“हम जान भी दे दे तो दुनिया हमें पागल कहती हैं”

वो आँख भी मार दे तो दुनिया पागल हो जाती हैं
हम जान भी दे दे तो दुनिया हमें पागल कहती हैं

 

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“कुछ यादें बस याद की जाती हैं”

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हमारा मिलना कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं, वक़्त का लंबा इंतज़ार था 
एक ऐसा इंतज़ार, मुक़द्दर में जिसके बस इंतज़ार था

तुम समझने की कोशिश करती रही, हर दफ़ा इस बात को
मैं मिटाने की कोशिश करता रहा, अपने अंदर जज़्बात को

मगर पलकों पर जमी कुछ बूंदों ने, सब कुछ बता दिया 
दिल की गहराई में छुपा दिल का राज़, आँखों ने जता दिया

हमारे मिलने पर बारिश का होना, एक इशारा था 
इशारा उस आसमान का, ज़मीं को जिसने संवारा था

कायनात की वो ख़ुशी भी, बादल बनके बरसती थी
घटाओं के संग-संग हवाओं की चूड़ियाँ खनकती थी

याद है तुम्हें! दर्द का वो ठिठुरता हुआ सर्द मौसम
जिसे हमने सुलगती हुई साँसों के सहारे गुज़ारा था

हमारा बिछुड़ना कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं, वक़्त की गहरी साज़िश थी
एक ऐसी साज़िश, जिसका मक़सद हम दोनों की आज़माइश थी

तुम भुलाने की कोशिश करती रही, हर एक याद को
मैं लिखने की कोशिश करता रहा, हर एक जज़्बात को

मगर..कुछ यादें ना भुलाई जाती हैं, ना लिखी जाती हैं
कुछ यादें बस याद की जाती हैं, कुछ यादें बस याद की जाती हैं।

 

“तुझे याद करना ज़ख़्मों पर मरहम की तरह लगता है”

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तुझे याद करना ज़ख़्मों पर मरहम की तरह लगता है
मुझको तेरा चेहरा दिल की क़लम की तरह लगता है

सब कुछ बयां कर देता है, फिर भी कुछ रह जाता है
नज़रों का नज़राना ज़ेहन को वहम की तरह लगता है

बहुत चलना है अभी तो, मुसाफ़िर है तू बहुत दूर का
तभी तुझे तेरा सफ़र किसी हमदम की तरह लगता है

न जाने किस बात पर, नाराज़ बैठी है ज़िंदगी हमसे
खुशियोंभरा हरइक लम्हा इसे किसी ग़म की तरह लगता है

कानों में जब भी पड़ती है, सदाएं गूँजती हैं हर तरफ़
तेरी आवाज़ में हर अल्फ़ाज़ किसी सरगम की तरह लगता है

कौन था मैं, कौन हूँ मैं, और कौन बनने जा रहा हूँ मैं?
तक़दीर का यह तमाशा वक़्त के हसीं सितम की तरह लगता है

सब कुछ भीग जाता हैं, ख़यालों की बेनज़ीर बारिश में
मुझको तेरा एहसास सावन के मौसम की तरह लगता है।

“कल तुम्हारे चेहरे से मिलता हुआ एक चेहरा देखा”

 

कल तुम्हारे चेहरे से मिलता हुआ एक चेहरा देखा
जिसने आँखों से सीधे दिल में उतरने की कोशिश की
ऐसा लगा जैसे उस कोशिश को कामयाब बनाने के लिये 
सारी कायनात ने कोशिश की
कोशिशों की इस कड़ी में, यादों का नाम भी जुड़ गया
यादों में छुपा था जो, वो नाम आँखों से ज़ाहिर हो गया
वक़्त ने इस बार बेवक़्त कैसे मेहरबानी कर दी?
पलकों की छाव तले दिल के आँगन में, मेहमान की मेज़बानी कर दी
जिसे मेहमान समझ रहा है ये दिल, वो कौन है आख़िर?
इसी कशमकश में ज़ेहन तसव्वुर के ताले खोल रहा हैं
बरसों पहले जो शख़्स, संग अपने इनकी चाबियां ले गया था
शायद आज उसी का अक्स, वो चाबियां लौटाने आया है दोबारा
और दिल को ये वहम है कि वो शख़्स यहाँ रहने आ गया है दोबारा 
वहम की यह बेरहम बयानी नज़रों में साफ़ दिख रही हैं
जो अब भी एक अजनबी अक्स में वो शख़्स ढूँढ रही हैं
जिसे देखते ही इन्हें अपने होने का यक़ीन होता था
कल तुम्हारे चेहरे से मिलता एक चेहरा देखा
जिसने आँखों से सीधे दिल में उतरने की कोशिश की
ऐसा लगा जैसे उस कोशिश को अंज़ाम देने के लिये 
सारी कायनात ने कोशिश की

“प्यास लगती तो है मगर कभी बुझती नहीं”

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प्यास लगती तो है मगर कभी बुझती नहीं
बूँदें बनती तो हैं मगर कभी टपकती नहीं।

ये कैसा मुक़द्दर है ज़िंदगी के मौसम का
बारिश होती तो है मगर कभी भिगोती नहीं।।

“मैं बन जाता हूँ हर रोज़ एक इंसान नया”

दिल में उठता है हर रोज़ एक तूफान नया
मैं बन जाता हूँ हर रोज़ एक इंसान नया।

रातभर आँखें जागकर काम करती रहती हैं
तब तामीर होता है ख़्वाबों का एक जहान नया।।

“दिल में क्या है, ज़िंदगी कभी बताती नहीं”

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जहां जताना हो, वहां प्यार जताती नहीं
दिल में क्या है, ज़िंदगी कभी बताती नहीं

एक अर्से तक दिल ने बहुत अंधेरा देखा है
रौशनी से दूरी ज्यादा देर अब सुहाती नहीं

छीलकर रख देती है, दर्द की बेदर्द बयार
रूह को वक़्त की यही फ़ितरत भाती नहीं

हर सफ़र की हमसफ़र हैं, और गवाह भी
मेरी नज़रें मुझसे कभी कुछ छुपाती नहीं

तू क्या गई, सावन भी संग अपने ले गई 
बारिश में भी बारिश आजकल आती नहीं

कई दहलीज़ें लांघ चुका हैं, मन मेरा ये बंजारा
डर की दहलीज़, दरमियान अब आती नहीं

आईना देखा, तो मालूम चला तिलिस्म यह
तेरे बिना तो मुस्कुराहट भी मुस्कुराती नहीं।

“तेरा ख़याल जब भी आता है, मायूस दिल मेरा मुस्कुराता है”

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तेरा ख़याल जब भी आता है, मायूस दिल मेरा मुस्कुराता है
दिल के बिखरे हुए टुकड़ें फिर से जोड़ने को दिल चाहता है

ज़ेहन का ज़ेहन भी, ख़ालीपन से कुछ इस क़दर बेचैन हो चला है
के जिस राह पे काँटें बिछे हो उसी राह पे चलने को दिल चाहता है

ग़ज़ाला की तरह हैं आँखें तेरी, इन पे ग़ज़ल लिखने को दिल चाहता है
क्या जादू हैं इनमें क्या तिलिस्म, इन्हें दिल से पढ़ने को दिल चाहता है

दिल-ए-नादान का हर एक भरम, टूट गया सफ़र के दौरान 
जो ना किया दिल ने अब तक वही करने को दिल चाहता है

