नौकरी उपलब्ध है

हिंदुस्तान के उभरते हुए मीडिया हाउस
शुभ 24 न्यूज़ चैनल में आपका स्वागत है

अगर आप में है कुछ कर गुज़रने का जज़्बा और जुनून
तो शुभ 24 टीम का हिस्सा बनने के लिए हो जाएं तैयार

निम्नलिखित रिक्तियों पर जयपुर कार्यालय
के लिए योग्य उम्मीदवार तुरंत आवेदन करे:-

1. हिंदी कंटेंट राइटर
2. वीडियो एडिटर
3. एंकर
4. बैक ऑफिस एग्जीक्यूटिव
5. एचआर एग्जीक्यूटिव

दिये गये पते पर मिले:

617, शुभ 24 न्यूज़ चैनल, 6 फ्लोर
वैभव कॉम्पलेक्स, आम्रपाली सर्किल
वैशाली नगर, जयपुर (राजस्थान)

दिये गये नंबर पर सीवी व्हाट्सएप करे:

7737713079
इरफ़ान अली ख़ान
कंटेंट हैड

नोट:- वर्क फ्रॉम होम सुविधा उपलब्ध नहीं है

Dainik Bhaskar Mein Aa Gaye Hum Bhi😍

*दैनिक भास्कर ने उभरते हुए न्यूज़ चैनल शुभ 24 की तारीफ़ की*
—————————————————–
*दैनिक भास्कर 24 जुलाई 2021 जयपुर संस्करण पृष्ठ 8*
—————————————————–
*देश के नंबर वन समाचार पत्र दैनिक भास्कर ने उभरते हुए न्यूज़ चैनल शुभ 24 की जमकर तारीफ की है. भास्कर के 24 जुलाई 2021 के जयपुर अंक में पृष्ठ संख्या 8 पर छपी खबर के अनुसार बहुत कम समय में अपनी अलग पहचान बनाने वाले शुभ 24 न्यूज़ समूह ने हिन्दुस्तान के हर कोने में अपनी धाक जमा ली है. सेल्स एंड मार्केटिंग हैड पीयूष शर्मा की अगुवाई में चैनल बहुत ही शानदार तरीके से आगे बढ़ रहा है. एंकर और राजस्थान सेल्स हैड गरिमा रितेश, कंटेंट हैड इरफ़ान अली और एडिटिंग हैड अंकित कौशिक की करिश्माई तिकड़ी ने शुभ 24 न्यूज़ की कमान संभाल रखी है. फिलहाल शुभ 24 यूट्यूब और ओटीटी प्लेटफार्म पर देश दुनिया की बाक़ी तमाम ख़बरों से रूबरू करवा रहे हैं. शुभ 24 जल्द ही आपको डीटीएच पर भी देखने को मिलेगा*

*क्या सच्ची पत्रकारिता से डर गई है सरकार?*



देश में कोरोना काल के बीच एक बड़ी ख़बर सामने आई है.
आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय ने दैनिक भास्कर समूह के कई कार्यालय पर छापे की कार्रवाई की है. ग़ौरतलब है कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान दैनिक भास्कर समूह ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का कर्तव्य निभाते हुए जनता के सामने लाने की भरपूर कोशिश की थी.

फिर चाहे बात गंगा में मिली लाशों की हो या वैक्सीन घोटाले की हो या रेमडेसीविर नकली इंजेक्शन की हो या ऑक्सीजन संकट की हो, इस आपदा काल में दैनिक भास्कर ने सब तरह की खबरों को प्रमुखता दी. और गोदी मीडिया की तरह अपने ज़मीर का सौदा नहीं करते हुए जनता की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाया.

शायद यही वजह रही है कि बीते गुरुवार भास्कर समूह के प्रमुख कार्यालयों पर इनकम टैक्स और ईडी ने छापेमारी की कार्रवाई की है. देश के प्रमुख राजनेताओं और समाचार पत्रों ने इसकी कड़ी निंदा की है. भास्कर समूह का एक अपना नाम है, रुतबा है, स्वच्छ छवि है, स्वतंत्र पहचान है. इस तरह की कार्रवाई कुछ अलग ही संदेश दे रही है.

क्या सरकार वाकई में डर गई है?
क्या सरकार को डर है कि जनता के सामने सच आ जाएगा?
क्या सरकार आगामी चुनाव की वजह से यह सब कर रही है?
ऐसे कई सवाल हैं जो जनता के मन में उभर रहे हैं.

सच्ची पत्रकारिता की आवाज़ दबाने की जो असंवैधानिक कोशिश की जा रही है, उसकी मैं खोजी मनमौजी बाइक रिपोर्टर कड़ी निंदा करता हूँ. और अपनी लिखी एक पंक्ति से जवाब देता हूँ.

“हक़ बोलेंगे, लाज़िम है के लब भी खोलेंगे
हर तदबीर अब हम इंसाफ़ के तराज़ू में तोलेंगे

ज़ुल्म करने वालों, सुनो ज़रा फ़र्माने इलाही
ज़ुल्म बढ़ने पर, तख़्त तुम्हारे ख़ुद बख़ुद डोलेंगे”




The RockShayar

With the attitude of a dreamer and the calmness of a writer, Irfan Ali Khan has rich experience in different fields. His technical ability and creative thought process makes smart decision making.

Irfan says, advertising is not only about promotion but also is about something you can relate. He also adds that emotions are an important part of our life. So through advertising we can also promote moral values to society.

*गाँव के युवा पत्रकार की ज़मीनी रिपोर्टिंग का असर, कलक्टर ने की तारीफ*

अजमेर जिले की मसूदा पंचायत समिति का बहुचर्चित गाँव लोडियाना इन दिनों अपनी समस्याओं के लिए सरकारी महकमों में चर्चा का विषय बना हुआ है.

सोशल मीडिया पर एक्टिव हमारे खोजी मनमौजी दबंग बाइक रिपोर्टर रॉकशायर इरफ़ान अली ख़ान देशवाली चौहान के प्रयासों के चलते अजमेर जिला कलक्टर ने ग्राम पंचायत लोडियाना की शुभ 24 द्वारा की गई ज़मीनी रिपोर्टिंग की तारीफ की है, साथ ही अधिकारियों को सख्त निर्देश भी दिए हैं.

दरअसल हमारे युवा पत्रकार ने ट्विटर पर गाँव की समस्याओं को लेकर मुख्यमंत्री गहलोत को ट्वीट किया था. मुख्यमंत्री कार्यालय ने फौरन अजमेर जिला कलक्टर को ग्राम पंचायत लोडियाना में मौजूद समस्याओं पर एक्शन लेने के आदेश दिये हैं. आपकी जानकारी के लिए बता दे कि हमारे युवा रिपोर्टर इंजीनियरिंग में स्नाकोत्तर के साथ ही साहित्य क्षेत्र में भी रॉकशायर के नाम से इंटरनेट पर काफी मशहूर है.

Raah e Haque

कामिल   है    ईमान    हमारा
राह-ए-हक़    मीज़ान  हमारा।

हम   को   झूठा  कहने  वाले
मक़्सद  तो  तू  जान  हमारा।

दिल में रहकर क्या ही करोगे
दिल   तो   है  वीरान  हमारा।

यादें  उसकी  सारी मिटाकर
जीना   कर   आसान  हमारा।

लौटा  ना   वो  शख़्स  दुबारा
वो  जो  था  इरफ़ान   हमारा।

मीज़ान – तराज़ू

We Are Hiring

हिंदुस्तान के उभरते हुए मीडिया हाउस
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निम्नलिखित रिक्तियों पर
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1. कंटेंट राइटर
2. विजुअल एडिटर
3. वीडियो एडिटर

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शुभ 24 न्यूज़, 6 फ्लोर
वैभव कॉम्पलेक्स
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वैशाली नगर, जयपुर (राजस्थान)

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अंकित – 8854868696
इरफ़ान – 7737713079

Seduce

अंग से मोहे तोरा अंग लगा दे
अंग पे मोहे तोरा रंग लगा दे

मैं बावरियाँ सब कुछ भूली
तोरे संग रासरंग सब झूली

सुर ताल स्वर लय छंद से
नाचू तोरे मन की सुगंध से

कारे कारे तोरे नैना दो कारे
दिल पर तीखी छुरियाँ वारे

मैं बावरियाँ सब कुछ भूली
तोरे संग प्रीतरंग सब झूली

अंग से मोहे तोरा अंग लगा दे
अंग पे मोहे तोरा रंग लगा दे ।।

मुझको दिल की ये तज्वीज़ बड़ी अच्छी लगती है

मुझको दिल की ये तज्वीज़ बड़ी अच्छी लगती है
उसके शहर की हर चीज़ बड़ी अच्छी लगती है

ज़िंदा है जिसमें इंतज़ार का वो इक तन्हा लम्हा
हसरत से तकती दहलीज़ बड़ी अच्छी लगती है

