“दरख्त़”

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कुछ सूखे से, कुछ घने दरख्त़
बात करते हैं, हँसते हैं, रोते हैं
साये में इनके, जब भी बैंठता हूँ
अनछुवा, एक दर्द महसूस होता हैं
छुपाये रखते हैं, जिसे ये अक्सर
अपनी ठ्ण्डी छाँव के, आगोश में
शाखे झुकी हुई, अनगिनत पत्तो से
फिर भी, सदा तनकर सीधे खङे रहते 
जेसे पिता रहता हैं, हरपल बच्चों के लिए
जाने कितने पंछीयों का घर हैं, ये दरख्त़
ढेरों सब्ज़ पत्तो में, कुछ मुरझाये हुए
असर हैं यह, उस जहरीले धुंए का
उगल रही जिसे, इन्सां कि बढती ख्वाहिशें
दम घुट रहा हैं इनका, आहिस्ता आहिस्ता
चारो तरफ बस, कंक्रीट का जाल नजर आता हैं
बेज़ुबां हैं मगर बेज़ान नही हैं, ये दरख्त़
कोई भी नही सुनता हैं यहाँ, इनकी पुकार
शायद इसीलिए, कायनात रूठी हैं हमसे
बारिश कि जगह, अब लावा बरसता हैं
मौसम का मिजाज़, पहले सा नही हैं
आओ कुछ देर यूँ बैंठे, बगीचे में
इन तन्हा दरख्त़ो के नीचे, थोङा वक्त निकालकर
और पूँछे मुस्कुराकर, इनकी खैरियत
तब शायद, फिर से खिल उठे वो जज्बात
जो दफ्न हैं, इन दरख्त़ो की जङो में कही

दरख्त़ = Tree

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“मैं तो हूँ, बस मेरे होने का एहसास नहीं”

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जाने किस मोड़ पर ले आया हैं, वक़्त मुझे
ज़िंदा तो हूँ, मगर जीने का एहसास नहीं
जंजीरो से कहीं, अंधेरो में बंधा हूँ
दम घुटता हैं, पर साँसे थमती नहीं
ज़िस्म, कबका बेज़ान हो चुका हैं
रूह मगर हर रोज, टुकड़ो में जलती हैं
वोह सारे जख्म, यूँ पत्थर बन गए हैं
छूने से अब इनको, लहू बहता नहीं
इन्तेहा हैं ये शायद, मेरे दर्द की
जाने क्यां लिखा हैं, मुक़द्दर में
साज़िशों से घिरा हुआ, ये किरदार
जगह जगह से, छिला हुआ, घिसा हुआ
बिखरी हुई हैं, हर इक ख़्वाहिश
टूटे जा रही हैं, हौंसले की डोर
जाने किस राह पर ले आया हैं, वक़्त मुझे
मैं तो हूँ, बस मेरे होने का एहसास नहीं

“कागज़ पर जब भी कलम रखता हूँ”

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कागज़ पर जब भी कलम रखता हूँ
अल्फाज़ खुद बखुद उतरने लगते हैं

ख्यालों के परिन्दें ज़हन में उङते हुए
लफ्ज़ो को पहनकर चहकने लगते हैं

ढेरों जज़्बात यहाँ दिल में छुपे रहते 
तन्हाई में जो रूख से बहने लगते हैं

आज फिर जलना होगा रातभर तुझे
शाम ढलते ही मुझसे कहने लगते हैं 

जागते हुए जब भी ख्वाब देखता हूँ
गज़ल के अक्स में वो सजने लगते हैं

ख्वाहिशों के पुलिन्दे रूह में तैरते हुए
सरगोशी को छूकर महकने लगते हैं

खामोशी को जब भी महसूस करता हूँ
एहसास खुद बखुद धङकने लगते हैं

“जूनून”

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जख्म़ो को चीरकर नासूर कर दे
रगो में और जरा बारूद भर ले

बन्दिशो की ये दीवारें तोङकर
साँसो में पिघलता जूनून भर ले

कदमो में हैं तेरे पूरी कायनात
इतना यकीं तू बस खुद पे कर ले

मुश्किलों से कम ना होगा हौंसला
यह वादा तू अब खुद से कर ले

यूँही बढता जा मंज़िल की ओर
इरादो से पूरी सब ख्वाहिशें कर ले

दर्द में डूबे तन्हा लम्हे छोङकर 
जिन्दगी से तू अब प्यार कर ले

“सुकून के कारवां भी मुझमें यूँ रहने लगे हैं”

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ख्वाहिशों के पर फिर से लगने लगे हैं 
उदासी के साये भी रूह से छटने लगे हैं

