“कीर्ति स्तम्भ चित्तौड़गढ़” (Victory Tower Chittorgarh)

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

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राजस्थान की आन बान और शान का प्रतीक है कीर्ति स्तम्भ
विभिन्न मूर्तियों से अलंकृत यह, भारतवर्ष का शक्ति स्तम्भ।

जब सारंगपुर युद्ध में महाराणा कुम्भा ने महमूद खिलजी को हराया
तब उस जीत के उपलक्ष्य में,1448 ई. में यह विजय स्तम्भ बनवाया।

वास्तुशिल्पी मंडन व जैता नाथा पोमा पूंजा थे शिल्पकार
अत्रि भट्ट और महेश भट्ट, दोनों ही कमाल के प्रशस्तिकार।

अपने आस-पास के मैदान से, 122 फीट है ऊँचाई इसकी 
इष्टदेव विष्णु को समर्पित, बड़ी अनोखी है गाथा इसकी।

ऊपर जाने के लिए 157 सीढ़ियाँ, तथा आकृति इसकी वृत्ताकार है 
ऊपर-नीचे से चौड़ा, बीच में से संकरा, इसका डमरू जैसा आकार है।

तीसरी मंजिल पर नौ बार, अल्लाह ही अल्लाह लिखा हुआ है
उकेरी गई प्रशस्ति असल में, कुम्भा की विजय यात्रा का बयां है।

सबसे ऊपरी मंजिल एक बार, बिजली गिरने से टूट गई थी
महाराणा स्वरूप सिंह ने तब उसकी, मरम्मत करवाई थी।

माध्यमिक शिक्षा बोर्ड एवं राजस्थान पुलिस का यह प्रतीक चिह्न है
ऐतिहासिक धरोहर के साथ-साथ, अद्भुत स्थापत्य कला का प्रतिबिंब है।

इतिहासकार फर्ग्यूसन ने इसको, रोम के टार्जन के समान बताया है
गाट्ज के अनुसार इसमें, भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष समाया है।

चित्तौड़गढ़ में स्थित यह स्मारक, जिसे विक्ट्री टाॅवर भी कहते है
बनाने वाले ने क्या चीज बनाई है, देखने वाले हमेशा यही कहते हैं।।

© RockShayar

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“गुलबदन गुलफ़ाम गुलपोश गुलज़ार है तू”

जाँ निसार मेरे यार, अन्वार आबशार है तू
गुलबदन गुलफ़ाम, गुलपोश गुलज़ार है तू।

कभी पैर जलते हैं, तो कभी ग़ैर जलते हैं
चिलचिलाती धूप में, मौसम-ए-बहार है तू।

माहरुख़ कहूँ या माहज़बीं, दिलबर कहूँ या दिलनशीं
मुश्क से तामीर हुई, बेनज़ीर निगार है तू।

बेतहाशा चढ़ता ही जाए, असर ये बढ़ता ही जाए
महीनों तक न उतरे जो, ऐसा ख़ुमार है तू।

जब भी मिलने आती हो, रूह भिगा जाती हो
सावन की पहली बारिश सी, ठंडी फुहार है तू।

ये तक़दीर का फैसला है, जो मुझे तू मिला है
अब और क्या कहूँ, मेरी साँसों में शुमार है तू।

बड़ी मुश्किलों के बाद मिले, जिस पर कि दाद मिले
ज़िन्दगी की ग़ज़ल का हर वो अशआर है तू।।

© RockShayar

शब्दावली:-

जाँ निसार – जान लुटाने वाला
अन्वार – प्रकाशवान
आबशार – झरना 
गुलबदन – फूलों जैसा शरीर 
गुलफ़ाम – फूलों जैसा रंग 
गुलपोश – फूलों से ढका हुआ 
गुलज़ार – बगीचा
माहरुख़/माहज़बीं – चाँद जैसा चेहरा
मुश्क – कस्तूरी 
बेनज़ीर – अद्वितीय 
निगार – मूर्ति
अशआर – शेर (बहुवचन), दोहे, छंद

“पता नहीं वो कौन है”

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बारिशों की तरह वो आती है
घटाओं की तरह वो छाती है
फ़िज़ाओं की तरह वो गाती है
दुआओं की तरह वो जाती है
हाँ, मुझको जो आज़माती है
पता नहीं वो कौन है, पता नहीं वो कौन है।

मुस्कान में एक ताज़गी है
चेहरे पर उसके सादगी है
मरहबा ये तो दीवानगी है
जो देखे वो कहे आफ़रीं है
इस रूह की जो जानशीं है
पता नहीं वो कौन है, पता नहीं वो कौन है।

