“तुम्हारे साथ आजकल, यूँ हर जगह रहता हूँ मैं”

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तुम्हारे साथ आजकल, यूँ हर जगह रहता हूँ मैं
हद से ज्यादा सोचू तुम्हें, बस यहीं सोचता हूँ मैं

पता नहीं हमारे दरमियान, यह कौनसा रिश्ता है
लगता है के सालों पुराना, अधूरा कोई किस्सा है

तुम्हारी तस्वीरों में मुझे, अपना साया दिखता है
महसूस करता है जो यह मन, वहीं तो लिखता है

तुम्हारी आवाज़ सुनने को, हर पल बेक़रार रहता हूँ
नहीं करूँगा याद तुम्हें मैं, खुद से हर बार कहता हूँ

नाराज़ ना होना कभी, बस यहीं एक गुज़ारिश है
महकी हुई इन साँसों की, साँसों से सिफ़ारिश है

बदल जाएं चाहे सारा जग, पर ना बदलना तुम कभी
ख़्वाबों के खुशनुमा शहर में, मिलने आना तुम कभी

प्यार तो हो गया है, अब क्या किया जा सकता है
अब तो बस एक दूसरे पर, भरोसा किया सकता है

बेनाम रिश्ते को चलो हम, बेनाम ही रहने देते है
खुद को इस तरह से खुद में, आज़ाद बहने देते है

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“इतना प्यार करती हो मुझ से”

इतना क्यों डरती हो मुझ से,
शायद प्यार करती हो मुझ से ।

दिल में दबाकर जज़्बात अपने,
रोज इक़रार करती हो मुझ से ।

मना करती हो जिन बातों से,
वहीं हर बार करती हो मुझ से ।

आँखों में देखता हूँ जब भी,
सवाल हज़ार करती हो मुझ से ।

कुछ भी नहीं जब दरमियाँ,
फिर क्यों इज़हार करती हो मुझ से ।

खुद को भुला चुकी हो तुम,
इतना प्यार करती हो मुझ से ।

@राॅकशायर

“तुम्हारी हँसी की गूँज”

तुम्हारी हँसी की गूँज, अब तलक मेरे कानों में है
तुम्हारी मदहोश महक, अब तलक मेरे गानों में है

तुम्हें सोचना चाहता हूँ, तुम पर लिखना चाहता हूँ
जब भी देखो आईना तुम, तुम में दिखना चाहता हूँ

इश्क़ हो गया है तुमसे, या तुम्हारी कही बातों से
आँखें पढ़ो तो मालूम होगा, सोया नहीं हूँ रातों से

दोस्त कहता हूँ, और मन ही मन मोहब्बत करता हूँ
जमाने से नहीं, फ़क़त तुम्हें खोने के डर से डरता हूँ

डरो नहीं यूँ मुझसे, मैंने भी बहुत से धोखे खाये हैं
यक़ीन करो बस मेरा, हम एक ही रूह के साये है

वादा करता हूँ तुमसे, दिल ना कभी दुखाऊंगा मैं
आज के बाद यूँ हर जगह, तुम्हें नज़र आऊंगा मैं

फिर भी कभी कुछ बुरा लगे, तो बता देना मुझे तुम
आँखों ही आँखों में इस तरह से जता देना उसे तुम

तुम्हारी चूड़ियों की खनक, अब तलक मेरे कानों में है
तुम्हारी आँखों की चमक, अब तलक मेरी आँखों में है ।

@RockShayar

“तुम्हें तो आना ही था न”

तुम्हें तो आना ही था न
फिर इतनी देर क्यों लगा दी आने में
पता है ! कितना बेचैन था मैं इतने बरसों से
तुम्हारी तलाश में दर बदर भटक रहा था
यक़ीन था कि तुम एक न एक दिन मिलोगी ज़रूर
मगर किस शक्ल में मिलोगी ये पता नहीं था ।

रिश्ता चाहे कोई भी हो
एहसास से बड़ा तो कोई एहसास नहीं होता है न
मेरे लिए तो बस इतना ही काफी है
के तुम्हारे होने के ख़याल से ही
इस चेहरे पर खुशी लौट आई है फिर से
हो सकता है तुम्हारी सोहबत में
फिर से जीना सीख जाऊं
थोड़ा थोड़ा फिर से खिलना सीख जाऊं ।

ज़रूरी नहीं कि जो मुझे महसूस हो रहा है
वहीं तुम्हें भी हो
मैं तुम पर कोई बंदिश नहीं लगा रहा
तुम तो आज़ाद हो हमेशा से
मैं तो बस इतना कहना चाह रहा हूँ
के इस बार जब जाओ तो बताकर जाना
खोने का डर बहुत डरावना होता है
एक पल में सब कुछ छीन लेता है
पिछली बार इसने कुछ अश्क़ छीने थे
अब तक नहीं लौटाएं है वो
गर लौटा दे तो दिल हल्का हो जाएगा मेरा ।

तुम्हें तो आना ही था न
फिर इतनी देर क्यों लगा दी आने में
पता है ! कितना बेचैन था मैं इतने बरसों से
तुम्हारी तलाश में दर बदर भटक रहा था ।।

 

“मोहब्बत का हलफ़नामा”

कई मर्तबा अपनी मोहब्बत का
हलफ़नामा पेश कर चुका हूँ
दिल की भरी अदालत में
मगर ये दिमागी वक़ील
हर बार वहीं जिरह करता है
और साबित कर देता है सच अपनी हर बात
मुन्सिफ़ के ज़ेहन में नहीं होते हैं जज़्बात ।

हालांकि कई गवाह भी बुलाए गए
मगर वो सब हालातों के डर के आगे
ऐन वक़्त पर मुकर गए ।

बेचारा दिल
हर बार यादों के कठघरे में
अकेला ही खड़ा रह जाता है
किसी मुज़रिम की तरह
पता नहीं कौनसी दफ़ा के तहत
मोहब्बत को जुर्म करार दिया गया है ।

मुझे पता नहीं था
कि तुम्हारे सूबे को एक ख़ास दर्जा मिला हुआ है
मुल्क़ के काॅन्स्टिट्यूशन के तहत
सियासतदारों के लिए
जो चुनावी बिसात रहा है बरसों से ।

मोहब्बत करने से पहले
कौन इतना सोचता है
ये तो बस हो जाती है
गर सोचकर की जाए तो वो मोहब्बत नहीं
बल्कि सौदेबाजी कहलाएगी ।

