“तुझ को भुलाने की, हर नाकाम कोशिश कर चुका हूँ”

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तुझ को भुलाने की, हर नाकाम कोशिश कर चुका हूँ
और हर उस कोशिश को, नाकाम भी मैं ही बनाता हूँ।

बहुत दिनों से मैंने, अपने अंदर एक समंदर छुपा रखा है
दिल के किसी कोने में, तेरी यादों का बवंडर दबा रखा है।

तुम से मुलाक़ात के वक़्त, बस यही ध्यान रखता हूँ मैं
कि तुम्हारे भीतर जो तुम हो, उससे मुलाक़ात हो जाए।

कई बार इस बारे में सोचा है मैंने, कि तुम से ना मिलू
लेकिन हरबार यही लगता है, के आख़िर क्यों ना मिलू।

याद है पिछली दफा, जब तुम मुझ से मिलने आई थी
कई दिनों तक ये ज़िन्दगी, मुसलसल मुस्कुराई थी।

तेरे जाने के बाद, जीना बहुत मुश्किल होता है
तुझे याद कर करके, ये दिल महीनो तक रोता है।

सोच रहा हूँ इस बार तुम्हे, अपनी आँखों में क़ैद कर लू
भूलने से पहले इकदफा तुम्हे अच्छी तरह याद कर लू।

सफ़र में यूँही चलते-चलते, आखिरकार हम मिल ही गए
एक लम्हे के लिए ही सही, आखिरकार हम मिल ही गए।।

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“Ajmer Sharif (अजमेर शरीफ)”

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पहाड़ों की तलहटी में, बसा हुआ एक प्राचीन नगर
सदियों पुराना इतिहास लिए, बैठा है अजमेर शहर।

1113 ईस्वी में, अजयपाल चौहान ने अजयमेरू बसाया
ज़मीन पर जिसकी सदा, रहता है ग़रीब नवाज़ का साया।

हिन्द के सुल्तान वो, वलियों के सरदार कहलाते है
अजमेर वहीं आते हैं, जिन्हें ख्वाज़ा पिया बुलाते है।

तीर्थराज पुष्कर में, ब्रह्माजी का सुप्रसिद्द मंदिर है
गऊघाट के किनारे पर, यह संस्कृति का शिविर है।

अर्द्ध-चंद्राकार इस झील में, पवित्र पूजा और स्नान होता है
कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर, यहाँ पुष्कर मेला भरता है।

अढ़ाई दिन का झोंपड़ा, सूफ़ी रंग में रंगा हुआ है
बीसलदेव और कुतुबुद्दीन, दोनों के दौर का गवाह है।

बारहवीं सदी में आनाजी ने, आनासागर झील खुदवाई
जहाँगीर ने दौलतबाग, व शाहजहाँ ने बारहदरी बनवाई।

इंजीनियर फाॅय के नाम पर ही तो, फाॅयसागर बनाया गया
अकाल राहत के तहत इसमें, बाँडी नदी का पानी लाया गया।

शहर के एकदम बीचोंबीच, सोनी जी की नसियां स्थित है
लाल पत्थरों के इस भव्य भवन में, जैन मंदिर अवस्थित है।

मेरवाड़ा पर्वत पर, गढ़बीठली दुर्ग तारागढ़ निर्मित है
मीरां साहब की दरगाह जहां पर, टीवी टावर स्थित है।

तारागढ़ मार्ग पर, पृथ्वीराज चौहान स्मारक बना हुआ है
नाग पहाड़ पर ही तो, मशहूर लूणी नदी का उद्गम हुआ है।

अकबर ने 1570 ईस्वी में, बनवाया मैगजीन का किला
इसी किले में टाॅमस रो, बादशाह जहाँगीर से था मिला।

राजकीय राजपूताना संग्रहालय, इसी किले में है
अरावली का सबसे कम विस्तार, इसी जिले में है।

समीप स्थित है नारेली तीर्थ, टाॅडगढ़-रावली अभयारण्य
पुष्कर घाटी पंचकुण्ड मृगवन, प्रकृति का अद्भुत लावण्य।