ज़िंदगी को अब फिर से गले लगाकर 
ज़ख्मों के निशां भी आहिस्ता भरने लगे हैं

गुज़रे वक़्त की झूठी बुनियाद मिटाकर 
दर्द के मकां भी खुद बखुद ढहने लगे हैं

तन्हा रातों की सियाह परछाई छोड़कर 
ख्वाबों के जहां भी आँखों में दिखने लगे हैं

लड़खड़ाते हुए वज़ूद की सदायें सुनकर 
रूह के बयां भी कागज़ पर छपने लगे हैं

टूटे इस दिल की कैफ़ियत महसूस कर 
सुकून के कारवां भी मुझमें यूँ रहने लगे हैं

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“कागज़ पर एहसास के धागे बुनता हूँ”

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कागज़ पर एहसास के धागे बुनता हूँ
मैं खामोशी से आती सदाये सुनता हूँ

ख्वाबों में हर शब तलाश कर तुम्हे
मैं तन्हाई में डूबती खलाये चुनता हूँ

ख्यालों के पार बस तेरे इन्तजार में
मैं उस मोङ पर आज भी रूकता हूँ

वक्त से मिले जख़्मो के निशां छुपाकर
मैं जिन्दगी में बिखरी वफ़ाये ढूंढता हूँ

बेरूखी से मिले वो सारे दर्द भुलाकर
मैं तेरी आवाज पर आज भी मुङता हूँ

लफ्ज़ो में दिल के जज़्बात यूँ उतारकर
मैं रूह की गुज़ारिश हर पल सुनता हूँ

“खलिश”

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जाने कैसी खलिश बस गई हैं रूह में 
साँस लेता हूँ तो घुटन महसूस होती हैं
कहीं भी कोई रोशनी का साया नहीं दिखता
अंधेरो ने ज़ंज़ीरो में जकड़ रखा हैं मुझे 
ख़ामोशी भी अब खामोश सी बैठी हैं 
जहा देखो बस वीरानियाँ फैली हुई 
बिखरती हुई ज़िन्दगी तलाश रही हैं 
सुकून के चंद लम्हे 
ख्वाबों का खुला आसमां
ख़्वाहिशों सी सब्ज़ ज़मीं 
बंदिशों से आज़ाद इक जहां
ख़्याल उड़ते रहते हैं ज़हन में 
आँखों में कायम हैं अब तक 
धुंधली होती एक उम्मीद 
इंतज़ार हैं उस बारिश का 
जो सैलाब लेकर आये 
और अपने संग बहा ले जाए
जाने कैसी आज़माइश बन गई हैं ज़िंदगी 
जीना चाहता हूँ फिर भी ये अधूरी लगती हैं

“रिश्तें”

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बिखरते गए रिश्तें काँच की तरह
दिल की ज़मीं पर फैले हुए 
हर कतरे में इक अक्स छुपा हैं
जो देखने को उठाता हूँ कभी
हाथो से लहू टपकने लगता हैं
नश्तर से लगते हैं सब टुकङे
बेमानी रिश्ते कबके सूख चुके हैं
पतझङ में गिरे पत्तो कि तरह
वक्त कि हवाए जिन्हे उङा ले जाती हैं
बीते हुये लम्हो से बहुत दूर कहीं
दिल के किसी कोने में मगर
कुछ निशां बाकी रह जाते हैं
तन्हाई में अक्सर नज़र आ ही जाते हैं
यादों में दफ्न हो चुके वोह रिश्ते
ज़िस्म तो जलकर राख हो जाता हैं
रूह मगर कभी मिटती नही
रिश्तों की चाह में बस जलती रहती हैं
ताउम्र यूँही….

“ज़िन्दगी”

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एक अनजान सफ़र हैं ज़िन्दगी
हर मोङ पर मुख्त़लिफ अन्दाज यहाँ
बाहें खोले हुए यूँ मिलते हैं
जैसे समन्दर से मिल रही हो नदी
वक्त की उफनती ठहरती लहरें
अपने संग कई यादें बहा ले जाती हैं
कभी कभी जब दिल जज़्बाती हो जाए
तब वो लहरें पलकों से छलक आती हैं
अश्क़ो में उनका अक्स नज़र आता हैं
धुन्धली सी बस इक परछाई बन जाती हैं
एक खानाबदोश फितरत हैं ज़िन्दगी
रूकना इसने कभी सीखा नही
चलते रहने से ही ये ज़िन्दा हैं
ढेरो रंग बिखरे हैं इसके दामन में
कभी खुशीयों के सुनहरे अन्दाज
कभी ग़मो के सियाह लिबास
कहीं मुहब्बतों में डूबते मंज़र
कहीं वीरानीयों के सुलगते खंज़र
कभी दीवानगी में मचलता जूनून
कभी आवारगी में बसता सूकून
कहीं बन्दिशो का टूटता कहर
कहीं आज़ादी की होती सहर
कभी ख्यालो के मौसम सुहाने
कभी बैचैनीयों में भीगे फ़साने
अलहदा हैं सब रंग इसके
बिना जिनके ये अधूरी हैं
हर इक अन्दाज़ इसका बेहद ज़रूरी हैं
एक मुकम्मल एहसास हैं ज़िन्दगी 
हर कदम पर धङकते अल्फाज़ यहाँ
तारीफ इसकी अब यूँ करते हैं
जैसे कोई शायर लिख रहा हो गज़ल