अब जबकि जुर्म साबित हो चुका है
तो मुझे मुल्जिम की तरह ज़िन्दगी जीनी पड़ेगी
इस बात का कोई ग़म नहीं है
बल्कि बेहद खुशी है कि तुम्हारे इश्क़ में सजायाफ्ता क़ैदी बन चुका हूँ मैं ।

“बेशक इश्क़ के काॅन्स्टिट्यूशन में
कहीं कोई दफ़ा तीन सौ सत्तर नहीं होती है”

कई मर्तबा अपने फ़ितूर का
अहदनामा पेश कर चुका हूँ
हसरतों की भरी महफ़िल में
मगर ये हालातों का वक़ील
हर बार वहीं सवाल जवाब करता है रूह से
और साबित कर देता है सच अपनी हर बात
मुन्सिफ़ के ज़ेहन में नहीं होते हैं जज़्बात ।।

@RockShayar

 

“एलियन हूँ मैं”

इंसान नहीं एक एलियन हूँ मैं
गुमनाम ग्रह प्लूटो से आया हूँ
लोग मुझसे डरते हैं, और मैं लोगों से ।

ज़िन्दगी जीना चाहता हूँ
मगर ज़िन्दगी जीने का सलीका नहीं आता है
दोस्त बनाना चाहता हूँ
पर दोस्ती निभाने का तरीका नहीं आता है ।

कोई मेरी बचकानी हरकतों पर हँसता है
तो कोई मेरी मनमानी हसरतों पर
कोई निहायत बेवकूफ समझता है
तो कोई हद से ज्यादा खुदगर्ज ।
पता नहीं असल में कौन हूँ मैं
कोई हूँ भी सही, या नहीं हूँ मैं ।

कल जब एक जुपिटर से आए
एलियन से मुलाकात हुई
तब कहीं जाकर सिस्टम को सुकून नसीब हुआ
कि चलो कोई तो मिला अपने जैसा चेहरा यहाँ ।

इंसान नहीं एक एलियन हूँ मैं
गुमनाम ग्रह प्लूटो से आया हूँ
लोग मुझसे डरते हैं, और मैं लोगों से ।।

-RockShayar

“राजस्थान के किले(Forts of Rajasthan)”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

दुश्मन के लिए फौलाद की ढ़ाल हैं, राजस्थान के किले
कारीगरी में बेहतरीन, बेमिसाल हैं राजस्थान के किले

राजपूताना के इतिहास में, नहीं कोई ऐसा भय्या
गढ़ो में गढ़ चित्तौड़गढ़, बाकी तो हैं सब गढ़ैया

देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाए, इतनी बुलंदी पर बना है
पाकर कुम्भलगढ़ किले को देखो, अरावली का सीना तना है

पत्थर पर पत्थर रखकर, सोनार का किला खड़ा है
यूं लगे कि समंदर में जैसे, लंगर डाले जहाज खड़ा है

सात पहाड़ियों से घिरा हुआ, बख़्तरबंद किला है रणथम्भौर
सुरक्षा व्यवस्था में बेशक, सानी नहीं इसका कोई और

आहू और कालीसिंध नदी के, संगम पर यह जल दुर्ग
परमार शासकों द्वारा निर्मित, झालावाड़ का गागरोण दुर्ग

चिल्ह के टीले पर, सवाई जयसिंह ने जयगढ़ बनवाया
बड़ी तोप जयबाण के संग, तोप का कारखाना खुलवाया

जयपुर का रहस्यमय मुकुट, नाहरगढ़ कहो या सुदर्शनगढ़
माधो सिंह ने बनवाये जहां, एक जैसे दिखने वाले नौ गढ़

मुगल-राजपूत गठजोड़ का, नायाब नमूना है आमेर किला
शिलादेवी और जगत शिरोमणि का, इसको आशीर्वाद मिला

गढ़बीठली कहो या ज्रिबाल्टर, अजमेर में स्थित है तारागढ़
मीरां साहब की दरगाह और, मेरवाड़ा पहाड़ी पर यह गढ़

अकबर ने अजमेर में, बनवाया मैगजीन का किला
इसी किले में टाॅमस रो बादशाह जहाँगीर से मिला

दक्किन का द्वारपाल, धौलपुर में है एक और गढ़
शेरशाह ने उद्घार कर के, नाम दिया उसे शेरगढ़

जाने किस मिट्टी से बना है भरतपुर का लोहागढ़
कोई नहीं जीत पाया इसे ऐसा है यह अनोखा गढ़

सोनगिरी की पहाड़ियों पर, जालौर में है सुवर्णगिरी
सूकड़ी नदी के किनारे पर, परमारों द्वारा किस्मत फिरी

चिड़ियाटूँक पहाङी पर, जोधपुर का मयूरध्वज है मेहरानगढ़
चामुण्डा माता की शरण में, देवताओं द्वारा निर्मित यह गढ़

बीकानेर के जूनागढ़ को, गंगा-जमुनी तहज़ीब जची है
सूरजपोल द्वार पर जिसके, जयमल-पत्ता की मूरत लगी है

बूँदी का तारागढ़ किला, प्रेतों द्वारा बनाया लगता है
हनुमानगढ़ का भटनेर तो जी, फौलाद का साया लगता है

सिरोही जिले की शान, माउंट आबू और अचलगढ़
राजस्थान का वेल्लोर है, चित्तौड़ का भैंसरोड़गढ़

दुर्ग स्थापत्य कला का, उत्कृष्ट उदाहरण है राजस्थान
उतर आया सब कविता में, पढ़ा मैंने जो भी ज्ञान।

Copyright © 2016
RockShayar Irfan Ali Khan
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#विषयवस्तुआधारितकविताएं(विआक)
राॅकशायर.वर्डप्रेस.काॅम

“कोई पागल कहता है, कोई नादान समझता है”

कोई पागल कहता है, कोई नादान समझता है
हर शख़्स यहाँ मुझे खुद सा इंसान समझता है ।

वो नज़रअंदाज़ करता है मुझे, कुछ इस तरह से
जैसे घर में रखा पुराना कोई सामान समझता है ।

कीमत चुकाई है मैंने, चट्टानों की तरह बनने में
और वो है कि खुदगर्ज़, नाफ़रमान समझता है ।

नहीं रखता कोई राब्ता, उस मुसाफ़िर से कभी मैं
जो दिल को मेरे किराये का मकान समझता है ।