मेयो काॅलेज जीसीए, पाॅलिटेक्निक जैसे संस्थान यहां
एजुकेशन फील्ड में इसने, पाया है बहुत सम्मान सदा।

प्रमुख प्रशासनिक कार्यालय, मुख्यालय एवं बोर्ड यहां पर
आरपीएससी रेवेन्यू और, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यहां पर।

रेलवे स्टेशन के ठीक सामने, एंटीक क्लाॅक टावर है
देश की राजनीति में, अजमेर का अलग ही पावर है।

आर.जे.जीरो.वन. हर वाहन को देता यूनीक पहचान
राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल, सिखाए आन बान और शान।

मुर्गीपालन व अंडाउत्पादन में, यह सबसे आगे है
सम्पूर्ण साक्षर होकर इसने, नित नए झंडे गाड़े हैं।

राजस्थान का हृदय, हिन्दोस्तान की शान है अजमेर
भारतीय गंगा जमुनी, तहज़ीब की पहचान है अजमेर।।

© RockShayar Irfan Ali Khan

“मैं जब लिखता हूँ, कोई और होता हूँ”

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इस दुनिया से दूर, कहीं और होता हूँ
मैं जब लिखता हूँ, कोई और होता हूँ।

मुझ को भी पता नहीं, कहाँ तक है हद मेरी
जो नामुमकिन लगे है, वही तो है ज़िद मेरी।

अंदर के समंदर में मैंने, कई तूफ़ान छुपाए हैं
क़ुबूल नहीं हो कभी जो, माँगी ऐसी दुआएँ हैं।

लफ़्ज़ों के काँधे पर, सिर रखकर रोता हूँ
मैं जब लिखता हूँ, कोई और होता हूँ।

काग़ज़ और क़लम, हैं दोनों मेरे हमदम
ज़िंदगी के तन्हा सफ़र में, साथ चले हरक़दम।

अपने ही अक्स में, हज़ार शख़्स नज़र आते हैं
तलाश में जिनकी, जज़्बात लफ़्ज़ बन जाते हैं।

दर्द की बारिश में, रूह को भिगोता हूँ
मैं जब लिखता हूँ, कोई और होता हूँ।

इस दुनिया से दूर, कहीं और होता हूँ
मैं जब लिखता हूँ, कोई और होता हूँ।।

“राब्ता”

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कभी-कभी लगता है तुम से, सदियों पुराना कोई वास्ता है
अधूरा है अब तक एहसास कोई, रुह का रूह से ये राब्ता है।
 
न तूने मुझे अपनाया कभी, न मैंने तुझे ठुकराया कभी
मैं जितना याद करता रहा, तू उतना मुझे भुलाती गई।
 
कैसा अजब ये रिश्ता है, दिलों के दरमियां जो पिसता है
न तुम समझ पाए कभी, न हम समझ पाए कभी।
 
मुझ से ज्यादा तुम्हे मेरी, मोहब्बत से मोहब्बत रही हमेशा
और तुम्हे सोचते ही मुझे वो, सुकून-ओ-राहत मिली हमेशा।
 
न तूने मुझे तड़पाया कभी, न मैंने तुझे तरसाया कभी
मैं जितना दर्द छुपाता रहा, तू उतना बेख़बर होती गई।
 
अजीब हालात के चलते, ये ज़िन्दगी भी अजीब हुई
एक पल को अमीर होकर, अगले ही पल ग़रीब हुई।
 
अब ना कहीं तू नज़र आती है, ना तेरा नाम-ओ-निशां
वो दौर ही कुछ और था, फ़क़त पल दो पल का मेहमां।
 
न तूने मुझे जाना कभी, दिल से अपना माना कभी
मैं जितना पास आता गया, तू उतनी दूर होती गई।।
 
 

“माँ मुझे आजकल तेरी याद नहीं आती है”

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हालाँकि अँधेरी गली अब भी मुझे बहुत डराती है
लेकिन माँ मुझे आजकल तेरी याद नहीं आती है।
 