रुख़्सत के वक़्त मुझ पर तेरी, कशिश हावी होने लगती है
जाते हुये तुझे बार-बार पलटकर देखने को दिल चाहता है

और कोई हसरत बाक़ी नहीं हैं, और कोई चाहत बाक़ी नहीं हैं 
बस एक ज़िंदगी की ख़ातिर दोबारा जीने को दिल चाहता है

गर्दिशे दौराँ का असर है, या फिर कोई और बात है इरफ़ान 
अपने लिये बनाया हर एक उसूल अब तोड़ने को दिल चाहता है।

“एक सफ़र से मुलाक़ात हुई”

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कई दिनों के बाद आख़िर एक सफ़र से मुलाक़ात हुई
सफ़र नया था, मगर मंज़िल वही थी
जहां कई बरस पहले वक़्त गुज़ार चुका हूँ मैं
आँखों ने कई बदलाव फौरन पहचान लिए
लेकिन ये आँखें अंदर चल रहे बदलाव को लेकर 
अनजान बनने का नाटक करती हैं
आजकल ये आँखें आईने देखते हुये 
किसी और का अक्स दिखाने लग गई हैं

सफ़र में संग नया एक दोस्त भी था 
जिसे देखकर ऐसा लगा मानो ये मैं ही हूँ
बस उम्र का एक फ़ासला दरमियाँ आ गया है

उस दोस्त ने मेरी कई तस्वीरें भी ली
जिन्हें देखकर मुझे अपने अंदर का खालीपन साफ़ नज़र आने लगा
वो पुराना क़िला और इमारतें 
जिन्हें रंग रोगन से नया दिखाने की कोशिश की गई है
मेरी ये तस्वीरें भी कुछ वैसी ही लग रही हैं

दस साल हो चुके हैं, मगर वक़्त अब भी वहीं ठहरा हुआ है
क़िले के चारों ओर बने ऊँचे परकोटे की तरह 
मैंने भी अपने चारों ओर एक परकोटा बना लिया है
जिस पर चढ़कर खुद को महफूज़ रखने का दावा 
आजकल बड़ा ही खोखला सा लगता है

किसी वज़ह से क़िले का दरवाज़ा बंद था
शायद इसीलिये हम वो जगह देख पाये
जहां आमतौर पर कोई नहीं आता जाता है
ठीक वैसे ही अपने दिल का दरवाज़ा बंद करके 
मैंने कई अनजान सफ़र तय किये हैं
अक्सर इस तरह के सफ़र मंज़िल से आज़ाद होते हैं
कई दिनों के बाद आख़िर एक सफ़र की सौगात हुई।

“मैं खुद से ज्यादा आईने में किसी और को निहारता हूँ”

मक़सद को पाने की ख़ातिर, ग़ुर्बत में दिन गुज़ारता हूँ
आग किसने लगाई घर किसने जलाया, सब जानता हूँ।

न जाने किसका तिलिस्म है, जो अब तक नहीं उतरा
मैं खुद से ज्यादा आईने में किसी और को निहारता हूँ।।

 

“बारिश की तरह है एहसास तुम्हारा”

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बारिश की तरह है एहसास तुम्हारा
जब भी आती हो, भिगोकर जाती हो

सीने में समा जाती हैं बौछार तुम्हारी
नज़रों में बसी है तस्वीर यार तुम्हारी

ज़ुल्फ़ की घनेरी घटाएं धूप से बचाती हैं
आँखों की सुनहरी अदाएं आईना बन जाती है

हवा की तरह है एहसास तुम्हारा
जब भी आती हो, छूकर जाती हो

तूफ़ान अपने अंदर छुपाकर प्यार से सहलाती हो
कभी उफनता सागर तो कभी लहर बन जाती हो

दिल के बेचैन बवंडर को पलभर में थाम लेती हो
गगन की नीली बाहों में यूँ पवन बनकर बहती हो

बारिश की तरह है एहसास तुम्हारा
जब भी आती हो, तर करके जाती हो

साँसों में समा जाती है फुहार तुम्हारी
पलकों पे सजी है तस्वीर यार तुम्हारी

टपकती बूँदें फिर से ज़िंदा कर देती हैं
आँखें मूँदें मुझको ये जीना सिखाती हैं

बारिश की तरह है एहसास तुम्हारा
जब भी आती हो, भिगोकर जाती हो।

“इन आँखों ने कई मंज़र देखे हैं, ज़रा संभलकर पढ़ना इन्हें”

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इन आँखों ने कई मंज़र देखे हैं
ज़रा संभलकर पढ़ना इन्हें

अश्क़ों की ओट में, अनगिनत अधूरे अरमान छुपे हैं
पलकों के पर्दों के पीछे, बीते लम्हों के बयान छुपे हैं

कहीं पे बंजर मैदान हैं, तो कहीं पे खंजर के निशान हैं
नज़रों का नज़ाक़ती नूर, दरअसल एक हूर का एहसान हैं

वो जिसकी तस्वीर, तसव्वुर की निगाहों में हैं
वो जिसकी एक झलक, पलकों की पनाहों में हैं

वो जिसका एहसास, हर साँस में समाया है
वो जिसका अंदाज़, मेरे वज़ूद में नुमायां है

वो जिसका चेहरा, आँखों में है ठहरा
वो जिसका रिश्ता, यादों से है गहरा

वो जिसको भुलाने में, ये ज़िन्दगी गुज़र गयी
वो जिसकी तलाश में, ये ज़िन्दगी ठहर गयी

वो जिसका मुझे अब भी इंतज़ार है
वो जिस पर मुझे अब भी ऐतबार है

वो जिसका ख़्वाब हर शब देखती हैं निगाहें
वो जिसका हिजाब हरदम ढूँढती हैं ये बाहें

वो जिसके अलावा, और कोई नहीं है इनमें
वो जिसके अलावा, और कोई नहीं है दिल में

इन आँखों ने कई समंदर बहाये हैं
ज़रा संभलकर दाख़िल होना इनमें।

“मुझको दीदार तेरा, दर्द की रिहाई लगती है”

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धूप में चलता हूँ तो तेरी परछाई बनती है
सूरज की किरणें तेरी अंगड़ाई लगती है

कुदरती है एहसास तेरा, ज़िंदगी है अंदाज़ तेरा
सर्दियों में सुबह की धुंध, तेरी जम्हाई लगती है

हर तरफ ठिठुरता हुआ समा, जाड़ों में काँप रहा है जहां 
गुनगुनी धूप की दस्तक, तेरी रजाई लगती है

ज़ुल्फ़ों के झुरमुट से, झांकता हुआ चेहरा कुछ कहता है
मुझको दीदार तेरा, दर्द की रिहाई लगती है

मर्ज़-ए-मोहब्बत का इलाज है तू, मेरे दिल की आवाज़ है तू
जब भी देखता हूँ, आँखें तेरी दवाई लगती है

बेनज़ीर सी वो बातें, हर जगह ढूंढता है दिल ये
ग़म की ग़मज़दा बातें, दिल को अब परायी लगती है

वक़्त के क़दम फिसल जाते हैं, ज्योंही आगे बढ़ते हैं
ज़हन की झील में यादें तेरी, जमी हुयी काई लगती है

धूप में निकलता हूँ तो तेरी परछाई बनती है
रौशनी अब चुभती नहीं, तेरी अंगड़ाई लगती है

 

