“The Story of A Toilet”

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Hello friends….This is The Story of A Toilet
Set करेगा जो, आज हम सबका एक Clean Mindset.

तो लीजिये जनाब, पेश-ए-ख़िदमत है सुपरस्टार संडास की कहानी
उम्मीद है यह आपको ज़रूर पसंद आयेगी, खुद उसी की जुबानी।

अब अगली आवाज़ आपको, Technically Toilet की सुनाई देगी
Welcome to Flashback, जहाँ Flush की Photo दिखाई देगी।

पहले तो तुम्हे मेरा नाम लेने में भी बहुत शर्म आती थी
जहाँ देखो जिधर देखो, Public मुझे गंदा कर जाती।

किसी C-grade Picture की तरह था हाल मेरा
सिर्फ एक Sweeper ही समझता था हाल मेरा।

सवेरे-सवेरे उठते ही, तुम लोग मेरे पास दौड़े चले आते
Motion और Emotion, दोनों से ही Free होकर जाते।

बरसों की वो मेहनत मेरी, समझ आ रही तुमको अभी
फिर भी गर न समझे तो, समझ जाओगे कभी न कभी।

संसद में उठने लगा है, अब तो सवाल मेरा
बदल रहा है आजकल, सूरत-ए-हाल मेरा।

किसी Celebrity की तरह चर्चित हूँ मैं
नहीं वो अब, पहले की तरह वर्जित हूँ मैं।

किसी खुशबूदार Toilet Cleaner से नहीं
बल्कि बदलती हुयी सोच से परिमार्जित हूँ मैं।

मुझको लेकर बड़े-बड़े सितारें
आजकल बड़ी-बड़ी फिल्में बना रहे।

नेता अभिनेता Comedian खिलाड़ी
मुझको अपना Twitter Trend बना रहे।

पहले जो लोटा लेकर खेतों में जाते थे
अब वो मुझको अपने घर में बनवा रहे।

खुले में शौच से ऐ लोगों, तुम नफ़रत क्यों नहीं करते हो
एक आवाज़ में इस कुरीति को गलत क्यों नहीं कहते हो।

जब तरक्की के नाम पर, हर बदलाव मंजूर हैं तुम्हे
तो फिर अपनी सोच को, तुम क्यों नहीं बदलते हो।

चलो अब तुम लोग सब ज़रा मेरी भी सुन लो
एक Toilet की आज यह खरी-खरी सुन लो।

मुझसे ज्यादा गंदे हो तुम
मेरे नाम पर करते धंधे हो तुम।

कितना भी Drama कर लो चाहे
मेरे सामने तो सब नंगे हो तुम।

एक ओर तो तुम लोगों ने शारीरिक स्वच्छता पर, बड़े-बड़े अभियान चला रखे हैं
वहीं दूसरी ओर मानसिक मैले के पिटारे, दकियानूसी सोच के नीचे दबा रखे हैं।

अभी भी वक़्त है, वक़्त रहते सब संभल जाओ
Nature की कद्र करो, इंसानों अब सुधर जाओ।

अपने आस-पास सफाई रखना, और सफाई करना अच्छी बात है
लेकिन, साथ में अपने दिमाग की सफाई करना भी तो सच्ची बात है।

So My friends….This is The Story of A Toilet
कोशिश यह उसकी, कि वो बदल पाये हमारा Mindset.

© RockShayar Irfan Ali Khan

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#ObjectOrientedPoems(OOPs)⁠⁠⁠⁠

“बहती हुयी हवाएँ, बारिश में गीली होकर ज़मीं पर उतर आती हैं”

दिल से निकली दुआएँ,
बारिश की बूँदें बनकर ज़मीं पर उतर आती हैं
सुबह की उजली सदाएँ,
सूरज की किरनें बनकर ज़मीं पर उतर आती हैं।

बहती हुयी हवाएँ,
बारिश में गीली होकर ज़मीं पर उतर आती हैं
काली घनी घटाएँ,
सावन में सीली होकर ज़मीं पर उतर आती हैं।

एहसास की निगाहें,
अश्क़ों की आरामगाह बनने ज़मीं पर उतर आती हैं
दिल में दबी वो आहें,
रंजो-ग़म की पनाहगाह बनने ज़मीं पर उतर आती हैं।

बादल की खुली बाहें,
आसमान की पेशानी चूमने ज़मीं पर उतर आती हैं
शायर की सभी आहें,
क़लम से रोज कहानी सुनने ज़मीं पर उतर आती हैं।

फ़ुर्कत भरी फ़िज़ाएँ,
अल्हड़ सी अंगड़ाई लेकर ज़मीं पर उतर आती हैं
चाँद की रौशन अदाएँ,
संग रात की तन्हाई लेकर ज़मीं पर उतर आती हैं।

आँसुओं से नम निगाहें,
पलकों के गीले पर्दे को छूने ज़मीं पर उतर आती हैं
राह चलती वो राहें,
खुद से किये वादे पूरे करने ज़मीं पर उतर आती हैं।

दर्द-ए-दिल की सज़ाएँ,
अपने रब की बंदगी करने ज़मीं पर उतर आती हैं
और बदले में नेक वफ़ाएँ,
ज़िंदगी की तस्वीर बदलने ज़मीं पर उतर आती हैं।

बेज़ुबान सी बेनज़ीर ये निगाहें,
जब किसी को याद करे तो इनमें नमी उतर आती हैं
ठीक उसी वक़्त, वक़्त की हवाएँ,
ओस की बूँदें बनकर दिल की ज़मीं पर उतर जाती हैं।।

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“आज तुम्हे मैं जादू दिखाऊँगा”

मन की आँखों से, आज तुम्हे मैं जादू दिखाऊँगा
दिल की बातों से, आज तुम्हे मैं जादू सिखाऊँगा।

जो तुम सोच रहे हो, यक़ीनन आज वही होने वाला हैं
अपनी आँखों पर तुम्हे, आज यक़ीन नहीं होने वाला हैं।

दिल थामकर बैठना, ऐ मुझको देखने वालों
कहीं दिल दे न बैठना, ऐ मुझको चाहने वालों।

कब तुम्हे तुमसे चुरा लूंगा, पता भी नहीं चलेगा
कब तुम्हे खुद में छुपा लूंगा, पता भी नहीं चलेगा।

अपनी अलग एक दुनिया में, आज तुम्हे मैं लेकर जाऊँगा
क्या है मेरी उस दुनिया का सच, आज तुम्हे मैं ये बताऊँगा।

वहाँ न कोई झूठ-कपट है, वहाँ न कोई डाँट-डपट है
वहाँ तो बस अपना घर है, पड़ोस में जिसके नील समंदर है।

फिक्रे अपनी भुला दो आज, नज़रें अपनी जमा लो आज
भरने दो खुद को तुम आज, ख़्वाबों ख़यालों की परवाज़।

तो अब बताइये हुज़ूर, मेरा ये जादू आपको कैसा लगा
कुछ हटकर नया लगा, या फिर वही पहले जैसा लगा।।

@RockShayar

“पहली नज़र का वो असर, अब तक याद है”

पहली नज़र का वो असर, अब तक याद है
नज़रों से नज़रों का सफ़र, अब तक याद है।

इक़रार इंकार तक़रार ऐतबार, और फिर प्यार
जज़्बातों का वो जादुई सफ़र, अब तक याद है।

ख़यालों की एक नदी, यादों के जंगल में बहती थी
एहसास की वो ऊँची लहर, अब तक याद है।

ख़्वाबों का घर लगता था, नहीं जहाँ पर डर लगता था
उम्मीदों का वो उम्दा शहर, अब तक याद है।

कई चेहरे देख लिये, सब रंग सुनहरे देख लिये
पर वो एक चेहरा शाम-ओ-सहर, अब तक याद है।

यादें हैं कि मिटती नहीं, रातें हैं कि कटती नहीं
ज़िंदगी की वो कड़ी दोपहर, अब तक याद है।

नफ़रत जिसके सामने, ज्यादा देर टिक न पाये
मोहब्बत तेरी वो इस क़दर, अब तक याद है।।

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“आओ चलें फिर इरफ़ान की गली”

 

लफ़्ज़ों को हँसते मुस्कुराते ग़मगीन हो आंसू बहाते 
किसी ने देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।

समंदर से वसीह दिल में लहरों की तरह जज़्बात उठते 
उन लहरों से उठते जज़्बातों को] लफ़्ज़ों में तब्दील करते
किसी को देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।

रूहानियत की क़लम में स्याही शिद्दत की भरकर
इक कोरे काग़ज़ को अनमोल बनाते 
किसी को देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।

एक शख़्स में छुपी हज़ार शख्सियतें
एक इंसां को एलियन में तब्दील होते
उम्र गुज़ार खुद में अंदाज़ अलहदा पाते
किसी को देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।

गर्दिशों के सियाह अंधेरों में चश्मा-ए-नूर बहाते 
हादसों में खुद ही को खुद का हौसला बढ़ाते
हर ग़म की खुशी मनाकर ग़म को कन्फ्यूज करते
किसी को देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।।

“ख़ामोशी के क़तरे”

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ख़ामोशी के क़तरे
आज़ाद होकर
यहाँ-वहाँ
बस अपना
अधूरापन लिए
हवाओ में बह रहे हैं।

कभी खुद से बहुत दूर चले जाते हैं
तो कभी खुद के बहुत पास आ जाते हैं।

लेकिन जब भी तुम और मैं
हम दोनों साथ होते हैं
तो ये हमारी ओर खिंचे चले आते हैं
एक अनजान कशिश इन्हें अपने पास बुलाती हैं।

जितनी जल्दी
ये हमारी निगाहों में दाखिल होते हैं
उतनी ही जल्दी
ये एक खूबसूरत गुफ़्तगू में शामिल होते हैं।