“इक बेहतरीन एहसास”

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जिन्दगी हैरानीयों का इक बेहतरीन एहसास हैं
अपनी बंद मुठ्ठी को यूँही कभी खोलकर देखो
तितलीयो कि तरह कई राज उङते नजर आयेंगे
ख्वाहिशों के खुले आसमां की चादर ओढे हुये
साँस लेती हुई सरगोशी को महसूस करते हुये
बादलो के पार छुप कर बैठा सूरज तकता रहता
जिन्दगी के चटक रंगो की चमक से वो हैरान हैं

“पिता”

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जिन्दगी की धूप में तन जलाकर
बच्चों पर खुशी के बादल फैलाकर
पूरी करता हैं जो उनकी हर हसरत
ऐसी अज़ीम शख्स़ियत पिता हैं
अपनी ख्वाहिशें सदा भुलाता रहा
परिवार की जरूरतो के लिये वोह
ग़म को चेहरे पर ना आने देता कभी
सीने में एहसास छुपाये रखता हैं वोह
पिता पुत्र का रिश्ता भी कितना अजीब हैं
ताउम्र इक दूजे को चाहते हैं बहुत
मगर दोनो कभी कह नही पाते हैं
वक्त के तपते अलाव में खुद को झोंककर
औलाद को हरदम पलकों पर बैंठाकर
सच करता हैं जो उनका हर सपना
ऐसी बेहतरीन सूरत पिता हैं
माँ की तारीफ में मेने कई नज़्मे लिखी
पिता को मगर दो लफ्ज़ भी ना कह पाया
जमाने ने हर तरफ अफवाह फैला रखी हैं
सख़्त मिजाज़ होते हैं अक्सर पिता यहाँ
जज्बातों से उनका रिश्ता नही हैं गहरा
मगर जब मैं कुछ दिन उनके पास रहा 
तब जाकर यह बात समझ में आई हैं
गर माँ के कदमो तले ज़न्नत हैं तो
पिता ज़न्नत का दरवाजा हैं
गर माँ की दुआ में रहमत हैं तो
पिता रहमत का ज़रिया हैं
गर माँ की गोद में सूकून हैं तो
पिता सूकून का दरिया हैं
गर माँ ने मुझे जन्म दिया हैं तो
पिता मेरे होने का एहसास हैं
जिन्दगी के सफ़र में दर्द को भुलाकर
परिवार के लिए उम्मीदें सजाकर
महफूज़ रखे जो हर दिन उन्हे
ऐसी बुलन्द इमारत पिता हैं

“खुदको तलाशता हूँ”

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कागज़ पर, धड़कते एहसास उतारता हूँ 
ख्यालों में अक्सर, तुमको निहारता हूँ 

चाँदनी रातों में, जलता बुझता हुआ 
तन्हाई से लिपटकर, रूह सँवारता हूँ

यादों के कारवां में, चलता रूकता हुआ 
बिखरे ख्वाबों के, टुकड़े बुहारता हूँ

कोरे पन्नो पर, लिखता मिटाता हुआ 
कैफ़ियत में डूबकर, लफ्ज़ निथारता हूँ 

वक़्त के सफर में, गिरता उठता हुआ 
आज़ाद उड़ने के लिए, बाहें पसारता हूँ 

दर्द की सोहबत में, टूटता बनता हुआ 
ख़ामोशी में आजकल, खुदको तलाशता हूँ

“मैं परिन्दों कि तरह, आसमां में उङता रहूँ”

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मैं परिन्दों कि तरह, आसमां में उङता रहूँ
जिन्दगी के सफर में, गिरता सम्भलता रहूँ

हर मोङ पर यहाँ, हैरानीयाँ मिलती रहे
अजनबी राहों पर, बँजारे सा चलता रहूँ

वादियों कि तरह, खुशबूए महकती रहे
बर्फिले पहाङो पर, झरने सा बहता रहूँ

खुशीयों को पीकर, आरजूए चमकती रहे
सब्ज़ बहारो पर, कलियों सा खिलता रहूँ

हर लम्हा हर पल, ख्वाहिशें मचलती रहे
इश्क़ में तेरे डूबकर, पतंगे सा जलता रहूँ

दर्द सभी भुलाकर, खामोशी चहकती रहे
ज़िन्दा रहना हैं तुझे, खुद से ये कहता रहूँ

“मुझ पर यूँ लिखने लगा हैं”

