“बेनज़ीर हो तुम”

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नज़ीर क्यां पेश करू, खुद बेनज़ीर हो तुम
फ़क़त रूह-ए-दिल की, अब वज़ीर हो तुम

जी करे सुनता जाऊ, मैं सब बातें तुम्हारी
महफ़िल-ए-अदब की, नेक तक़रीर हो तुम

रुख पर लिखा है, पाकीज़ा सा इक कलाम
आयत-ए-कुरआन सी, वो तफ़सीर हो तुम

जलतरंग से बनी हुई, इश्क़ रंग में सनी हुई
रूह पतंग में बसी हुई, एक तसवीर हो तुम

इबादत में अक्सर, होता है दीदार तुम्हारा
दुआओं से हासिल हुई, मेरी तक़दीर हो तुम

हयात के सफ़र की, यूँ दास्तां है ‘इरफ़ान’
साँसों पर लिखी हुई, ज़िंदा तहरीर हो तुम

© रॉकशायर
(इरफ़ान अली खान)

नज़ीर – उदहारण
बेनज़ीर – अनुपम, बेमिसाल
फ़क़त – सिर्फ
रूह-ए-दिल – ह्रदय और आत्मा
वज़ीर – मंत्री
महफ़िल-ए-अदब – साहित्यिक सभा
तक़रीर – भाषण
रुख – चेहरा
पाकीज़ा – पवित्र
कलाम – लिखित रचना, गीत
आयत-ए-कुरआन – पवित्र ग्रन्थ कुरआन शरीफ में क्रमानुसार लिखे वाक्यांश
तफ़सीर – व्याख्या
इबादत – पूजा
दीदार – दर्शन
हयात – ज़िंदगी
तहरीर – लिखित दस्तावेज

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“सुन, ओ वहशी दहशतगर्द”

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सुन, ओ वहशी दहशतगर्द
नहीं, तू कोई नेकदिल फ़र्द
कर रहा हूँ, ये तुझसे अर्ज़
वबा सा, तू लाइलाज मर्ज़
तदबीर कर ले, चाहे जो भी
नहीं उतरेगा, रूह से क़र्ज़
तूने दिये, माँओं को ज़ख्म
तूने किये, ख़्वाब सब भस्म
तूने जलाये, घर बार सारे
तूने बुझाये, मासूम तारें
तूने जो मारा, बेगुनाहों को
तूने वो काटा, बेकसूरों को
तूने उगला, सदा ही ज़हर
तूने बरपा, ज़मीं पर कहर
तूने बोये, नफ़रत के बीज
तूने किये, काम सब नीच
तूने किया, गुमराह सदा
तूने पिया, बस लहू यहाँ
तूने दिया है, बेमानी फतवा
तूने किया, इस्लाम को रुस्वा
तूने काटे, ज़िंदगी के पर
तूने बांटे, मुल्क और घर
दरिंदगी को, अपनी सदा
कहते आये, जिहाद यहाँ
गंदगी को, यूँ अपनी सदा
कहते आये, जन्नत यहाँ
सुन, ओ हब्शी दहशतगर्द
नहीं तू कोई, शेरदिल फ़र्द
इबादत कर ले, चाहे जो भी
नहीं उतरेगा, रूह से क़र्ज़ ।।

© रॉकशायर
(इरफ़ान अली खान)

वहशी – बर्बर
दहशतगर्द – आतंकवादी
फ़र्द – आदमी
अर्ज़ – कहना
वबा – महामारी
मर्ज़ – बीमारी
तदबीर – कोशिश
रूह – आत्मा
गुमराह – गलत राह पे ले जाना
फतवा – धर्म गुरू द्वारा धर्म संबंधी किसी विवादास्पद बात के संबंध में दिया हुआ शास्त्रीय लिखित आदेश
रुस्वा – अपमानित करना
जिहाद – ख़ुदा की राह में संघर्ष

“यूँ तो नाम से, मैं भी इक खान हूँ” (दहशतगर्दो को मेरा जवाब)

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यूँ तो नाम से, मैं भी इक खान हूँ
दीन-ए-मज़हब से, मुसलमान हूँ
अल्लाह रसूल पे, रखता ईमान हूँ
इस्लाम पर, चलने वाला इंसान हूँ
कुरआन-ओ-हदीस का, उन्वान हूँ
सच्चाई की राह पर, गतिमान हूँ
इंसानियत की खातिर, कुर्बान हूँ
गुनाहों से लड़ता हुआ, इरफ़ान हूँ
जो भी मैं हूँ यहाँ, जैसा भी हूँ यहाँ
नहीं मगर, तुम्हारी तरह हैवान हूँ