ख़लाओं के क़तरे
आज़ाद होकर
यहाँ-वहाँ
बस अपना
बंजारापन लिए
फ़िज़ाओ में बह रहे हैं।

कभी खुद से बहुत नाराज़ हो जाते हैं
तो कभी खुद के बहुत पास सो जाते हैं।।⁠⁠⁠⁠

“तुझे भुलाना ही नहीं चाहता हूं मैं”

तुझे अब तक नहीं भुला पाया मैं
तुझे भुलाना ही नहीं चाहता हूं मैं।

हररोज मुझको तेरी याद आती है
तुझे रोज याद करना चाहता हूं मैं।

बात चाहे कोई भी हो कैसी भी हो
एक तेरी ही बात करना चाहता हूं मैं।

ज़िंदगी के सुहाने सफ़र में हमसफ़र
ज़िंदगीभर तेरे साथ रहना चाहता हूं मैं।

तेरे बिन जीना जानाँ मुमकिन नहीं मेरा
तुझसे मिलकर यह कहना चाहता हूं मैं।

दरिया हो तुम, जीने का ज़रिया हो तुम
किनारा बनकर संग बहना चाहता हूं मैं।

ज़िंदगी की धूप में ज़िंदगी जल गयी मेरी
तेरे आँगन की छाँव में सोना चाहता हूं मैं।।

“सुबह-सुबह नंगे पाँव घास पर चलकर ऐसा लगा”

सुबह-सुबह नंगे पाँव
घास पर चलकर ऐसा लगा
मानो कई दिनों के बाद
आज खुलकर साँस ली है।

पैरों ने बड़ी राहत महसूस की
मगर घास थोड़ी घबरायी हुयी सी लग रही है।

शायद ! इसे अपने कुचल दिये जाने का डर है।

कभी-कभी लगता है कि
ये ज़िन्दगी भी कुछ ऐसी ही है।

कुचल दिये जाने के डर से
खुद को ज्यादा ख़्वाब नहीं देखने देती है।

पता नहीं !
कब कौन आकर कुचल दे
इसके नाजुक ख़्वाबों को
अपनी राहत के लिये।

कुछ चीजे कभी समझ नहीं आती
शायद ! इसीलिए ज़िन्दगी को ज़िन्दगी कहते है।

क्योंकि यह एक पल में पूरी सदी है
और सदियों में सिर्फ एक पल।।

“तेरा मुझ से दूर होना”

तेरा मुझ से दूर होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद से दूर होना।

तेरा मुझ में शामिल होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद में शामिल होना।

तेरा मुझ पे ऐतबार होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद पे इख़्तियार होना।

तेरा मुझ को खुशियाँ देना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद को पा लेना।

तेरा मुझ से ज़ुदा होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद से ज़ुदा होना।

तेरा मुझ में साँस लेना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद में ज़िन्दा रहना।

तेरा मुझ पे यक़ीन होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद पे यक़ीन होना।

तेरा मुझ को बेपनाह चाहना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद को बेपनाह चाहना।।

“ज़िंदगी का बेनज़ीर वो लुत्फ़ हो तुम”

ज़िंदगी की घनेरी कोई जुल्फ़ हो तुम
ज़िंदगी का बेनज़ीर वो लुत्फ़ हो तुम।

जिसे लिखने के बाद, मिले खूब दाद
ग़ज़ल का ऐसा कोई लफ़्ज़ हो तुम।

नज़र से लेकर जिगर तक क्या कहूँ
टूट नहीं सकता वो तिलिस्म हो तुम।

सुनकर जिसे महसूस करने लगे हम
जानाँ गुलज़ार की वो नज़्म हो तुम।

तोड़ने से टूटे ना, छोड़ने से छूटे ना
निभाना लाज़िम जिसे वो रस्म हो तुम।

मैं शायर गुमनाम अंधेरी गलियों का
अदीबों की बाअदब बज़्म हो तुम।

दीदार किया तो पता ये चला इरफ़ान
मोहब्बत का मासूम अक्स हो तुम।।

“दिन और रात के दरमियाँ पूरी ज़िंदगी गुज़र जाती है”

अलसुबह सुबह से जब गले मिलता हूँ
फिर पूरा दिन उसकी बाहों में रहता हूँ।

सूरज की किरणों से मिलती हैं ताकत मुझे
अपने हरकिरदार से है सच्ची मोहब्बत मुझे।

तपती हुई दोपहर हरपहर बस यही कहती है
धूप-छाँव तो यूँही ज़िंदगीभर चलती रहती है।

हरशाम शाम मुझे अक्सर यूँ थाम लेती है
खुशियों को हरबार नया एक नाम देती हैं।

ख़याल भी तभी आते हैं, जब रात हो जाती है
ख़्वाब भी तभी आते हैं, जब रात सो जाती है।

रात के आगोश में टिमटिमाते हैं कई सितारें
रात के आगोश में पास बुलाते हैं कई सितारें।

दिन और रात के दरमियाँ पूरी ज़िंदगी गुज़र जाती है
पास जाकर जो देखो कभी, ये बड़ी दूर नज़र आती है।

हरपल का मज़ा लो, यहाँ तुम हरपल खुलकर जियो
हरसुबह चाहत की अदरक वाली चाय बनाकर पियो।।

#राॅकशायर⁠⁠⁠⁠

“दोस्ती” (Unforgettable Day…2nd August 2015)

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दोस्ती का दिन कोई, न कोई वार होता है
दोस्तों के साथ तो, हर वार ही शनिवार होता है।

चाहे माइंड की मिस्ट्री हो, या हसरतों की हिस्ट्री
दोस्तों के दरमियाँ होती हैं, कमाल की कैमिस्ट्री।

सेटिंग चाहे मोबाइल की हो, या फिर दिल की
दोस्तों ने तो इन पर, पूरी पीएचडी हासिल की।

हुस्न देखकर ये फँस जाते हैं, रोज उसकी गली तक जाते हैं
दोस्ती के बिना दोस्तों, ये ज़िंदगी के सफ़र में भटक जाते हैं।

यारों दा ठिकाना कोई, न कोई घरबार होता हैं
यारों के साथ तो, हर लम्हा ही यादगार होता हैं।

मुसीबत हो या मोहब्बत, या हो कोई फड्डा
हर थड़ी पे होता हैं, साड्डे यारों दा अड्डा।

घरवाले जब इन्हें डाँटते हैं, बुरा नहीं ये मानते हैं
दोस्त लोग तो हमेशा, दोस्तों में खुशियाँ बाँटते हैं।

ज़िंदगी ने एक रोज जब, मुझसे मेरी खुशियों का राज़ पूछ लिया
मुस्कुराकर मैंने भी, अपने दिल के काग़ज़ पर दोस्ती लिख दिया।।

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“इस दुनिया से अलग एक दुनिया है मेरी”

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इस दुनिया से अलग
एक दुनिया है मेरी।

जब भी डर लगता है
वहाँ चला जाता हूं।

वहाँ डर नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ घर नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ अपने नहीं हैं, सिर्फ खुशी है
वहाँ सपने नहीं हैं, सिर्फ खुशी है।

वहाँ मक़सद नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ हसरत नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ दीवारें नहीं हैं, सिर्फ खुशी है
वहाँ किनारे नहीं हैं, सिर्फ खुशी है।

वहाँ होड़ नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ दौड़ नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ तड़पना नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ तरसना नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ उम्मीद नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ ईद नहीं है, फिर भी खुशी है।

वहाँ हँसी है, सिर्फ हँसी है
वहाँ खुशी है, सिर्फ खुशी है।।

“The Scissor Sound Unisex Saloon”

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© RockShayar

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#ObjectOrientedPoems(OOPs)

“मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है”

तेरे साथ बिताया वक़्त बड़ी जल्दी गुज़र जाता है
मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है।

रास्तेभर यही सोचता हूं कि अब आगे क्या?
ज़िंदगी से कुछ लम्हे चुराकर भागे क्या?

याद न करने के बहाने से तुम्हे याद कर लेता हूं
मैं नज़रों से दिल की बेचैनी आज़ाद कर देता हूं।

वक़्त के साथ-साथ वक़्त की सिफ़त बदल जाती हैं
बदलते-बदलते इसकी हरएक आदत बदल जाती हैं।

दूरियों के दरवाज़े अक्सर बड़ी देर से खुलते हैं
पर मज़बूरियों के मकान बड़ी जल्दी बन जाते हैं।

ज़ेहन की परछाई से परे होते हैं जज़्बात
दिल की गहराई से जुड़े होते हैं जज़्बात।

अगर एहसास है धागा तो यह मन अपना चरखा हैं
उम्मीद की उँगलियों से हमने दिल को थाम रखा हैं।

तेरे साथ गुज़ारा वक़्त बहुत जल्दी गुज़र जाता है
मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है।।⁠⁠⁠⁠

“पहले तो तेरा ख़याल ही काफ़ी था, जीने के लिये”

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पहले तो तेरा ख़याल ही काफ़ी था, जीने के लिये
और अब तेरा ख़याल भी नाकाफ़ी है, जीने के लिये।

वो गुज़ारिश जो थी मेरी, वो अब भी अधूरी है
वो नवाज़िश जो थी तेरी, वो अब भी ज़रूरी है।

जो दिल से दिल मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हमारे दिल मिल जाते, तो क्या बात होती।

पहले तो तुम तसव्वुर पर खूब बंदिशें लगाती थी
और अब तुम हो कि तसव्वुर में भी नहीं आती हो।

वो सवाल जो था मेरा, वो अब भी वही है
वो जवाब जो था तेरा, वो अब भी नहीं है।

जो लब से लब मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हमारे चेहरे खिल जाते, तो क्या बात होती।

पहले तो तुम बेनज़ीर सी बहुत वो बातें करती थी
और अब तुम हो कि ज़रा भी नहीं याद करती हो।