मैंने हरदम जिसे सोचा
अपने अंदर जिसे पाया
मैंने हरपल जिसे चाहा
जिगर में जिसे बिठाया
वो जो है मुझमें नुमायाँ
पता नहीं वो कौन है, पता नहीं वो कौन है।

बला की जो ख़ूबसूरत है
मासूमियत की मूरत है
जैसी वो उसकी सूरत है 
वैसी ही उसकी सीरत है
इस दिल की जो हसरत है
पता नहीं वो कौन है, पता नहीं वो कौन है।।

© RockShayar

“तेरी साँसों की सरगोशी में नुमायाँ मैं”

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तेरी खुशबुओं से,
खिंचा चला आया मैं
तेरी साँसों की सरगोशी में नुमायाँ मैं।
 
जब भी धड़कता हूँ.
तुझमें धकड़ता हूँ
तेरी धड़कनों में इस क़दर समाया मैं।
 
सबने मुझे बुलाया,
पर मुझको कोई न भाया
जब तूने मुझे बुलाया, दौड़ा चला आया मैं।
 
ज़रा ग़ौर से देखो मुझे,
ऐ जाने जहाँ
तेरी ज़िन्दगी का हसीन सरमाया मैं।
 
तुझे ख़बर नहीं है,
मुझे सबर नहीं है
देख तेरी ख़ातिर क्या-क्या लाया मैं।
 
ये मोहब्बत मेरी,
कम न होगी कभी
तेरी आदतें सब मेरी, तेरा हमसाया मैं।।
 
© RockShayar

“मैंने तुझे कल याद किया था”

ये कैसे हो सकता है जानाँ
मुझको ज़रा ये तो बताना।
मैंने तो कुछ बोला भी नहीं
राज़ अपना खोला भी नहीं।
फिर तुमने ये सब कैसे जाना
जानाँ ज़रा मुझको ये बताना।
वो कौनसा जादू आता है तुम्हे
ये दिल बेकाबू चाहता है तुम्हे।
दूर होकर भी जो इतना क़रीब हो
हबीब हो रक़ीब हो, या नसीब हो।
तुम्हे महसूस करूं तो कैसे करूं
छू भी ना पाऊं, इतना क़रीब हो।
मैंने तुझे कल याद किया था
बहुत दिनों के बाद किया था।
भूल से नहीं, हाँ जानबूझकर
दिल से बहुत याद किया था।।
© RockShayar

“गर ज़मीं पर कहीं जन्नत है तो बस यहीं है, यहीं है”

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“गर फिरदौस बर-रूऐ ज़मीं अस्त
हमी अस्तो, हमी अस्तो, हमी अस्त”

When you read it…You just feel it…

वादियों का दिलकश जहाँ, जैसे ख़्वाब कोई हसीं है
गर ज़मीं पर कहीं जन्नत है तो बस यहीं है, यहीं है।

कांपती हुई कायनात ने, धुंध की चादर ओढ़ रखी है
बर्फीले कोहसारों में, इश्क़ की अंगीठी सुलग रही है।

देखों तो सही, डल झील में तैर रहे हैं कई शिकारे
ऐसे में कोई अपना दिल, बताओ तो कैसे ना हारे।

सुर्ख़ चिनार के वो शादाब शजर, मुस्कुराते हुए नज़र आते हैं
गुलमर्ग से लेकर पहलगाम तक, गुनगुनाते हुए नज़र आते हैं।

निशात हो या शालीमार, चमन में तो गुल खिलते हैं
दौर-ए-खिज़ा में अक्सर यहाँ, पत्तों के रंग बदलते हैं।

दरिया-ए-झेलम का पानी, अपनी कहानी कह रहा है
कई बरस बीत चुके हैं, मुसल्सल ख़ामोश बह रहा है।

अस्सार-ए-शरीफ़ जहां पर, महफूज़ मो-ए-मुक़द्दस है
हज़रतबल दरगाह तो बेहद, पाकीज़ा और मुक़द्दस है।

फ़िज़ाओं में बसी वो बेनज़ीर, जैसे कोई माहज़बीं है
गर ज़मीं पर कहीं जन्नत है तो बस यहीं है, यहीं है।।

:-RockShayar

“Positive Poem”

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एडवर्सिटी कम्स टू आईदर ब्रेक यू, ओर ब्रेक दी रिकॉर्ड
कुछ ऐसा कर जाओ कि, वो तुमको मिले नोबेल रिवॉर्ड।
 
एक ऑर्डिनरी को एक्स्ट्राऑर्डिनरी, बनाती है डेस्टिनी
हाँ निगेटिव को सुपरलेटिव बनना, सिखाती है डेस्टिनी।
 