© रॉकशायर
(इरफ़ान अली खान)

“ग़ज़ल सा सुकूं कहूँ, या कहूँ नज़्म सा ख़ुमार”

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ग़ज़ल सा सुकूं कहूँ, या कहूँ नज़्म सा ख़ुमार
मुझमें हर लम्हात यहाँ, तू ही तू अब बेशुमार

आसमां से उतरी है, फरिश्तों की इक जमात
नूर की बारिश से यूँ, कर रही वो मुझे सलाम

पलकों के पर्दे से, झांक रही दो आँखें गुलाबी
हया का वो सुर्ख़ हिज़ाब, देता है पहरा शबाबी

साँसे करती रहे सज़दा, बातों में है नज़ाकत
लबों को यूँ छूकर फिर, रातें हुई मेरी इबादत

निदा है उर्दू ज़ुबान सी, सुबह की अज़ान सी
रूह से आती रहती बस, खुशबू ज़ाफ़रान सी

सादगी है ज़ीनत तेरी, बंदगी इनायत तेरी
दिल पे मेरे लिखी हुई, ज़िंदगी इबारत तेरी

हुस्न से वाबस्ता, माहताब रूख़ पे लिए हुए
चाहत की वादियों में, यूँ आफ़ताब लिए हुए

फ़िज़ाओं में बहार तुमसे, हवाओं में है नमी
दुआओं में करार तुमसे, ख़लाओं में है कमी

मुहब्बत की अलामत ये, इश्क़ की नेअमत ये
फ़िरदौस से नाज़िल हुई, ख़ुदा की रहमत है ये

शबनम के कतरे सा, नरम ये एहसास तेरा
शोखियों में लिपटा हुआ, सर्द ये अंदाज़ तेरा

इस कदर शैदा हूँ तुझ पर, हर घड़ी हर पहर
नक़्श मैं तेरा, और मुझमें तू शाम-ओ-शहर

इश्क़ का जुनूं कहूँ, या कहूँ मुश्क़ का ख़ुमार
मेरे हर अल्फ़ाज़ में, तू ही तू अब बेशुमार

“इंसानियत, अब ना कहीं बची है”

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हैवानियत की, यहाँ होड़ मची है
इंसानियत, अब ना कहीं बची है

ख़ौफ़ रखो, जरा उसका तो तुम
कायनात ये सब, जिसने रची है

दहशतजदा, मजबूर ये ज़िंदगी
बुज़दिल के, इशारों पर नची है

सियासत करे, यूँ अम्न की दुआ
ये बात ‘इरफ़ान’, ना अब पची है

“नाद”

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व्यवधान से, ना विवाद से
आरंभ तू कर, शंखनाद से

मन के भीतर, अंकुर जगा
अब आत्मबल की, खाद से

गूँज उठे, चहुँ लोक यहाँ जो
अलौलिक, धर्म निनाद से

तमस छवि, को मिटा दे
गुज़रें समय की, याद से

अटल रहता है, सदा ही
सत्य, बस अपने वाद से

जीवन में यूँ , फिर से उगा
कुछ पुष्प तू अब, शाद से

© रॉकशायर

नाद – ध्वनि
तमस – अँधेरा
शाद – खिला हुआ, प्रसन्नचित

“दहशत के, हुक्मरानों के नाम सीधा सरल सा, मेरा पैग़ाम”

A very shameful act……
समूची मानवता शर्मसार है, मनुष्य के बर्बर निर्दयी कृत्यों पर…

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84 children reported dead in Taliban attack on school. Hundreds of students were in the school at time of attack and it is believed hostages have been taken.