वो अंदाज़ जो था मेरा, वो अब भी वही है
वो एहसास जो था तेरा, वो अब भी वही है।

जो मन से मन मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हम दोनों खिल जाते, तो क्या बात होती।।⁠⁠⁠⁠

“न मुझे इख़्तियार दिया, न मेरा इंतज़ार किया”

न मुझे इख़्तियार दिया, न मेरा इंतज़ार किया
ऐ ज़िंदगी तूने मेरा, क्यों कभी ऐतबार न किया।

मैं मनाता ही रहा, तू रूठती चली गयी
खुद को ढूँढ़ते हुये, बड़ी दूर चली गयी।

वक़्त के वो धारे, जो कि अब धुंधले हो चुके हैं
एहसास की उस नदी में, रेत बनकर जम चुके हैं।

मुसाफ़िर आज भी मिलते हैं, अनजान सफ़र में
हसरतों के आशियाँ लिये हुये, आँखों के घर में।

ऐतबार करना मगर, अब भी बहुत मुश्किल है
तब से लेकर अब तक, सहमा हुआ ये दिल है।

ज़िंदगीभर ऐ ज़िंदगी, मुझको तेरा इंतज़ार ही रहा
मैं जितना पास आता गया, तू उतना दूर होती गयी।

छुप कर बैठी है कहीं, क्यों गर्दिशो में तू अब भी
कभी तो झांक इधर, मैं तन्हा खड़ा हूं अब भी।

सुना है ! कई रंगो से मिलकर बनी है तू
वो सुनहरे सपने तेरे, मुझे कब दिखाएगी तू।

ज़िंदगी तुझसे मेरा, अब वो पहले जैसा रिश्ता न रहा
तू यादें मिटाती चली गयी, मैं फर्यादें लिखता ही रहा।।⁠⁠⁠⁠

“आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है”

आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है
आसमाँ से ज़मीं की सिफ़ारिश हो रही है।

आज फिर से जीने की ख़्वाहिश हो रही है
दिल से दिल की वही गुज़ारिश हो रही है।

आज फिर से ज़िन्दगी मदहोश हो रही है।
हौले-हौले खुद ये अपना होश खो रही है।

आज भी मैं बरसते हुए मौसम का आवारा बादल हूं
आज भी मैं उफनते हुए सागर का बंजारा साहिल हूं।

जब भी तुम मेरे आस-पास होती
बारिश शुरू होने लग जाती।

इशारा था वो कायनात का
फ़साना था वो जज़्बात का।

मैं जिसे बखूबी समझ जाता, मगर तुम बहुत डरती थी
भीगने से, इश्क़ में डूबने से, इसलिए दूर-दूर रहती थी।

आज फिर से वही पहले जैसी बारिश हो रही है
आज फिर से ये कायनात कोई इशारा दे रही है।

आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है
आज फिर से जीने की ख़्वाहिश हो रही है।।

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“मैं दवा हूं, धीरे-धीरे असर करता हूं”

लहरों के दरमियाँ सफ़र करता हूं
मैं दवा हूं, धीरे-धीरे असर करता हूं।

जो कुछ कमाया है, जो कुछ पाया है
कदमों में आपके वो नज़र करता हूं।

तेरा याद आना लाज़िम है मेरे लिए
तेरी यादों के सहारे गुज़र-बसर करता हूं।

लबों से निकलकर जो आसमाँ तक जा पहुँचे
मैं दुआ हूं, तेरे दिल में घर करता हूं।

बता नहीं सकता तुझे इस क़दर करता हूं
मैं प्यार तुझसे इस क़दर करता हूं।

मेरी नज़रों में रहने वाले, ऐ मेरे हमसफ़र
तेरा इंतज़ार मैं हरपहर करता हूं।

चाहे तू मुझको सज़ा दे, चाहे तू अपना बना ले
कदमों में हाज़िर अपना ये सर करता हूं।।

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“Songs”

Without song, this life is तो एकदम ही wrong
No मज़ा bore होने की सज़ा, ज़िन्दगी का सफ़र भी long

Reel हो या real, हमेशा हर film की जान होते हैं गाने
मौसिकी के सुर ताल, rhythm की पहचान होते हैं गाने

सुनने वालों के style बदल गए, पर गाने अब भी वहीं हैं
ज़िन्दगी के vocals पर, गूँज रहे तराने अब भी वहीं हैं

Auto रिक्शा bus कैब metro ट्रेन ship या हो aeroplane
यात्रा तभी सुखद होगी, जब play list में हो गाने top ten

Tv tape fm radio, cd dvd Mp3 और I-pod
गाने के अख़बार हैं ये, कम करते हैं काम का load

Earphone से ज्यादा ज़रूरी चीज, सफ़र में कुछ भी नहीं
ज्योंही कान में लगाओ इसे, मूड होगा खुद-ब-खुद सही

एक count down है ज़िन्दगी, हमेशा सबकी बजाती है
जैसे हालात होते हैं हमारे, ठीक वैसे ही गाने सुनाती हैं

Without song, this life is तो एकदम ही ढ़ोंग
No dance No romance, लाइफ की journey भी long.

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“Diploma की वो Dynamic यादें”

Dedicated to all Ajmer Polytechnic Alumni…

Polytechnic Diploma की वो Dynamic यादें
बहुत याद आती हैं, College Time की वो बातें।

Schooling के बाद शुरु हुआ, Life का Brand New एक सफ़र
राजकीय बहुतकनीकी महाविद्यालय, माखूपुरा अजमेर शहर।

शुरु-शुरु में तो Ragging के नाम से ही डर लगता था
और बाद में तो फिर Hostel ही अपना घर लगता था।

बात जब Hostel की आ जाए तो उसे याद करते हैं हम
अपने उस कोहिनूर Hostel को कैसे भूल सकते हैं हम।

Advocate अय्यूब भाई साहब का था वो
Students के ख़्वाबों का आशियाँ था वो।

हर शनिवार शाम को ही हम, TV अपने कब्जे में ले लेते थे
और फिर पूरा Sunday, Hollywood Movies देखा करते थे।

सभी शाखाओं के अपने-अपने अलग भवन होते थे
6 के 6 Semester हम फाइलों का वज़न ढ़ोते थे।

क़रीब ही Canteen में चाय-समोसा मिलता था
एक इतवार को ही तो सबका चेहरा खिलता था।

अगर किसी के किसी Subject में Back आ जाती थी
तो ये ज़िंदगी कई दिनों तक उसका मातम मनाती थी।

College में सबकी अपनी, कोई न कोई Setting थी
हम जैसे कुछ तन्हा भी थे, Poor जिनकी Rating थी।

NCC Camp में तो भय्या, हालत ही खराब हो जाती थी
Valentines Day पर ज़िंदगी मानो गुलाब हो जाती थी।

सात Number Tempo हो या साड्डे यार दी Bike
कितनी हसीन थी वो दोस्तों, अपनी College Life.

College के Gate के उस तरफ, ज़िंदगी हमें हँसाती थी
College के Gate के इस तरफ, ज़िंदगी हमें नचाती है।

Engineering Diploma की वो धाकड़ यादें
बहुत याद आती हैं, Campus वाली वो बातें।।

© RockShayar

rockshayar.wordpress.com

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

“शर्त यही थी के कोई शर्त न हो”

 

शर्त यही थी के कोई शर्त न हो
रुख़्सत के वक़्त कोई दर्द न हो।

सहेजकर रखी है जिसे दिल में
उस तस्वीर पर कोई गर्द न हो।

नफ़रत की ज़हरीली आँधी में
सब्ज़ पत्तों का रंग ज़र्द न हो।

बड़ा तड़पाता है, बड़ा सताता है
दर्द का मौसम कभी सर्द न हो।

तसव्वुर में तकब्बुर आ जाता है
जज़्बाती जब कोई फ़र्द न हो।

न जीने दे, न मरने दे
ज़िंदगी इतनी भी बेदर्द न हो।

दिल को बहुत बुरा लगता है
हमदर्द ही जब हमदर्द न हो।।

“हमने ख़ुद को ज़ुबान दी है”

हमने ख़ुद को ज़ुबान दी है
अपने लिए ख़ुद जान दी है।

ज्योंही पैर डगमगाने लगे
बन्दूक सिर पर तान दी है।

दो गज ज़मीन के अलावा
अपनी पूरी ज़मीन दान दी है।

गिरवी ख़्वाब छुड़ाने की ख़ातिर
खेत मकान और दुकान दी है।

ज्यादा कुछ नहीं बस अपनी
आन बान और शान दी है।

जिसने भी दिल की सुनी है
दिल ने उसे ज़ुबान दी है।

शहीदों को सलाम करो इरफ़ान
देश के लिए इन्होने जान दी है।।

“गुज़रता नहीं ये लम्हा जाने कैसा लम्हा है”

ज़ेहन के हर हिस्से पर उसका ही कब्ज़ा है
गुज़रता नहीं ये लम्हा जाने कैसा लम्हा है।

चलता ही चला जाता है, मंज़िलों के पार
ठहरता नहीं ये रस्ता जाने कैसा रस्ता है।

बेजान पड़ा रहता है, अपनी ज़िद पर अड़ा रहता है
धड़कता नहीं ये हिस्सा जाने कैसा हिस्सा है।

जिस्म की तपिश में भी रूह को पहनता है
पिघलता नहीं ये नुत्फ़ा जाने कैसा नुत्फ़ा है।

जो पैदा हुआ है, उसे मरना है एक रोज
बदलता नहीं ये नुस्ख़ा जाने कैसा नुस्ख़ा है।

मुद्दे की बात करे तो आज़ादी एक मुद्दा है
उछलता नहीं ये मुद्दा जाने कैसा मुद्दा है।