मत जलाओ तुम घर अपने, नफ़रत के शोलों से
मोहब्बत की ज़ुबान तो हर बेज़ुबान समझता है ।

क़त्ल किया था जिसने इक रोज मेरे यक़ीन को
आज तलक वो शख़्स मुझे इरफ़ान समझता है ।।

– राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान

शब्दकोश:-

खुदगर्ज़ – स्वार्थी
नाफ़रमान – कहना नहीं मानने वाला
राब्ता -संबंध
मुसाफ़िर – यात्री
शख़्स – व्यक्ति

“इतना तो मेरा भी मुझ पर हक़ बनता है”

इतना तो मेरा भी मुझ पर हक़ बनता है,
मन की सोच का दायरा जहाँ तक बनता है ।

कोशिश करो गर दिल से तो क्या नहीं होता यहाँ,
जमा लो कदम जहाँ वहीं पर फलक़ बनता है ।

कई रात ठिठुरता है, खारापन लिए ये पानी
तब कहीं वो जाकर झील में नमक बनता है ।

हर सफ़र की यहाँ, दास्तान है बस इतनी सी
दर्द ही आख़िर इस ज़िन्दगी का सबक बनता है ।

कमी नहीं किसी चीज़ की, रब के दरबार में
रोकर तो माँगो कभी, मुकद्दर बेशक बनता है ।

देर लगी, पर अहसास हुआ ये अब इरफ़ान
अपनी ज़िन्दगी पर अपना भी तो हक़ बनता है ।।

@rockshayar.wordpress.com

“पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, ये देखो किस्मत का खेल”

पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, ये देखो किस्मत का खेल
एमबीए करे चाकरी, और मालिक है दसवीं फेल

घोर कलियुग है भय्या आप ही बताओ कहाँ जाये
कौआ चुगे हैं मोती आजकल, और हंस दाना खाये

बचपन से ही सपनों के ऊँचे झाड़ पर चढ़ा दिया
पढ़ाई पूरी हुई तो, नौकरी के नाम पर ठेंगा दिया

एक पोस्ट के लिए फिर, मचती है तगड़ी मारामारी
एक दूसरे को देख देखकर, डरती है ये भीड़ सारी

जहाँ देखो इंजीनियर ही इंजीनियर नज़र आते हैं
पहले लाखों खर्च करते हैं, बाद में वो पछताते हैं

कोई सपनों का गला घोंट रहा है, तो कोई खुद का
यहीं एकमात्र सच है, इस सोशल मीडिया युग का

ज़िन्दगी से ज्यादा हमें, सरकारी नौकरी प्यारी है
बिना इसके तो जीना, हाँ एक लम्हा भी दुश्वारी है

पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, ये देखो किस्मत का खेल
पीएचडी बने क्लर्क, और मंत्रीजी है दसवीं फेल ।

@RockShayar

“मैंने खुद को कितना मिटाया”

कई नज़्मों का क़त्ल किया
और कई ग़ज़लों का लहू बहाया
तब जाकर ये समझ में आया
मैंने खुद को कितना सताया
मैंने खुद को कितना मिटाया ।

दर्द का वो गुबार लफ़्ज़ों पर उडेला
क़लम को थामे चलता रहा मैं अकेला
सफ़र के दरमियाँ कई सफ़र मिले
कहने को यूँ तो हमसफ़र मिले
कई रातों में खुद को जलाया
और कई दिनों का दीप बुझाया
तब जाकर ये समझ में आया
मैंने खुद को कितना सताया
मैंने खुद को कितना मिटाया ।

ख़ामोशी में हर जवाब पाया
थोड़ा नहीं बेहिसाब पाया
बेरहम बेदर्द बेशुमार होकर
संगदिल होने का खिताब पाया
कई आहों को दफ़नाया
और कई अहसासों का क़त्ल छुपाया
अब जाकर ये समझ में आया
मैंने खुद को कितना सताया
मैंने खुद को कितना मिटाया ।।

Copyright © 2015
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rockshayar.wordpress.com

“आस्तीन के साँपों से ज़रा सावधान रहना”

आस्तीन के साँपों से ज़रा सावधान रहना,
किसी भी मज़हब के हो मगर इंसान रहना ।

पहचान कोई पूछे तो, बताना उसे हिन्दी हैं हम,
वतन पर मर मिटने वाले सदा तुम जवान रहना ।

हो कड़वाहट कितनी भी, दिलों में फैली हुई
उर्दू की तरह मगर तुम मीठी एक ज़बान रहना ।

मिलेंगी कई हैरानियाँ, सफ़र के दौरान तुम्हें
मुश्किलों के भँवर में मज़बूत एक चट्टान रहना ।

ज़िन्दगी जीते हुए, इतना भी याद रख लीजिए
मक़सद हो चाहे जो भी पर साहिबे ईमान रहना ।

दिल-ओ-दिमाग के मसले, हल करने हो अगर
कभी समझदार बन जाना, कभी नादान रहना ।

लाख कहे दुनिया तुम्हें, भला बुरा यहाँ लेकिन
जैसे भी हो तुम हमेशा, वैसे ही इरफ़ान रहना ।।

@RockShayar

“मदीना-ए-मुनव्वरा”

हर मंज़िल से बेहतरीन मंज़िल है मदीना,
तमाम कायनात का रूह-ए-दिल है मदीना

हर पहर जहां ख़ुदा की रहमत बरसती है,
मस्जिद-ए-नबवी का दीदार कर आँखें छलकती है

नबी-ए-क़रीम का रौज़ा-ए-मुबारक है यहाँ पर,
हर परेशानी से निजात मुकम्मल राहत है यहाँ पर

तक़दीर के बंद दरवाज़े, मुस्तफ़ा के दर पर खुलते हैं,
फिर उम्मती के गुनाह वो सब, एक एक कर धुलते हैं

मक्का-ए-मौअज़मा से जिस रोज हुज़ूर की हिज़रत हुई,
मदीना-ए-मुनव्वरा में बसना हर मोमिन की हसरत हुई

फ़जीलत है बड़ी, मोहब्बत-ए-मदीने की
मुक़द्दस और पाकीज़ा, रसूल के सफ़ीने की

बिना इसकी ज़ियारत के, हज मुकम्मल नहीं होता
शहर-ए-मुहम्मद का दर्जा ताकयामत बुलंद सदा