मुद्दत से मैं रो नहीं पाया, किसी का भी हो नहीं पाया
अब तो गोद में सुला ले, सुकूं भरी नींद सो नहीं पाया।
 
तू तो सब जानती थी, मेरे हर डर को पहचानती थी
फिर डर क्यों मिटाया नहीं, निडर मुझे बनाया नहीं।
 
शिकायत न करू तो क्या करू, सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं
संगी साथी सब यार दोस्त, मुझे बात-बात पर चिढ़ाते हैं।
 
जब जाना ही नहीं चाहता था, फिर क्यों दूर भेजा मुझे
मासूमियत को छीनकर, मुझ से ही क्यों दूर भेजा मुझे।
 
पापा तो उस वक़्त भी ऐसे ही थे, और आज भी ऐसे ही है
और बाक़ी सब लोग, पहले जो भी थे पर अब वैसे नहीं हैं।
 
माना कि तेरे क़दमों के नीचे जन्नत रहती है
मगर दिल तोड़ने का हक़ तुझ को भी नहीं है।
 
हालाँकि अँधेरी रात अब भी मुझे बहुत डराती है
लेकिन माँ मुझे आजकल तेरी याद नहीं आती है।।

“जो आज तेरी हँसी उड़ा रही है, वही दुनिया कल तुझे सलाम करेगी”

अकेला चना भी अब भाड़ फोड़ेगा, और एक हाथ से ताली भी बजेगी।
जो आज तेरी हँसी उड़ा रही है, वही दुनिया कल तुझे सलाम करेगी।

जो भी है यहाँ, सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं
दिल के अँधेरे कोनों में, छुपे हुए ये तिलचट्टे हैं।

एक तीर से दो-दो नहीं, दस-दस तू शिकार कर
क़लम का सिपाही है, सो क़लम से ही वार कर।

आठों पहर चौंसठ घड़ी, माशूक़ मौत तेरे सर पर खड़ी
इधर कुआँ उधर खाई, क्योंकि ज़िन्दगी ज़िद पर अड़ी।

छाती पर जो तूने पत्थर रखे हैं, वही तो तेरे यार सगे हैं
तन्हाई की शिद्दत में अक्सर, सोये हुए अरमान जगे हैं।

घाट-घाट का पानी पिया है, हरेक लम्हा सदी सा जिया है
अपने दिल का हर फैसला तूने, ज़िन्दगी के नाम किया है।

कान का बहुत कच्चा है तू, मासूम अब भी बच्चा है तू
जमाना चाहे कुछ भी कहे, पर इंसान बहुत सच्चा है तू।

लोहे के चने भी चबाएगा, और पानी में आग भी लगाएगा
पहचान कर सके खुद अपनी, इसलिए करके भी बताएगाा।।

“ऊपर बैठा है मदारी, और जमूरा है नीचे”

ऊपर बैठा है मदारी, और जमूरा है नीचे
तू आगे-आगे, तेरी परछाई पीछे -पीछे।
 
कुछ भी कर ले चाहे तू, मगर होनी तो एक दिन होकर रहेगी
सुन बस अपने दिल की तू, हालाँकि दुनिया तुझे जोकर कहेगी।
 
सबसे निकम्मा चेला तू, और सबसे बड़ी गुरु ज़िन्दगी
जिस पल भी तू गिरता है, वहीँ से असल शुरू ज़िन्दगी।
 
काल का यह डमरू, सब को अपनी ताल पर नचाये
हर प्राणी के लिए यहाँ, नाना प्रकार के खेल रचाये।
 
जैसी करनी वैसी भरनी, बहुत सुना और बहुत देखा
न्याय तो केवल वो करे, उसके पास है सब का लेखा।
 
न किसी का मज़ाक उड़ाओ, न किसी का दिल दुखाओ
न किसी का तलाक़ कराओ, न किसी का घर जलाओ।
 
सब कुछ उसके सामने है, सब कुछ उसकी मर्ज़ी से है
सबसे अक़्लमंद है फिर भी, कर्म इंसान के फर्जी से है।
 