तज्वीज़ – Planning

Navel Ishq

देवर से दीवाने दिल का, न जाने किस भाभी पर दिल आ गया है

सब कुछ छोड़कर आजकल बस उनकी नाभि पर दिल आ गया है

Erotic

सुर्ख़ जोड़े में सजी हुई, घूँघट की आड़ में ढकी हुई
पिया मिलन की आस में, पलंग पर बैठी एक दुल्हन

डरी हुई सी सहमी हुई सी, बर्फ़ की तरह जमी हुई सी
भँवरे की राह तकती हुई, हो जैसे वो नाजुक कली सी।

दिल में कई अरमां सजा रखे हैं आँखों में दीप जला रखे हैं
गुलाब की पंखुड़ी जैसे होंठ, मदिरा के प्याले छलका रहे हैं।

पिया ने जब उसको छुआ, छुईमुई सी वो सिमट गई
पहले थोड़ा लज्जाई, बाद में अमरबेल सी लिपट गई।

उस पल जो हुआ उसे यहाँ पर लिखा नहीं जा सकता है
उस पल जो हुआ, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है

दूर कहीं झरना बह रहा था, पास में जिसके एक अँधेरी गुफा थी
एक दूसरे का हाथ पकड़कर, दोनों ने यह अनोखी यात्रा पूरी की

समापन के पश्चात स्वेद रक्त से लथपथ हो गये वो दोनों
विसर्जन के पश्चात कुछ देर तक निशक्त हो गये वो दोनों

सुहाग से जब हुआ मिलन, दुल्हन बन गई सुहागन
मन मरुस्थल में देखो आज, बरसने लगा है सावन।।













Khoji Manmauji Bike Reporter Irfan Ali Khan

**बिजयनगर पुलिस ने 28990 लीटर हथकढ शराब को नष्ट किया**

बिजयनगर थाना पुलिस ने अवैध शराब माफिया के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है. हमारे दबंग पत्रकार इरफ़ान अली खान की रिपोर्ट के अनुसार आबकारी अधिनियम के 7 प्रकरणों में जप्त शुदा माल लगभग 28990 लीटर शराब को बिजयनगर थाना पुलिस की गठित कमेटी द्वारा नष्ट किया गया.

मादक कविता

होंठो पे अपने होंठ रख दूँ
आ तुझे मैं प्यार कर लू।

साँसों में साँसें घुल जाने दे
बाँहों में बाहें मिल जाने दे। 

दो जिस्म मगर जान एक है
इरादे मेरे नहीं आज नेक है।

आग लग रही है, तन-बदन में
जल रहा हूँ मैं प्रेम अगन में।

लबों पे अपने लब रख दूँ
आ तुझे मैं प्यार कर लू।

एक दूसरे में खो जाने दे
मुझको तेरा हो जाने दे। 

चलो ना आज पूरी तरह से बहक जाते हैं
ताक़त हम अपनी इक दूजे पे आज़्माते हैं।

आग लग रही है, तन और मन में
सुलग रहा हूँ मैं, बरसते सावन में।।

Erotic poem (new try) Kamzor dilwale na padhe😜😉

भीगी हुई साड़ी का पल्लू तो गिराओ ज़रा
दूर जाने से पहले नज़दीक तो आओ ज़रा

लिपट जाएं मुझसे तू, किसी अमरबेल की तरह
उतर जाऊं तुझमें मैं, रिसते हुये तेल की तरह

सीने की कसावट को, हाथों में भर लेने दे
साँसों की गर्माहट को, साँसों में भर लेने दे

नाभि की नशीली गहराई में, जी भरकर गोते लगाने दे
चाहत को राहत में बदलने का, हुनर तू आज दिखाने दे

जो थामता हूँ, तो मछली की माफिक फिसलती है कमर
जो चूमता हूँ, तो मछली की माफिक उछलती है कमर

कसमसाती हुई हथेलियों को, धीरे-धीरे ऐंठने तो दो
थरथराती हुई उँगलियों को, हर जगह फेरने तो दो

तेरी बढ़ती हुई सिसकारियाँ, मेरा हौसला बढ़ा रही हैं
तेरी पिघलती हुई पिचकारियाँ, मेरा बदन भिगा रही हैं

सुलगते हुए तन पर, दहकता हुआ लावा बहने तो दे
हर एक पल में जैसा हो रहा है, बस वैसा होने तो दे

भीगी हुई साड़ी का पल्लू तो गिराओ ज़रा
तर करने से पहले आग तो भड़काओ ज़रा।

















Ishq bhi ajib he

बिना मक़्सद मैं उसके शहर से अक्सर गुज़रता हूँ
नहीं करनी हो जो गलती वहीं क्यों कर गुज़रता हूँ

अभी तक याद है मुझको गली उसकी पता उसका
नहीं जब काम फिर भी क्यूँ वहीं होकर गुज़रता हूँ

Seductive lines

सीने पे तेरे उभरी हुई हैं, मेरी छुअन की वो सलवटें
सितारों के पार ले जाती हैं, तेरे बदन की वो करवटें

मदहोश करे खुशबू तेरी, रातभर जलाएं आरज़ू तेरी
कैसा असर है वस्ल का, आबरू तेरी है आबरू मेरी

महके-महके से लगते हैं, मोहब्बत भरे मुख़्तसर लम्हे
बहके-बहके से लगते हैं, शरारत भरे ये बेसबर लम्हे

बलखाती कमर पर, बारिश की बेईमान बूँदें जब गिरती हैं
लरज़ते लबों की तिश्नगी, थरथराता मंज़र देखते ही बढ़ती हैं

“मैं हिंद का मुसलमान हूँ”

  1. मीर हूँ कबीर हूँ
    मैं मिट रहा ज़मीर हूँ
    था बादशाह जो कभी
    क्यूँ आजकल हक़ीर हूँ
    तारीख़ हूँ तहरीर हूँ
    एक दौर का अमीर हूँ
    दुश्मन सारा जहाँ मेरा
    तरकश में रखा तीर हूँ
    मिटाना मुझे आसां नहीं
    मैं सुलेमानी शमशीर हूँ
    मेरे बिना कैसी तरक्की
    मैं भारत की तस्वीर हूँ
    मेरे बिना कैसा विकास
    मैं भारत की तक़्दीर हूँ
    मेरे बिना कैसी जन्नत
    मैं वादी ए कश्मीर हूँ।
  2. हुनर की मैं खान हूँ
    क्यूँ फिर भी परेशान हूँ
    हाँ ख़ुद से अनजान हूँ
    वतन पे क़ुर्बान हूँ
    सवाल उठ रहे हैं आज
    क्यूँ अली क्यूँ ख़ान हूँ
    तो जवाब सब सुने ये आज
    मैं कैसे इस देश की शान हूँ
    एक ऐसे देश का अभिमान हूँ
    जहाँ बेफ़िक्र हो देता अज़ान हूँ
    पहचान बस इतनी मेरी
    मैं हिंद का मुसलमान हूँ
    मैं हिंद का मुसलमान हूँ।
  3. ग़ालिब हूँ साहिर हूँ
    मुहब्बत में माहिर हूँ
    ख़ुसरो हूँ रसख़ान हूँ
    मैं जायसी और निज़ाम हूँ
    हसरत हूँ फ़राज़ हूँ
    राहत मुनव्वर दाग़ हूँ
    वसीम हूँ बशीर हूँ
    मैं निदा ए रहीम हूँ
    कुमार हूँ फ़िराक़ हूँ
    कैफ़ी जां निसार हूँ
    जिगर हूँ ज़ौक़ हूँ
    शायर दरअसल रॉक हूँ
    फैज़ हूँ जॉन हूँ
    सदियों से मौन हूँ
    जो कहते डॉन हूँ
    वो सुने मैं कौन हूँ
    वो सुने मैं कौन हूँ।
  4. इक़बाल हूँ आज़ाद हूँ
    सर सैयद मैं अश्फ़ाक़ हूँ
    ज़ाकिर अमज़द ख़य्याम हूँ
    मैं मोमिन अब्दुल कलाम हूँ
    शहीद हूँ हमीद हूँ
    संग दीवाली मैं ईद हूँ
    हिदायतुल्लाह की परछाई
    मैं बिस्मिल्लाह की शहनाई
    लोग कहते बाहरी मुझे
    सौतेला नहीं मैं सगा भाई।
  5. रफ़ी हूँ रहमान हूँ
    शाहरुख़ आमिर सलमान हूँ
    संगीत सूना मेरे बिना
    मैं सलीम सुलेमान हूँ
    ज़हीर शमी पठान हूँ
    मैं हाशमी इमरान हूँ
    क़िरदार चाहे हो कोई
    हर रोल में इरफ़ान हूँ
    पहचान पूछने वालो सुनो
    मैं हिंद का मुसलमान हूँ।
  6. नसीर हूँ नवाज़ हूँ
    सिनेमाई सरताज हूँ
    नौशाद हूँ इरशाद हूँ
    के आसिफ इम्तियाज़ हूँ
    बोल सईद कादरी के
    मैं जावेद की आवाज़ हूँ
    लालकिले का सुर्ख़ लहू
    यमुना किनारे ताज हूँ
    जॉनी जगदीप महमूद हूँ
    कादर अजित महबूब हूँ
    सलीम जावेद मज़रूह हूँ
    इस मुल्क़ की मैं रूह हूँ।
  7. नरगिस सुरैया सायरा हूँ
    ज़ीनत शबाना ज़ायरा हूँ
    परवीन जुबैदा फरीदा हूँ
    मधुबाला और वहीदा हूँ
    सरोज सना फराह हूँ
    तब्बू हुमा साराह हूँ
    आलिया मीना ज़रीना हूँ
    मैं हेलन और कटरीना हूँ
    सानिया हूँ सैफ हूँ
    अज़हर और कैफ़ हूँ
    मेरी फ़िक्र छोड़ो पड़ोसी
    मुल्क़ में अपने सैफ हूँ
  8. सरहद पे खड़ा जवान हूँ
    सीने में रखता क़ुर्आन हूँ
    नबी पर रखता ईमान हूँ
    गरीब नवाज़ की शान हूँ
    शहद सी मीठी ज़बान हूँ
    मैं अदब का पासबान हूँ
    प्रश्न उठते हैं फिर भी
    क्यूँ अली क्यूँ ख़ान हूँ
    पर बुरा नहीं मानूंगा मैं
    बड़े फ़ख्र से कहूंगा ये
    मुक़म्मल हिंदोस्तान हूँ
    मुक़म्मल हिंदोस्तान हूँ
    पहचान बस इतनी मेरी
    मैं हिंद का मुसलमान हूँ
    शनाख़्त बस इतनी मेरी
    मैं हिंद का मुसलमान हूँ।