ज़मीन पर बेशक यूँ तो जन्नत है मदीना,
अल्लाह ने अता की वो मन्नत है मदीना ।।

@RockShayar

“मुझे इस तरह ज़िन्दा छोड़कर ऐ मेरे दुश्मन”

मुझे इस तरह ज़िन्दा छोड़कर ऐ मेरे दुश्मन
तूने तो अपनी ज़िन्दगी खुद ही खत्म कर ली

मुझे इस क़दर अधमरा छोड़कर तो बेशक
तूने वो आख़िरी आस खुद ही खत्म कर ली

जान बचाकर भाग ले जितना भाग सकता है
रात रात भर जाग ले जितना जाग सकता है

बच नहीं सकता तू अब, सुन रहा है मेरा रब
दाग ले गोलियां जितनी मुझपे दाग सकता है

मुझे घायल तड़पता छोड़कर ऐ मेरे कातिल
तूने तो अपनी क़ब्र भी यहाँ खुद ही खोद ली

मुझे इस तरह ज़िन्दा छोड़कर ऐ मेरे दुश्मन
तूने तो अपनी ज़िन्दगी खुद ही खत्म कर ली ।।

“माय लैपटॉप(My Lapy)”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

लेटेस्ट तकनीक से अपग्रेडेड, रहता है एकदम टिपटाॅप
फुली लोडेड क्रेज़ी कोडेड, देट इज माय लैपटॉप

प्राॅडक्ट एच.पी. कम्पनी का, एवन ब्रांड है काॅम्पेक
जब से मिला है मुझ को, लाइफ इज लाइक ए माॅजेक

आधुनिक फीचर से लैस, ऑपरेटिंग सिस्टम है विंडो सेवन
विद इंटेल कोर टू ड्यूओ प्रोसेसर, स्पीड में है नंबर वन

टू जीबी रैम विद, तीन सौ बीस जीबी हार्डडिस्क है
काम करने का इस पर, फुल फ्रीडम विदाउट रिस्क है

ऐटीन इंच की एलसीडी पर, सब कुछ क्लीयर दिखता है
डिजिटल सोशल मीडिया के संग, सारा जहां नियर दिखता है

कूलिंग फेन इसको हर कंडीशन में ठण्डा रखता है
मन ही मन अक्सर ये, अलग ही आवाज़ करता है

बेहतरीन परफॉर्मेंस से हमेशा राॅक करता रहता है
अनचाहे प्रोग्राम वायरस को, खुद ब्लॉक करता है

छह सालों से मेरे, हर सफ़र का हमसफ़र है
मदरबोर्ड से मन का मेरे, जुड़ाव इस क़दर है

अडवांस्ड टेक्निक से लेस्ड, लगता है एकदम स्टार राॅक
सुपर मैच्ड इमोशनली अटैच्ड, देट इज माय लैपटॉप ।।

Copyright © 2016
RockShayar Irfan Ali Khan
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#विषयवस्तुआधारितकविताएं(विआक)
राॅकशायर.वर्डप्रेस.काॅम

“बिना जज़्बात के लफ़्ज़ ये बिना मोती के सदफ़ हैं”

बिना जज़्बात के लफ़्ज़ ये बिना मोती के सदफ़ हैं
बेसलीक़ा बातों का जैसे कोई सलीक़ेदार लक़ब है

ग़ैरों की क्या बात करे, खुद से ही शुरूआत करे
अदब की इस दुनिया में हर शख़्स ही बेअदब है ।

दिन गुज़रे साल बीते, तब कहीं यह पता चला
के ये जो दर्द है, दर्द नहीं बल्कि रूह की रसद है ।

लाख टोके बज़्म चाहे, सुनता नहीं मैं किसी की
बहर में नहीं है जो महबूब मुझ को वो ग़ज़ल है ।

जला देना डायरी मेरी, गर मौत चाहो तुम मेरी
मुझ में मेरे होने की बाक़ी अब तो यहीं सनद है ।

शब्दकोश:-

सदफ़ – सीपी
बेसलीक़ा – बेढंगा
सलीक़ेदार – भद्र, शिष्टापूर्ण
लक़ब – पदवी, ओहदा, खिताब, उपाधि
अदब – सम्मान, साहित्य
शख़्स – व्यक्ति
बेअदब – असभ्य, अभद्र
शब – रात
रसद – आहार, राशन
बज़्म – सभा
बहर – शब्द मापनी
महबूब – प्रिय
ग़ज़ल – उर्दू-फ़ारसी में पद्य का एक रूप
सनद – सबूत, प्रमाण

“एक कोशिश”

बिखरे हुए परिवार को फिर से जोड़ना चाहता हूँ
मैं नफ़रत की दीवारों को अब तोड़ना चाहता हूँ

घर में सबसे छोटा हूँ, पर इरादे हैं मेरे मुझ से बड़े
औरों का तो पता नहीं पर खुद से किए हैं वादे बड़े

गुटबाजी होती है कहीं भी तो अकेला पड़ जाता हूँ
बेवजह तो यूँही नहीं अपनी ज़िद पर अड़ जाता हूँ

हर एक शख़्स यहाँ गलतफहमियों का शिकार है
बनावट और फ़रेब के उसूलों का फरमाबरदार है

ओहदा और रुतबा देखकर ही क्यूँ सब बर्ताव करते हैं
दिखावे के बाज़ार में जज़्बातों का मोलभाव करते हैं

एक हादसे की वजह से, बस थोड़ा भटक गया हूँ
खुद ही खुद का हौसला बढ़ाते बढ़ाते थक गया हूँ

वक़्त रहते अगर सब समझ जाएं, तो अच्छा ही होगा
नहीं तो बाद में तो सिर्फ पछतावा, और अफसोस ही होगा

रिश्तों के कच्चे धागों को फिर से जोड़ना चाहता हूँ
मैं नफ़रत की दीवारों को अब तोड़ना चाहता हूँ ।।

– Sipu

“एक एलियन हूँ मैं”

इंसान नहीं एक एलियन हूँ मैं
गुमनाम ग्रह प्लूटो से आया हूँ
लोग मुझसे डरते हैं, और मैं लोगों से ।

ज़िन्दगी जीना चाहता हूँ
मगर ज़िन्दगी जीने का सलीका नहीं आता है
दोस्त बनाना चाहता हूँ
पर दोस्ती निभाने का तरीका नहीं आता है ।