“तुम्हारे जाने के बाद वहीं ठहर गया मैं”

 

तुम्हारे जाने के बाद वहीं ठहर गया मैं
उस एक पल को अलविदा ना कह पाया मैं

बहुत मेहनत करनी पड़ी इस दिल को
अपने आप को यह यक़ीन दिलाने में

के तुम तो जा चुकी हो, उस एक पल में मीलों दूर 
मगर दिल का क्या है, दिल तो ठहरा दिल आख़िर

यह उस एक पल की ख़ातिर, कई कल क़ुर्बान कर दे
और अगर ज़िद पर आ जाये, तो हर मुश्किल आसान कर दे

जाते वक़्त तुम्हारी खुशबू ने बहुत बेचैन किया मुझे
तुम तो चली गयी, मगर यह वहीँ पर ठहर गयी

मैंने तुम्हारी खुशबू का एक हिस्सा, यादों में सहेजकर रख लिया
डर था मुझको बस यही, तुम्हारी तरह यह भी ना खो जाये कहीं
 
तुम्हारे साये का पीछा करते हुए, राह में कई साये मिले
कुछ ऐसे साये, रास्तों से ज्यादा जिन्हें मंज़िल प्यारी थी

तुम्हारे जाने के बाद वहीँ थम गया मैं
ना लबों से ना दिल से अलविदा कह पाया मैं।

“तेरी भीगी हुई ज़ुल्फ़ों की लट”

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तेरी भीगी हुई ज़ुल्फ़ों की लट
जब भी मेरे चेहरे पर गिरती है

माथे की शिकन, आँखों की थकन 
पलभर में गायब हो जाती है

इस राज़ को समझने को कोशिश करना
ज़हन की नासमझी की एक निशानी है

इस एहसास को अपनी बाँहों में भरना
दिल की तिश्नगी की बेनज़ीर बयानी है

तेरी घनी ज़ुल्फ़ें तसव्वुर का साया बन जाती हैं
धूप से महफूज़ रखती हैं, ये छाया बन जाती हैं

इस अंदाज़ को सीखने की कोशिश करना 
दिमाग़ की नादानी की एक निशानी है

इस एहसास को महसूस करना
दिल की दिलकश खुशनुमा ज़िंदगानी है

तेरे गीले-गीले गेसुओं की घटा,
जब भी मेरे चेहरे पर बरसती है

माथे की शिकन, पलकों की थकन
पलभर में छू मंतर हो जाती है।

“गैरों के लिए अपना और अपने लिए पराया बन गया”

साये का पीछा करते-करते खुद एक साया बन गया
अपनी छाया पीछे छोड़कर किसी और की छाया बन गया

सफ़र की दर बदर दास्तान, हमसे ना पूछो इरफ़ान
गैरों के लिए अपना और अपने लिए पराया बन गया।


 

“तेरी आँखों से गिरे चंद क़तरे संभालकर रखे हैं मैंने”

तेरी आँखों से गिरे चंद क़तरे
संभालकर रखे हैं मैंने
अपनी आँखों के ऊपर
इस डर से पलकें झपकता नहीं
गिर ना जाये वो कहीं
संग उन ख़्वाबों को लेकर
जो देखे हैं हमने साथ में
जो महकते हैं मुलाक़ात में
जो बरसते हैं बरसात में
जो रहते हैं जज़्बात में
जो बसते हैं हर साँस में

इन क़तरों में रुख़्सत के वो पल नज़र आते हैं
जिन पलों में कुछ भी नज़र नहीं आता है
सिवाय फिर मिलने की आस के
अधूरी एक प्यास के
अलविदा एहसास के
आँखों की अरदास के

तेरी आँखों से गिरे चंद क़तरे
सहेजकर रखे हैं मैंने
अपनी आँखों के ऊपर
इस डर से पलकें झपकता नहीं
बह ना जाये वो कहीं
संग उन लम्हों को लेकर
जिनमें हरघड़ी तू मेरे साथ है
जिनमें हरपल तू मेरे पास है।

“सोच को अमल में लाने की कोशिश करता हूँ”

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सोच को अमल में लाने की कोशिश करता हूँ
मैं खुद को खोकर खुद को पाने की कोशिश करता हूँ

दुनिया तो तोहमते लगाती आयी हैं, लगाती रहेगी
मैं टूटने से पहले हर रिश्ते को निभाने की कोशिश करता हूँ

मुद्दत से सफ़र में हूँ, थकने लगे हैं पैर आजकल
मैं थके हुए पैरों को फिर से चलाने की कोशिश करता हूँ

जब तक परवाह करता हूँ, बेपरवाह होकर करता हूँ
मैं नाराज़ होकर अक्सर हक़ जताने की कोशिश करता हूँ

वक़्त का तूफ़ान आकर, बिखेरता है जब भी मुझे
मैं धीरे-धीरे फिर से अपने क़दम जमाने की कोशिश करता हूँ

वज़ूद को चट्टान बनाकर, रहना उसमें बहुत मुश्किल है
मैं बेदर्द बन चुके दर्द को पिघलाने की कोशिश करता हूँ

लफ़्ज़ों से मेरा रिश्ता, लफ़्ज़ों में बयां नहीं हो सकता
मैं क्या सोचता हूँ बस यही बताने की कोशिश करता हूँ।

“मैं ठहरा लफ़्फ़ाज़ी लौहार, वज़्नी हर्फ़ के हथौड़े चलाता हूँ”

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काग़ज़ के कोरे-कोरे मैदान पर, अक़्ल के घोड़े दौड़ाता हूँ
मैं ठहरा लफ़्फ़ाज़ी लौहार, वज़्नी हर्फ़ के हथौड़े चलाता हूँ

साँसों की धौंकनी अंदर की आग को भड़काती है
एहसास की रौशनी अनदेखा सा कुछ दिखाती है

आहों से निकलता धुआँ नज़र नहीं आता है
यादों का पिघलता लोहा पल में जम जाता है

ना जाने कौनसी शक़्ल इख़्तियार करेगा, इसे भी नहीं पता
यह किस औज़ार की नस्ल तैयार करेगा, इसे भी नहीं पता

तपिश और वर्ज़िश के चलते, ज़हन भी थक जाता है
ख़लिश और गर्दिश के चलते, धूल से ये ढक जाता है

मेहनतकश मन के लिये ख़ुराक़ हैं ख़याल
सेहतमंद सोच के लिये क़िताब हैं ख़याल

दर्द की भट्टी में आँच तेज़ करते वक़्त, ये हाथ जल जाते हैं
क़लम की धार को तेज़ करते वक़्त, नर्म जज़्बात छिल जाते हैं

तसव्वुर के तारीक़ तहखाने में, हक़ीक़त के शोले भड़काता हूँ
मैं ठहरा लफ़्फ़ाज़ी लौहार, वज़्नी हर्फ़ के हथौड़े चलाता हूँ।

“रात को जब भी हवायें चलती हैं”

रात को जब भी हवायें चलती हैं
तुम्हारे क़दमों की आहट सुनाई देती है

ये हवायें मुझको अपने साथ ले जाती हैं
बादलों के पार आसमान की सैर कराती हैं

मैं किसी परिंदे सा उड़ने लगता हूँ
मन के गगन की ऊँचाई छूने लगता हूँ

ये बादल रूई के ढेर जैसे लगते हैं
तुझको छूते ही बरसने लगते हैं

मैं प्यासी ज़मीन सा टपकते लम्हों की राह देखता हूँ
बस एक क़तरे की आस में पल-पल तरसता हूँ