मछली की तरह बार-बार फिसल जाता है
ठहरता नहीं ये लम्हा जाने कैसा लम्हा है।।

“My Mission Institute Jaipur”

प्रतियोगी इस दौर में, कोचिंग सेंटर्स के शोर में
माय मिशन इंस्टीट्यूट की बात ही कुछ और है।

ज्ञान की धरोहर सदा सुरक्षित रहती है जहाँ पर
परिश्रम की पावन पूंजी रक्षित रहती है यहाँ पर।

आदरणीय कुँवर कनक सिंह जी राव के दिशा निर्देशन में
मिशन सदैव सफल रहा, प्रबुद्ध गुरूजनों के मार्गदर्शन में।

आरएएस शिक्षक भर्ती जूनियर अकाउंटेंट सब इंस्पेक्टर पटवार एलडीसी
कॉम्पीटिशन की ऐसी तैयारी कराए, जैसी होनी चाहिए बिल्कुल वैसी।

प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से यहाँ, हजारों विद्यार्थी आते हैं
कड़ी मेहनत और रणनीति से, मंज़िल वो अपनी पाते हैं।

क्लास रूम के साथ-साथ, स्टडी मैटेरियल भी स्मार्ट है
कम टाइम में अधिकतम नाॅलेज गेन करना भी एक आर्ट है।

प्रतिस्पर्धा हो चाहे बहुत कठिन, या बह रही हो उल्टी धारा
कर्ण अर्जुन और एकलव्य की तरह, लक्ष्यभेदी है बाण हमारा।

पिछले सोलह वर्षो से सर्वश्रेष्ठ परिणाम देने वाला संस्थान है ये
निराशा से ग्रस्त कमजोर स्टूडेंट्स के लिए तो जैसे वरदान है ये।

आपकी सफलता सुनिश्चित करना हमारी जिम्मेदारी है
कोई झूठा दावा नहीं, सिर्फ सच्चाई और ईमानदारी है।।

Irfan Ali
LDC Batch – 02

Happy birthday Manoj Meena…

सुपर है स्पेशियलिटी जिसकी
धाकड़ है पर्सनैलिटी जिसकी
माइंडेड है मेंटिलिटी जिसकी
एडवांस्ड है एबिलिटी जिसकी
मासूम है मैच्योरिटी जिसकी
निश्चित है स्योरिटी जिसकी
क्यूट है क्योरिसिटी जिसकी
स्वीट है सिम्पलीसिटी जिसकी

पहचानो….
पहचानो….
वो कौन है?
नहीं पहचाने!

अरे यार !
एक ही तो है

यारों का यार…
दोस्तों का दोस्त…

धौलपुर की मिट्टी से
पैदा हुआ एक ओज

बर्थडे है जिसका आज
साडडा यार मनोज…

Happy birthday Haseeb…

सबसे जुदा एक शख्सियत है
बहुत नेक जिसकी तर्बियत है
कामिल जिसकी काबलियत है
ख़यालों में जिसके क़ैफ़ियत है
दुआओं में जिसकी ख़ैरियत है
सच्चाई जिसकी असलियत है

बुलंद इरादे हैं, नहीं और कोई तरक़ीब
अपनी मेहनत से बनाया अपना नसीब
न कोई रक़ीब
है खुशनसीब
बताओ ज़रा
वो कौन है
सोचो ज़रा
वो कौन है
सबका हबीब
दिल के क़रीब
वो है हसीब
वो है हसीब।।

…irfan boss

“कीर्ति स्तम्भ चित्तौड़गढ़” (Victory Tower Chittorgarh)

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

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राजस्थान की आन बान और शान का प्रतीक है कीर्ति स्तम्भ
विभिन्न मूर्तियों से अलंकृत यह, भारतवर्ष का शक्ति स्तम्भ।

जब सारंगपुर युद्ध में महाराणा कुम्भा ने महमूद खिलजी को हराया
तब उस जीत के उपलक्ष्य में,1448 ई. में यह विजय स्तम्भ बनवाया।

वास्तुशिल्पी मंडन व जैता नाथा पोमा पूंजा थे शिल्पकार
अत्रि भट्ट और महेश भट्ट, दोनों ही कमाल के प्रशस्तिकार।

अपने आस-पास के मैदान से, 122 फीट है ऊँचाई इसकी 
इष्टदेव विष्णु को समर्पित, बड़ी अनोखी है गाथा इसकी।

ऊपर जाने के लिए 157 सीढ़ियाँ, तथा आकृति इसकी वृत्ताकार है 
ऊपर-नीचे से चौड़ा, बीच में से संकरा, इसका डमरू जैसा आकार है।

तीसरी मंजिल पर नौ बार, अल्लाह ही अल्लाह लिखा हुआ है
उकेरी गई प्रशस्ति असल में, कुम्भा की विजय यात्रा का बयां है।

सबसे ऊपरी मंजिल एक बार, बिजली गिरने से टूट गई थी
महाराणा स्वरूप सिंह ने तब उसकी, मरम्मत करवाई थी।

माध्यमिक शिक्षा बोर्ड एवं राजस्थान पुलिस का यह प्रतीक चिह्न है
ऐतिहासिक धरोहर के साथ-साथ, अद्भुत स्थापत्य कला का प्रतिबिंब है।

इतिहासकार फर्ग्यूसन ने इसको, रोम के टार्जन के समान बताया है
गाट्ज के अनुसार इसमें, भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष समाया है।

चित्तौड़गढ़ में स्थित यह स्मारक, जिसे विक्ट्री टाॅवर भी कहते है
बनाने वाले ने क्या चीज बनाई है, देखने वाले हमेशा यही कहते हैं।।

© RockShayar

“गुलबदन गुलफ़ाम गुलपोश गुलज़ार है तू”

जाँ निसार मेरे यार, अन्वार आबशार है तू
गुलबदन गुलफ़ाम, गुलपोश गुलज़ार है तू।

कभी पैर जलते हैं, तो कभी ग़ैर जलते हैं
चिलचिलाती धूप में, मौसम-ए-बहार है तू।

माहरुख़ कहूँ या माहज़बीं, दिलबर कहूँ या दिलनशीं
मुश्क से तामीर हुई, बेनज़ीर निगार है तू।

बेतहाशा चढ़ता ही जाए, असर ये बढ़ता ही जाए
महीनों तक न उतरे जो, ऐसा ख़ुमार है तू।

जब भी मिलने आती हो, रूह भिगा जाती हो
सावन की पहली बारिश सी, ठंडी फुहार है तू।

ये तक़दीर का फैसला है, जो मुझे तू मिला है
अब और क्या कहूँ, मेरी साँसों में शुमार है तू।

बड़ी मुश्किलों के बाद मिले, जिस पर कि दाद मिले
ज़िन्दगी की ग़ज़ल का हर वो अशआर है तू।।

© RockShayar

शब्दावली:-

जाँ निसार – जान लुटाने वाला
अन्वार – प्रकाशवान
आबशार – झरना 
गुलबदन – फूलों जैसा शरीर 
गुलफ़ाम – फूलों जैसा रंग 
गुलपोश – फूलों से ढका हुआ 
गुलज़ार – बगीचा
माहरुख़/माहज़बीं – चाँद जैसा चेहरा
मुश्क – कस्तूरी 
बेनज़ीर – अद्वितीय 
निगार – मूर्ति
अशआर – शेर (बहुवचन), दोहे, छंद

“पता नहीं वो कौन है”

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बारिशों की तरह वो आती है
घटाओं की तरह वो छाती है
फ़िज़ाओं की तरह वो गाती है
दुआओं की तरह वो जाती है
हाँ, मुझको जो आज़माती है
पता नहीं वो कौन है, पता नहीं वो कौन है।

मुस्कान में एक ताज़गी है
चेहरे पर उसके सादगी है
मरहबा ये तो दीवानगी है
जो देखे वो कहे आफ़रीं है
इस रूह की जो जानशीं है
पता नहीं वो कौन है, पता नहीं वो कौन है।

मैंने हरदम जिसे सोचा
अपने अंदर जिसे पाया
मैंने हरपल जिसे चाहा
जिगर में जिसे बिठाया
वो जो है मुझमें नुमायाँ
पता नहीं वो कौन है, पता नहीं वो कौन है।

बला की जो ख़ूबसूरत है
मासूमियत की मूरत है
जैसी वो उसकी सूरत है 
वैसी ही उसकी सीरत है
इस दिल की जो हसरत है
पता नहीं वो कौन है, पता नहीं वो कौन है।।

© RockShayar

“तेरी साँसों की सरगोशी में नुमायाँ मैं”

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तेरी खुशबुओं से,
खिंचा चला आया मैं
तेरी साँसों की सरगोशी में नुमायाँ मैं।
 
जब भी धड़कता हूँ.
तुझमें धकड़ता हूँ
तेरी धड़कनों में इस क़दर समाया मैं।
 
सबने मुझे बुलाया,
पर मुझको कोई न भाया
जब तूने मुझे बुलाया, दौड़ा चला आया मैं।
 
ज़रा ग़ौर से देखो मुझे,
ऐ जाने जहाँ
तेरी ज़िन्दगी का हसीन सरमाया मैं।
 
तुझे ख़बर नहीं है,
मुझे सबर नहीं है
देख तेरी ख़ातिर क्या-क्या लाया मैं।
 
ये मोहब्बत मेरी,
कम न होगी कभी
तेरी आदतें सब मेरी, तेरा हमसाया मैं।।
 
© RockShayar

“मैंने तुझे कल याद किया था”