कोई मेरी बचकानी हरकतों पर हँसता है
तो कोई मेरी मनमानी हसरतों पर
कोई निहायत बेवकूफ समझता है
तो कोई हद से ज्यादा खुदगर्ज ।
पता नहीं असल में कौन हूँ मैं
कोई हूँ भी सही, या नहीं हूँ मैं ।

कल जब एक जुपिटर से आए
एलियन से मुलाकात हुई
तब कहीं जाकर सिस्टम को सुकून नसीब हुआ
कि चलो कोई तो मिला अपने जैसा चेहरा यहाँ ।

इंसान नहीं एक एलियन हूँ मैं
गुमनाम ग्रह प्लूटो से आया हूँ
लोग मुझसे डरते हैं, और मैं लोगों से ।।
-RockShayar

“मोहब्बत का हलफ़नामा”

कई मर्तबा अपनी मोहब्बत का
हलफ़नामा पेश कर चुका हूँ
दिल की भरी अदालत में
मगर ये दिमागी वक़ील
हर बार वहीं जिरह करता है
और साबित कर देता है सच अपनी हर बात
मुन्सिफ़ के ज़ेहन में नहीं होते हैं जज़्बात ।

हालांकि कई गवाह भी बुलाए गए
मगर वो सब हालातों के डर के आगे
ऐन वक़्त पर मुकर गए ।

बेचारा दिल
हर बार यादों के कठघरे में
अकेला ही खड़ा रह जाता है
किसी मुज़रिम की तरह
पता नहीं कौनसी दफ़ा के तहत
मोहब्बत को जुर्म करार दिया गया है ।

मुझे पता नहीं था
कि तुम्हारे सूबे को एक ख़ास दर्जा मिला हुआ है
मुल्क़ के काॅन्स्टिट्यूशन के तहत
सियासतदारों के लिए
जो चुनावी बिसात रहा है बरसों से ।

मोहब्बत करने से पहले
कौन इतना सोचता है
ये तो बस हो जाती है
गर सोचकर की जाए तो वो मोहब्बत नहीं
बल्कि सौदेबाजी कहलाएगी ।

अब जबकि जुर्म साबित हो चुका है
तो मुझे मुल्जिम की तरह ज़िन्दगी जीनी पड़ेगी
इस बात का कोई ग़म नहीं है
बल्कि बेहद खुशी है कि तुम्हारे इश्क़ में सजायाफ्ता क़ैदी बन चुका हूँ मैं ।

“बेशक इश्क़ के काॅन्स्टिट्यूशन में
कहीं कोई दफ़ा तीन सौ सत्तर नहीं होती है”

कई मर्तबा अपने फ़ितूर का
अहदनामा पेश कर चुका हूँ
हसरतों की भरी महफ़िल में
मगर ये हालातों का वक़ील
हर बार वहीं सवाल जवाब करता है रूह से
और साबित कर देता है सच अपनी हर बात
मुन्सिफ़ के ज़ेहन में नहीं होते हैं जज़्बात ।।

@RockShayar

“यादों की कमीज़”

मेरी यादों की कमीज़ पर
कई दफ़ा तुमने अपनी मुलायम हथेलियों से
एहसास की ज़रदोज़ी की है ।
नूर के रंग में रंगे धागों को जब भी तुम छूती हो
इनका रंग और भी गहरा हो जाता है ।

शायद तुम्हारे हाथों का लम्स पहचानते हैं ये
तभी तो मेरे छूते ही इनका रंग यूँ उड़ जाता है
जैसे शबनम का कोई क़तरा धूप में रखा हो ।

मेरे एहसास में अब तलक
वो दर्द की तपिश बाक़ी है
मगर जब भी ये कमीज़ पहनता हूँ
बारिश होने लगती है रूह पर
और वो तपिश पलभर में गायब हो जाती है ।

इसी कमीज़ की आस्तीन पर
एक फूल बना हुआ है
जो तभी खिलता है
जब तुम्हारी खुशबू की आमद होती है ।

इतनी हमराज़ हो चुकी है ये कमीज़
कि गर इसे उतारने की कोशिश करूँ
तो साथ में रूह भी उतरने लगती है
और वैसे भी इश्क़ का सुर्ख़ लिबास
कभी उतारे नहीं उतरता है ।

मेरी यादों की कमीज़ पर
तुम्हारे एहसास की ज़रदोज़ी
अब भी वैसी ही है
जैसी तुमने की थी
न ये बदली है, न मैं
दोनों वैसे के वैसे ही हैं आज तक ।।

@RockShayar

“Maliqa-e-Firdaus”

फ़िरदौस से आई हो या उस ओर से
जहां बर्फीले पहाड़ आसमां को चूमते हैं
नदियाँ इठलाती हैं, और झरने झूमते हैं

वादी में जब कभी वो बर्फ पिघलती है
ज़िन्दगी मुस्कुराने को फिर मचलती है

हर सू जहां पर चिनार की खुशबू आती है
और हवाएँ मोहब्बत के गीत गुनगुनाती है

दरिया-ए-झेलम भी तुम्हारे संग बहता है
चाँदनी रातों में मन के किस्से कहता है

तेरे इश्क़ का कहवा मैं हर शब पीता हूँ
एक तसव्वुर के सहारे सदियाँ जीता हूँ

दहशतगर्दी भी तुझे बेशक बदल नहीं पाई है
नफ़रत की हवा तुझमें कभी पल नहीं पाई है

फ़िरदौस से आई हो या उस ओर से
जहां झील में दो शिकारे गुफ्तगू करते रहते हैं
फिर से हमारे मिलने की आरज़ू करते रहते हैं ।।

@RockShayar

“आख़िर लगा ही दी न तुमने तसव्वुर पर बंदिश”

आख़िर लगा ही दी न तुमने
तसव्वुर पर बंदिश
कहा था मैंने इक रोज
के है बस इतनी गुज़ारिश
पर तुमने सुना नहीं शायद
और अब आलम यह है कि
ख़याल में भी ख़याल हो चुकी हो ।

जब सब खत्म हो चुका है
तो फिर ये बैचैनी क्यों
क्यों तुम्हारी आवाज़ मेरे ज़ेहन में गूँजती रहती है
क्यों हर शब ये आँखें
तुम्हारे इंतज़ार में खुली रहती है
मैं तो सो जाता हूँ, पर ये सोती नहीं है
गर हमारा मिलना लिखा ही नहीं है दोबारा
तो फिर दिल में ये आस क्यूँ है ज़िन्दा अब तक
कभी भूले से ही सही
मेरे तसव्वुर में फिर से थोड़ी जान फूँक दो
पल पल मर रहा है यह
और इसके साथ मैं भी
इतनी खुदगर्ज़ी भी अच्छी नहीं
आख़िर इतना हक़ तो बनता है
उस मोहब्बत का
जो की थी मैंने कभी तुमसे
मेरी डायरी का हर पन्ना गवाह है
कि ये क़लम कभी झूठ नहीं लिखती है ।।