बुरा वक़्त आपको तोड़ सकता है, या फिर से जोड़ सकता है
जिस तरफ भी आप चाहो, ये रुख हवाओं का मोड़ सकता है।
 
प्रॉस्पेरिटी ट्राइज दी फॉर्चुनेट, एण्ड एडवर्सिटी दी ग्रेट
असफलता बहुत ज़रूरी है, मत करो इससे इतना हेट।
 
वेन योर स्ट्रगल्स डवलप मेनी स्मार्ट स्ट्रेंग्थ्स इंटू यू
फिर अपने करियर को लेकर, हो इतना चिंतित क्यूँ।
 
ऐवरीवन नॉ, स्टार्स कैननॉट शाइन विदआउट डार्कनेस
हर बंदा यूनीक यहाँ पर, खुद पहचानो अपनी स्मार्टनेस।
 
एन ऑप्टिमिस्ट सी दी ऑपर्चुनिटी इन ऐवरी डिफिकल्टी
कोई नहीं जानता यहाँ पर कि, वो है कितना टैलेंटेड मल्टी।
 
ऐवरी डिफीट ऐवरी हार्टब्रेक ऐवरी लॉस कंटेंस इट्स ओन सीड
मुश्किलें उतनी ही मिलती हैं, जितनी कि ज़िन्दगी की हैं नीड।।

“वो अधूरी गुज़ारिश मेरी, अब भी अधूरी है”

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वो अधूरी गुज़ारिश मेरी, अब भी अधूरी है
कम नहीं होती कभी, ये जाने कैसी दूरी है।

तेरा नाम तेरी बातें, तुझसे मेरी वो मुलाकातें
तुझे भुलाने के लिए तुझे याद करना ज़रूरी है।

सुना है ! माशूक, साथ जीते हैं साथ मरते हैं
हमारा यूँ दूर-दूर रहना, कितना ग़ैरज़रूरी है।

हद पार करता हूँ, कभी सरहद पार करता हूँ
जुनून को बढ़ाता है जो, नशा तेरा फितूरी है।

तुझको भुलाना जैसे, खुद को भुलाना लगता है
बेपनाह चाहूँ तुझे, कितनी हसीं ये मज़बूरी है।

जितना सोच पाता हूँ, लिखता चला जाता हूँ
ये कामयाबी तो, कड़ी मेहनत की मज़दूरी है।

तेरी मेरी वो कहानी, डायरी में है जो छुपानी
अभी तो आधी लिखी है, बाक़ी अभी पूरी है।।

“स्मार्टफोन (SmartPhone)”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)
 
कभी नहीं सोता है जो, रहता चौबीसों घंटे ऑन
उँगली पर सबको नचाए जो, वो है जी स्मार्टफोन।
 
एमेजिंग एंड्रॉयड हो या विशिष्ट विंडोज, इन्हीं से तो पहचान है
विदाउट एन ऑपरेटिंग सिस्टम, ये सिस्टम स्टुपिड समान है।
 
सूचनाएं वो सब अब जेब में रहती हैं, ज़िन्दगी आजकल ऐप में रहती है
फरमाइशों का रेडियो खुद ऑन करके, ये माइक्रोवेव सितम सहती है।
 
बिन इंटरनेट के कुछ ऐसे तड़पता है, जैसे बिन पानी के मछली
फेसबुक व्हाट्स अप ट्विटर, यही सब तो इसकी मित्र मंडली।
 
सोशल मीडिया के संगठित द्वार, इसी के ज़रिए खुलते हैं
न्यू जेनरेशन के पाप जहाँ पर, कंफेशन के ज़रिए धुलते हैं।
 
सेल्फी लेना और सेल्फिश बनना, इसी ने तो सिखाया सब
इस डिजिटल नशे की लत से, खुद को आज़ाद करे हम अब।
 
टच स्क्रीन के कारण, फिंगर्स की सेंसिटिविटी कम हो जाती है
हाई डेफिनेशन ख़्वाब देखते-देखते, वो नींद कहीं खो जाती है।
 
चाहे वो अलार्म हो या कि कलाई घड़ी, या हो वो टेलीफोन डायरी
काग़ज़-क़लम बेरोज़गार हुए, लिखी जाती हैं इसी में अब शायरी।
 
चाहे कुछ भी हो जाए मगर, तकनीक तकनीक ही रहती है
हावी मत होने दो इसे खुद पर, नेचर हमेशा सही कहती है।
 
कभी नहीं रेस्ट करता वो, बताओ ऐसा है कौन?
फोन से कहीं बढ़कर है जो, वो है जी स्मार्टफोन।।
 
:-RockShayar