दहशत के, हुक्मरानों के नाम
सीधा सरल सा, मेरा ये पैग़ाम

पालोगे गर सांप को, तुम यूँ खुद
डसेगा वो इक दिन, तुमको ही खुद….
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मज़हब नहीं सिखाता, यूँ आपस में बैर रखना
ज़ुल्म-ओ-फसाद के ये सब, कड़वे बेर चखना

दहशत के हुक्मरानों, इतना समझ लो तुम भी
आदमख़ोर हो जाये जो, वो शेर कभी ना रखना

“रूप”

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दिखा तू, अपना रौद्र रूप
मिटा दे, भय का स्वरुप
चहुँ दिशा, शक्ति समरूप
अक्षय ऊर्जा, का प्रतिरूप
अधर्म ये, निर्लज्ज कुरूप
पाप से, परिपूर्ण इक कूप
आसुरी छवि, के अनुरूप
कर्म का, यूँ अपभ्रंश रूप
धर्म की, बरसे जब धूप
जल जाये, सब क्षुद्र रूप
निर्मल हो, तू फलस्वरूप
सत्य का, वो दिव्य रूप
निर्गुण, निराकार, निरूप
स्थूल से लेके, सूक्ष्म रूप
ज्ञान वेदी की, चंदन धूप
ओजमय लगे, कांति रूप
समय ये केवल, काल रूप
सृष्टि रचे, विकराल रूप
सृजन प्रलय, बस दो ही रूप

© रॉकशायर

“ज़िंदगी का फ़लसफा”

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ज़िंदगी का फ़लसफा, किसी मसखरे सा
कभी मुस्कुराये जो, कभी मुँह बनाये यहाँ

सुख है सावन ऋतु, दुख ऋतु पतझङ सी
पल पल हर घङी, दौङ रही यूँ भगदङ सी

श्वेत रंग की पोर ये, मन मलंग की भोर ये
समर्पण की वेदी पर, प्रेम पतंग की डोर ये

सौन्दर्य की प्रीत पर, मधुर इक संगीत पर
खनक रहा है साज़ ये, काल के अतीत पर

ज़िन्दगी का ये तमाशा, किसी मसखरे सा
कभी आज़माये जो, कभी मुँह चिढ़ाये यहाँ ।।

“शमा-ए-महफ़िल”

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दफ्तर की बोरिंग, नौकरी बजाकर
डायरी को अपनी, दिल से लगाकर
निकल पड़ा, जो कल शाम को मैं
सीने में लिए, चंद एहसास को मैं
ढूंढता रहा जिसे, यहाँ वहाँ गली गली
मज़लिस वो उम्दा, फिर मुझको मिली
रूह तरबतर हुई, खिल उठी मन की कली
रूहानी अंदाज़ में, धीरे धीरे वो शमा जली
अजनबी से चेहरें, लगने लगे सब अपने से
ज़हन की वादी में, फलने लगे जो सपने से
दौर चला फिर, एक एक करके जो शायरी का
धक धक करने लगा, वो दिल मेरी डायरी का
एक जनाब, जो थे बड़े ज़हीन से आर्टिस्ट वहाँ
देने लगे वो धीरे धीरे, लम्हों को स्केच की ज़ुबां
गर्म गर्म चाय, और साथ में क्रंची कुरकुरे पकौड़े
बेहद लज़्ज़तदार, कविताओं के वो अंतरे मुखड़े
बाद उसके, सिलसिला चला जो फोटोसेशन का
मुस्कुराते खिलखिलाते हुए से, टंडन मेंशन का
रुख़सत के वक़्त सबने, फिर मिलने का वादा किया
अदब-ओ-एहतराम से, दिल जोड़ने का वादा किया
यादगार सी इक शाम, संग लिए नज़्म-ओ-ग़ज़ल
गुलाबी फ़िज़ा में फिर, जल उठी शमा-ए-महफ़िल

“क्रोध को अपने, तू पालना सीख ले”

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क्रोध को वो अपने, तू अब पालना सीख ले
हालात सा खुद को, तू अब ढालना सीख ले

माँ ने जो सबक सिखाया, फिर से याद कर
परो से हवाओं को, तू अब काटना सीख ले

बंदिशों की सारी हदें, यूँ तोड़ दे, रूख़ मोड़ दे
रूह के लिबास को, तू बस कातना सीख ले

चंद रोज़ की मेहमान, है जो ज़िन्दगी तेरी
दर्द में भी खुशियाँ, तू यहाँ बाँटना सीख ले

याद रखे ये जमाना, ग़ज़ल कोई ऐसी बना
जुनूं को अशआर में, यूँ बस ढालना सीख ले

“चाहो जिसे सदा, क्यूँ वो माहिया नहीं मिलता”