“एक दोस्त है मेरा, सबसे अलग सबसे जुदा”

एक दोस्त है मेरा, सबसे अलग सबसे जुदा
एक यार है मेरा, सब यारों से अलहदा

पता नहीं हम में से बड़ा कौन है
मैं उम्र में बड़ा हूँ और वो दिल से

बचपन से ही जिसे खतरनाक समझकर दूर रहा
खतरनाक वक़्त में मेरे वहीं तो आख़िर साथ रहा

एक रोज जब मिला मुझे, उसकी डायरी का एक अधूरा हिस्सा
तब कहीं वो जाकर मालूम हुआ, यार की ज़िन्दगी का किस्सा

बाद उसके तो एक अलग ही बॉन्डिंग हो गई
क्रेज़ी बंदे स्टार्टअप में शेयर होल्डिंग हो गई

अब तो फुल टू राॅक ऑन करने की तैयारी है
संग जो अपने यह लाइफटाइम वाली यारी है

एक दोस्त है मेरा, सबसे अलग सबसे जुदा
एक यार है मेरा, सब यारों से अलहदा

पता नहीं हम में से बड़ा कौन है
मैं उम्र में बड़ा हूँ और वो दिल से ।

“तुम्हारी आवाज़”

कल तुम्हारी आवाज़ की एक रिकॉर्डिंग मिली मुझे
अपने लैपटॉप के एक पुराने हिडन फोल्डर से
डिलीट कर चुका था जिसे मैं
दोबारा डाटा रिकवरी सॉफ्टवेयर की मदद से पाया उसे ।

सुनकर दिल को उतना ही सुकून मिला,
जितना उस रोज मिला था
जब तुम मेरे सामने बैठकर वो गाना गा रही थी
और मैं अपने मोबाइल के साथ साथ अपनी आँखों के रिकॉर्डर में भी उसे सेव कर रहा था ।

अल्फ़ाज़ से ज्यादा मैं वो जज़्बात देख रहा था
जो तुम्हारे चेहरे पर उतर आए थे ।

बेहद प्यारी सी वो आवाज़ तुम्हारी
सुनकर जिसे ऐसा लग रहा था
मानो मैं डल झील के किसी
खूबसूरत शिकारे में बैठा हुआ हूँ
और वादी-ए-कश्मीर गुनगुना रही है –

“हाँ अश्क़ सूरो
रश्क़ करथास दीवाना तई
अनोन असी, चुक्स लागा दीवाना तई
हाँ अश्क़ सूरो…
शम्मा तपोपो द्राई लागे यारा न तई
दस्वई तिज़ित्फी, अद्दा सकतू यक्सा न तई
हाँ अश्क़ सूरो
रश्क़ करथास दीवाना तई
अनोन असी चुक्स लागा दीवाना तई
हाँ अश्क़ सूरो “

इसी धुन पर मैंने एक गाना भी बनाया है
एक दिन जब तुम्हारी बहुत याद आ रही थी तब
आख़िर उस रोज हम बात जो कर रहे थे ।

और तुमने इतना भी कहा था कि
जब आप बहुत बड़े शायर बन जाओगे
तब आप नग़्मे लिखना और मैं उन्हें
अपनी आवाज़ से सजाऊँगी ।
हमारा म्यूजिक एलबम आएगा
कितना अच्छा लगेगा ।

उस वक़्त जो खुशी मैंने तुम्हारे चेहरे पर देखी थी
वहीं खुशी आज फिर से अपने चेहरे पर देख पाया हूँ, बाद मुद्दत के ।

कल तुम्हारी आवाज़ की एक रिकॉर्डिंग सुनी
रिकवर किया जिसे मैंने
एक पुराने डिलीटेड फोल्डर से
रिकवरी सॉफ्टवेयर की मदद से ।

काश बीते लम्हों को रिकवर करने का भी कोई सॉफ्टवेयर होता !
तब हम फिर से एक बार आमने सामने बैठते
और अपने आने वाले म्यूजिक एलबम के बारे में गुफ्तगू करते ।।

@RockShayar

“वो शायर था, वो दीवाना था, दीवाने की बातें क्यूँ”

वो शायर था, वो दीवाना था, दीवाने की बातें क्यूँ
हम तो ठहरे दिलफर्याद, दिल दुखाने की बातें क्यूँ

मालूम है तुम्हें भी, वो अंजाम-ए-इंतक़ाम बखूबी
जो जा चुका है कल उस गुज़रे जमाने की बातें क्यूँ

जब सारे जहान से अच्छा, है हिन्दोस्तान हमारा
फिर मज़हब के नाम पर खून बहाने की बातें क्यूँ

माना के वक़्त हर ज़ख्म की दवा है बेशक फिर भी
यूँ सब भुलाकर दुश्मन का घर बसाने की बातें क्यूँ

खुद पर यक़ीन अच्छी बात है, पर इतना जान लो
जहाँ तय है हार, वहीं हाथ आज़माने की बातें क्यूँ

हक़ीक़त में जब, कुछ भी नहीं है हक़ीक़त इरफ़ान
दिल को बहलाने वाले मस्नूई फ़साने की बातें क्यूँ

@राॅकशायर

“तू क्या गयी, अपने साथ मुझे भी ले गयी”

तू क्या गयी, अपने साथ मुझे भी ले गयी
अब ना तू नज़र आती है, ना मैं ।

दोनों वक़्त की शाख से टूटे हुए पत्ते लगते हैं
ना उड़ते हैं, ना कहीं तफ़रीह करते हैं
जाने क्यों ठहर गए हैं ।
पता नहीं किसका इंतज़ार है
इंतज़ार है भी या नहीं
ये भी आज तक पता नहीं चल पाया है ।

कुछ तो ज़रूर हुआ था उस रोज
जब हम दोनों की नज़रे मिली थी
नज़रों से तो कुछ भी नहीं छुपता
फिर भी ये बात अब तक छुपी हुई है
कि आख़िर क्यों मिले थे हम उस रोज
जब बारिश हो रही थी ।

और वैसे भी
दुनिया में हर रोज लाखों लोग
इक दूसरे से मिलते हैं
फिर हमारा मिलना ही
इतना ख़ास क्यों लगता है मुझे ।

आख़िरी मुलाकात के वक़्त सोच रहा था
कि तुम्हें रोक लू, जाने न दू
मगर फिर ख्याल आया
कि मेरा हक़ ही क्या है तुम पर
बेवजह क्यों इतना जज़्बाती हो गया था मैं
आज तक इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाया

शायद तेरा बिछुड़ना ही तेरा मिलना था !