ये कैसे हो सकता है जानाँ
मुझको ज़रा ये तो बताना।
मैंने तो कुछ बोला भी नहीं
राज़ अपना खोला भी नहीं।
फिर तुमने ये सब कैसे जाना
जानाँ ज़रा मुझको ये बताना।
वो कौनसा जादू आता है तुम्हे
ये दिल बेकाबू चाहता है तुम्हे।
दूर होकर भी जो इतना क़रीब हो
हबीब हो रक़ीब हो, या नसीब हो।
तुम्हे महसूस करूं तो कैसे करूं
छू भी ना पाऊं, इतना क़रीब हो।
मैंने तुझे कल याद किया था
बहुत दिनों के बाद किया था।
भूल से नहीं, हाँ जानबूझकर
दिल से बहुत याद किया था।।
© RockShayar

“गर ज़मीं पर कहीं जन्नत है तो बस यहीं है, यहीं है”

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“गर फिरदौस बर-रूऐ ज़मीं अस्त
हमी अस्तो, हमी अस्तो, हमी अस्त”

When you read it…You just feel it…

वादियों का दिलकश जहाँ, जैसे ख़्वाब कोई हसीं है
गर ज़मीं पर कहीं जन्नत है तो बस यहीं है, यहीं है।

कांपती हुई कायनात ने, धुंध की चादर ओढ़ रखी है
बर्फीले कोहसारों में, इश्क़ की अंगीठी सुलग रही है।

देखों तो सही, डल झील में तैर रहे हैं कई शिकारे
ऐसे में कोई अपना दिल, बताओ तो कैसे ना हारे।

सुर्ख़ चिनार के वो शादाब शजर, मुस्कुराते हुए नज़र आते हैं
गुलमर्ग से लेकर पहलगाम तक, गुनगुनाते हुए नज़र आते हैं।

निशात हो या शालीमार, चमन में तो गुल खिलते हैं
दौर-ए-खिज़ा में अक्सर यहाँ, पत्तों के रंग बदलते हैं।

दरिया-ए-झेलम का पानी, अपनी कहानी कह रहा है
कई बरस बीत चुके हैं, मुसल्सल ख़ामोश बह रहा है।

अस्सार-ए-शरीफ़ जहां पर, महफूज़ मो-ए-मुक़द्दस है
हज़रतबल दरगाह तो बेहद, पाकीज़ा और मुक़द्दस है।

फ़िज़ाओं में बसी वो बेनज़ीर, जैसे कोई माहज़बीं है
गर ज़मीं पर कहीं जन्नत है तो बस यहीं है, यहीं है।।

:-RockShayar

“Positive Poem”

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एडवर्सिटी कम्स टू आईदर ब्रेक यू, ओर ब्रेक दी रिकॉर्ड
कुछ ऐसा कर जाओ कि, वो तुमको मिले नोबेल रिवॉर्ड।
 
एक ऑर्डिनरी को एक्स्ट्राऑर्डिनरी, बनाती है डेस्टिनी
हाँ निगेटिव को सुपरलेटिव बनना, सिखाती है डेस्टिनी।
 
बुरा वक़्त आपको तोड़ सकता है, या फिर से जोड़ सकता है
जिस तरफ भी आप चाहो, ये रुख हवाओं का मोड़ सकता है।
 
प्रॉस्पेरिटी ट्राइज दी फॉर्चुनेट, एण्ड एडवर्सिटी दी ग्रेट
असफलता बहुत ज़रूरी है, मत करो इससे इतना हेट।
 
वेन योर स्ट्रगल्स डवलप मेनी स्मार्ट स्ट्रेंग्थ्स इंटू यू
फिर अपने करियर को लेकर, हो इतना चिंतित क्यूँ।
 
ऐवरीवन नॉ, स्टार्स कैननॉट शाइन विदआउट डार्कनेस
हर बंदा यूनीक यहाँ पर, खुद पहचानो अपनी स्मार्टनेस।
 
एन ऑप्टिमिस्ट सी दी ऑपर्चुनिटी इन ऐवरी डिफिकल्टी
कोई नहीं जानता यहाँ पर कि, वो है कितना टैलेंटेड मल्टी।
 
ऐवरी डिफीट ऐवरी हार्टब्रेक ऐवरी लॉस कंटेंस इट्स ओन सीड
मुश्किलें उतनी ही मिलती हैं, जितनी कि ज़िन्दगी की हैं नीड।।

“वो अधूरी गुज़ारिश मेरी, अब भी अधूरी है”

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वो अधूरी गुज़ारिश मेरी, अब भी अधूरी है
कम नहीं होती कभी, ये जाने कैसी दूरी है।

तेरा नाम तेरी बातें, तुझसे मेरी वो मुलाकातें
तुझे भुलाने के लिए तुझे याद करना ज़रूरी है।

सुना है ! माशूक, साथ जीते हैं साथ मरते हैं
हमारा यूँ दूर-दूर रहना, कितना ग़ैरज़रूरी है।

हद पार करता हूँ, कभी सरहद पार करता हूँ
जुनून को बढ़ाता है जो, नशा तेरा फितूरी है।

तुझको भुलाना जैसे, खुद को भुलाना लगता है
बेपनाह चाहूँ तुझे, कितनी हसीं ये मज़बूरी है।

जितना सोच पाता हूँ, लिखता चला जाता हूँ
ये कामयाबी तो, कड़ी मेहनत की मज़दूरी है।

तेरी मेरी वो कहानी, डायरी में है जो छुपानी
अभी तो आधी लिखी है, बाक़ी अभी पूरी है।।

“स्मार्टफोन (SmartPhone)”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)
 
कभी नहीं सोता है जो, रहता चौबीसों घंटे ऑन
उँगली पर सबको नचाए जो, वो है जी स्मार्टफोन।
 
एमेजिंग एंड्रॉयड हो या विशिष्ट विंडोज, इन्हीं से तो पहचान है
विदाउट एन ऑपरेटिंग सिस्टम, ये सिस्टम स्टुपिड समान है।
 
सूचनाएं वो सब अब जेब में रहती हैं, ज़िन्दगी आजकल ऐप में रहती है
फरमाइशों का रेडियो खुद ऑन करके, ये माइक्रोवेव सितम सहती है।
 
बिन इंटरनेट के कुछ ऐसे तड़पता है, जैसे बिन पानी के मछली
फेसबुक व्हाट्स अप ट्विटर, यही सब तो इसकी मित्र मंडली।
 
सोशल मीडिया के संगठित द्वार, इसी के ज़रिए खुलते हैं
न्यू जेनरेशन के पाप जहाँ पर, कंफेशन के ज़रिए धुलते हैं।
 
सेल्फी लेना और सेल्फिश बनना, इसी ने तो सिखाया सब
इस डिजिटल नशे की लत से, खुद को आज़ाद करे हम अब।
 
टच स्क्रीन के कारण, फिंगर्स की सेंसिटिविटी कम हो जाती है
हाई डेफिनेशन ख़्वाब देखते-देखते, वो नींद कहीं खो जाती है।
 
चाहे वो अलार्म हो या कि कलाई घड़ी, या हो वो टेलीफोन डायरी
काग़ज़-क़लम बेरोज़गार हुए, लिखी जाती हैं इसी में अब शायरी।
 
चाहे कुछ भी हो जाए मगर, तकनीक तकनीक ही रहती है
हावी मत होने दो इसे खुद पर, नेचर हमेशा सही कहती है।
 
कभी नहीं रेस्ट करता वो, बताओ ऐसा है कौन?
फोन से कहीं बढ़कर है जो, वो है जी स्मार्टफोन।।
 
:-RockShayar

“तुझ को भुलाने की, हर नाकाम कोशिश कर चुका हूँ”

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तुझ को भुलाने की, हर नाकाम कोशिश कर चुका हूँ
और हर उस कोशिश को, नाकाम भी मैं ही बनाता हूँ।

बहुत दिनों से मैंने, अपने अंदर एक समंदर छुपा रखा है
दिल के किसी कोने में, तेरी यादों का बवंडर दबा रखा है।

तुम से मुलाक़ात के वक़्त, बस यही ध्यान रखता हूँ मैं
कि तुम्हारे भीतर जो तुम हो, उससे मुलाक़ात हो जाए।

कई बार इस बारे में सोचा है मैंने, कि तुम से ना मिलू
लेकिन हरबार यही लगता है, के आख़िर क्यों ना मिलू।

याद है पिछली दफा, जब तुम मुझ से मिलने आई थी
कई दिनों तक ये ज़िन्दगी, मुसलसल मुस्कुराई थी।

तेरे जाने के बाद, जीना बहुत मुश्किल होता है
तुझे याद कर करके, ये दिल महीनो तक रोता है।

सोच रहा हूँ इस बार तुम्हे, अपनी आँखों में क़ैद कर लू
भूलने से पहले इकदफा तुम्हे अच्छी तरह याद कर लू।

सफ़र में यूँही चलते-चलते, आखिरकार हम मिल ही गए
एक लम्हे के लिए ही सही, आखिरकार हम मिल ही गए।।

“Ajmer Sharif (अजमेर शरीफ)”

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#ObjectOrientedPoems(OOPs)

पहाड़ों की तलहटी में, बसा हुआ एक प्राचीन नगर
सदियों पुराना इतिहास लिए, बैठा है अजमेर शहर।

1113 ईस्वी में, अजयपाल चौहान ने अजयमेरू बसाया
ज़मीन पर जिसकी सदा, रहता है ग़रीब नवाज़ का साया।

हिन्द के सुल्तान वो, वलियों के सरदार कहलाते है
अजमेर वहीं आते हैं, जिन्हें ख्वाज़ा पिया बुलाते है।

तीर्थराज पुष्कर में, ब्रह्माजी का सुप्रसिद्द मंदिर है
गऊघाट के किनारे पर, यह संस्कृति का शिविर है।

अर्द्ध-चंद्राकार इस झील में, पवित्र पूजा और स्नान होता है
कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर, यहाँ पुष्कर मेला भरता है।

अढ़ाई दिन का झोंपड़ा, सूफ़ी रंग में रंगा हुआ है
बीसलदेव और कुतुबुद्दीन, दोनों के दौर का गवाह है।