@Rockshayar irfan

कभी तूफ़ान था मैं भी

अभी मिस्कीन हूँ लेकिन, कभी सुल्तान था मैं भी
कोई कह दो हवाओं से, कभी तूफ़ान था मैं भी

लगाओ ख़ूब तोहमत तुम, मगर ये तो नहीं भूलो
बुरा है वक़्त लेकिन हां, कभी इर्फ़ान था मैं भी

Abhi Miskin Hoon Lekin
Kabhi Sultan Tha Main Bhi

Koi Keh Do Hawaon Se
Kabhi Toofan Tha Main Bhi

Ibadat Ka Maqsad

अगर सच को लिखने की ताकत नहीं है
तो लिखने की तुझको ज़रूरत नहीं है

इबादत का बदला तो जन्नत है यारो
इबादत का मकसद तो जन्नत नहीं है

ये दौलत ये शोहरत ज़मीं की ये हसरत
हूँ दरवेश मेरी ये ज़रूरत नहीं है…

Watch full video at
👇👇👆
https://youtu.be/SUc3eOKkEWY

गर मुहम्मद से निभाई, तो वफ़ा है काम की

गर मुहम्मद से निभाई, तो वफ़ा है काम की
याद रक्खो आप के बिन, ज़िंदगी बस नाम की

कामयाबी चाहते हो, राज़ फिर ये जान लो
ज़िक्र जिसमें हो ख़ुदा का, रात है वो काम की

Dil Se

किसी ने दिल से लिक्खा है किसी ने दिल पे लिक्खा है
कि हमने नाम उसका फिर किसी साहिल पे लिक्खा है।

यहाँ सब लोग तन्हा हैं सभी की रूह प्यासी है
जलेगा कौन कब कितना सभी के दिल पे लिक्खा है।

©इरफ़ान अली ख़ान

No Tobacco Day

आँसू को भी आँख तक आना पड़ता है
ना जाना हो जिधर वहीं जाना पड़ता है

अजीब आदत है सिगरेट पीना भी
हर बात पर सीना जलाना पड़ता है

Nazar nahin aata

कहीं कोई दस्तगीर अब नज़र नहीं आता
शख़्स वो बेनज़ीर अब नज़र नहीं आता।

मंजिल की ओर चला था जो एक मुसाफ़िर कभी
खो गया वो राहग़ीर अब नज़र नहीं आता।

था जिसकी दुआओं में असर भी शिद्दत भी
कहाँ गया वो फ़क़ीर अब नज़र नहीं आता।

बिक जाते हैं लोग आजकल कौड़ियों के भाव में
पहले जैसा ज़मीर अब नज़र नहीं आता।

Nazar nahin aata

कहीं कोई दस्तगीर अब नज़र नहीं आता
शख़्स वो बेनज़ीर अब नज़र नहीं आता।

मंजिल की ओर चला था जो एक मुसाफ़िर कभी
खो गया वो राहग़ीर अब नज़र नहीं आता।

था जिसकी दुआओं में असर भी शिद्दत भी
कहाँ गया वो फ़क़ीर अब नज़र नहीं आता।

बिक जाते हैं लोग आजकल कौड़ियों के भाव में
पहले जैसा ज़मीर अब नज़र नहीं आता।

ख़िलाफ़त जो करेगा अब, उसी की जान जायेगी

नहीं मानी अभी तक जो, ये दुनिया मान जायेगी
चुना हम ने गलत बंदा, ये अब के जान जायेगी

पहन चोला शराफ़त का, हुकूमत ने किया ऐलान
ख़िलाफ़त जो करेगा अब, उसी की जान जायेगी

Alwada Mah e Ramzan

अलविदा ना कहो माह-ए-रमज़ान को
यूं ज़ुदा ना करो जिस्म से जान को।

कोई तो रोक लो, थाम लो वक़्त ये
रोकते है यूं जैसे कि मेहमान को।।

Nurses Day

बचाते हैं सभी की जां, मुक़द्दस काम करते हैं
डटे रहते हैं ड्यूटी पे, नहीं आराम करते हैं

बड़ी ईमानदारी से, करे तीमारदारी जो
दुआएं दो ज़रा इनको, बड़ा ये काम करते हैं

ठिकाना है शिफ़ाखाना, बचाना है सभी की जां
दवा देना दुआ लेना, यही सब काम करते हैं

चुने जो फ़र्ज़ को पहले, असल में नर्स है वो ही
नहीं थकते नहीं थमते, हमेशा काम करते हैं

Baitul Muqaddas

सुनो आवाज़ देती है, ज़मीं बैतुल मुक़द्दस की
हिफ़ाज़त तो करेगा वो, वही सबसे बड़ा ग़ाज़ी

क़यामत की निशानी है, वबा ये तो ख़ता ये तो
गवाही रोज़ देती है, फ़ज़ा बैतुल मुक़द्दस की

नबी ने पांव जब रक्खे, ज़मीं वो झूमकर बोली
हुई मक़्बूल अब जाकर, दुआ बैतुल मुक़द्दस की

भले फ़ित्ना बढ़े जितना, थमेगी ज़ुल्म की आंधी
बिखरकर टूट जाएगी, सभी शाखें यूँ बातिल की

लिखा है जो ज़माने ने, उसे तुम भूल ही जाओ
जहां में फिर से गूंजेगी, अज़ां बैतुल मुक़द्दस की

@irfan

Be A Bahubali in Covid

महासेना क्या है कोरोना?

हमारी कम्युनिटी से वायरस की इम्युनिटी ज्यादा है
ये सोचना है कोरोना

बिना काम के बिना बात के
बाज़ार में इधर उधर टहलना है कोरोना

जिस वायरस को हमने मार भगाया था
वो दोबारा हमारे आसपास तेजी से फैल रहा है

उसका सर कुचलकर मेडिकोज का हौसला बढ़ाने के बजाय
वैक्सीन के लिए उन्हें परेशान करना है कोरोना

उस वायरस को रोकने जा रहा हूं मैं
मेरी फैमिली और शहर को वह छू भी नहीं सकता
उसको फिर से मात देने के लिए
कुछ दिन घर पर ठहरने जा रहा हूं मैं

मेरे साथ घर पर रुकेगा कौन?
हर वक़्त गरम पानी पियेगा कौन?
एक दूसरे की हिम्मत बढ़ायेगा कौन?