क़तरा भी वो जो रूह को तर कर दे
लम्हा भी वो जो शाम को सहर कर दे

रात को जब भी हवायें चलती हैं
तुम्हारे मन की मुस्कुराहट दिखाई देती है

ये हवायें मुझको अपने साथ ले जाती हैं
बादलों के पार ख़्वाबों का इक नया जहां दिखाती हैं

रातभर यादों का वास्ता देकर नींद को जगाती हैं
ख़ामोशी में रूपोश है जो, वो आवाज़ देकर तुम्हें बुलाती हैं।

“अलविदा”

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नया दौर तभी आता है, जब पुराना दौर चला जाता है
खुशी और ग़म के इस अमलगम को अलविदा कहा जाता है

दिलों दिमाग़ दोनों हक्के-बक्के रह जाते हैं
समय के अभिनय को वो समझ नहीं पाते हैं

किसी के चले जाने के बाद ही उसकी कमी ख़लती है
दूरियों का ये दस्तूर भी खुद वक़्त के हाथों मज़बूर है

आना-जाना तो ज़िंदगी के चलते रहने की कहानी है
और चलते रहना ही इसके ज़िंदा होने की निशानी है

दोनों ही सूरतों में एक वक़्त ही तो है जो गुज़र जाता है
बाक़ी तो हरएक पल दिल बीती बातों का घर बनाता है

खुशी क्या है, ग़म क्या है, हँसी क्या है, मातम क्या है
ये सब तो सिर्फ जज़्बातों के हाथों की कठपुतलियां हैं

अलविदा कहते हुये अक्सर यह ज़बान लड़खड़ा जाती है
वज़्नी हर्फ़ बोलने का शर्फ़, ठीक उसी वक़्त भूल जाती है

मुलाक़ात से ज्यादा हमेशा रुख़्सत पर ध्यान क्यों दिया जाता है
वक़्त को बार-बार उसके वक़्त होने का एहसास कराया जाता है

इस बार अलविदा को ही अलविदा कहने की सोच रहा हूँ
खुद को पहले से ज्यादा अलहदा बनाने की सोच रहा हूँ।

“मैं आजकल ज़िंदगी जी रहा हूँ”

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बासी लम्हों को पीछे छोड़कर
ताज़ा हवा में साँस ले रहा हूँ
खुद से किये वादे निभा रहा हूँ
मैं आजकल ज़िंदगी जी रहा हूँ

मन की अर्ज़ी सुनकर, मनमर्ज़ी करने लगा हूँ
उधड़ी क़िस्मत सीने, दिल से दर्ज़ी बन गया हूँ

ज़र्रा भी फ़र्क़ नहीं पड़ता, चाहे कोई कुछ भी कहे
आज़ाद हो चुकी हैं राहें, दरिया के जैसे ये अब बहे

दिल की गली को रोशन करके
खुली आँखों से ख़्वाब देख रहा हूँ
आसमां छूने के इरादे बना रहा हूँ
मैं आजकल ज़िंदगी जी रहा हूँ

आज मैं जीने की आदत ने, कल को भुलाने में साथ दिया
फिसलकर जब भी गिरा, अपने साये ने हमेशा हाथ दिया

वक़्त से जो भी वक़्त मिला, उसे जी लिया
दर्द को हमदर्द मानकर, गले से लगा लिया

बासी लम्हों को पीछे छोड़कर
ताज़ा हवा में साँस ले रहा हूँ
खुद से किये वादे निभा रहा हूँ
मैं आजकल ज़िंदगी जी रहा हूँ।

“तेरी यादों का एक पुतला बनाया मैंने”

तेरी यादों का एक पुतला बनाया मैंने
 दिल के घर से हर जंगला हटाया मैंने

तू ऐसी गयी, के फिर लौटकर ना आयी
 तेरी याद में यादों का डेरा लगाया मैंने

याद है वो अपना मिलना, बारिश का होना
 बाद में जिसे जलना था वही हिस्सा भिगाया मैंने

तुमको क्या पता, मेरे साथ क्या-क्या हुआ
 खुद को ही भूल बैठा, खुद को इतना सताया मैंने

इंतज़ार की हद गुज़री, पर ना गुज़री वो रात
 नागवार उस रात में हर जज़्बात मिटाया मैंने

मेरी मोहब्बत पे नाज़ करने वाली, कहाँ खो गयी तू
 तुझे याद कर-करके हिज़्र का हर एक लम्हा बिताया मैंने

बहाकर न ले जाये कभी, गलती से अपने साथ कहीं
 अश्क़ों से छुपाकर आँखों में तेरा सपना सजाया मैंने

मिलने का इरादा हो तो, चले आना कभी भी
 यादों की पहाड़ी पर घर अपना बनाया मैंने।

 

“पानी का जो रंग है, वही मेरा रंग है”

पानी का जो रंग है, वही मेरा रंग है
मिट्टी सा मटमैला, हवाओं सा मलंग है

ज्यादा देर एक जगह रुकता हूँ तो काई जम जाती है
मुझमें किसी और की परछाई नज़र आती है

पानी का जो ढंग है, वही मेरा ढंग है
बर्फ़ सा सख़्त, भाप सा पतंग है

रहने-बहने को जो मिल जाये उसी में ढल जाता हूँ
मैं एहसास की गर्मी पाकर पिघल जाता हूँ

पानी का जो रंग है, वही मेरा रंग है 
आकाश सा नीला, बादलों सा बदरंग है

नदी तालाब झील समंदर, क्या कुछ नहीं है मेरे अंदर
जितना बाहर फैला हुआ हूँ, उतना ही मैं गहरा हूँ अंदर

पानी का जो रंग है, वही मेरा रंग है
मिट्टी सा मटमैला, हवाओं सा मलंग है।

“चलते रहना ही ज़िंदगी है”

 

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हर तरफ घना कोहरा है
कुछ भी नज़र नहीं आ रहा है

ऐसे वक़्त में आगे बढ़ना बहुत मुश्किल है
लेकिन मुश्किल के ठीक आगे खड़ी मंज़िल है

धीरे-धीरे क़दमों को आगे बढ़ाना है
धुंध में चलने का एक यही सलीक़ा है

जब कुछ भी नज़र ना आये
तब चलते रहना ही बेहतर है

कई बार वक़्त को भी वक़्त लगता है
नूर का दरख़्त बनने में, धुंध छटने में

जब सोचने-समझने की आदत काम ना आये
तब क़दमों के चलने की आदत ही काम आती है

कोहरे का असर ज्यादा देर नहीं रहता है
रौशनी के आते ही यह गायब हो जाता है

धुंध में एक बात सीखी है
चलते रहना ही ज़िंदगी है।

“तुम यहीं हो कहीं”

मैं अब भी उस बारिश का इंतज़ार कर रहा हूँ
जिसका होना हमारे मिलने का इशारा होता था

तुम्हें याद है एक दिन मैंने एक दीवानगी की थी
जिस दिन तुम बारिश में पूरी तरह भीग गयी थी
और मैं उस बरसती बारिश में तुम्हें बाइक पर लेने आया था
उन गीले कपड़ों को मैंने कई दिनों तक सूखने नहीं दिया था
जिनमें तुम्हारी खुशबू ठहर गयी थी
उस पल दिल में एक लहर उठी थी