ऊपर बैठा है उस्ताद, और शागिर्द है नीचे
तू आगे-आगे, तेरी तक़दीर पीछे -पीछे।।

“बरसों पुरानी, है ये कहानी”

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बरसों पुरानी, है ये कहानी
क़द्र किसी ने, न उसकी जानी।
मज़ाक उड़ाया, जब पूरे जग ने
आख़िर उसने, लड़ने की ठानी।।
 
ख़ामोशी को, हथियार बनाया
दर्द को अपनी तलवार बनाया।
ख़त्म हो गए, जब सारे पैतरे
ज़ेहन को ही, औज़ार बनाया।।
 
ज़माने ने उस को, पागल कहा
दहाड़ता हुआ शेर, घायल कहा।
आसमां ने सीरत, नम देखकर
ज़मीं का आशिक़, बादल कहा।।
 
बरसों पुरानी, है ये कहानी
बात किसी ने, न उसकी मानी।
मज़ाक बनाया, जब पूरे नभ ने
आख़िर उसने, उड़ने की ठानी।।
 
 

“जो पहले मर चुका है, उसे मौत का क्या डर”

जो पहले मर चुका है, उसे मौत का क्या डर
ख़ानाबदोश का कहीं कोई, नहीं होता है घर।
 
जिस्म के जाली लिबास में, यह रूह छटपटाती है
उड़ने के लिए डर की ऊँची, छत पर फड़फड़ाती है।
 
इंतक़ाम की दहकती आग में, झुलस रही है ये ज़िंदगी
अपनी आँखों से देखी है इसने, अपने साथ हुई दरिंदगी।
 
खेल कौन शुरू करता है, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है
बाज़ीगर तो बस आपकी, कमज़ोर चाल को पकड़ता है।
 
क़ायदे-क़ानून सिर्फ, कहने सुनने में अच्छे लगते हैं
जो आपके अपने हैं, सबसे पहले आपको वही ठगते हैं।
 
अपने अनोखे तरकश में, कई तीर छुपा रखे हैं उसने
जख़्मी सीने पर, दुश्मन के नाम खुदा रखे हैं उसने।
 
मक़सद मिल जाए जिसे, फिर उसके लिए क्या आराम
जुनूनी के लिए तो कभी भी, नामुमकिन नहीं कोई काम।
 
वक़्त की क़द्र करना सीख गया, वो शख़्स आख़िर
जीने से पहले मरना सीख गया, वो शख़्स आख़िर।।
 
 

“कभी”

बाप-भाई पर भी तो गालियाँ बनाओ कभी
ज़िन्दगी है मुजरा, तालियां बजाओ कभी।

ग़ैरों पर तो हमेशा अपनी जान लुटा देते हो
हमें भी तो आगोश में अपने, सुलाओ कभी।

दरवेश है हम तो, दर-बदर भटकते रहते है
दिल के दर पर खड़े है, ख़ैरात लुटाओ कभी।

सुन मेरे ऐ सनम, इतने बुरे भी नहीं है हम
गली से रोज गुज़रते हो, घर आओ कभी।

क़तरा क़तरा जलने में, एक अलग ही मज़ा है
मेरी तरह, तुम भी तो दिल जलाओ कभी।

वैसे तो बड़े ही नेकदिल इंसान है हम, लेकिन
हद पार हो जाए, इतना भी न सताओ कभी।

वो चेहरा, वो आँखें, वो बातें, वो मुलाक़ातें
मैं सब बताऊँगा, ख़्वाब में तो आओ कभी।।

 
 
 

“जान लेना और देना, हमें दोनों आता है”

जान लेना और देना, हमें दोनों आता है
यह तुझ पर है, कि तू क्या चाहता है।

दर्द को जब से, बनाया है हथियार हमने
दर्द अब पहले जितना नहीं सताता है।

जो पूछा किसी ने, तो अपनों ने तआरूफ़ कुछ यूँ दिया
के पता नहीं काग़ज़ पर, चंद लकीरें बनाता है।