जय मनुष्य मति

Itfar

अब्र की आँखों से दर्द टपकने को है
सब्र कर ऐ ज़मीं, बारिश होने को है

अभी प्यास लगना लाज़िम है तुझे
बस थोड़ी देर और, इफ़्तार होने को है

Maula Tu

सभी के दिल में मौला तू,
अली के दिल में मौला तू
कि सबको चाहता है तू,
सभी के दिल में मौला तू

फ़लक से चाँद है उतरा,
गवाही जो कि देता है
ये सब कुछ है नबी से और,
नबी के दिल में मौला तू

Chalo na

चलो न नया एक नशेमन बनाते हैं
एक दूसरे के और पास आ जाते हैं।

नज़दीक आने में अभी वक़्त लगेगा
चलो न दूर से ही दूरियां मिटाते हैं।

ख़यालात में खून की कमी चल रही है
चलो न खुद को जी भरके हँसाते हैं।

हक़ीक़त को सच मान चुकी हैं आँखें
चलो न इन्हें कुछ ख़्वाब दिखाते हैं।

बहुत दिन हो गए हैं दर्द सहते-सहते
चलो न आज जी भरके मुस्कुराते हैं।

Hippocrate Wazir

चेहरा छुपाने के बजाय अपनी नाकामी छुपा रहा है
जनता जान चुकी हैं, वज़ीर अपनी ख़ामी छुपा रहा है

अंधों की भीड़ जमा करके, उनको गूंगा बना दिया
करके सबको गुमनाम अपनी बदनामी छुपा रहा है


























Naye Zamane Yaar Purane

बंजर में बारिश के फ़साने ढूंढते हैं
वो हँसने के भी बहाने ढूंढते हैं

खो जाते हैं जो किसी दौर के दौरान
खुद को लिखने के बहाने ढूंढते हैं

दुःखी होते हैं जब लोग अक्सर
नए जमाने में यार पुराने ढूंढते हैं

Haq bolenge

हक़ बोलेंगे,
लाज़िम है के लब भी खोलेंगे
हर तदबीर अब हम
इंसाफ़ के तराज़ू में तोलेंगे

ज़ुल्म करने वालों
सुनो ज़रा फ़र्माने इलाही
ज़ुल्म बढ़ने पे
तख़्त तुम्हारे ख़ुद बख़ुद डोलेंगे

Shame Shame

वज़ीर के भेष में आला अदाकार है आप
रियाया जान चुकी हैं, रियाकार है आप

सियासत हो या तिजारत
कोई आपसे सीखे
मानना पडे़गा कमाल के कलाकार है आप

रियाया – प्रजा
रियाकार – पाखंडी
तिजारत – व्यापार

Hungama

हंगामा है हर तरफ़, कौन सही और कौन गलत
अंदर आग बाहर बरफ़, कौन सही और कौन गलत।

ये लिखू के वो लिखू, समझ नहीं आता कुछ भी
सहमे हुए सारे हरफ़, कौन सही और कौन गलत।

किस किस से बचेगी भला अब इंसानियत यहां
ये भेड़िया वो जरख, कौन सही और कौन गलत।

वसीयत सौंपी थी जिसे, वही जलाने लगा है घर
सदमे में है सारा शहर, कौन सही और कौन गलत।

इंसानियत की मौत

सड़ चुकी है सोच यहां, हर ख़याल ख़मीर बन गया
देखो कैसा दौर आया है, इंसान का ज़मीर मर गया

उम्मीद भला क्या कीजे, मुंसिफ़ से अब इंसाफ़ की
अब तो बस दुआ कीजे, ज़ालिम जो मीर बन गया

Come back

अभी जो हाल है मेरा, सभी को जान लेने दो
कि जैसा मानता है जो, उसे वो मान लेने दो

नहीं है हक़ यहाँ तुमको, किसी की जान लेने का
कि जिसने जान बख़्शी है, उसी को जान लेने दो

Hope

बेशक थोड़ा ठहर गया हूँ, ताकि फिर से उड़ सकूं
बिखरे टुकड़े समेट रहा हूँ, ताकि फिर से जुड़ सकूं

ये कैसी ज़िन्दगी मौला

कभी आतिश कभी बारिश ये कैसी ज़िन्दगी मौला
सफ़र भी अलविदा को है मिलेगी कब ख़ुशी मौला

गुज़रता ही नहीं लम्हा गुज़रता हूँ मैं हर लम्हा
रिहा कर दे मुझे या फिर बदल क़िस्मत मेरी मौला

“उदासी में डूबा हुआ लम्हा”

 

एक लम्हा, उदासी में डूबा हुआ
मुझमें आकर, थम गया
जब कभी बैचैन होता हूँ
चेहरे पर नज़र, आ जाता
खामोश आँखों से, जाने क्या कह रहा
दिल में छुपी, बेबसी का अक्स है
जेसे इक गहरा, नीला समंदर
सीने में, ज़ज्बात दफन किये बेठा हुआ
साहिल पे खड़ा हूँ, कबसे यहाँ
कोई किनारा मगर, दिखता नहीं
कहा चले गए, हंसी के वो बादल
ख़ुशी में जो सदा, बरसते रहते
तलाश भी अब, धुंधली होने लगी है
पलकों के, उदास पानी से
एक शख्स, दर्द में डूबा हुआ
मुझमें आकर, थम गया

“एक नादान परिंदा था वोह”

एक नादान परिंदा था वोह 
पतंग के माँझे से यूँ लटका हुआ 
मेने आज एक कबूतर देखा
कबका मर कर सूख चुका
माँझे से दोनों पंख कटे हुए 
बहुत फड़फड़ाया होगा शायद 
आज़ाद होने को
मगर ना मालूम था उसे
इस जाल के बारे में
इंसान के लिए जो महज खेल
मनोरंजन का साधन है 
परिंदे ने ना सोचा होगा कभी
ये पतंग यूँ मौत का खेल बन जायेगा
वो तो बस शाम को उड़कर
अपने घर लौट रहा था 
पतंगों कि उस बाजी में
जान कि बाजी हार गया
कुछ ना नज़र आया उसे 
बस माँझे में उलझता गया
आखिरी सांस तक फड़फड़ाता रहा 
फिर दम तोड़ दिया 
लटक गया माँझे से यूँ
जेसे हो कोई कटी पतंग 
छत कि मुंडेर से लटकी हुई 
दूर पेड़ो पर बेठे थे चील कौए
बदन को नौंच नौंच कर खा गए
जो बचा उसे धूप सुखा गयी
अब तो सिर्फ मांझा लटका है अकेला
किसी कबूतर के निशान नहीं इस पर 
शायद उसका गुनाह यही के
एक नादान परिंदा था वोह……… 

“भूल कभी ना भूल से”

भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से
इरादे हो तेरे गर आसमानी
हो चाहे हर शय की ज़बानी
चलते चलते यूँ बेफ़िजूल से
मिलना है इक दिन धूल से
भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से ।

कमा ले जितनी मालो दौलत
बना ले जितनी शानो शौकत
रह जायेगी सब धरी की धरी
बात समझ ले यह ख़री ख़री
गिरते पङते यूँही उसूल से
मिलना है इक दिन धूल से
भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से ।

ज़िंदगी तूने जैसे भी जी
बंदगी तूने कैसे भी की
हिसाब होगा हर एक चीज का
बोये गए हर एक बीज का
फलते फूलते यूँही फिजूल से
मिलना है इक दिन धूल से
भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से ।

भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से
इरादे हो तेरे गर आसमानी
हो चाहे हर शय की ज़बानी
चलते चलते यूँ बेफ़िजूल से
मिलना है इक दिन धूल से
भूल कभी ना भूल से
बना है तू तो धूल से ।।

अच्छी शायरी क्या होती है (part 2)By Fehmi Badayuni


आगे बढ़ने से पहले ‘आमद’ (स्वतःस्फूर्त शायरी ) और ‘आवुर्द’ (प्रयासजन्य शायरी ) पर एक छोटी सी बहस बहुत ज़रूरी है क्यों कि अब सारा दारोमदार इन्ही पर आने वाला है। आपने अक्सर शायरों को कहते सुना होगा कि ”अब वो शेर सुनिए जिसके लिए ग़ज़ल कही” या कहना पड़ी या ”हासिल-ए-ग़ज़ल शेर समाअत करें” वग़ैरह वग़ैरह। इस शेर को आमद का शेर कहते हैं यानी अचानक आपके ज़हन में एक ख़्याल या एक मिसरा पैदा होता है और थोड़ी सी कोशिश करके आप शेर मुकम्मल कर लेते हैं। आम तौर पर ‘आमद’ का शेर अच्छा ही होता है।

इसके बरअक्स आवुर्द यानी कोशिश करके शेर ‘बनाया’ जा सकता है, लेकिन इनमें वो बात नहीं होती जो ‘आमद’ वाले शेर में होती है। कुछ पुराने उस्तादों का क़ौल है कि शेर बनाया नहीं जाता बल्कि होता है या हो जाता है। ठीक है मान लिया कि एक शेर हो गया आपने उसका क़ाफ़िया और रदीफ़ Set कर लिया। अब आप ग़ज़ल पूरी करने के लिये अलग अलग क़ाफिये चुनेंगे और शेर ‘बनाने’ में लग जाएंगे, जब कि शेर बनाया नहीं जा सकता, बल्कि हो जाता है।

