“वैसे तो मेरी हर नज़्म में सिर्फ तुम ही रहती हो”

वैसे तो मेरी हर नज़्म में सिर्फ तुम ही रहती हो
पता नहीं क्यों आजकल कहीं दिखती नहीं हो

हालाँकि अब भी तेरा ही ख़याल काफी है जीने के लिए
फिर भी हर ख़याल बेकरार है खुद काग़ज़ पर उतरने के लिए

कलम का तुमसे, न जाने क्या राब्ता है
दिल से जो गुज़रता है, ये वो रास्ता है

मिलती नहीं कभी कोई, नज़ीर बेनज़ीर के आगे
ज़ेहन में उलझते रहे, तन्हाई की तहरीर के धागे

तक़दीर के इन पन्नों पर, कुछ तो है जो ज़रूर लिखा है
तभी तो इस दिल को, दिल पढ़ने का ये शऊर मिला है

जमाने गुज़र गए, पर वक़्त अब भी वहीं है
यादों ने सींचा जिसे, वो दरख़्त अब भी वहीं है

वैसे तो मेरे हर अल्फ़ाज़ में सिर्फ तुम्हारा ही बयां है
पता नहीं क्यों आजकल वो एहसास कहीं खो गया है

हालाँकि अब भी तेरा ही ख़याल काफी है जीने के लिए
फिर भी हर ख़याल मुन्तज़िर है खुद काग़ज़ पर उतरने के लिए ।

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“घर लौटने की कहीं कोई सूरत नज़र नहीं आती है”

घर लौटने की कहीं कोई सूरत नज़र नहीं आती है
अपनों की सोहबत अब इस दिल को नहीं भाती है

मसरूफ़ है ये ज़िन्दगी, खुद अपनी तलाश में
दूर है खुद से जितनी, उतनी ये खुद के पास है

पाया है इतनी मुश्किलों से, मैंने खुद को यहाँ
अता किया है रब ने अब, मुझको अपना पता

न किसी का साथ चाहिए, न कोई हमदर्दी मुझे
रास आ गई है अब तो, ग़मों की मैली वर्दी मुझे

अश्क़ों के दरिया कई, और कई समंदर बहाए हैं
तब कहीं जाकर यूँ चट्टानों की तरह बन पाए है

मालिक ने पैदा किया है वहीं मक़सद अता करेगा
बंदा ये एक दिन अपनी जान का हक़ अदा करेगा

हर कदम ठोकर मिली, ज़िन्दगी फिर खोकर मिली
जितनी दफ़ा ये गले मिली मुझसे खूब रोकर मिली

घर वापसी की कहीं कोई वजह नज़र नहीं आती है
दरअसल अपनों की अब मुझे याद नहीं सताती है।

“ये कैसा वहम है”

ये कैसा वहम है
जो मुझे होता है
हरपल हरघड़ी
ये कैसा वहम है।

कभी सच झूठ लगता है
कभी झूठ सच
तो कभी दोनों ही बेमानी लगते हैं।

जो डर इतना डराता है
असल में वो है ही नहीं
ये मन है कि उससे छुपता रहता है
हरपल यहाँ से वहाँ भागता रहता है।

सच और झूठ के तराजू का भी तो
एक तराजू होना चाहिए
अपने बनाए उसूलों को ही सब सही मान लेते हैं
बेशक कई सिक्कों के दो पहलू नहीं हुआ करते हैं।

मन को जो अच्छा लगता है
मन उसे ही हक़ीक़त मान लेता है
और जो इसकी समझ से परे होता है
उसे वहम का नकाब ओढ़ाकर
यह डर की पोटली में बंद कर देता है
डर को भी शायद खुद से डर लगता है
तभी तो यह अंधेरों में पलता है
और उजालों से जलता है।

कभी कभी जो सामने होता है
असल में वो होता ही नहीं है
और कभी कभी जो नहीं होता है
असल में वहीं हो जाता है।

वैसे ये ज़िन्दगी भी तो एक वहम ही है
जिसे मौत की आहट से ही डर लगता है
तभी तो ये खुद को इतना उलझाए रखती है
के ज़िन्दगी भर अपने ज़िन्दा होने के वहम में
यूँही तन्हा तन्हा सी गुज़रती चली जाती है।

ये कैसा वहम है
जो मुझे होता है
हरपल हरघड़ी
ये कैसा वहम है।।

@rockshayar.wordpress.com

“अपना बर्थ डे(25th August)”

रोज रोज कोई अपना बर्थ डे थोड़े ही आता है
रोज रोज कोई इतना थोड़े ही मुस्कुराता है

साल में एक दिन तो हम एज लाइक किंग जैसा फील करते हैं
लाइफ के बिजी शेड्यूल से चंद हैप्पीनुमा लम्हों की डील करते हैं

फर्स्ट ऑफ ऑल तो केक कटता है, ऑफ्टर देट वो सब में बंटता है
और वैसे देखा जाए तो, हमारी ज़िन्दगी का एक पूरा साल घटता है

दिल की दीवारों पर, यादों के कलरफुल बैलून टंगे होते हैं
समटाइम ब्लैक एंड व्हाइट, वो समटाइम रंग बिरंगे होते हैं

स्टार्टअप सेलिब्रेशन के बाद, मस्तवाली पार्टी तो बनती है
धूम धड़ाका एंड डांसिंग धमाल, साड्डे यारों दी क्रेजीपंती है

गिफ्ट्स एंड विशेज का सिलसिला तो दिन भर चलता है
माइंड ब्लोइंग मैसेज पढ़कर ही सबका चेहरा खिलता है

नेक्स्ट ईयर यह फिर से आएगा, जमकर खूब खुशियाँ लाएगा
हर शख़्स बर्थ डे बाॅय के लिए फिर, हैप्पी बर्थ डे टू यू गाएगा।

“क्या वहीं हो तुम”

दुआओं में मांगा जिसे, क्या वहीं हो तुम
शिद्दत से चाहा जिसे, क्या वहीं हो तुम

रातों में ढ़लते हुए, जलते हुए, मचलते हुए
ख़्वाबों में देखा जिसे, क्या वहीं हो तुम

क़लम को थामे हुए, दर्द वो सब आधे हुए
ख़यालों में सोचा जिसे, क्या वहीं हो तुम

पहली ही नज़र में, दर्द की भरी दोपहर में
मन ने मेरे छुआ जिसे, क्या वहीं हो तुम

पलकों के इस घर में, अश्क़ों के सफर में
सीने में छुपाया जिसे, क्या वहीं हो तुम

बनती हुई बिगड़ती हुई, रूठी हुई तक़दीर में
रब ने मेरे लिखा जिसे, क्या वहीं हो तुम।