वक़्त बहुत लगा, कंकर से चट्टान बनने में
वक़्त है आखिर, सब को आज़माता है।

पहले बहुत रोता था, जो चैन अपना खोता था
सुना है वो आजकल जोशीले गीत सुनाता है।

ज़माना कहता है अक्सर, पागल शायर उसे
ज़ेहन में हर वक़्त जो ख़याली मुर्गे लड़ाता है।

कुछ इस तरह, तरसाती आयी है ज़िंदगी हमें
कि जैसे सूखी ज़मीं को काला बादल तरसाता है।।

 

“The Kapil Sharma Show”

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“The Kapil Sharma Show”
 
उदास चेहरों पर, पलभर में मुस्कान ले आए जो
वन एंड ओनली, दी कपिल शर्मा शो।
 
कॉमेडी किंग कपिल की तो, बात ही सबसे निराली है
सोनी साब के साथ इनकी तो, रब ने जोड़ी बना दी है।
 
शांतिवन हाउसिंग सोसाइटी में, घर है इनका बेहद लाजवाब
बीरबल के बाद दुनिया में, एक यहीं तो सबसे हाजिर जवाब।
 
प्रोग्राम के परमानेंट जज, जिन्हें हम सिद्धू पाजी कहते है
खटाक से शेर खड़का कर, सब का दिल वह जीत लेते है।
 
50-50 अस्पताल के, बड़े ही फ़र्ज़ी डॉक्टर मशहुर गुलाटी
गेस्ट का करते है विचित्र टेस्ट, डाॅक्टरी नहीं इनको आती।
 
एज ए डॉक्टर ऑलवेज, इनके कुछ फर्ज़ बनते हैं
व्हाट ए बिजी डे, हर बार सबको यही सब कहते है।
 
साथ में पंक्चर की दुकान, ऐसे कौन चलाता है भाई
बड़ी विनम्रता से कहते है, ऐसे कौन बिठाता है भाई।
 
फैशनेबल पुष्पा नानी को तो, फटाक से एक पोता चाहिए
और इतना ही नहीं साथ में, एक ब्रांड न्यू नाना भी चाहिए।
 
बेबीनाज़ दादू मामा, या हो चाहे फिर बेगम लुच्ची
जितने भी यह रोल निभाए, लेना चाहे उतनी पुच्ची।
 
थाउजेंड एक्स एल लार्ज एक नर्स, नाम है जिसका बम्पर
ब्लू व्हेल जैसी फिज़िक है, रहती है फिर भी अपने दम पर।
 
रिंकू देवी और संतोष, मेहमानों को खूब सताए
भई अरोड़ा साहब…आप हमें बहोत पसंद आए।
 
हमरा तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गीया, रिंकू भौजी का यही रोना है
उस पर बिना गर्दन वाली ननद, संतोष का वाह क्या कहना है।
 
सीटी केबल में मिलकर यहाँ सब, बाल की खाल निकालते हैं
कौन भईल करोड़पति में, घत्रुघन घिन्हा नॉलेज खंगालते है।
 
दुबई टी-स्टाल खोलकर, चंदू चायवाला कहलाता है
ये शरारती खजूर, इसी पतीले से मुँह वाले का बेटा है।
 
खजूर की क्लास टीचर, कहते है जिन्हें मिस विद्यावती
कोयल को भी डायबिटीज हो जाए, इतना मीठा यह गाती।
 
गुलाटी की बेटी सरला, जो कि बचपन से ही कप्पू की दीवानी है
नर्स हो अगर लाटरी जैसी तो, मरीजों की तो लाइन लग जानी हैं।
 
घर के बगल में ही यहाँ, मोहन टॉयलेट सेवा उपलब्ध है
इस गिटार वाले दिनेश को तो देखो, ज़रूर इसे कब्ज़ है।
 
हँसते रहिए, मुस्कुराते रहिए, और अपने आस-पास सफाई रखिए
हर शनिवार और रविवार, The Kapil Sharma Show देखते रहिए।।
 
-RockShayar Irfan Ali Khan
 
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“तू कहीं नहीं है”