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साँसों में इक जूनून, यहाँ रहने लगा हैं 
लफ्ज़ो में दास्ताँ, फिर से वो कहने लगा हैं

वक़्त के थपेड़ो से, उलझता मेरा वज़ूद 
ठहरा था कहीं पर, फिर से वो बहने लगा हैं

साज़िशों से घिरा रहा, रूह का अक्स 
छुपा था कहीं पर, फिर से वो दिखने लगा हैं

कबसे इक शख्स, ख़ामोश हैं मुझमें
बिखरा जो दर्द से, फिर से वो जीने लगा हैं

ज़िंदगी से शिकवे, धीरे धीरे कम हुए 
छाया था जो साया, रूह से वो छटने लगा हैं

एक शायर “मिर्ज़ा”, रहता है मुझमें कहीं
महसूस करके वो, मुझ पर यूँ लिखने लगा हैं

 

“दिल-ए-नादाँ”

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दिल-ए-नादाँ, तू क्यूँ इतने दर्द सहता हैं
महफ़िल में होकर भी, यूँ तन्हा रहता हैं

खुदगर्ज़ी यह तेरी, या फिर कोई ज़िद हैं
ज़िन्दगी से आजकल, तू ख़फ़ा रहता हैं

झूठे रिश्तों की बंदिशें, दम घोटे जा रही
खुशियों से हर पल, अब तू ज़ुदा रहता है

उड़ने को तू आज़ाद है, नीले आसमां में
जंजीरो में सदा, फिर क्यूँ बंधा रहता है

रेशमी ज़ज्बात, छुपे है ख्यालों में कई
इक शख़्स के लिए, बस तू जला रहता है

एहसास का सागर, तुझमे है भरा हुआ
सबसे रूबरू होकर, खुदसे तू छुपा रहता हैं

 

“कहा है वो मरहम, जो मेरे ज़ख़्म भर दे”

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कहा है वो मरहम, जो मेरे ज़ख़्म भर दे 
बँजर में बारिश सा, रूह को तर कर दे 

ख्वाहिशों की तरह, बिखर रहा है वज़ूद
कुछ रेशमी लम्हें, वोह मुझे अता कर दे

बंदिशों में दफ़्न, सदियों से एहसास मेरा 
छूकर कोई इसे, फिर से मुझे ज़िंदा कर दे 

सरगोशी में छुपा है, इक ख्याल सुनहरा 
महफूज़ करलू उसे, कोई यह दुआ कर दे 

ख़ामोश है निगाहें मेरी, कुछ कहती नहीं 
झाँककर तू इनमें, मुझसे मुझे ज़ुदा कर दे 

“मिर्ज़ा” की गुज़ारिश, लफ्ज़ो से है धुली 
ले ले कोई दर्द मेरे, और मुझे रिहा कर दे

“ज़िंदगी के तन्हा सफर में इक बंजारा हूँ”

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ज़िंदगी के तन्हा सफर में इक बंजारा हूँ 
वक़्त से लड़ता हुआ मैं झोंका आवारा हूँ

कदम कदम पर ज़माने ने ठुकराया मुझे 
अंधेरो में डूबता हुआ मैं एक सय्यारा हूँ

साज़िशों के ग़ुबार से हर पल घिरा हुआ 
समंदर से ज़ुदा होता मैं कोई किनारा हूँ

तन्हाई के मंजर फैले है बस चारो तरफ 
ख़ामोशी में दफ़्न होता मैं एक इशारा हूँ

बंदिशों से आज़ाद होने की ज़िद है मुझे 
सहरा में भटकता हुआ मैं कोई नज़ारा हूँ

दुनिया के झूठे रिश्तो से अब दूर होकर 
अनजानी राहों पर खुद अपना सहारा हूँ ..

“तेरी यादें”

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रफ़्ताह रफ़्ताह तेरी यादें मिटाता गया 
मैं ग़ज़ल में हाल-ए-दिल छुपाता गया 

सुनहरे तेरे ख्यालों में हर लम्हा डूबकर
मैं तन्हाई में अक्सर रूह जलाता गया 

जब जब जज्बाती हुआ यह दिल मेरा 
यूँ अश्क़ों से भरी पलकें झुकाता गया 

ख्वाबों के जहाँ में जब से मिले हो तुम 
यूँ साँसों में तेरा एहसास समाता गया 

वज़ूद की पुकार ना सुन सका ‘मिर्ज़ा’ 
मैं तेरे लिए बस खुद को भुलाता गया