बारहवीं सदी में आनाजी ने, आनासागर झील खुदवाई
जहाँगीर ने दौलतबाग, व शाहजहाँ ने बारहदरी बनवाई।

इंजीनियर फाॅय के नाम पर ही तो, फाॅयसागर बनाया गया
अकाल राहत के तहत इसमें, बाँडी नदी का पानी लाया गया।

शहर के एकदम बीचोंबीच, सोनी जी की नसियां स्थित है
लाल पत्थरों के इस भव्य भवन में, जैन मंदिर अवस्थित है।

मेरवाड़ा पर्वत पर, गढ़बीठली दुर्ग तारागढ़ निर्मित है
मीरां साहब की दरगाह जहां पर, टीवी टावर स्थित है।

तारागढ़ मार्ग पर, पृथ्वीराज चौहान स्मारक बना हुआ है
नाग पहाड़ पर ही तो, मशहूर लूणी नदी का उद्गम हुआ है।

अकबर ने 1570 ईस्वी में, बनवाया मैगजीन का किला
इसी किले में टाॅमस रो, बादशाह जहाँगीर से था मिला।

राजकीय राजपूताना संग्रहालय, इसी किले में है
अरावली का सबसे कम विस्तार, इसी जिले में है।

समीप स्थित है नारेली तीर्थ, टाॅडगढ़-रावली अभयारण्य
पुष्कर घाटी पंचकुण्ड मृगवन, प्रकृति का अद्भुत लावण्य।

मेयो काॅलेज जीसीए, पाॅलिटेक्निक जैसे संस्थान यहां
एजुकेशन फील्ड में इसने, पाया है बहुत सम्मान सदा।

प्रमुख प्रशासनिक कार्यालय, मुख्यालय एवं बोर्ड यहां पर
आरपीएससी रेवेन्यू और, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यहां पर।

रेलवे स्टेशन के ठीक सामने, एंटीक क्लाॅक टावर है
देश की राजनीति में, अजमेर का अलग ही पावर है।

आर.जे.जीरो.वन. हर वाहन को देता यूनीक पहचान
राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल, सिखाए आन बान और शान।

मुर्गीपालन व अंडाउत्पादन में, यह सबसे आगे है
सम्पूर्ण साक्षर होकर इसने, नित नए झंडे गाड़े हैं।

राजस्थान का हृदय, हिन्दोस्तान की शान है अजमेर
भारतीय गंगा जमुनी, तहज़ीब की पहचान है अजमेर।।

© RockShayar Irfan Ali Khan

“मैं जब लिखता हूँ, कोई और होता हूँ”

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इस दुनिया से दूर, कहीं और होता हूँ
मैं जब लिखता हूँ, कोई और होता हूँ।

मुझ को भी पता नहीं, कहाँ तक है हद मेरी
जो नामुमकिन लगे है, वही तो है ज़िद मेरी।

अंदर के समंदर में मैंने, कई तूफ़ान छुपाए हैं
क़ुबूल नहीं हो कभी जो, माँगी ऐसी दुआएँ हैं।

लफ़्ज़ों के काँधे पर, सिर रखकर रोता हूँ
मैं जब लिखता हूँ, कोई और होता हूँ।

काग़ज़ और क़लम, हैं दोनों मेरे हमदम
ज़िंदगी के तन्हा सफ़र में, साथ चले हरक़दम।

अपने ही अक्स में, हज़ार शख़्स नज़र आते हैं
तलाश में जिनकी, जज़्बात लफ़्ज़ बन जाते हैं।

दर्द की बारिश में, रूह को भिगोता हूँ
मैं जब लिखता हूँ, कोई और होता हूँ।

इस दुनिया से दूर, कहीं और होता हूँ
मैं जब लिखता हूँ, कोई और होता हूँ।।

“राब्ता”

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कभी-कभी लगता है तुम से, सदियों पुराना कोई वास्ता है
अधूरा है अब तक एहसास कोई, रुह का रूह से ये राब्ता है।
 
न तूने मुझे अपनाया कभी, न मैंने तुझे ठुकराया कभी
मैं जितना याद करता रहा, तू उतना मुझे भुलाती गई।
 
कैसा अजब ये रिश्ता है, दिलों के दरमियां जो पिसता है
न तुम समझ पाए कभी, न हम समझ पाए कभी।
 
मुझ से ज्यादा तुम्हे मेरी, मोहब्बत से मोहब्बत रही हमेशा
और तुम्हे सोचते ही मुझे वो, सुकून-ओ-राहत मिली हमेशा।
 
न तूने मुझे तड़पाया कभी, न मैंने तुझे तरसाया कभी
मैं जितना दर्द छुपाता रहा, तू उतना बेख़बर होती गई।
 
अजीब हालात के चलते, ये ज़िन्दगी भी अजीब हुई
एक पल को अमीर होकर, अगले ही पल ग़रीब हुई।
 
अब ना कहीं तू नज़र आती है, ना तेरा नाम-ओ-निशां
वो दौर ही कुछ और था, फ़क़त पल दो पल का मेहमां।
 
न तूने मुझे जाना कभी, दिल से अपना माना कभी
मैं जितना पास आता गया, तू उतनी दूर होती गई।।
 
 

“माँ मुझे आजकल तेरी याद नहीं आती है”

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हालाँकि अँधेरी गली अब भी मुझे बहुत डराती है
लेकिन माँ मुझे आजकल तेरी याद नहीं आती है।
 
मुद्दत से मैं रो नहीं पाया, किसी का भी हो नहीं पाया
अब तो गोद में सुला ले, सुकूं भरी नींद सो नहीं पाया।
 
तू तो सब जानती थी, मेरे हर डर को पहचानती थी
फिर डर क्यों मिटाया नहीं, निडर मुझे बनाया नहीं।
 
शिकायत न करू तो क्या करू, सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं
संगी साथी सब यार दोस्त, मुझे बात-बात पर चिढ़ाते हैं।
 
जब जाना ही नहीं चाहता था, फिर क्यों दूर भेजा मुझे
मासूमियत को छीनकर, मुझ से ही क्यों दूर भेजा मुझे।
 
पापा तो उस वक़्त भी ऐसे ही थे, और आज भी ऐसे ही है
और बाक़ी सब लोग, पहले जो भी थे पर अब वैसे नहीं हैं।
 
माना कि तेरे क़दमों के नीचे जन्नत रहती है
मगर दिल तोड़ने का हक़ तुझ को भी नहीं है।
 
हालाँकि अँधेरी रात अब भी मुझे बहुत डराती है
लेकिन माँ मुझे आजकल तेरी याद नहीं आती है।।

“जो आज तेरी हँसी उड़ा रही है, वही दुनिया कल तुझे सलाम करेगी”

अकेला चना भी अब भाड़ फोड़ेगा, और एक हाथ से ताली भी बजेगी।
जो आज तेरी हँसी उड़ा रही है, वही दुनिया कल तुझे सलाम करेगी।

जो भी है यहाँ, सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं
दिल के अँधेरे कोनों में, छुपे हुए ये तिलचट्टे हैं।

एक तीर से दो-दो नहीं, दस-दस तू शिकार कर
क़लम का सिपाही है, सो क़लम से ही वार कर।

आठों पहर चौंसठ घड़ी, माशूक़ मौत तेरे सर पर खड़ी
इधर कुआँ उधर खाई, क्योंकि ज़िन्दगी ज़िद पर अड़ी।

छाती पर जो तूने पत्थर रखे हैं, वही तो तेरे यार सगे हैं
तन्हाई की शिद्दत में अक्सर, सोये हुए अरमान जगे हैं।

घाट-घाट का पानी पिया है, हरेक लम्हा सदी सा जिया है
अपने दिल का हर फैसला तूने, ज़िन्दगी के नाम किया है।

कान का बहुत कच्चा है तू, मासूम अब भी बच्चा है तू
जमाना चाहे कुछ भी कहे, पर इंसान बहुत सच्चा है तू।

लोहे के चने भी चबाएगा, और पानी में आग भी लगाएगा
पहचान कर सके खुद अपनी, इसलिए करके भी बताएगाा।।

“ऊपर बैठा है मदारी, और जमूरा है नीचे”

ऊपर बैठा है मदारी, और जमूरा है नीचे
तू आगे-आगे, तेरी परछाई पीछे -पीछे।
 
कुछ भी कर ले चाहे तू, मगर होनी तो एक दिन होकर रहेगी
सुन बस अपने दिल की तू, हालाँकि दुनिया तुझे जोकर कहेगी।
 
सबसे निकम्मा चेला तू, और सबसे बड़ी गुरु ज़िन्दगी
जिस पल भी तू गिरता है, वहीँ से असल शुरू ज़िन्दगी।
 
काल का यह डमरू, सब को अपनी ताल पर नचाये
हर प्राणी के लिए यहाँ, नाना प्रकार के खेल रचाये।
 
जैसी करनी वैसी भरनी, बहुत सुना और बहुत देखा
न्याय तो केवल वो करे, उसके पास है सब का लेखा।
 
न किसी का मज़ाक उड़ाओ, न किसी का दिल दुखाओ
न किसी का तलाक़ कराओ, न किसी का घर जलाओ।
 
सब कुछ उसके सामने है, सब कुछ उसकी मर्ज़ी से है
सबसे अक़्लमंद है फिर भी, कर्म इंसान के फर्जी से है।
 
ऊपर बैठा है उस्ताद, और शागिर्द है नीचे
तू आगे-आगे, तेरी तक़दीर पीछे -पीछे।।

“बरसों पुरानी, है ये कहानी”

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बरसों पुरानी, है ये कहानी
क़द्र किसी ने, न उसकी जानी।
मज़ाक उड़ाया, जब पूरे जग ने
आख़िर उसने, लड़ने की ठानी।।
 