तन्हा सफ़र में यहाँ, कोई साथिया नहीं मिलता
ढहते वुज़ूद को भी फिर, आशियां नहीं मिलता

शिकवा नहीं ये कोई, बस है एक सवाल मेरा
चाहो जिसे सदा, क्यूँ वो माहिया नहीं मिलता

“रूह की गुज़ारिश”

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झुकी हुई ये पलकें तेरी, टूटा सा है दिल मेरा
लोबान सी है साँसे तेरी, रूठा सा ये दिल मेरा

इक दूजे की ख़ाहिश में, जलते रहे यूँही सदा
खिल उठे फिर से हम, ना रहे अब ग़मज़दा

दर्द के सियाह ये घेरे, रूख़ पर ज़ुल्फ़ों के पहरे
निगाहों से पढ़ लेता हूँ, आजकल मैं सब चेहरे

ख़लाओं में क़ैद है तू, तन्हाईयों में गुम हूँ मैं
जफ़ाओं में खोई है तू, बेचैनियों में गुम हूँ मैं

हर नज़र तू ही दिखे, हर बशर जो तू ही मिले   
कायनात के ज़र्रे में, हर पहर अब तू ही खिले

अल्फ़ाज़ उतर आते है यूँ, कागज़ के सीने पर
एहसास मगर होता नहीं, अपने ही जीने पर

जिस्म ये मेरा अब, नक्श में तेरे यूँ गुमशुदा  
रूह की गुज़ारिश है, तुझपे करू मैं जां फ़िदा

सहमी हुई पलके तेरी, टूटा सा है दिल मेरा
सुरमई दो आँखे तेरी, रूठा सा ये दिल मेरा

                © रॉकशायर
            (इरफ़ान अली खान)

“एग्जाम-फोबिया” (परीक्षा का डर)

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आहट सुनकर ही जिसकी, बुझ जाये जलता दिया
स्टूडेंट्स का जानी दुश्मन, ये है एग्जाम-फोबिया
कितना भी पढ़ लो यहाँ, कितना भी रट लो यहाँ
शिकवा शिकायत हमेशा से, यही बस तो रहता है
ये पेपर हर दफ़ा ही, इतना अजनबी क्यूँ लगता है
पूरा सेमेस्टर इक पल में, यूँ हो जाता है बेगाना
जो कुछ याद था, लगता है सब गुज़रा ज़माना
अजब अजब सा जाने क्यूँ, हर मंज़र लगता है
ज़हन की वादियों में, सब कुछ बंज़र लगता है
एग्जाम हॉल तो लगता है जैसे, मौत का कुआँ
जरा सा भूले के, निकला फिर आंसर्स का धुँआ
इंविजिलेटर के रूप में, साक्षात प्रभु नज़र आते है
गिड़गिड़ाओं चाहे जितना, दया ना कभी ये दिखाते है
सीरत पढ़कर ही जिसकी, बुझ जाए जलता दिया
स्टूडेंट्स का जानी दुश्मन, ये है एग्जाम-फोबिया

“तांडव”


ना कौरव सा दगा दे, ना पांडव सा ठगा ले
जीवन के रणक्षेत्र में, तू अब तांडव मचा दे

नरमुंड की माला लिए, नेत्रों में ज्वाला लिए
पापियों के सर्वनाश को, हाथों में भाला लिए

ना कोई करुणा दिखा, ना कोई हया दिखा
दुर्जन का विनाश कर, ना कोई दया दिखा

वज्र अपना उठा ले, रगो में तू शौर्य चढ़ा ले
शक्ति के प्रहार से, बस यहाँ तांडव मचा दे

“जो भी हूँ मैं, या मौला”

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माना कि ख़ुश्क़ज़ार हूँ
गुनाहों में सरोबार हूँ
तन्हाई का कोहसार हूँ
ज़ख्मों से अश्क़बार हूँ
रिहाई का तलबगार हूँ
बंदिशों में गिरफ्तार हूँ
रूहानी वो किरदार हूँ
आवारा शहरयार हूँ
बंजारों सा हर बार हूँ
दर्द से बनी तलवार हूँ
जंग के लिए तैयार हूँ
फौलाद की दीवार हूँ
ख़्वाहिशों से बेदार हूँ
ख़्वाबों पर सवार हूँ
ख़्यालों की रफ्तार हूँ
इश्क़ का वो ख़ुमार हूँ
ख़लाओं में बेशुमार हूँ
सुकूं का तरफदार हूँ
जुनून का अशआर हूँ
इरादों की झंकार हूँ
ज़िन्दा एक पुकार हूँ
उम्मीद की पतवार हूँ
जिद्दी हूँ, पर खुद्दार हूँ
जो भी हूँ मैं, या मौला
बस तेरा गुनहगार हूँ