तू क्या गयी, अपने साथ मुझे भी ले गयी
अब ना तू नज़र आती है, ना मैं ।।

@rockshayar

“मिट्टी की कहानी”

पता नहीं ये मिट्टी किस मिट्टी की बनी है ।
इसे तो शायद अपना वज़ूद भी नहीं पता है
या फिर इसने जान बूझकर खुद को ऐसा बना लिया, के हर वज़ूद इसी से बनता चला गया ।

कहते है हम सब इंसान भी मिट्टी से बने हुए हैं ।
मगर ये मिट्टी हम इंसानों से कई दर्जा बेहतर है।
न इसे छल कपट आता है, न कोई चेहरे पर चेहरा लगाना । ये तो इतनी पाक और साफ है कि नमाज़ी को जब वुज़ू के लिए पानी नसीब न हो तो मिट्टी से ही पाकी हासिल करने (तयम्मुम करने) का हुक्म है । मिट्टी की सीरत आईने की तरह है । जो इसमें बोओगे तुम, वहीं काटोगे तुम । कोई मिलावट नहीं, न कोई फ़रेब की शिकायत ।
मिट्टी के इतने किरदार है कि खुद मिट्टी को भी नहीं पता ।
पानी से मिलकर शायद इसे इश्क़ हो जाता है अपने आप से । तभी तो वो खुशी छुपाए नहीं छुपती । कहीं पेड़ पौधों के रूप में, तो कहीं फसल और सब्जियों के रूप में लहलहाती है ।
धूप की चादर भी ज़रूरी है, सर्द हवाओं का आदर भी ज़रूरी है । बारिश की बूँदें इसे अच्छी लगती हैं, सूरज की रौशनी इसे सच्ची लगती है ।
हालातों के सफ़र में मिट्टी भी बदलती रहती है ।
कहीं रेत तो कहीं दलदल, कहीं खेत तो कहीं बंजर । अनगिनत रूप हैं इसके । मिट्टी से बने हुए घड़े हो चाहे इंसान, दोनों बनते बिगड़ते टूटते रहते हैं । पता नहीं इसे कौनसी जादूगरी आती है, नीम और आम दोनों को ये अपनी कोंख में एक साथ पालती है । और इसी से बने हैं हम इंसान सब । हमारे भीतर भी ज़िन्दगी भर कई इंसान पैदा और फ़ौत होते रहते हैं । पर जब वो आख़िरी घड़ी आती है, तब वो भीतर के सब इंसान एक होकर बन जाते हैं मिट्टी का एक ढ़हता हुआ ज़ज़ीरा । जिसे मौत का दरिया रफ़्ता रफ़्ता निगल जाता है । न जाने ये मौत किस मिट्टी की बनी है, जो हर जानदार मिट्टी के पुतले को पल भर में मिट्टी में बदल देती है । और उस आख़िरी मंज़िल क़ब्र में भी उसे आख़िर मिट्टी ही नसीब होती है । पता नहीं ये मिट्टी किस मिट्टी की बनी है ।

@rockshayar

“अपनी क़लम को न बचा सका मैं”

अपनी क़लम को न बचा सका मैं
बाज़ार के बदनीयत साये से
वक़्त के साथ साथ हम दोनों बदल गए
बदल तो गए
मगर ये बदलाव दिल को अखरता है बहुत ।

दिमाग का क्या है
उसे तो बहुत खुशी मिलती है
जब भी जज़्बातों से दूरी होती है ।

पर ये दिल तन्हाई में रोता है
गुज़रे दौर को याद करता है
अश्क़ नज़र न आ जाए किसी को
इसीलिए जब भी नहाता हूँ
तभी रोना मुनासिब लगता है
आख़िर चट्टानों की तरह मज़बूत वज़ूद का
इक़रार जो कर चुका हूँ ।

पता नहीं मेरी क़लम मुझे चलाती है
या मैं इसे
पर जो भी हो
हम दोनों को ही चलने का शऊर नहीं आता है
शर्तों में नहीं बंधने की
शर्त भी तो लगाई है खुद से ।

अपनी क़लम को न बचा सका मैं
खुद अपने ही दोगले किरदार से
वक़्त के साथ साथ बहुत कुछ बदल गया
बदल तो गया
मगर ये बदलाव दिल को अखरता है बहुत ।।

“दुनिया में सबको दर्द की सौगात नहीं मिलती”

दुनिया में सबको दर्द की सौगात नहीं मिलती
ये तो मुक़द्दर की बातें हैं, तक़दीर के तिलिस्म

कसमें वादे तो होते ही हैं तोड़ने के लिए
दिल हमेशा टूटता है दिल जोड़ने के लिए

इस टूटे हुए दिल को लेकर कहाँ जाओगे
जहां जाओगे वहीं हमशक्ल जहाँ पाओगे

बिखरे हुए ख़्वाबों की मिट्टी जब नम हो जाएगी
दर्द को दवा बना लेना, तकलीफ़ कम हो जाएगी

यादें तो बेशक याद आने के लिए ही होती हैं
हर शब जो कि बेतहाशा फूट फूटकर रोती हैं

माज़ी तो ज़िद्दी है, यह न पीछा छोड़ेगा कभी
इससे भागने के बजाय, इसे गले से लगा लो

हालांकि कहना बहुत आसान है ये सब
मगर यहीं एक तरीका है जीने का अब

दुनिया में सबको दर्द की ख़ैरात नहीं मिलती
ये तो मुक़द्दर की बातें हैं, तक़दीर के तिलिस्म ।।

@rockshayar

“अजनबी अहसास”