ख़ामोशी को, हथियार बनाया
दर्द को अपनी तलवार बनाया।
ख़त्म हो गए, जब सारे पैतरे
ज़ेहन को ही, औज़ार बनाया।।
 
ज़माने ने उस को, पागल कहा
दहाड़ता हुआ शेर, घायल कहा।
आसमां ने सीरत, नम देखकर
ज़मीं का आशिक़, बादल कहा।।
 
बरसों पुरानी, है ये कहानी
बात किसी ने, न उसकी मानी।
मज़ाक बनाया, जब पूरे नभ ने
आख़िर उसने, उड़ने की ठानी।।
 
 

“जो पहले मर चुका है, उसे मौत का क्या डर”

जो पहले मर चुका है, उसे मौत का क्या डर
ख़ानाबदोश का कहीं कोई, नहीं होता है घर।
 
जिस्म के जाली लिबास में, यह रूह छटपटाती है
उड़ने के लिए डर की ऊँची, छत पर फड़फड़ाती है।
 
इंतक़ाम की दहकती आग में, झुलस रही है ये ज़िंदगी
अपनी आँखों से देखी है इसने, अपने साथ हुई दरिंदगी।
 
खेल कौन शुरू करता है, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है
बाज़ीगर तो बस आपकी, कमज़ोर चाल को पकड़ता है।
 
क़ायदे-क़ानून सिर्फ, कहने सुनने में अच्छे लगते हैं
जो आपके अपने हैं, सबसे पहले आपको वही ठगते हैं।
 
अपने अनोखे तरकश में, कई तीर छुपा रखे हैं उसने
जख़्मी सीने पर, दुश्मन के नाम खुदा रखे हैं उसने।
 
मक़सद मिल जाए जिसे, फिर उसके लिए क्या आराम
जुनूनी के लिए तो कभी भी, नामुमकिन नहीं कोई काम।
 
वक़्त की क़द्र करना सीख गया, वो शख़्स आख़िर
जीने से पहले मरना सीख गया, वो शख़्स आख़िर।।
 
 

“कभी”

बाप-भाई पर भी तो गालियाँ बनाओ कभी
ज़िन्दगी है मुजरा, तालियां बजाओ कभी।

ग़ैरों पर तो हमेशा अपनी जान लुटा देते हो
हमें भी तो आगोश में अपने, सुलाओ कभी।

दरवेश है हम तो, दर-बदर भटकते रहते है
दिल के दर पर खड़े है, ख़ैरात लुटाओ कभी।

सुन मेरे ऐ सनम, इतने बुरे भी नहीं है हम
गली से रोज गुज़रते हो, घर आओ कभी।

क़तरा क़तरा जलने में, एक अलग ही मज़ा है
मेरी तरह, तुम भी तो दिल जलाओ कभी।

वैसे तो बड़े ही नेकदिल इंसान है हम, लेकिन
हद पार हो जाए, इतना भी न सताओ कभी।

वो चेहरा, वो आँखें, वो बातें, वो मुलाक़ातें
मैं सब बताऊँगा, ख़्वाब में तो आओ कभी।।

 
 
 

“जान लेना और देना, हमें दोनों आता है”

जान लेना और देना, हमें दोनों आता है
यह तुझ पर है, कि तू क्या चाहता है।

दर्द को जब से, बनाया है हथियार हमने
दर्द अब पहले जितना नहीं सताता है।

जो पूछा किसी ने, तो अपनों ने तआरूफ़ कुछ यूँ दिया
के पता नहीं काग़ज़ पर, चंद लकीरें बनाता है।

वक़्त बहुत लगा, कंकर से चट्टान बनने में
वक़्त है आखिर, सब को आज़माता है।

पहले बहुत रोता था, जो चैन अपना खोता था
सुना है वो आजकल जोशीले गीत सुनाता है।

ज़माना कहता है अक्सर, पागल शायर उसे
ज़ेहन में हर वक़्त जो ख़याली मुर्गे लड़ाता है।

कुछ इस तरह, तरसाती आयी है ज़िंदगी हमें
कि जैसे सूखी ज़मीं को काला बादल तरसाता है।।

 

“The Kapil Sharma Show”

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“The Kapil Sharma Show”
 
उदास चेहरों पर, पलभर में मुस्कान ले आए जो
वन एंड ओनली, दी कपिल शर्मा शो।
 
कॉमेडी किंग कपिल की तो, बात ही सबसे निराली है
सोनी साब के साथ इनकी तो, रब ने जोड़ी बना दी है।
 
शांतिवन हाउसिंग सोसाइटी में, घर है इनका बेहद लाजवाब
बीरबल के बाद दुनिया में, एक यहीं तो सबसे हाजिर जवाब।
 
प्रोग्राम के परमानेंट जज, जिन्हें हम सिद्धू पाजी कहते है
खटाक से शेर खड़का कर, सब का दिल वह जीत लेते है।
 
50-50 अस्पताल के, बड़े ही फ़र्ज़ी डॉक्टर मशहुर गुलाटी
गेस्ट का करते है विचित्र टेस्ट, डाॅक्टरी नहीं इनको आती।
 
एज ए डॉक्टर ऑलवेज, इनके कुछ फर्ज़ बनते हैं
व्हाट ए बिजी डे, हर बार सबको यही सब कहते है।
 
साथ में पंक्चर की दुकान, ऐसे कौन चलाता है भाई
बड़ी विनम्रता से कहते है, ऐसे कौन बिठाता है भाई।
 
फैशनेबल पुष्पा नानी को तो, फटाक से एक पोता चाहिए
और इतना ही नहीं साथ में, एक ब्रांड न्यू नाना भी चाहिए।
 
बेबीनाज़ दादू मामा, या हो चाहे फिर बेगम लुच्ची
जितने भी यह रोल निभाए, लेना चाहे उतनी पुच्ची।
 
थाउजेंड एक्स एल लार्ज एक नर्स, नाम है जिसका बम्पर
ब्लू व्हेल जैसी फिज़िक है, रहती है फिर भी अपने दम पर।
 
रिंकू देवी और संतोष, मेहमानों को खूब सताए
भई अरोड़ा साहब…आप हमें बहोत पसंद आए।
 
हमरा तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गीया, रिंकू भौजी का यही रोना है
उस पर बिना गर्दन वाली ननद, संतोष का वाह क्या कहना है।
 
सीटी केबल में मिलकर यहाँ सब, बाल की खाल निकालते हैं
कौन भईल करोड़पति में, घत्रुघन घिन्हा नॉलेज खंगालते है।
 
दुबई टी-स्टाल खोलकर, चंदू चायवाला कहलाता है
ये शरारती खजूर, इसी पतीले से मुँह वाले का बेटा है।
 
खजूर की क्लास टीचर, कहते है जिन्हें मिस विद्यावती
कोयल को भी डायबिटीज हो जाए, इतना मीठा यह गाती।
 
गुलाटी की बेटी सरला, जो कि बचपन से ही कप्पू की दीवानी है
नर्स हो अगर लाटरी जैसी तो, मरीजों की तो लाइन लग जानी हैं।
 
घर के बगल में ही यहाँ, मोहन टॉयलेट सेवा उपलब्ध है
इस गिटार वाले दिनेश को तो देखो, ज़रूर इसे कब्ज़ है।
 
हँसते रहिए, मुस्कुराते रहिए, और अपने आस-पास सफाई रखिए
हर शनिवार और रविवार, The Kapil Sharma Show देखते रहिए।।
 
-RockShayar Irfan Ali Khan
 
#ObjectOrientedPoems(OOPs)
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“तू कहीं नहीं है”

उन भूली बिसरी यादों में भी तू कहीं नहीं है
ऐसा भी क्या रूठना, ऐसी भी क्या बेरुखी।

धूप में जब चलता हूँ, परछाई तुम्हारी बनती है
मुझ को अपनी कहानी, सदियों पुरानी लगती है।

कभी तो हटाओ, मेरे तसव्वुर से वो बंदिश
एक अर्सा हो गया है, तुम्हें सोचे हुए जानाँ।

हम को तो मिलना ही था, इसलिए मिले थे हम
वरना यूँ तो ज़िन्दगी में, रोज ही इत्तेफाक़ होते हैं।

दूर रहकर भी मुझ से, एक पल के लिए भी दूर नहीं हो
दर्द को मेरे जिसने महसूस किया, क्या तुम हूर वही हो।

यक़ीन न आए तो, मुझ को आज़माकर देख लो
लफ़्ज़ों में बनाई जो मैंने, तस्वीर अपनी देख लो।

यह वक़्त तो गुज़र जाता है, मगर गुज़रता नहीं वो वक़्त
बड़ी चालाकी से क़त्ल करता है, है क़ातिल बड़ा ही सख्त।

अब तो तेरी तस्वीर में भी तू कहीं नहीं है
ऐसी भी क्या जुदाई, हरपल बस तन्हाई।।

Poem for me by sadda yaar…Ashif

CYMERA_20150824_193451.jpgखुद ही को खुद में इज़ाद करता है वो शख़्स 

खुद ही को खुद से आज़ाद करता है वो शख़्स।

शायरी से यारी, फिर क्या दुनियादारी
तकलीफ़ों को कुछ यूँ निजात करता है वो शख़्स।

दुनिया से तलाक कर
शायरी की दुनिया पर नाज़ करता है वो शख़्स।

कागज़ से यारी, और बस लिखना जारी
हर हद को भूल कर, खुद को क़ुबूल करता है वो शख़्स।

हर नाराज़ से बेपरवाह हो
बस काग़ज़ को हमराज़ करता है वो शख़्स।

आसमां छूने की ज़िद में
सितारों तक जा पहुँचता है वो शख़्स।

अल्फाज़ो में खोकर
वुज़ूद को उन्ही में नुमायाँ कर देता है वो शख़्स।

अश्क़ों से आँखे नम करती दुनिया सारी
पर लफ्ज़ो से कागज़ तर कर, रोता है वो शख़्स।

सीने में दिल को छुपाती दुनिया सारी
पर डायरी में अपना दिल रख कर, सोता है वो शख़्स।।