उन भूली बिसरी यादों में भी तू कहीं नहीं है
ऐसा भी क्या रूठना, ऐसी भी क्या बेरुखी।

धूप में जब चलता हूँ, परछाई तुम्हारी बनती है
मुझ को अपनी कहानी, सदियों पुरानी लगती है।

कभी तो हटाओ, मेरे तसव्वुर से वो बंदिश
एक अर्सा हो गया है, तुम्हें सोचे हुए जानाँ।

हम को तो मिलना ही था, इसलिए मिले थे हम
वरना यूँ तो ज़िन्दगी में, रोज ही इत्तेफाक़ होते हैं।

दूर रहकर भी मुझ से, एक पल के लिए भी दूर नहीं हो
दर्द को मेरे जिसने महसूस किया, क्या तुम हूर वही हो।

यक़ीन न आए तो, मुझ को आज़माकर देख लो
लफ़्ज़ों में बनाई जो मैंने, तस्वीर अपनी देख लो।

यह वक़्त तो गुज़र जाता है, मगर गुज़रता नहीं वो वक़्त
बड़ी चालाकी से क़त्ल करता है, है क़ातिल बड़ा ही सख्त।

अब तो तेरी तस्वीर में भी तू कहीं नहीं है
ऐसी भी क्या जुदाई, हरपल बस तन्हाई।।

Poem for me by sadda yaar…Ashif

CYMERA_20150824_193451.jpgखुद ही को खुद में इज़ाद करता है वो शख़्स 

खुद ही को खुद से आज़ाद करता है वो शख़्स।

शायरी से यारी, फिर क्या दुनियादारी
तकलीफ़ों को कुछ यूँ निजात करता है वो शख़्स।

दुनिया से तलाक कर
शायरी की दुनिया पर नाज़ करता है वो शख़्स।

कागज़ से यारी, और बस लिखना जारी
हर हद को भूल कर, खुद को क़ुबूल करता है वो शख़्स।

हर नाराज़ से बेपरवाह हो
बस काग़ज़ को हमराज़ करता है वो शख़्स।

आसमां छूने की ज़िद में
सितारों तक जा पहुँचता है वो शख़्स।

अल्फाज़ो में खोकर
वुज़ूद को उन्ही में नुमायाँ कर देता है वो शख़्स।

अश्क़ों से आँखे नम करती दुनिया सारी
पर लफ्ज़ो से कागज़ तर कर, रोता है वो शख़्स।

सीने में दिल को छुपाती दुनिया सारी
पर डायरी में अपना दिल रख कर, सोता है वो शख़्स।।

-Ashif Khan

Introducing The Rock Ghazal…

बासी पड़े ख़यालों से दिमाग़ी कॉन्स्टिपेशन हो गया
पता ही नहीं चला कब मुझ में मेरा सेपरेशन हो गया।
 
खुद से खुद की मुलाकात है, फिर डरने की क्या बात है
जब जुनून का सुकून से डायरेक्ट कनेक्शन हो गया।
 
मुश्किलों को पार करके, जब फल मिला तो लगा उसे
कि जैसे किसी जॉब का कम्पलीट प्रोबेशन हो गया।
 
इतने साल हो गए, वो लिखता रहा बस लिखता रहा
यादों का काग़ज़ पर लाइफटाइम रेस्टोरेशन हो गया।
 
बार-बार गलतियां करके, और बार-बार ठोकर खाके
खुद में करके सुधार हासिल उसे परफेक्शन हो गया।
 
धुन का वह धनी, कन्सिस्टन्सी से आगे बढ़ता रहा
विधि के हाथों लिखी गई यूनिक डेफिनेशन हो गया।
 
वक़्त ने एक रोज जब, संभलने का भी वक़्त न दिया
खुद को पाना ही फिर तो उसका ऑब्सेशन हो गया।।
 
RockShayar

“कोई और बनकर जी रहा है तू”

यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू
यह पता है तुझे, फिर भी सह रहा है तू
यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू।

एक अर्से से मुकद्दर, अजीब खेल खेलता आया है
तू ही तुझ में ना रहा, अब तो कोई और नुमायाँ है।