तो फिर आप क्या बना रहे हैं। महज़ ग़ज़ल पूरी कर रहे हैं, ताकि आप आमद का एक शेर सुनाने के अहल हो जाएँ। दूसरी बात ये कि ‘आमद’ हर वक़्त नहीं होती, कभी कभी होती है। 5 / 7 शेर की पूरी ग़ज़ल ही आमद की हो जाये, ये ना-मुमकिन सा है।

मगर हम ग़ालिब के यहां देखें या किसी और बड़े शायर के यहाँ देखें तो ग़ज़ल के सारे शेर एक ही Quality के होते हैं और मुतअस्सिर भी करते हैं, इससे साफ़ ज़ाहिर है कि अच्छा शेर ख़ुद भी हो सकता है और ‘बनाया’ भी जा सकता है। कम से कम उसे 70 / 80% तक आमद के शेर में ढाला जा सकता है। बड़े शायरों के ऐसे ही शेर ध्यान से पढ़ कर ये तलाश किया जा सकता है कि इन्होंने क़ाफिये रदीफ़ को अच्छे शेर में बदलने के लिए क्या किया है। मैंने ये अमल नए पुराने नामचीन शायरों पर किया और कुछ नतायज हासिल किए, जो सब में Common थे, और कुछ अलग अलग थे।

एक बात और कहनी है कि ये तजज़िया हमने अपनी फ़हम के मुताबिक और अपनी सहूलत के लिए किया है। आपका या किसी का भी इससे मुत्तफ़िक़ होना ज़रूरी नहीं है। और न मेरा कोई ज़ोर है कि आप इसे ही अपनी शायरी पर Apply करें।

शायरी बिल-ख़ुसूस ग़ज़ल की शायरी इशारों कनायों और तशबीह (Simile) का फ़न है इसका अहम ज़ेवर इस्तिआरे यानी Metaphors हैं। इस्तिआरे का मानी उधार लेना है, यानी हम किसी लफ़्ज़ का मफ़हूम किसी दूसरे लफ़्ज़ से लेते हैं, तो वो इस्तिआरा कहलाता है, जैसे ‘सफ़र’ ज़िन्दगी का इस्तिआरा है, ‘दरिया’ वक़्त का इस्तिआरा है क्योंकि वक़्त की तरह आगे बढ़ता रहता है। वग़ैरह वगैरह!! जैसे हमारी आपकी Family होती है उसी तरह अल्फ़ाज़ की भी Family होती है और इसमें इज़ाफ़ा भी वक़्त के साथ होता रहता है। उर्दू शायरी के सबसे पुराने ये चन्द इस्तिआरे एक ही Family के मेम्बर हैं।

1- आशियाँ
2- बिजली
3- शजर
4- क़फ़स
5- चमन

किसी शेर की तशकील में इस में से कम से कम दो इस्तिआरे (रूपक) लेना ज़रूरी है, दो से ज़्यादा भी लिए जा सकते हैं, फिर उनके बीच कोई Link क़ायम करते हुए एक ख़्याल अख़्ज़ करना है। उस ख़्याल को दूसरे अल्फ़ाज़ की मदद से किसी बहर में बांधना है। एक मिसरा बन जायेगा। इस पर दूसरा मिसरा लगा कर शेर पूरा करना है। इस्तिआरे किसी एक मिसरे में या दोनों मिसरों में लाये जा सकते हैं। दोनों में लाएंगे तो शेर और ज़ियादा मानी-दार हो जाएगा। मफ़हूम की फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं अगर आपने Link को Natural लिया है तो मफ़हूम अपने आप पैदा हो जाएगा। लेकिन ये Group बहुत Old है, हज़ारों शेर पुराने लोगों ने इन इस्तेआरों की मदद से निकाले हैं। आपका शेर किसी न किसी से टकरा ही जायेगा, लिहाज़ा इस पर कोशिश न करें, ये Example के तौर पर लिया गया है। अब एक शेर ग़ालिब का देखिए इस Group का सबसे अहम शेर यही लगा मुझे।

क़फ़स में मुझ से रूदाद ए चमन कहते न डर हमदम
गिरी है जिस पे कल बिजली वो मेरा आशियाँ क्यों हो

अब हम ये चाहते हैं कि इस Group से शेर कहें। क्योंकि रवायत से जुड़े रहना भी ज़रूरी है, और साथ ही ये भी चाहते हैं कि शेर ताज़ा और नया भी हो तो उसकी एक तदबीर है कि हम इस Group में इसी फ़ैमिली के कुछ नए लफ़्ज़ शामिल करें। जैसे आशियाँ के Base पर चिड़िया या परिंदा, शजर के Base पर फल, फूल,पत्थर में से कुछ। इस से ये होगा कि जो अल्फ़ाज़ आपने नए लिए हैं, उनमें आपसी Relation ज़रूर क़ायम किया जा सकता है क्योंकि Origin एक ही है। अब चिड़िया, फल, फूल, पत्थर में हमें एक Link मिल गया जिससे एक ख़्याल नमूदार हुआ कि ”अगर शजर पर पत्थर मार कर फल तोड़ा जाए तो वो चिड़िया के भी लग सकता है” मिसरा ये रहा,

”एक चिड़िया गिरी थी फल के साथ”

ये मिसरा पूरा बनाया हुआ नहीं है लगभग ‘आमद’ जैसा ही है अब ऊपर के मिसरे में पत्थर का ज़िक्र ज़रूरी है। ‘शजर’ या ‘पेड़’ का ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि ‘शजर’ की Family के दो लफ़्ज़ पहले ही आ चुके हैं, जो Reader को ‘शजर’ तक पहुंचा देंगे।

अब शेर इस तरह हुआ,

मैंने पत्थर से हाथ तोड़ लिया
एक चिड़िया गिरी थी फल के साथ

यक़ीन है कि ये शेर उस्तादों के शेर से लग्गा नहीं खाता। अब एक और मिसाल देकर ये सिलसिला ख़त्म किया जाएगा।

दूसरे नम्बर पर जिस Group के इस्तिआरों का इस्तेमाल जम कर किया गया है, वो यह है,

1- हवा या आंधी
2- दिया या चराग़
3- उजाला या अंधेरा

हर शेरी मजमूए में आपको इस पर शेर मिल जाएंगे। लिहाज़ा अगर आप इसी Group से ख़्याल उठाएंगे तो रवायत के साथ किसी शेर से भी जुड़ जाएंगे। आइये फिर वही कर के देखते हैं,

हवा के Base पर पेड़ या खिड़की लिया
दिये के Base पर मिट्टी,चाक और तेल लिया
उजाले के Base पर कमरा या दीवार लिया

किसी ख़्याल की पैदाइश के लिए अब इसमें से हमें दो या तीन लफ्ज़ Consider करना है। एक तो यूँ हुआ ”कुम्हार अगर तेल में मिटटी गूंथ कर दिया बनाये तो क्या situation होगी” सोचने पर ये ख़्याल कुछ अटपटा सा लगा, लिहाज़ा Pending में डाल देते हैं। दूसरा ये हुआ कि ”जब कुम्हार चाक पर मिट्टी का दिया बना रहा हो तो उस वक़्त हवा के ज़हन में क्या चल रहा होगा” इस ख़्याल में जान नज़र आई तो शेर भी हो गया,

हवाएँ चाक के नज़दीक आन बैठी हैं
अभी बना भी नहीं है चराग़ मिट्टी का

चाक और मिट्टी की मौजूदगी में कुम्हार को मिसरे में लाने की ज़रूरत नहीं है, ये मैं इस लिए बार बार बता रहा हूँ कि एक भी फ़ालतू लफ़्ज़ शेर को बेकार कर सकता है। उम्मीद है कि आपको ये सिलसिला पसन्द आएगा लेकिन इस के इस्तेमाल के लिए बड़ी Study और माथा-पच्ची की ज़रूरत है। होनी भी चाहिए कि शायरी यूँही थोड़ी हो जाती है।

इसी तरह हर दौर की ग़ज़लिया शायरी में कोई न कोई Group हावी रहता है। 1980 से 2000 तक के दौरान हवा, चराग़ का दबदबा रहा था। जिधर देखिये हवा ही हवा, चराग़ ही चराग़ नज़र आते थे। मौजूदा वक्त में ख़ाक, बदन, वहशत का Group हावी है। ग़ज़ल की शायरी पर उस्ताद तो उस्ताद नौजवान लड़के भी इसी पर लगे हुए हैं।

दर असल ये तसव्वुफ़ के सूफ़ी शायरों ने अमूमन फ़ारसी में इस्तिआरों की शक्ल में ख़ूब इस्तेमाल किये हैं । तसव्वुफ़ का फ़लसफ़ा बड़ा Complicated है वुजूद, वहदत-उल-वुजूद,अज़ल, अदम और इसी तरह के कई भारी भरकम लफ़्ज़ इसमें भरे पड़े हैं।