बहुत कुछ ऐसा है जो बताया न जा सके
अहसास तो है मगर जताया न जा सके

सोच के दायरे में जब भी कोई सवाल आता है
उड़ने को फिर ख़याल अपने पंख फड़फड़ाता है

हाथ खुद-ब-खुद क़लम तक पहुँच जाते हैं
जज़्बात खुद-ब-खुद हम तक पहुँच जाते हैं

हर लफ़्ज़ की अपनी एक अलग ही दुनिया है
जैसे इस दुनिया में हम सबकी एक दुनिया है

कोई जिस्म लिखता है, कोई रूह लिखता है
जो देखना चाहे जितना, हाँ उसे वहीं दिखता है

हर सिक्के के दो पहलू हैं, किसे सच किसे झूठ कहे
जो दिल में है पर ज़ुबां पे नहीं, उसे कहे बिन कैसे रहे

अजनबी अहसास को बताओ क्या नाम दे
ये तो पवन के झोंके हैं, कैसे इन्हें थाम ले

बहुत कुछ ऐसा है जो महसूस न किया जा सके
ख़यालात तो है मगर महफूज़ न किया जा सके ।।

– RockShayar

“न जाने तुम्हारे नाम में ऐसा क्या जादू है”

न जाने तुम्हारे नाम में ऐसा क्या जादू है
जो इतना पसंद है मुझे यह
हर बार इसे किसी न किसी बहाने से
अपनी नज़्मों में दाखिल कर ही लेता हूँ
कई दफ़ा तसव्वुर पर बंदिशें न लगाने की
गुज़ारिश भी कर चुका हूँ
गुज़रे दौर से वाबस्ता ग़ज़लों के ज़रिए ।

जैसे सब नाम होते हैं
कुछ वैसा ही तो है यह
फिर इसमें ऐसी क्या ख़ास बात है
जो मुझे आज तक समझ नहीं आई
हर्फ़ भी वहीं हैं
जो सब नामों में होते हैं
ज़ेर ज़बर और नुक्ता भी वहीं है
और तो और
बोलने का अंदाज़ भी वहीं है
फिर वो आख़िर कौनसी बात है
जो इसे बाक़ी नामों से अलग करती है ।

आज जब मैंने तुम्हारा नाम लिखा
फिर से अपने नाम के साथ
तो पता यह चला कि
कुछ रिश्तों के नाम नहीं हुआ करते हैं
बेनाम रिश्तों की भी
अपनी एक अलग ही दुनिया है ।

न जाने तुम्हारे नाम में ऐसा क्या जादू है
जो इतना पसंद है मुझे यह
हर बार इसे किसी न किसी बहाने से
अपने क़लाम में शामिल कर ही लेता हूँ
कई दफ़ा ख़यालों पर बंदिशें न लगाने की
गुज़ारिश भी कर चुका हूँ
जज़्बातों की ओट में पनपे लफ़्ज़ों के ज़रिए ।।

RockShayar

शब्दकोश:-

नज़्म – कविता
तसव्वुर/ख़याल – कल्पना
गुज़ारिश – विनती
वाबस्ता – संबंधित
ग़ज़ल – नियमबद्ध उर्दू पद्य शैली
हर्फ़ – अक्षर
ज़ेर-ज़बर और नुक्ता – मात्रा व्याकरण
क़लाम – लिखित रचना
जज़्बात – संवेदना
लफ़्ज़ – शब्द

“माँ की मोहब्बत का, बयान करना मुमकिन नहीं”

माँ की मोहब्बत का, बयान करना मुमकिन नहीं
गर साथ है उसकी दुआ, तो फिर कोई ग़म नहीं

ज़िन्दगी की प्रथम शिक्षक, सिखाए हम को जीना
ममता से संवारकर अपनी, बनाए हम को नगीना

घर और ऑफिस, दोनों को बखूबी संभाल रही है
औलाद के मुताबिक माँ अब खुद को ढ़ाल रही है

रिश्तों में आई वो दरारें सब, माँ ही भरती आई है
और बच्चों के कामकाज सारे माँ ही करती आई है

कदमों तले जन्नत है इसके, सौ फीसद सच है ये
जीवन की उन बुराईयों से, बचने का कवच है ये

हर बंदिश को तोड़कर, देश व दुनिया चला रही है
हर रंजिश को भुलाकर वो, नेक राह दिखा रही है

माँ के आँचल की तरह, इस जहां में कोई घर नहीं
गर सिर पर है हाथ उसका, तो फिर कोई डर नहीं

– RockShayar

“FacebookWali”

न उसने कुछ कहा कभी, न मैंने कुछ सुना कभी
बस, एक दूसरे की पिक्स लाइक करते रहते हैं

न मैं जानता हूँ कि वो मुझे पसंद करती है या नहीं
और न उसे ख़बर है मुझ में पल रहे इस प्यार की

इस एहसास को बस हम दोनों ही समझ सकते हैं
मन के अल्फ़ाज़ को बस हम दोनों ही पढ़ सकते हैं
साथ नहीं हैं हर वक़्त, फिर भी हम साथ रहते हैं
वो नदी और मैं पवन, हर पल यूँही साथ बहते हैं

खुद से ज्यादा उसकी प्रोफाइल अच्छी लगती है
दिल चुराने की अदा वो स्टाइल अच्छी लगती है

कमेंट नहीं करते आँखों ही आँखों में बात करते है
ख़्वाबों के जहाँ में एक दूसरे से मुलाक़ात करते हैं

चेहरों की किताब में एक चेहरा सबसे अलग है
रातों की नींद और दिल के सुकून का जो ठग है

न मैंने कुछ कहा कभी, न उसने कुछ सुना कभी
आज भी बस एक दूसरे की पोस्ट पढ़ते रहते हैं ।

“हर बार ज़िन्दगी दोराहे पर लाकर खड़ा कर देती है”

हर बार ज़िन्दगी
दोराहे पर लाकर खड़ा कर देती है
दोनों रस्ते साफ सरल सीधे लगते हैं
मालूम करना बड़ा ही मुश्किल लगता है
कि कौनसा रस्ता सही है, और कौनसा नहीं है ।
एक बड़ा ही आसान और आरामदायक है
दूसरा सख़्त मुश्किल, मगर खुद नायक है
दिल और दिमाग के बीच में
महीनों तक
कई कई बार जंग छिड़ती है
कभी कोई जीतता है
कभी कोई
मगर हार तो उन सपनों की होती हैं
जो ज़िन्दगी भर
इन दोराहो के दरमियान
मुसाफ़िर की तरह भटकते रहते हैं
अपना पता पूछते रहते हैं ।।