मैं अब भी उस लहर का इंतज़ार कर रहा हूँ
जिसका उठना तुम्हारे आस-पास होने का इशारा होता था

तुम्हें याद है तुमने मुझे एक बार अपना स्कार्फ दिया था
जिसको छूने पर मुझे तुम्हारा वो चेहरा महसूस हुआ था
जिसके महीन रेशों में तुम्हारी ज़ुल्फ़ों का साया छुपा था
जिसके पश्मीना धागों में तुमने अपना एहसास बुना था
बाइक चलाते हुये अक्सर जिसे मैं मुँह पर बाँध लेता था
तब ऐसा लगता मानों तुम मुझे साँसें दे रही हो
और सर्दियों में जब उसे अपने गले में बाँधता
तब ऐसा लगता मानों तुमसे गले मिल रहा हूँ

मैं अब भी उस एहसास का इंतज़ार कर रहा हूँ 
जिसका होना फिर से मिलने का इशारा होता है

आज फिर वही बारिश हो रही है
फिर वही लहर उठ रही है
फिर वही एहसास हो रहा है
के तुम यहीं हो कहीं, मुझमें हो छुपी
तुम यहीं हो कहीं, मुझमें हो बसी।

“निगाहें क़दमों को रोकने की कोशिश करती हैं”

जाते वक़्त पलटकर ना देखा करो
निगाहें क़दमों को रोकने की कोशिश करती हैं

रुख़्सत के वक़्त अलविदा कहना, 
पल में पलकों को गीला कर देना
हो न हो मुझे यह वक़्त की साज़िश लगती है

तुझे याद करने का बहाना,
इतना हसीन है ये फ़साना
के भरी दोपहरी में बेमौसम बारिश बरसती है

वैसे तो ज़िंदगी को फ़ुर्सत नहीं, 
ज्यादा किसी से ये मिलती नहीं
पर जब भी मिलती है जीने की गुज़ारिश करती है

नज़रों की इतनी ख़ता हैं, 
नज़रें तो दिल का पता हैं
बिछुड़ते वक़्त फिर से मिलने की ख़ाहिश रखती हैं

चार दिन की ज़िंदगी,
रूह की यह तिश्नगी
रब से थोड़ी और मोहलत की सिफ़ारिश करती है

कहीं कोई कमी न रह जाये, 
घाव कोई ज़ख़्मी न रह जाये
हर बार हर कोशिश बस यही कोशिश करती है।

“तलाश”

 

तलाश कभी भी ख़त्म नहीं होती है
तलाश तो बस सोच की एक किस्म होती है

तक़दीर के पन्नों पर कई सवाल लिखती है
तलाश तो खुद अपने बारे में सवाल करती है

भीड़ में अक्सर गुम हो जाती है
तलाश में आँखें नम हो जाती हैं

हर जगह ना जाने क्या ढूँढती है
तलाश तो बस खोयी हुयी एक आस ढूँढती है

हक़ीक़त जानना ही नहीं चाहती है
तलाश तो बस तलाश रहना चाहती है

पानी पर चलने का वहम पैदा करती है
तलाश तो खुद अपने क़दमों के निशां छोड़ती है

तलाश कभी भी पूरी नहीं होती है
तलाश तो बस मन की अधूरी प्यास होती है।

 

“क्या बादलों पे चलना चाहते हो”

क्या बादलों पे चलना चाहते हो
तुम गिरके फिर संभलना चाहते हो

तो खोल दो अपने वो पंख सारे
गर परिंदों के जैसे उड़ना चाहते हो

पहले अपने दिल को रौशन करो
गर रौशनी के जैसे दिखना चाहते हो

बेतहाशा सब्र रखो और दर्द चखो
गर आग के जैसे जलना चाहते हो

मिटा दो मन के अँधेरे वो सारे
गर सूरज के जैसे बनना चाहते हो

थमना नहीं है कहीं, बात यही है सही
गर सफ़र के जैसे चलना चाहते हो

ज़िन्दगी को हँसकर गले लगाओ, नाचो गाओ ख़ुशी मनाओ
गर ज़िन्दगी के जैसे जीना चाहते हो।

“दिल की बेचैनी का अक्स अश्क़ों में नज़र आता है”

यह किसका असर है जो लफ़्ज़ों में नज़र आता है
दिल की बेचैनी का अक्स अश्क़ों में नज़र आता है

बारिश को बाहों में भरकर भी जो प्यासा रहता है
बेसब्र सा वो अब्र तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में नज़र आता है

कभी पल में गुज़र जाता है, कभी गुज़रता ही नहीं
वक़्त का यह हसीं सितम किश्तों में नज़र आता है

तक़्दीर का एक तूफ़ान, सब कुछ तबाह कर गया
दिल का दरख़्त उजड़ा कई हिस्सों में नज़र आता है

जिन रिश्तों की बुनियाद, यक़ीन पर टिकी होती हैं
अपनेपन का एहसास उन रिश्तों में नज़र आता है

ये दुनियावाले हैं, दुनियादारी की ही बातें करेंगे
रूह का साया भी इन्हें तो जिस्मों में नज़र आता है

शायर की डायरी में, छुपे हैं कई अनछुए से जज़्बात
बंजर दिल का मंज़र उसकी नज़्मों में नज़र आता है।

 

 

 

 

 

 

“मुझमें है जो मेरा उसे कहीं और ढूँढता हूँ”

 

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मुझमें है जो मेरा उसे कहीं और ढूँढता हूँ
मैं गुमशुदा राहों से अपना पता पूछता हूँ

हक़ीक़त से मुझको रूबरू कराने वाले
मैं ख़्वाब में भी तेरा ख़्वाब देखता हूँ

करने को तो बहुत कुछ हैं, इस दुनिया में मगर
दिल लगे जिसमें काम मैं वही करता हूँ

सुनने में अजीब है, लेकिन सच यही है
मैं अनजानों से नहीं अपनों से डरता हूँ

दूर है मंज़िल पास है मुश्किल, इसलिये
सफ़र के लिये कुछ साँसें बचाके रखता हूँ

चलना बेहद ज़रूरी है, रुकना तो खुद एक दूरी है
मैं बिना रुके बेसबब बस चलता रहता हूँ

सवालों के सफ़र में जवाब बस यही मिला
मुझमें है जो मेरा उसे कोई और कहता हूँ।

“वो रास्ता”

जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं
तब एक रास्ता खुलता है
देखने में जो अजनबी लगता है
पर वो रास्ता इंतज़ार करता है
हमारा और हम उसका
दोनों की मुलाक़ात कब होगी कोई नहीं जानता।

ज़िंदगी की भूल भुलय्या में कई रास्ते हैं
आने-जाने के लिये
लेकिन सही रास्ता कौनसा हैं
यह तो उस पर चलने के बाद ही पता चलता है।

क़दमों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
इस बात से के रास्ता कौनसा हैं
ये तो बस चलना जानते हैं
आगे बढ़ना जानते हैं।

सो मैंने भी इस बार क़दमों को रुकने नहीं दिया
बल्कि चलने दिया
आगे बढ़ने दिया
अपना रास्ता खुद चुनने दिया
शायद वो इंतज़ार ख़त्म होने वाला है
मेरा और मेरे रास्ते का।

“मन तो मन है बेवज़ह सोचता है”

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क्या चाहता है ये क्या बोलता है
मन तो मन है बेवज़ह सोचता है