© रॉकशायर
(इरफ़ान अली खान)

“आपके होते हुए, मुझे कुछ नही होगा अब्बू”

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आपके होते हुए, मुझे कुछ नही होगा अब्बू
जानता हूँ, हर पल आपको
मेरी कितनी फ़िक्र रहती है
हर दिन सोचता भी हूँ, बहुत इस बारे में
पर शायद कभी, समझ नही पाऊंगा इसे।

फोन पर रोज शाम, जब बात करते हो आप
तब भी बस, जल्दी से हालचाल पूछ कर
अम्मी को थमा देते हो मोबाइल
मुझे सब मालूम है अब्बू
कितना परेशां होते है, आप उस वक्त
जब कभी मैं, फोन उठाने में देरी कर देता हूँ
जब कभी मैं, बाईक पर होता हूँ
जब कभी मैं, कहीं बाहर होता हूँ
जब तक, मेरी आवाज़ नही सुन लेते आप
तब तक वो, चैन से नही बैठ पाते है आप
अम्मी से तो रोज खुलकर बात हो जाती है
आपसे जाने क्यूँ वो सब कह नही पाता हूँ
सीने में दबे हुए है जो, अनछुँवे जज़्बात।

मैं जब भी, घर आता हूँ
आपके चेहरे पर, एक खुशी तैर जाती है
सब कुछ, मेरी पसंद का बनवाते है आप
अम्मी को कहते रहते, हर घड़ी बस
ये बनाना, वो बनाना
कितना कमजोर हो गया है
जितने दिन यहाँ है, इसका ध्यान रखो
बाहर का खाना खा खाकर
देखों कैसा सूख सा गया है
घर से वापस, जब रवाना होता हूँ
तब आप, वो ख़ुदा हाफिज़ कहकर
जल्दी से नज़रों को, यूँ इधर उधर कर लेते है
ताकि, मैं उन गीली होती पलकों को ना देख पाऊ।

आपके होते हुए, मुझे कुछ नही होगा अब्बू
जानता हूँ, हर पल आपको
मेरी कितनी फ़िक्र रहती है
हर दिन सोचता भी हूँ, बहुत इस बारे में
पर शायद कभी, समझ नही पाऊंगा इसे ।।

© रॉकशायर
(इरफ़ान अली खान)

“मुझमें जो है यहाँ, माँ की दुआओं से है”

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परिन्दों को मुहब्बत सदा, इन हवाओं से है
मुझमें जो कुछ है यहाँ, माँ की दुआओं से है

सौ बार गिरा हूँ, उठ खड़ा मगर हर बार हुआ
वुज़ूद में यह कैफ़ियत, माँ की दुआओ से है

शान से जीना सिखाया, मान वो रखना सिखाया
ज़िन्दगी के सफ़र में, ईमान पे चलना सिखाया

ग़मों से यूँ होकर दूर, दर्द को जीकर भरपूर
ज़िन्दगी में अब सुकूं, माँ की दुआओ से है

© रॉकशायर

“यारों की यारी”

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ख़्वाबों के बादल पर, रखते है ये दुनिया सारी
इरादों में महके जिनके, ज़िंदा सी कोई ख़ुमारी
दोस्ती निभाये सदा, भूलकर सब दुनियादारी
हर रिश्ते पर यहाँ, रिश्ता है जो सबसे भारी
नाम है उसी रिश्ते का प्यारे, यारों की यारी ….