-Ashif Khan

Introducing The Rock Ghazal…

बासी पड़े ख़यालों से दिमाग़ी कॉन्स्टिपेशन हो गया
पता ही नहीं चला कब मुझ में मेरा सेपरेशन हो गया।
 
खुद से खुद की मुलाकात है, फिर डरने की क्या बात है
जब जुनून का सुकून से डायरेक्ट कनेक्शन हो गया।
 
मुश्किलों को पार करके, जब फल मिला तो लगा उसे
कि जैसे किसी जॉब का कम्पलीट प्रोबेशन हो गया।
 
इतने साल हो गए, वो लिखता रहा बस लिखता रहा
यादों का काग़ज़ पर लाइफटाइम रेस्टोरेशन हो गया।
 
बार-बार गलतियां करके, और बार-बार ठोकर खाके
खुद में करके सुधार हासिल उसे परफेक्शन हो गया।
 
धुन का वह धनी, कन्सिस्टन्सी से आगे बढ़ता रहा
विधि के हाथों लिखी गई यूनिक डेफिनेशन हो गया।
 
वक़्त ने एक रोज जब, संभलने का भी वक़्त न दिया
खुद को पाना ही फिर तो उसका ऑब्सेशन हो गया।।
 
RockShayar

“कोई और बनकर जी रहा है तू”

यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू
यह पता है तुझे, फिर भी सह रहा है तू
यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू।

एक अर्से से मुकद्दर, अजीब खेल खेलता आया है
तू ही तुझ में ना रहा, अब तो कोई और नुमायाँ है।

अपनों के लिए क्यों अपने आप को भूल रहा है
किस्मत और कोशिश के दरमियान झूल रहा है।

सब पता है तुझे, कि तू किस चीज के लिए बना है
मासूम मोहब्बत के उस, गाढ़े लाल ख़ून में सना है।

सब तो खुशियां मना रहे हैं, पर तू खुश नहीं है
सब तो हासिल है लेकिन, तू खुद, खुद नहीं है।

यह कैसी तलब है, जो कभी खत्म ही नहीं होती
यह कैसी तड़प है, जो कभी भस्म ही नहीं होती।

जब-जब तू आगे बढ़ा, खींचकर यह ज़िन्दगी पीछे ले आई
जब-जब तू ऊपर चढ़ा, घसीटकर यह फिर नीचे ले आई।

यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू
खुद में ही अजनबी की तरह रह रहा है तू
यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू।।

-RockShayar

“नज़र नहीं आता”

कहीं कोई दस्तगीर अब नज़र नहीं आता
शख़्स वो बेनज़ीर अब नज़र नहीं आता।

मंज़िल की ओर चला था, जो एक मुसाफ़िर कभी
खो गया वो राहगीर अब नज़र नहीं आता।

था जिसकी दुआओं में, असर भी शिद्दत भी
कहाँ गया वो फ़क़ीर अब नज़र नहीं आता।

एक अर्से से सींचा जिसे, ज़ख्मों ने अपने लहू से
शायर वो शबगीर अब नज़र नहीं आता।

बिक जाते हैं लोग आजकल, कौड़ियों के भाव में
पहले जैसा ज़मीर अब नज़र नहीं आता।

इंसानियत को सही राह पर ले जाए जो
ऐसा तो कोई मीर अब नज़र नहीं आता।

वतन के रहनुमाओं की मेहरबानी है कि, वतन
पहले जैसा कबीर अब नज़र नहीं आता।

लुट चुकी है मेरे दिल की सल्तनत ‘इरफ़ान’
वारिस न कोई वज़ीर अब नज़र नहीं आता।।

शब्दार्थ:-
दस्तगीर – मददगार
बेनज़ीर – अद्वितीय
शबगीर – रात को इबादत करने वाला
ज़मीर – अंतरात्मा
मीर – नेता
कबीर – महानज़मीर – अंतरात्मा
सल्तनत – साम्राज्य
वारिस – उत्तराधिकारी
वज़ीर – मंत्री

Hey..Bro.. This is for You…

मासूम से उस बचपन से लेकर, नादान इस जवानी तक
अब्बू की साईकिल से लेकर, अम्मी की हर कहानी तक।
हर बार मुझ को ही तो बस, तुम्हारे हिस्से का वो प्यार मिला है
जितना भी हक़ है तुम्हारा, नहीं कभी उतना भी दुलार मिला है।
तुम्हें भी तो, माँ की महफूज़ गोद बहुत अच्छी लगती होगी
तुम्हें भी तो, पापा की हर आदत बहुत सच्ची लगती होगी।
पर अफ़सोस, कि वो प्यार न मिल पाया तुम्हें
क्योंकि कब्ज़ा कर लिया था मैंने, सारा उस पे।
अंदर के उस अधूरेपन ने तुम्हें, खुलकर जीने से रोक दिया है
इसलिए तो खुद को तुमने, ज़िन्दगी की दौड़ में झोंक दिया है।
सबको बहुत चाहते हो, फिर भी इक़रार नहीं कर पाते हो
दिल के बहुत सच्चे हो, हालांकि कभी कभी रूठ जाते हो।
अगर बीते उस दौर में, मैं फिर से जा सकता तो बदल देता वो सब
कोशिश कर रहा हूँ, इससे ज्यादा और कर भी क्या सकता हूँ अब।
दुआ है मेरी ये दिल से कि, तुम्हें तुम्हारा पूरा पूरा हक़ मिले
लिखा है जो भी मुकद्दर में बेशक, बेहतरीन वो रिज़्क़ मिले।।

“पता था”

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तेरी परछाई संभाल कर रखी है मैंने
पता था कि अंधेरा घना होने वाला है।

तुझे ख़बर नहीं थी मेरे आने की
मगर मुझे ख़बर थी तेरे जाने की।

वो पल, जो पल भर के लिए हम को मिले थे
न उनमें कोई शिकवे थे, न उनमें कोई गिले थे।

तेरी आवाज़ सहेज कर रखी है मैंने
पता था कि ख़ामोशी कायम होने वाली है।

तुमने कभी बताया नहीं, कि कौन हो तुम
तफ़्तीश करता रहा, मैं ज़िन्दगी भर यही।

इस बार जब मुलाक़ात होगी, तो पूछूँगा
इस मुलाक़ात में कितने अलविदा छुपे हैं।

हर बार यह अलविदा मेरी जान ही ले लेता है
पता नहीं इसके मुँह, कब मेरा खून लग गया।

तेरी तस्वीर संभाल कर रखी है मैंने
पता था कि याददाश्त जाने वाली है।।

RockShayar

“बहुत सोचने के बाद भी जब कोई नतीजा न निकला”

बहुत सोचने के बाद भी जब कोई नतीजा न निकला
अजनबी राहों पर तब एक राही फिर अकेला ही निकला।

सफ़र की मुश्किलों से वह कभी घबराया नहीं
एक बार क्या गिरा, फिर कभी लड़खड़ाया नहीं।

परेशानियों को इनायत समझता रहा वह
खुद से ही हर घड़ी, खुद उलझता रहा वह।

ख़ामोश होकर वो बेसबर, खुद में सबर तलाशता रहा
ज़िन्दगी की डायरी में, लिखने का हुनर तराशता रहा।

जैसे जैसे मोड़ आते गए, रास्ता खुद-ब-खुद मुड़ता गया
रास्तों के इस तन्हा सफ़र में, हमसफ़र नया जुड़ता गया।

ज़ख्मी होने के बावजूद उसने चलना जारी रखा
नमी होने के बावजूद उसने जलना जारी रखा।

छटपटाने की वो आदत भी फिर धीरे-धीरे छूट गयी
और दर्द की थैली भी हिम्मत के शरारों से फूट गयी।

तमाम कोशिशों के बाद भी जब कोई नतीजा न निकला
अनजान राहों पर तब एक अजनबी फिर अकेला ही निकला।।

#RockShayar

“कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी”

मेरे साथ-साथ मुझ में, उस बच्चे की भी मौत हो गई
कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी, तू इतनी बेरहम क्यों हो गई।

हर बार हर दफा, जो तूने चाहा वही मैंने किया
एक तेरी खुशी के लिए, ज़हर भी हँसकर पिया।

फिर भी एक अर्से से नाराज़ हुए बैठी है
खुशी में भी आजकल, तू उदास रहती है।

मेरे साथ-साथ मुझ में, उस अच्छाई की भी मौत हो गई
कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी, तू इतनी बेरहम क्यों हो गई।

हुई मुझसे ऐसी कौनसी ख़ता, बोल तो सही, कुछ तो बता
मुँह फेर ले तू चाहे मुझसे, मगर पहले थोड़ा हक़ तो जता।

तुझे भी तो मेरी याद आती होगी न, कभी न कभी
तुझे भी तो दर्द महसूस होता होगा न, कहीं न कहीं।

मेरे साथ-साथ मुझ में, उस इंसान की भी मौत हो गई
कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी, तू इतनी बेरहम क्यों हो गई।

खुद को पाने की ज़िद में, सब कुछ कितना बदल गया
अंधेरे से लड़ते लड़ते, वो सूरज भी एक दिन ढ़ल गया।

एक तेरे ही तो इंतज़ार में, मैं अब तक वहीं ठहरा हुआ हूँ
यादों का सब्ज़ जंगल जलाकर, वीरान एक सहरा हुआ हूँ।

मेरे साथ-साथ मुझ में, उस शख़्स की भी मौत हो गई
कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी, तू इतनी बेरहम क्यों हो गई।।

RockShayar