पल में राज़ी पल में उदास
नहीं रहता इसे होशो हवास

समझदार होकर भी नादान है, ये खुद से ही परेशान है
सबकी ख़बर रखने वाला ये मन खुद से ही अनजान है

प्यार भी यही है, तक़रार भी यही है
ना उतरे जो वो खुमार भी यही है

आवारा होके हर जगह घूमता है
मन तो मन है बेवज़ह झूमता है

बेकाबू मन को जिसने भी काबू किया
दिलो दिमाग़ पर उसी ने जादू किया

अभी इधर तो अभी उधर
नहीं इसकी कोई अपनी डगर

बंजारा बनके यहाँ वहाँ डोलता है
मन तो मन है बेवज़ह सोचता है।

“कुछ ऐसे मिले वो हमसे के हमारी दुनिया बन गये”

कुछ लम्हे लम्हे ही रहे, कुछ लम्हे सदियाँ बन गये
कुछ ऐसे मिले वो हमसे के हमारी दुनिया बन गये

कई दिनों से इंतज़ार, कर रही है ज़िंदगी धूप का
रंजो ग़म में डूबे लम्हे ठिठुरती हुई सर्दियाँ बन गये

हिज़्र-ए-दिलबर का असर, दिल पर कुछ ऐसा हुआ
के नज़रों के ख़ामोश ख़त बहती हुई नदियाँ बन गये

नज़र नहीं आता कुछ भी, दिल को अपने ही घर में
दर्द से सराबोर अल्फ़ाज़ दिल की अँखियाँ बन गये

सालों बीत गए हैं, नींद को सोये हुए, नैनों को रोये हुए
बचाकर रखे जो ख़्वाब वो नींद का तकिया बन गये

पहले जिससे मोहब्बत थी, उससे अब नफ़रत हो गई
दिल के सब अरमान मानो जलता हुआ दिया बन गये

दोनों ने बहुत कोशिश की, रिश्ते को बचाने की खातिर
पता नहीं ऐसा क्या हुआ जो फ़ासले दरमियाँ बन गये।

 

 

 

 

 

“किसे होता यहाँ खुद पे गुमान नहीं”

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यह तज़ुर्बा भी इतना आसान नहीं
किसे होता यहाँ खुद पे गुमान नहीं

किराये की बस्ती है, ये दुनिया ये महफ़िल
यहाँ किसी का अपना मकान नहीं

चुरा के शख़्सियत, पहन लेता हूँ अक्सर
मेरी अपनी कोई पहचान नहीं

पहले लुटा, फिर टूटा, फिर रूठा
दिल अब पहले सा नादान नहीं

हँसते हुये जलना, सीख लिया है इसने
यूँ होता आजकल परेशान नहीं

चंद पल मिले हैं, गुज़र जायेंगे
मेहमान हैं ये पल मेजबान नहीं

तीर तो तैयार है कब से, दिल चीरने को
कसी हुई मगर नज़रों की कमान नहीं।

“कई दिनों से दिल में एक बात है”

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कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से खामोश जज़्बात हैं

कई दिनों से आँखें सोई नहीं हैं
कई दिनों से आँखें रोई नहीं हैं

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से बंजर ये बरसात है

कई दिनों से यादें याद आ रही हैं
कई दिनों से यादें दिल जला रही हैं

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से बेचैन यह रात है

कई दिनों से सुकून खो गया है
कई दिनों से जुनून गुमशुदा है

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से गुमसुम आवाज़ है

कई दिनों से मैं कहीं और हूँ
कई दिनों से मैं कोई और हूँ

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से बेअसर अल्फ़ाज़ हैं

कई दिनों से सफ़र की सोच रहा हूँ
कई दिनों से लहर को खोज रहा हूँ

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से अजनबी अंदाज़ है

कई दिनों से साँस नहीं ले पा रहा हूँ
कई दिनों से कुछ नहीं कह पा रहा हूँ

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से मुसल्सल ये रात है

कई दिनों से सूरज निकला नहीं है
कई दिनों से वक़्त ये बदला नहीं है

शायद इसीलिए मैं बदल गया
और वक़्त वहीँ पर ठहर गया

खुद को बदलने की कोशिश में
दिल का कच्चा घर जल गया

ज़हन की सयानी साज़िश में
दिल का बच्चा घर जल गया

कई दिनों से दिल में एक बात है
लगता है वही मेरी असल ज़ात है

एक बात जो अब हर घड़ी मेरे साथ है
एक बात जो अब हर पल मेरे पास है।

“जाड़ो का जादुई मौसम”

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जाड़ो का जादुई मौसम जब भी आता है
काँपती हुई आवाज़ में कई किस्से सुनाता है

गर सारे किस्से सुनने हैं तो बस यही शर्त है
आखिरी शेर में कही गई बात मानना फर्ज़ है

तो चलिये दोस्तों, आज ये बर्फानी एहसास करते हैं
सिर से पांव तक जमे हुये, कुछ जज़्बात खरोंचते हैं

गुनगुनी धूप की राह, दिनभर जो तकते हैं
तन और मन दोनों ही, यूँ थरथर काँपते हैं

ऐसे सर्द आलम में, इक तुम्हारा एहसास ही है
जो मुझे गर्माहट देता है, खुद में समेट लेता है

जाड़ो का जादुई मौसम जब भी आता है
काँपती हुई आवाज़ में कई किस्से सुनाता है

चाय की चुस्की लाज़िमी है ऐसे मौसम में
नहाने से दूरी बहुत ज़रूरी है ऐसे आलम में

मुँह से भाप का निकलना कुछ ऐसे लगता है
जैसे साँसों की रेल चल रही हो छुकछुक करके

जहाँ एक ओर रजाई से प्यारी चीज कोई नहीं लगती है
वही दूसरी ओर मोबाइल की बैट्री खत्म हो रही होती है

जाड़ो का जादुई मौसम जब भी आता है
काँपती हुई आवाज़ में कई किस्से सुनाता है

गोंद तिल के लड्डू, गुड़ गजक चिक्की मूंगफली
सर्दियों में एक बार तो आईसक्रीम है ज़रूर खानी

यह अलग बात है कि बाद में यह गला बैठ जायेगा
और जब विंटर का हंटर चलेगा तो यह भर आयेगा

जाड़ो का जादुई मौसम जब भी आता है
काँपती हुई आवाज़ में कई किस्से सुनाता है

तो कैसा लगा यह सर्द फ़साना
ठिठुरते लफ़्ज़ों का ताना-बाना

अब नहीं चलेगा कोई बहाना
अब तो पड़ेगा आपको नहाना

यही शर्त है इसे अब निभाना
बाथरूम में तराना यह गाना

जाड़ो का जादुई मौसम है awesome
जाड़ो का जादुई मौसम है awesome…

 

 

“एक दिन मेरे लिए बहुत तरसोगे तुम”

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याद रखना, एक दिन मेरे लिए बहुत तरसोगे तुम
वक़्त रहते क्यों नहीं समझे, खुद से ये कहोगे तुम

यूँही नहीं कह रहा हूँ, लिख लो तुम यह बात मेरी
एकदम से नहीं, यूँ धीरे-धीरे मुझ को खो दोगे तुम

झाड़कर वक़्त की धूल, न पाओगे तुम मुझ को भूल
दबे हैं जो दर्द डायरी में कहीं, कभी तो पढ़ोगे तुम 