दर्द-ओ-ग़म की टांगो को, पल पल यूँ खींचे
ज़िन्दगी की क्यारी को, लम्हा लम्हा सींचे
वादे निभाये सदा, भूलकर वो सब राज़दारी
हर ख़ुशी पर यहाँ, ख़ुशी है जो सबसे भारी
नाम है उसी ख़ुशी का प्यारे, यारों की यारी ।।

© रॉकशायर

“एहसास-ए-इश्क़”

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एहसास वो तेरा, यूँ हर पल मुझे होने लगा
दूर होकर भी सदा, तू पास मेरे होने लगा

इश्क़ का ख़ुमार, इस कदर सर पे चढ़ा
रातों से मेरी, चैन-ओ-सुकूं सब खोने लगा

मुझमें मुझसा तो, कुछ भी अब ना रहा
जो भी था शख्स वो, सब तेरा होने लगा

जुड़ा है जब से ये, बावरा जो मन तुझसे
अंधेरों में कहीं, सवेरा वो इक होने लगा

दिल-ए-नादां की, बातों में यूँ आके फिर
हुआ था जो ना कभी, वो अब होने लगा

एहसास-ए-इश्क़ का, है बस इतना बयां
ना होकर तू यहाँ, मुझमें कहीं होने लगा

© इरफ़ान अली खान ‘रॉकशायर’

“म्हारों शहर, ओ जैपुरियों” (My City Pink City Jaipur)

मेरी पहली राजस्थानी कविता
गुलाबी नगरी जयपुर को समर्पित है
कही कोई त्रुटि हो तो क्षमा करे …

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गुलाबी रंगा में रंग्यों छै, म्हारों शहर ओ जैपुरियों
चौङी चौङी सङका पे जडे, उङतो फिर वो लहरियों

दुकाना ऐ सब लाईना में, यूँ खङी खङी इतरावें है
हवामहल की खिङक्या सू, वा ठण्डी हवा आवें है

सांगानेरी चूंदङी की पछै, वे बातां ही काई केणी छै
देसी विदेसी सगळा ही अडे, ईका घणा दिवाना छै

नाहरगढ, जयगढ, आमेर, जलमहल, कनक-घाटी
ऐ सगळा ही तो है, कॉलेज वाळा री घूमण दी वाटी

जंतर-मंतर, राजमंदिर, अल्बर्ट-हॉल, सिटी-पैलेस
कारीगरी सू बण्या छै, शहर का ऐ पूठरा नेकलेस

परकोटा सागे गेट खड़ा, सुरक्षा रो पक्को इंतजाम
ज्वैलरी अडा री फेमस, चोखों छै नगीना रो काम

ऐ सगळी बातांचीता, वा बरसा पुरानी धरोहर री छै
आज को जैपुरियों शहर तो, दो कदम खुद आगे छै

चारों तरफ अडे, कन्स्ट्रकशन रो जाळ बिछ ग्यो
लो-फ्लोर बसा चाली, मेट्रो को वो जाळ बिछ ग्यो

क्रिस्टल-कोर्ट, एमजीएफ, डब्ल्यूटीपी, एमआई रोङ
एक सू बढ़र एक छै, माचे जठे खरीदबावाळा री होङ

जवाहर-सर्किल, ईपी, सेन्ट्रल-पार्क, आईनोक्स, जीटी
छोरा छोरियाँ रोज जडे, बजावे अपणा दिल री सीटी

यूनिवर्सिटी, स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल, है सब एवन
तरक्की का पहिया पर अडे, चाल पङ्यो अब जीवन

लिखबा गर बैठू तो, जाणे कित्ती किताबा भर जावें
जैपुरियां रो बखाण मगर, सम्पूर्ण ना कोई कर पावें

डोर पतंगा में रम्यो छै, म्हारों शहर ओ जैपुरियों
चौङी चौङी सङका पे अडे, उङतो फिरे वो लहरियों

© RockShayar
(इरफ़ान अली खान)

“मौत खुद अपने लिए मौत मांगेगी”

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मौत खुद अपने लिए, अब मौत मांगेगी
ज़िन्दगी से थोङी मोहलत, और मांगेगी

दर्द की वो हद, आकर कब की गुज़र गई
अब तो ये रूह भी, आतिश और मांगेगी

बेज़ुबां होकर यूँ, ना सह इतना ज़ुल्म तू
सांसें ये तुझसे तेरी, अपना ज़ोर मांगेगी

भङक रही है आग जो, डस रहा है नाग वो
बंदिशें सब तोड़कर, ख़ामोशी शोर मांगेगी

दिल की सुनता जा, बस तू ‘इरफ़ान’ यहाँ
गर्दिशें वो तुझसे खुद, नूरानी दौर मांगेगी

© RockShayar

“एक ज़हरीली रात (भोपाल गैस त्रासदी:३/१२/१९८४)”

 “The tragedy still haunts us in the form of incapacitated people and children born with deformities. It was indeed a human tragedy of unparalleled magnitude which shocked the conscience of the world.The criminal human folly that caused this tragedy has been compounded by indifferent attitude in subsequent years. It is incumbent on us, morally and legally, to do our utmost to support the surviving victims in every manner possible.”