इस पर लगातार अच्छी शायरी करने वाले नौजवानों मे से दो एक को छोड़ कर बाक़ी ने ये अल्फ़ाज़ सुने भी नहीं होंगे मगर Group में कोई Link बना कर शेर कह देते हैं और मफ़हूम कुछ न कुछ निकल ही आता है। अब तो इसमें ‘ख़ाक’ और ‘बदन’ की family भी बढ़ गयी है चाक, कूज़ा-गर लहू, सांस, भी शामिल हो गए हैं।

Symbolic शायरी का सबसे बड़ा फ़ायदा ही ये है कि इसमें शाइर ख़ुद मफ़हूम पैदा नहीं करता बल्कि सारे symbols मिल कर ख़ुद एक माना बनाते हैं। ब-राहे-रास्त की जाने वाली नफ़्सियाति शायरी में ज़्यादा महनत करना पड़ती है और Fiction, फ़िल्म, News वग़ैरह से तहरीक हासिल करना पड़ती है। एक बात और कि ऊपर का System मेरी ज़ाती ईजाद नहीं है। आप अमीर ख़ुसरो को पढ़ें तो उसमें एक Chapter कह-मुकरनी का है। इसमें होता ये था कि वो लोगों से कहते थे कि सब एक एक लफ़्ज़ बोलें, जब तीन-चार लफ़्ज़ जमा हो जाते तो अमीर ख़ुसरो उनका इस्तेमाल करते हुए एक शेर जैसा कुछ कहते और उसे कहमुकरनी बताते। मिसाल के लिये एक बार वो कहीं जा रहे थे कि किसी गाँव से गुज़रे तो पनघट पर औरतें पानी भर रहीं थी, उन्होंने वहाँ पानी पिया और उनसे कहा कि एक एक लफ्ज़ बोलो तो चारों औरतों ने खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल का लफ़्ज़ अदा किया, जिनमें ब-ज़ाहिर कोई Link नज़र नहीं आता, मगर ख़ुसरो ने उसी वक़्त ये मुकरनी सुनाई,

खीर पकाई जतन से चरखा दिया जला
आया कुत्ता खा गया तू बैठी ढोल बजा

तो मैंने कोई नया शगूफ़ा नहीं छोड़ा है, सिर्फ़ अमीर खुसरो की इस Technique को Modernize किया है।

अच्छी शायरी क्या होती है (part 1)By Fehmi Badayuni

अच्छी शायरी क्या होती है (part 1)
By Fehmi Badayuni

अच्छी शायरी क्या होती है इसका फ़ैसला करना बहुत मुश्किल है। बड़े बड़े दानिश-वरों और नाक़िदों ने मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से अच्छी शायरी की तारीफ़ की है इनसे कोई एक ऐसा नतीजा निकालना जो सबको क़ुबूल हो, नामुमकिन सी बात है। आख़िर इसकी वजह क्या है क्यों कोई उसूल इस बारे में नहीं बन सकता। वजह वही है पसन्द अपनी अपनी ख़्याल अपना अपना…

इन्सान की फ़ितरत होती है कि लाशऊरी तौर पर उसका झुकाव उन बातों की तरफ़ होता है जो उसको अच्छी लगती हैं या उसे मुतअस्सिर करती हैं। आलोचक भी चूंकि इन्सान है लिहाज़ा उसकी राय मे उसकी पसन्द ज़रूर दख़्ल-अंदाज़ होगी।

इस लिये हम अच्छी शायरी क्या है ये जानने के लिए Reverse Method अपनाएंगे, यानी पहले ये तय करेंगे कि ख़राब शायरी क्या है लेकिन उससे पहले आधुनिक और रवायती शायरी की भी थोड़ी सी बात कर लेते हैं।

जिन लोगों को किसी शेर में कोई ऐसी बात नज़र आ जाये जो उसने पहले किसी शेर मे न पढ़ी हो और वो बात उसे चौंकाए भी या मुतअस्सिर करे तो वो बरजस्ता कह देगा कि ”बड़ा जदीद शेर है” इसी तरह उसका सौ बार के सुने हुए किसी मफ़हूम का शेर उसे रवायती मालूम होगा। पता ये चला कि अक्सर आधुनिकता और रवायत का तय करना आपके मुतालिए यानी Study पर आधारित है। आपको मीर के यहाँ कोई जदीद शेर भी मिल सकता है और ज़फ़र इक़बाल के यहाँ रवायती शेर भी मिल सकता है।

अच्छी शायरी की बुनियादें
अगर हम अपने शेर मे अपने दौर/समाज का कोई ऐसा मसअला या वाक़िया बयान करते हैं जो मीर या ग़ालिब के दौर में नहीं था तो ये आधुनिक शेर हुआ। ये सोचना ही बेमानी है, ये शेर जदीद आपके लिये थोड़ी हुआ मीर और ग़ालिब के ज़माने वालों के लिये हुआ, वो इसे सुनने या पढ़ने के लिए मौजूद होते तो इसे जदीद कहते। आपके लिए तो आपके दौर का शेर हुआ। इस तरह से ये वक़्त वाला Base भी जदीद और क़दीम के संदर्भ में ज़ियादा असर-अंगेज़ नहीं है।

शायरी (यानी अदब के मेयारों पर पूरी उतरने वाली शायरी) की बुनियाद दर-अस्ल इंसान की फ़ितरी सोच, ज़रूरियात, मजबूरियों, दुख-सुख ,ख़ुशी और ग़म की नफ़्सियात, अपने ज़मीनी तजर्बे, मुशाहिदे और तजज़िये का एक निज़ाम है, जो चंद मुन्तख़ब शब्दों से तरतीब पाता है।

इंसान की फ़ितरी नफ़्सियात की बुनियाद वक़्त पर मुनहसिर नहीं है। ये कभी नहीं बदलती। मुहब्बत के मुख़्तलिफ़ शोबों जैसे ख़ुशी / ग़म हिज्र / वस्ल के अच्छे बुरे अहसास का मज़ा या दर्द आज भी वैसा ही है जैसा सदियों पहले था। वक़्त के साथ इन सब बातों के इज़हार के तरीके बदल जाते हैं बुनियादी सूरत-ए-हाल तो वही रहती है। मिसाल के तौर पर मीर के दौर की दुल्हन पालकी में बैठी हुई है, और हमारे ज़माने की दुल्हन कार में बैठी हुई है, मगर दोनों के दिलो ज़हन में उस वक़्त जो चल रहा है वो कम-ओ-बेश एक जैसा ही है।

रवायती और जदीद शायरी का फ़र्क़
‘अब अगर मैं पालकी में बैठी दुल्हन को अपने शेर का किरदार बनाऊँ तो मैं रवायती हूँ, कार या हवाई जहाज़ में बैठी दुल्हन की मन्ज़र-कशी करूँ तो जदीद हूँ’ अस्ल में ऐसा नहीं है। जब कि हक़ीक़त ये है कि मैं शायर ही नहीं हूँ, मुझे शायर होने के लिए पालकी या कार का ज़िक्र नहीं बल्कि उस का ज़िक्र करना चाहिये जो एक नई दुल्हन के जहन-ओ-दिल में चलता है, या चल रहा है। जो कि मीर के ज़माने में भी ऐसा ही था जैसा कि अब है, लिहाज़ा अस्ल शायरी (यानी दाख़िली शायरी) में जदीद और क़दीम की कोई तफ़रीक़ मुनासिब नहीं। हाँ!! ज़िन्दगी की कुछ क़दरें और रस्म-ओ-रिवाज बदलते रहते हैं अगर वो पहले से अच्छे हो गए हैं तो शायर उसका ज़िक्र नहीं करते। जैसे पहले लड़कियाँ सरकारी नौकरी नहीं करती थीं, शादी के बाद घरेलू काम-काज में ही ज़िन्दगी बसर हो जाती थी । ये एक Positive Change है, इसका ज़िक्र नहीं होगा या बराये नाम होगा। लड़की के कमाने की वजह से उसके घर मे जो मसाइल पैदा होते हैं, जैसे शौहर से तअल्लुक़ात में कशीदगी वग़ैरा, इस पर ख़ूब शायरी होगी और इसे जदीद भी कहा जायेगा। लेकिन ये आफ़ाक़ी Universal नहीं है, दुनिया की तीन अरब औरतों मे कितनी नौकरी करती हैं और कितनों के यहाँ इसकी वजह से फ़ैमिली टेंशन है Universal सिर्फ़ एक Subject है, मुहब्बत इश्क़ और बाक़ी सारी चीज़ें यानी हमारा हंसना, रोना, जीना, मरना, इबादत करना, खाना और खिलाना बच्चों को पालना, बीमार का इलाज करना, मुरदे को दफ़्न करना या जलाना सब मुहब्बत से ही जुड़े हुए Emotions हैं।

क्राफ़्ट की अहमियत
इस से पहले हम रवायती शायरी और जदीद शायरी के फ़र्क़ पर बात कर चुके हैं। इस गुफ़्तुगू में ये बात भी शामिल है कि शायरी में तर्ज़-ए-इज़हार यानी Crafting का रोल बहुत अहम है। शेर कहते वक़्त पहला Step बहर / वज़्न रदीफ़ क़ाफ़िया और दूसरे अरूज़ी लवाज़मात हैं। इन्हें आप किसी अरूज़-दाँ से सीख सकते हैं, किसी किताब से सीख सकते हैं, ये सिर्फ़ साँचा या Packing Material है। इसमें क्या भरना है, कैसा माल भरना है, ये आप के शेरी ज़ौक़, Study, और लगन पर मुनहसिर करेगा। मुख़्तसर ये कि उस्ताद आपको अरूज़ी (बहर के) नियम-क़ायदे सिखा सकता है, मगर शायरी नहीं सिखा सकता। यही सबब है कामयाब अरूज़-दाँ अक्सर कामयाब शायर नहीं होते। उनकी सारी सलाहियत Packing को ख़ूबसूरत और फिट रखने में ख़र्च हो जाती है। अंदर का माल यूँही सा होता है।

आइये अब शेर-गोई की तरफ़ आते हैं!!