अपनों के लिए क्यों अपने आप को भूल रहा है
किस्मत और कोशिश के दरमियान झूल रहा है।

सब पता है तुझे, कि तू किस चीज के लिए बना है
मासूम मोहब्बत के उस, गाढ़े लाल ख़ून में सना है।

सब तो खुशियां मना रहे हैं, पर तू खुश नहीं है
सब तो हासिल है लेकिन, तू खुद, खुद नहीं है।

यह कैसी तलब है, जो कभी खत्म ही नहीं होती
यह कैसी तड़प है, जो कभी भस्म ही नहीं होती।

जब-जब तू आगे बढ़ा, खींचकर यह ज़िन्दगी पीछे ले आई
जब-जब तू ऊपर चढ़ा, घसीटकर यह फिर नीचे ले आई।

यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू
खुद में ही अजनबी की तरह रह रहा है तू
यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू।।

-RockShayar

“नज़र नहीं आता”

कहीं कोई दस्तगीर अब नज़र नहीं आता
शख़्स वो बेनज़ीर अब नज़र नहीं आता।

मंज़िल की ओर चला था, जो एक मुसाफ़िर कभी
खो गया वो राहगीर अब नज़र नहीं आता।

था जिसकी दुआओं में, असर भी शिद्दत भी
कहाँ गया वो फ़क़ीर अब नज़र नहीं आता।

एक अर्से से सींचा जिसे, ज़ख्मों ने अपने लहू से
शायर वो शबगीर अब नज़र नहीं आता।

बिक जाते हैं लोग आजकल, कौड़ियों के भाव में
पहले जैसा ज़मीर अब नज़र नहीं आता।

इंसानियत को सही राह पर ले जाए जो
ऐसा तो कोई मीर अब नज़र नहीं आता।

वतन के रहनुमाओं की मेहरबानी है कि, वतन
पहले जैसा कबीर अब नज़र नहीं आता।

लुट चुकी है मेरे दिल की सल्तनत ‘इरफ़ान’
वारिस न कोई वज़ीर अब नज़र नहीं आता।।

शब्दार्थ:-
दस्तगीर – मददगार
बेनज़ीर – अद्वितीय
शबगीर – रात को इबादत करने वाला
ज़मीर – अंतरात्मा
मीर – नेता
कबीर – महानज़मीर – अंतरात्मा
सल्तनत – साम्राज्य
वारिस – उत्तराधिकारी
वज़ीर – मंत्री

Hey..Bro.. This is for You…

मासूम से उस बचपन से लेकर, नादान इस जवानी तक
अब्बू की साईकिल से लेकर, अम्मी की हर कहानी तक।
हर बार मुझ को ही तो बस, तुम्हारे हिस्से का वो प्यार मिला है
जितना भी हक़ है तुम्हारा, नहीं कभी उतना भी दुलार मिला है।
तुम्हें भी तो, माँ की महफूज़ गोद बहुत अच्छी लगती होगी
तुम्हें भी तो, पापा की हर आदत बहुत सच्ची लगती होगी।
पर अफ़सोस, कि वो प्यार न मिल पाया तुम्हें
क्योंकि कब्ज़ा कर लिया था मैंने, सारा उस पे।
अंदर के उस अधूरेपन ने तुम्हें, खुलकर जीने से रोक दिया है
इसलिए तो खुद को तुमने, ज़िन्दगी की दौड़ में झोंक दिया है।
सबको बहुत चाहते हो, फिर भी इक़रार नहीं कर पाते हो
दिल के बहुत सच्चे हो, हालांकि कभी कभी रूठ जाते हो।
अगर बीते उस दौर में, मैं फिर से जा सकता तो बदल देता वो सब
कोशिश कर रहा हूँ, इससे ज्यादा और कर भी क्या सकता हूँ अब।
दुआ है मेरी ये दिल से कि, तुम्हें तुम्हारा पूरा पूरा हक़ मिले
लिखा है जो भी मुकद्दर में बेशक, बेहतरीन वो रिज़्क़ मिले।।