी
पल पल हर पल साँसे बहकने लगी
तू जब मुस्कुराये खिल उठे बहार
खामोश लम्हे फिर जी उठे हर बार
मेरे सब अल्फ़ाज़ तुमसे ही ज़िंदा हैं
तेरा वो एहसास मुझमें यूँ जाविदां हैं

ज़ुदा होकर भी तेरा मेरे साथ होना
बातों बातों में यूँही हक़ जता देना
दिल में गहरे ज़ज्बात छुपा लेना
हयात को मेरी जन्नत बना देना
इब्तिदा-ए-इश्क़ का आलम हैं ये

“ताना-ए-हिफ़ाज़त”

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This poem is dedicated to the holy relation of brother n sister…..Happy RakshaBandhan

ज़मीं पर एक रिश्ता हैं सबसे ज़ुदा
क़ैफ़ियत जिसकी पाकीज़ा नूरानी
भाई बहन की तकरार में सदा ही
निर्मल स्नेह की झलक नज़र आती हैं
बचपन की वो खट्टी मीठी शरारतें
जब याद आये तो पलकें भींग जाती हैं
जिन्दगी के हर मोङ पर बहन हमेशा
सच्चे दोस्त का फर्ज़ निभाती हैं
कलाई पर बन्धा हुआ ये रेशमी धागा
याद दिलाता हैं हिफ़ाज़ती कसम की
फौलाद सा मजबूत हैं जिसका ताना बाना
अल्फ़ाज नही हैं अब और मेरे पास
बयां कर सके जो इस पवित्र बंधन को
लेकिन इतना जरूर कहूँगा कि
रिश्ते की यह डोर हैं सबसे ज़ुदा
सिफ़ात हैं जिसकी मुकद्दस रूहानी

“बरसात”

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काली काली घटाए, गरज़ते हुए बादल
आसमां की आँखों में, फैल रहा काजल
टिप टिप बरस रहा हैं, आज यूँ सावन
हरी भरी चादर में, लिपटी हुई हैं ज़मीं
धूल से सने हुए ये सब्ज़ पत्तें
झेल रहे बूंदो के बाण, यूँ हँसते हुए
बन्दिशों से जैसे, रिहाई हुई हो अभी
मिट्टी की सीलन से हौले हौले
कुशादा हो रही दरख़्त की जङे
भींगी भींगी ये साँसे, काँप रही हैं
गर्म चाय की भांप, ताप रही इन्हें
गीला गीला सा हैं, हर एहसास
नज़र आने लगे हैं, बहार के निशां
फिर से ज़िन्दा हो रही हैं ज़िन्दगी
शायद, बरसात की अलामत हैं ये

“ख़ानाबदोश फ़ितरत”


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बहती हवा के संग संग
चल पड़ा हूँ
अनजानी राहों पर
ना कोई हमसफ़र हैं
ना कोई ठिकाना
साथ हैं बस
मेरी ख़ानाबदोश फ़ितरत
कभी यहाँ कभी वहाँ
हर पल यूँही चलते जाना
रूकना इसकी आदत नहीं
जैसे दिल में ख़्वाहिश
आसमां में सूरज
ज़मीं पर ज़िन्दगी
कभी थमती नहीं
चलती रहती हैं सदा
वैसे ही इक आग हैं, मुझमें कहीं
जो बस जलती रहती हैं
आहिस्ता आहिस्ता, भीतर भीतर
मुख़्तलिफ़ रंगो में डूबे नज़ारे
कदम कदम पर
बाहें खोलें हुए यूँ मिलते हैं
बैचैन रूह को गले लगाकर
साँसों की जुम्बिश पर
थिरकते रहते हैं, हसीं लम्हें
उड़ते हुए, मचलते हुए
लहराती फ़िज़ा के साथ साथ
निकल पड़ा हूँ
अजनबी रास्तों पर
ना कोई रहबर हैं
ना कोई फ़साना
साथ हैं बस
मेरी ख़ानाबदोश फ़ितरत
कभी यहाँ कभी वहाँ
हर घडी यूँही चलते जाना
रुकना इसकी आदत नहीं

— (c) RockShayar —

“जी भर के जी ले”

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जी भर के जी ले यारा
छोटी सी हैं ज़िंदगानी
ना कुछ संग लाया तू
ना कुछ संग जाना तेरे
मिटटी से बना ये जिस्म
मिटटी में मिल जायेगा आखिर
तो छोड़ फिर सब फ़िक्र-ओ-ग़म
पीले जुनूं का प्याला भरकर
खुशियों से रूह तर कर ले
वक़्त फिसलता जा रहा हैं
हर लम्हा तू खुलकर जी ले
इससे पहले के दम निकले  
यारा तू बस..जी भर के जी ले