My Tribute to Victims of Bhopal Gas Tragedy…..

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बेहद खौफ़नाक सी, एक ज़हरीली रात
डरे हुए से, सहमे हुए से, सब जज्बात   
फ़िज़ा में घुलती गई, जो मौत धीरे धीरे  
साँसे वो घुटती गई, हुई फ़ौत धीरे धीरे   
सोये हुए थे जो, सब सो गए हमेशा को
रो भी ना पाये, फिर खो गए हमेशा को
क्रूरता है ये, मिथाइलआइसोसाइनाइट की
तबाही है ये, एक ज़हरीले डायनामाइट की
यूनियन कार्बाइड की, ख़ता नाकाबिले माफ़ी है
ज़िन्दगी के बदले, मुआवज़ा नही बस काफ़ी है
आज भी हर पल यहाँ, चींख पुकारें वो गूँज रही है
वक़्त की दहलीज़ पर, अपना पता बस ढूंढ रही है
दफ़्न है जो आहें सब, इन्साफ अब वो मांग रही है  

                 © रॉकशायर
            (इरफ़ान अली खान)

“रॉकशायर की कहानी”

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भुने भुने से है, वो जज़्बात सारे
अधपके लगते, फिर क्यूँ नज़ारे  
साँसों से निकलता, गहरा धुँआ
ख्वाहिशों का नहीं, थमता जुआ
दर्द वो पीकर, बना है ये लफ्ज़-तराश
अल्फ़ाज़ सब इसके, है रूह की खराश
लकड़ी सा, सुलगता हुआ ये तन
संग अपने लिए, इक आवारापन  
कभी लगे वीरानी, कभी जो शादमानी
कुछ अलहदा है, रॉकशायर की कहानी….
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ख़्वाब वो अधूरे, यूँ भुला ना पाया
रातें सब इसकी, तन्हाई का साया
रूखा रूखा सा है, इक अरसे से यहाँ
भूखा भूखा सा है, कई बरसो से यहाँ
गर्दिशों में पला बढ़ा, जुनूनी ये फ़र्द
ना धूप लगे इसको, ना लगे वो सर्द  
लहरों सा, मचलता हुआ ये मन
संग अपने लिए, इक बंजारापन
कभी लगे रूमानी, कभी जो आतिशानी
कुछ अलहदा है, रॉकशायर की कहानी।।।

       © RockShayar
    (इरफ़ान अली खान) 

“आज मैंने, ये जाना है”

Today I am very happy.
I have donated blood for the first time.
It’s a beautiful feeling to save a life.
I wrote a poem to express my feelings……

Blood donate1
लहू के चंद कतरे देकर
आज मैंने, ये जाना है
इंसानियत से बढ़कर कुछ नहीं
आज मैंने, ये माना है
बह जाता है अक्सर जो
झगड़े फसाद में हर रोज
बचा सके गर ज़िन्दगी वो
इससे बेहतर और क्यां है
ख़ुदग़र्ज़ियों में जीते जीते
ख़ामोशियों को पीते पीते
खूं की वो उम्दा अहमियत
रूह की वो ज़िंदा कैफ़ियत
रिश्तों से बड़ी है इंसानियत
आज मैंने, ये जाना है

© RockShayar

“अम्मी की दुआओं का ताबीज”

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अम्मी की दुआओं का, वो ताबीज है मेरे पास
अंधियारों से लड़ने का, इक बीज है मेरे पास

कोशिशें यूँ चाहे जितनी, कर ले शातिर यहाँ
हिफाज़त करे जो सबसे, वो चीज है मेरे पास

शैतानी ये साये घने, बेखबर क्यूँ इस बात से
आसमां से नाज़िल हुई, दहलीज है मेरे पास

तौबा से करता हूँ, गुनाहों का कफ़्फ़ारा यहाँ
ज़िक्र से हासिल हुआ, इक बीज है मेरे पास

© RockShayar