अभी तो ठुकरा रहो हो, ठुकरा लो कोई बात नहीं
बाद में मुझे ही याद करके, तन्हाई में रोओगे तुम

सताएगी जब बैचैनी तुम्हें, मिलेगा नहीं चैन तुम्हें
रात रातभर जागकर, यूँ इधर-उधर टहलोगे तुम 

पहले लहू टकपने लगेगा, फिर दिल धड़कने लगेगा
ज़ख्मों को जब भी, यादों के नश्तर से छुओगे तुम

महसूस करो या न करो, पर इतना ज़रूर जान लो
हरजगह हरघड़ी, फ़क़त मुझ को ही पाओगे तुम।

“बर्फ़ से ढके हुये पहाड़ मुस्कुरा उठते हैं”

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बर्फ़ से ढके हुये पहाड़ मुस्कुरा उठते हैं
जब भी इनसे कोई मिलने आता है

यह अलग बात है कि लोग यहाँ पर घूमने आते हैं
पर इन्हें लगता हैं, इनका हालचाल पूछने आते हैं

सर्दियों में सूरज से इनकी दोस्ती हो जाती है
इसी ख़ुशी में शबनम की बूँदें छलक आती हैं

बर्फ़ की सफ़ेद चादर के नीचे एक और चादर है
तन्हाई की काली चादर, दर्द छुपाने की ख़ातिर

पहाड़ों पर जो पेड़ हैं, वो तिरछे से लगते हैं
शायद वो काली चादर को चूमना चाहते हैं

बरसों से जिसने इन्हें आपस में बांध रखा हैं
बिना किसी डोर के, ख़ामोश से उस शोर से

बर्फ़ से लदे हुये पहाड़ मुस्कुरा उठते हैं
जब भी इन पे कोई क़दम रखता है

यह अलग बात है कि वो ऊपर चढ़ता है
पर इन्हें लगता है ये नीचे उतर रहे हैं

बर्फ़ से ढके हुये पहाड़ मुस्कुरा उठते हैं
जब भी इनसे कोई मिलने आता है।

“मेरी नज़र से खुद को देख”

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सच्चे दिल का यक़ीं है तू, आसमां की ज़मीं है तू
मेरी नज़र से खुद को देख, हुस्न से भी हसीं है तू

तेरी शोख़ियों पर खुद चाँद भी फ़िदा है
तेरी आँखों पर सारी कायनात शैदा है

तेरे रुख़सार पर जो हया रहती है
तेरी तारीफ़ वही तो बयां करती है

लरज़ते हुए लबों के पास, वो जो एक काला तिल है
नज़र न लगे किसी की, इस दुआ में वो शामिल है

ज़िंदगी की कड़ी धूप से बचने को
तेरे गेसुओं की घनी छाँव काफी है

दीदार को मुन्तज़िर हैं कब से ये निगाहें
करवटें बदलती रहती हैं अक्सर ये बाहें

मुद्दत हो गई है जानाँ पलकों से पलकें मिलाये
आओ ना फिर से एक बार हम ज़िंदा हो जाये

जो सोचा वही है तू, दूर नहीं यहीं कहीं है तू
मेरी नज़र से खुद को देख, मुझमें बसी है तू।

“तुम मेरा सफ़र हो”

वादियों के जहान में रहने वाली, क्या तुझे मैं याद नहीं
ऐसा तो कोई लम्हा नहीं, जिसमें तू होती मेरे साथ नहीं

यह बात अलग है कि मोहब्बत मेरी इकतरफ़ा है
मगर यह क्या कम है कि अंदाज़ मेरा अलहदा है

बहुत दिन हो गये हैं, ख़्वाब में भी तुम्हारा ख़्वाब नहीं आया
बिना बहाने के भी कभी-कभी मुलाक़ात हो सकती है, हैं ना !

न कोई तसव्वुर पे बंदिश, न कोई ख़यालों में जुंबिश
कोई तो इशारा दो, चाहे वो गुज़ारिश या हो वो बारिश

बेनज़ीर सी वो बातें, मुझे तो अब तक सब याद हैं
यह अलग बात है कि तुम्हें मेरी याद ही नहीं आती

न शाम में हो न सहर में हो, मालूम नहीं किधर को हो
आख़िर मैंने भी यह मान लिया, कि तुम मेरा सफ़र हो
आख़िर मैंने भी यह जान लिया, कि तुम मेरा सफ़र हो

मेरे दिल के घर में रहने वाली, क्या तुझे मैं याद नहीं
ऐसा तो कोई पल नहीं, जिसमें तू होती मेरे साथ नहीं।

 

“तेरी मुस्कुराहट से भरा वो हर इक लम्हा”

तेरी मुस्कुराहट से भरा वो हर इक लम्हा
जो मैंने अपनी आँखों में संभालकर रखा है
आजकल मेरी तन्हाई का साथी है।

कई बार अश्क़ों ने कोशिश की हैं
इसे अपने साथ बहा ले जाने की
मगर हर बार ये नाकाम ही रहे
जब भी उदास होता हूँ, इसे पहन लेता हूँ।

चेहरे पर जितने भी चेहरे लगाए हैं मैंने
वो सब चेहरे
तेरा चेहरा याद आते ही एक जैसे हो जाते हैं
कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आता फिर उनमें
फ़र्क़ नज़र आये भी तो कैसे
आँखें भी आख़िर मन की आँखें जो ठहरी।

तेरी मुस्कुराहट से भरा वो हर इक लम्हा
जो मैंने अपनी यादों में संभालकर रखा है
आजकल मेरी तन्हाई का साथी है।

 

“मन की अतरंगी सतरंगी दुनिया”

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एक बुलबुले की तरह है, मन की यह अतरंगी दुनिया 
जो कि सरगोशी के साबुन से सतरंगी छल्ले बनाती है

थोड़ी देर को ही सही यह ज़िंदगी के कई रंग दिखाती है
मासूम बच्चे की तरह मुँह बनाती है और फिर चिढ़ाती है

मन के इन सतरंगी बुलबुलों की कहानी बहुत ही छोटी है
इतनी छोटी के सिर्फ मन की आँखों से ही नज़र आती है

अपने दम पे फैसले बदलने की कुव्वत रखते हैं मन के छल्ले ये
मन की सुनते हैं मन की करते हैं, ये रहते हैं मन के मोहल्ले में

पल में बनते हैं पल में बिगड़ते हैं
रोज़ नहीं कभी-कभी ही बनते हैं

मनचले बुलबुले की तरह है मन की यह हसीन दुनिया
जो कि मदहोशी के साबुन से सतरंगी छल्ले बनाती है

थोड़ी देर को ही सही यह लाइफ के कई कलर्स दिखाती है
किसी नाज़नीन के जैसे दिल को लुभाती है अपना बनाती है

मन के इन सतरंगी बुलबुलों का सफ़र बहुत ही मुख़्तसर होता है
इतना मुख़्तसर के जिसे सिर्फ मन की आँखें ही तय कर पाती हैं।।

“नेक दिल का दिल न तोड़ना कभी”

नेक दिल का दिल न तोड़ना कभी
एक उम्र गुज़र जाती है मातम मनाने में

दिल तोड़ने का हसीं तमाशा तो सदियों से चला आ रहा है
ये कोई आज की बात नहीं, ये तो बरसों से चला आ रहा है

जब भी कोई दिल टूटता है, खुद से और ज्यादा जुड़ता है
बरसों से एक यही तो नुस्खा है दिल का दिल बहलाने का