आप दो तरह से शेर कह सकते हैं।
1- बराहे रास्त
2- इस्तिआरे और अलामतों के इस्तेमाल के ज़रिए

हमारे लिए ज़रूरी है कि सतही शायरी से बचने की कोशिश करें , जो बराह-ए-रास्त भी होती है और इस्तिआराती (रूपक) भी। यहाँ एक बात और clear करना ज़रूरी है कि मैं सतही शायरी की मिसालें शेर की शक्ल में नहीं दे सकता, फिर ये गुफ़्तगू तवील भी हो जाएगी और किसी की दिल आज़ारी का सबब भी हो सकती है।

बराहे रास्त (सतही) शायरी
हमारे यहाँ अदब में कुछ अक़वाल-ए-ज़र्रीँ मौजूद हैं जो सदियों से चले आ रहे हैं, जिन पर पुराने उस्तादों ने ला-तादाद शेर कह रखे हैं जो लोगों को रट गए हैं, इनका इस्तेमाल आपके शेर को सतही कर सकता है,

1- सच की हमेशा जीत होती है
2- मौत सब को आनी है
3- सब से बड़ा मज़हब इंसानियत है
4- वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
5- मुहब्बत अंधी होती है
6- आईना कभी झूट नहीं बोलता

ऐसे ही और बहुत से जुमले हैं, अगर आप इनका बराह-ए-रास्त इस्तेमाल करेंगे तो कोई बा-ज़ौक़ और सुख़न फ़हम Reader मुतअस्सिर नहीं होगा। आपका शेर सच्चा होते हुए भी सतही हो जाएगा।

हाँ ! अगर इनका इस्तेमाल अगर आप किसी मन्ज़र या वाक़िए की मदद से करेंगे तो आपका शेर अच्छा हो जाएगा।

इस क़ौल की एक शायराना मिसाल ये है कि ”मज़लूम की मदद अल्लाह करता है” ये शेर देखिये,

शिकारी ने तो इक इक तीर बे-आवाज़ फेंका था
परिंदे पेड़ पर बैठे हुए किसने उड़ा डाले

“तुझे सब पता है”

मांगू मैं क्या, तुझे सब पता है
चाहूं मैं क्या, सब तेरी अता है
कहूं मैं क्या, हुई मोसे ख़ता है
हूँ तो मैं क्या, नहीं कुछ पता है
मौला मेरे…..सुन मौला मेरे
दिल की दुआ….सुन मौला मेरे ।

दिल के हाल, सब जानता है तू
मुझको मुझ में, पहचानता है तू
लिखू मैं क्या, तुझे सब पता है
बोलू मैं क्या, सब तेरी अता है
कहूं मैं क्या, हुई मोसे ख़ता है
हूँ तो मैं कहाँ, नहीं कुछ पता है
मौला मेरे…..सुन मौला मेरे
दिल की दुआ….सुन मौला मेरे ।

हर शय पर कादिर है तू
हर जगह यूँ ज़ाहिर है तू
रोऊँ मैं कितना, तुझे सब पता है
बोऊँ मैं कितना, सब तेरी अता है
कहूं मैं इतना, हुई मोसे ख़ता है
हूँ तो मैं कौन, नहीं कुछ पता है
मौला मेरे…..सुन मौला मेरे
दिल की दुआ….सुन मौला मेरे ।।

ग़मों का साथ है अपना ख़ुशी का पल पराया है

नहीं कोई मेरा अपना ये साया भी पराया है
बता ऐ ज़िंदगी तूने ये क्या रिश्ता निभाया है

यक़ीं होता नहीं अब भी मुझे इस बात पे यारों
जिसे घर को बचाना था उसी ने घर जलाया है

समझ आया यही आख़िर सफ़र के आख़िरी पल में
ग़मों का साथ है अपना ख़ुशी का पल पराया है

लगी हैं ख़ुद ही दीवारें इमारत को गिराने में

ज़रा सा वक़्त लगता है किसी का दिल दुखाने में
सदी इक बीत जाती है नया रिश्ता बनाने में

दरारें रोज़ भरता हूँ मगर बढ़ती ही जाती हैं
लगी हैं ख़ुद ही दीवारें इमारत को गिराने में

परिंदे चीखते रहते नहीं सुनता कोई इनकी
यहाँ तो पेड़ कट जाते नई सड़कें बनाने में

ख़ुद को अकेला कर लिया मैंने

बिना सोचे बिना समझे भरोसा कर लिया मैंने
यक़ीं उस पर न जाने क्यूँ दुबारा कर लिया मैंने

कि जिसको याद करने से अकेलापन नहीं खलता
उसी की याद में ख़ुद को अकेला कर लिया मैंने


Voice of Heart ❤

या ख़ुदा अलहदा क्यूँ बनाया मुझे
जान लेकर मेरी फिर बचाया मुझे

रोज़ देता है दिल ये सदा या ख़ुदा
तोड़ना ही था फिर क्यूँ बनाया मुझे

फ़साना क्या लिखूँ अपना

मुझे महसूस होता है, छुरा है पुश्त में मेरी
हुई है मौत सौ बारी, हुई है किश्त में मेरी

फ़साना क्या लिखूँ अपना, नसीबा है यही इरफ़ान
बहारों की सभी उम्रे, कटी हैं दश्त में मेरी


पुश्त – Back, पीठ
दश्त – Desert, रेगिस्तान

“जुनूनी इक बार हो जा”

नींद से बेदार हो जा, रूहानी किरदार हो जा
सोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

बहुत जी लिया मर मर कर,
लहू के आंसू भर भर कर
रोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

नींद से बेदार हो जा, रूहानी किरदार हो जा
सोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

साया तेरा तुझसे कहे, पलकों से ना ये अश्क़ बहे
नुमायाँ तुझमें तू रहे, अब और ना यह सितम सहे

बहुत खोया है तूने खुदको, आबाद इस बार हो जा
रोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

नींद से बेदार हो जा, रूहानी किरदार हो जा
सोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

यूँही नहीं तू पैदा हुआ, यूँही नहीं तेरी ज़िन्दगी
कर्ज़ चुका इन साँसों का, तुझसे कहे ये ज़िन्दगी

बहुत रोका है तूने खुदको, आज़ाद इस बार हो जा
रोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

नींद से बेदार हो जा, रूहानी किरदार हो जा
सोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

वज़ूद तेरा पूछे तुझसे, कहाँ हूँ मैं बता ज़रा
जुनून तेरा कहे तुझसे, कर ले यक़ीं खुद पे ज़रा

बहुत टोका है तूने खुदको, हिम्मती इस बार हो जा
रोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

नींद से बेदार हो जा, रूहानी किरदार हो जा
सोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

बहुत जी लिया मर मर कर,
लहू के आंसू भर भर कर
सोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा ।।

“सज़ा को ही मज़ा बना ले”

सज़ा को ही मज़ा बना ले
जीने की तू वजह बना ले
दर्द ही लगने लगे हमदर्द
खुद को इस तरह बना ले
सज़ा को ही मज़ा बना ले
जीने की तू वजह बना ले

ज़िंदगी इम्तिहान लेती है
रोज नई पहचान देती है
मैले ये तेरे क़रम धोकर
कुव्वत और ईमान देती है
आह ही लगने लगे जो वाह
खुद को इस तरह बना ले
सज़ा को ही मज़ा बना ले
जीने की तू वजह बना ले

हर दिन लगे कुछ बेहतर
हर रात कटे खुश रहकर
हर पल जियो कुछ ऐसे कि
याद आए वो रह रहकर
घाव ही लगने लगे छाँव
रूह को इस तरह बना ले

सज़ा को ही मज़ा बना ले
जीने की तू वजह बना ले
दर्द ही लगने लगे हमदर्द
खुद को इस तरह बना ले
सज़ा को ही मज़ा बना ले
जीने की तू वजह बना ले ।।