नेक राह के मुसाफ़िर को न छेड़ना कभी
एक भूल हज़ारों ज़िंदगियाँ बर्बाद कर देती हैं

साज़िश का शिकार भी अमूमन वही होता है
वो जो सबको साथ लेकर चलता है

सबको खुश रखने की चाह में 
अपने लिये वो आहें चुनता हैं

ठोकर खाकर ही तो वो हर बार संभलता है
चेहरे से तो हँसता है पर भीतर कहीं जलता है

नेक नीयत पे इल्ज़ाम न लगाना कभी
एक उम्र गुज़र जाती है बेकुसूर साबित होने में।

“उदास नहीं होता मैं अब, खुश रहने की आदत हो गई”

उदास नहीं होता मैं अब, खुश रहने की आदत हो गई
एहसास नहीं होता ये अब, दिल को ये आदत हो गई

अपने आप से पूछता हूँ, आजकल मैं कई सवाल
वही सवाल, जिनके जवाब मुझको भी नहीं पता

दिल का दिल बैठ जाता है, जब भी वो वक़्त आता है
वही वक़्त, जिसमें कि खुद वक़्त भी ठहर जाता है

तुमसे मिलने की उम्मीद अब भी क़ायम है 
और उम्मीद पर तो दुनिया क़ायम है

उदास होने पर एक जगह बैठ जाता हूँ
सोचना-समझना सब बंद कर देता हूँ

मेरे अंदर जो शख़्स है, उसे मेरी बड़ी फिक्र है
एक वही तो है, जो हमेशा मेरा ख्याल रखता है

कभी-कभी वो मुझको गले से लगा लेता है
और कभी-कभी अपना मुँह फेर लेता है

शिकायत है उसे तो बस उस उदासी से
जो कभी मिटती नहीं इस वक़्त के साथ।

“दर्द काग़ज़ पर उतर आया” 

सीने में जो कहीं छुपा था, वो दर्द आवाज़ में नज़र आया 
दिल में जो कहीं दबा था, वो दर्द काग़ज़ पर उतर आया 

खुद को खोने का एहसास होने पर, कभी नहीं सोया मैं
हर बार यह एहसास होने पर, दो बार रोया मैं

पहला उस एहसास को लिखते वक़्त 
दूसरा उस एहसास को पढ़ते वक़्त

दिल पर पत्थर रखकर, जाने कितने फैसले किये
दिल को नादान समझकर, दिमाग़ ने फैसले लिये

दिल फिर भी चुप रहा, महीनों तक मायूस रहा
वक़्त का वो वक़्त था, वक़्त था सो गुज़र गया

कोशिश करती आई ज़िंदगी, हर बार सुलह करवाने की
हर बार मगर बीच में ही इसकी याददाश्त चली जाती है

दिन महीने साल, सब गुज़र रहे भी हैं और नहीं भी
दिल और दिमाग़ के दरमियाँ, एक यही तग़ाफ़ुल है

सोच रहा हूँ इस बार कुछ अनकहा लिखूं
वही अनकहा जो खुद में महसूस करता हूँ।

“ज़िंदगी: रूह दा रेडियो”

ये तमाम कायनात एक रेडियो ब्रॉडकास्टर की तरह है
जो हर वक़्त कायनात में मोहब्बत फैलाने की हसरत में
इश्क़ की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स रेडिएट करती रहती है

और ये ज़िंदगी उस महत्वाकांक्षी श्रोता लिस्टनर की तरह है
जो कि ज़िंदगीभर सही स्टेशन ट्यून करने की चाहत में
अपनी कोशिशों के ट्यूनर को चारों ओर घुमाता रहता है

लेकिन मनपसंद स्टेशन के आस-पास 
नाॅस्टेल्जिक नॉइज बहुत होता है
जिसे पूरी तरह से रिमूव करने में फ़ितरत का फिल्टर नाकाम रहता है

कायनात के इस चैनल की सबसे ख़ास बात यह है
कि यहाँ केवल प्यार की ढ़ाई हर्टज फ्रिक्वेंसी ही नहीं 
बल्कि श्रोताओं के नसीब की ब्रॉडकास्टिंग भी होती हैं

और तो और
प्रोग्राम के दौरान अक्सर एड भी वहीं आते हैं
जो सुनने वालों के मन के मन को बहलाते हैं
गीत सुनाते-सुनाते, अपनी दुनिया में ले जाते हैं

ये सब तो ठीक है, 
मगर अब तक ये पता नहीं चल पाया
के रूह के रिकॉर्डिंग रूम में 
आखिर वो आरजे कौन है?
जो हर वक़्त, वक़्त के अकाॅर्डिंग
नये-पुराने ट्रैक प्ले करता रहता हैं
और बीच-बीच में दिल की बातें
पुरानी वो यादें ताज़ा कर देता हैं 

तो चलिये दोस्तों
मैं जब तक उस आरजे का पता लगाता हूँ
आप तब तक इक एहसास की आवाज़ में
यह नग़्मा सुनिये

बोल है राॅकशायर इरफ़ान के
संगीत है मन के मीत का
और फिल्म का नाम है
ज़िंदगी: रूह दा रेडियो

“संग तुम्हारे काॅफ़ी पीने की आरज़ू लिये बैठे है हम”

संग तुम्हारे काॅफ़ी पीने की आरज़ू लिये बैठे है हम
और तुम हो कि हरबार बहाना बनाके टाल देती हो

कब तक टालती रहोगी, यूँ खुद को और मुझको
कभी तो आईने में देखो, खुद में पाओगी मुझको

जो खुद में मुझको ना पाओ, तो फिर कहना
तुम्हें सब पता है इस दिल का आलम, है ना ?

रिश्तों को नाम देकर, उन्हें बदनाम क्यों करना
कुछ रिश्ते नाम के मोहताज़ नहीं होते

एहसास को सिर्फ महसूस किया जा सकता है
इसको जताने का माद्दा किसी अल्फ़ाज़ में नहीं

गर सुबह का ख़्वाब सच होता है तो वो ख़्वाब तुम हो
गर दिल की आवाज़ सुन रही हो तो वो आवाज़ तुम हो

संग तुम्हारे जीने की अब आरज़ू लिये बैठे है हम
और तुम हो कि हरबार वादा करके भूल जाती हो

कब तक भूलती रहोगी, यूँ खुद को और मुझको
कभी तो दिल से देखो, पाओगी हरजगह मुझको

“मनचाहा सफ़र”

अपनी ही धुन पर नाच रहा है ये मन
मनचाही डगर पर चल पड़ा है ये मन

रास्ते का नाश्ता ले लिया है
नाश्ते में रास्ता खा लिया है

तभी तो पैरों को थकान महसूस नहीं हो रही
उल्टा ये तो अब पहले से तेज़ चलने लगे हैं

चल भी रहे हैं या उड़ रहे हैं
रास्तों से रिश्ते दिल के जुड़ रहे हैं

मंज़िल दूर से ही इन्हें तक रही है
इंतज़ार में खड़ी-खड़ी थक रही है

मंज़िल को जिन रास्तों से रश्क़ है
दिल को उन्हीं रास्तों से इश्क़ है

देखते है ये बाज़ी कौन जीतता है
सबसे पहले वहाँ कौन पहुँचता है

जहाँ से फिर एक नया सफ़र शुरू हो जायेगा
पिछले सफ़र के किस्से ये वाला सफ़र सुनायेगा।