Haal e Dil

नहीं मालूम हाले दिल, नहीं मासूम अब ये दिल
कभी ग़म ये कभी ग़म वो, नहीं महरूम अब ये दिल

सुना था कांच है दिल ये, हमीं ने ही नहीं माना
किसी ने चोट जो मारी, हुआ मरहूम अब ये दिल

” सिमटी हुई तेरी पलकें “

 

 

सिमटी हुई तेरी पलकें 
कुछ कह रही है मुझसे 
आहिस्ता से यूँ दबे पांव 
हौले हौले दिल के आशियाँ में
अपना असर छोड़ती हुई 
जब भी ये उठती है 
मेरी नींद साथ में चल देती
ख्वाबो के जहाँ में दोनों ही 
बस चलती जा रही
शायद किसी मोड़ पर मिले तुझसे 
हसरत के इक जहाँ में 
सही गलत के पार 
जब कभी ये पलके भारी हुई 
तेरे अकस को मेने पाया इन पर 
अश्क़ो से भीगकर वही ठहर गया है 
इसका तो रंग भी कबका उड़ चुका
अब तो बस ख़ुशबू सी तैर रही 
इन पलकों के शामियाने में
मेने कई लफ्ज़ो के ताने बुने
रेशमी उस एहसास से भरे हुए 
जो पहली नज़र में रहता है 
भीगी हुई तेरी पलके 
कुछ कह रही है मुझसे
इन्हे शायद अभी हुआ है यकीं 
मेरी भी पलके आज नम है

Shajar se pathhar

ज़ुदा जब से यारों, हुआ ज़िंदगी से
शजर से यूँ पत्थर, बना मैं तभी से

यही राज़ मेरा, यही सच है सुन लो
सभी यार लगते, लड़ाई सभी से

मेरी मौत पर तुम, न आंसू बहाओ
रिहाई ये मुझको, मिली है मुझी से

Manzar jo the khanjar

कभी आंसू कभी है ख़ूं, मेरी आँखें हमेशा नम
नहीं मरहम सितम हरदम, है दिल में बस सिसकता ग़म
फ़साना है यही मेरा, सुनोगे क्या पढ़ोगे क्या
कई मंज़र थे जो खंजर, हुआ मैं क़त्ल निकला दम

Tanhayee ke sannate

मेरी  आँखों  में  आँसू  हैं  दिखाई  जो  नहीं  देते
है   तन्हाई    के   सन्नाटे    सुनाई  जो  नहीं  देते।

करो  महसूस  इनको तुम  निगाहो  से परे जो  है
ये  साये  हैं  ख़लाओ  के  दिखाई  जो  नहीं  देते

मुहब्बत क्या है मत पूछो

कोई कहता सदा दिल की, कोई कहता ख़ता दिल की
मुहब्बत क्या है मत पूछो, है इक दिलकश अदा दिल की

नहीं है इल्म मुझको हाँ, यही मालूम है इरफ़ान
जिसे हर बेज़ुबाँ समझे, वही सच्ची ज़ुबाँ दिल की

तन्हा क्यूँ भरी महफ़िल के बीचों बीच रहता हूँ

के माज़ी और मुस्तक़बिल के बीचों बीच रहता हूँ
सभी से दूर टूटे दिल के बीचों बीच रहता हूँ

बता दे ये कोई मुझको कि आख़िर माजरा है क्या
यूँ तन्हा क्यूँ भरी महफ़िल के बीचों बीच रहता हूँ

My Birthday 🎂🎂

रोज रोज कोई अपना बर्थ डे थोड़े ही आता है
रोज रोज कोई इतना थोड़े ही मुस्कुराता है

साल में एक दिन तो हम एज लाइक किंग जैसा फील करते हैं
लाइफ के बिजी शेड्यूल से चंद हैप्पीनुमा लम्हों की डील करते हैं

फर्स्ट ऑफ ऑल तो केक कटता है, ऑफ्टर देट वो सब में बंटता है
और वैसे देखा जाए तो, हमारी ज़िन्दगी का एक पूरा साल घटता है

दिल की दीवारों पर, यादों के कलरफुल बैलून टंगे होते हैं
समटाइम ब्लैक एंड व्हाइट, वो समटाइम रंग बिरंगे होते हैं

स्टार्टअप सेलिब्रेशन के बाद, मस्तवाली पार्टी तो बनती है
धूम धड़ाका एंड डांसिंग धमाल, साड्डे यारों दी क्रेजीपंती है

गिफ्ट्स एंड विशेज का सिलसिला तो दिन भर चलता है
माइंड ब्लोइंग मैसेज पढ़कर ही सबका चेहरा खिलता है

नेक्स्ट ईयर यह फिर से आएगा, जमकर खूब खुशियाँ लाएगा
हर शख़्स बर्थ डे बाॅय के लिए फिर, हैप्पी बर्थ डे टू यू गाएगा।








Muqaddar of Musafir

कभी आंधी कभी तूफ़ां, मुसाफ़िर के मुक़द्दर में
ख़ुदाया और क्या क्या हैं, मुहाजिर के मुक़द्दर में

सदा दर दर भटकना यूँ, सुकूँ है के नहीं मिलता
यही सच है नहीं है घर, मुसाफ़िर के मुक़द्दर में

मुहाजिर – शरणार्थी, Refugee, Emigrant

Ideal Inspirational Blogger Award

This is my first “Ideal Inspirational Blogger Award”. Anushree Srivastava nominated me for this award….

You are amazing writer…..Anushree. I love to read your each and every post on your blog site

👉 ashree2412blogspot.wordpress.com

Make sure you all bloggers go check out her blogs and read their work….

The Rules of this award are:

1. Thank the person who have nominated you and provide a link back to his/her blog.

2. Answer their questions.

3. Nominate up to 9 other bloggers and ask them 5 new questions.

4. Notify the nominees through their blog by visiting and commenting on their blog.

5. List the rules and display the “Ideal Inspiration Blogger Award” logo.

6. Provide the link of the Award creator of ideal inspiration blogger award as Rising Star from https://idealinspiration.blog

Questions asked by Anushree……😇

1-Which post of your own is your favorite?
☆ My post entitled “ज़िन्दगी तुझपे मेरा इख़्तियार” is my favourite.

2-If you would write a book, what would it be about?
☆ It’s about My Journey
“Shajar Se Patthar Ka Safar” 😊.

3-If you’re asked to suggest a book, which one will you prefer ?
☆ Ingnited Minds by Dr. APJ Abdul Kalam Sahab

4-If everything will be okay..someday, will you be thankful to the lockdown . If it is yes, or no accordingly, then Why ?
☆ Of course I am very thankful to destiny for realizing me what I am in this duration. Solitude taught me lesson of life. Self believe. So thank god for mercy on us.

5-What motivates you to survive or live your life ?
☆ My existance, My best friend Ashif n also passion for poetry.

My nominees are :

1. Tara Pant
2. Ritu Jain
3. Rahat Jahan
4. SaniaaSparkle
5. Shelendra Shukla ‘Haldauna’

Thank you again for all the love, support and nomination…..

Happy Blogging 🙂


बिना दिल के भी कुछ बंदे, ज़माने में यूँ जीते हैं

बिना दिल के भी कुछ बंदे, ज़माने में यूँ जीते हैं
किसी से कुछ नहीं कहते, ग़मों के घूंट पीते हैं

यही कहती है हर इक रूह अपने जिस्म से इरफ़ान
के इस ज़िन्दान में दिन ये, बड़ी मुश्किल से बीते हैं
  
ज़िन्दान – जेल, Prison

“खुद से भी कभी कुछ बात की जाए”

खुद से भी कभी कुछ बात की जाए
कौन है भीतर ? चलो मुलाकात की जाए
खुद को ही आज खुद से यूँ मात दी जाए
कौन है भीतर ? चलो मुलाकात की जाए ।

हटा दो अक्ल के पहरे तुम सब
हटा दो शक्ल सुनहरे तुम अब
देखो ग़ौर से, दिल की कोर से
हटा दो नक्ल के चेहरे तुम सब

दिखावे की मालो दौलत ख़ैरात की जाए
कौन है भीतर ? चलो मुलाकात की जाए
खुद से भी कभी कुछ बात की जाए
कौन है भीतर ? चलो मुलाकात की जाए ।

ख़ामोशी की आवाज़ सुनो ना तुम
ख़यालों पर अल्फ़ाज़ बुनो ना तुम
ग़ैरों को ना देखो, मन के पासे फेंको
खुद ही अपने अंदाज़ चुनो ना तुम

ज़ेहन से आओ अपने ख़ुराफ़ात की जाए
कौन है भीतर ? चलो मुलाकात की जाए
खुद से भी कभी कुछ बात की जाए
कौन है भीतर ? चलो मुलाकात की जाए ।।