“My Rajasthan”

रंग रंगीलो राजस्थान, रंगीले सब रूप और भेस
मेहमान को हम कहते जहाँ, पधारो नी म्हारे देस

पन्ना-मीरा की धरती यह, बलिदान से मांग भरती है
रणबाँकुरों की जननी यह, वीर रस स्वांग रचती है

मिसरी सी मीठी बोली, प्रेम की पावन परिभाषा
हर चार कोस के बाद जहाँ, बदल जाती हैं भाषा

रेतीले धोरों के दरमियां, ज़िन्दगी मुस्कुराती है
मिट्टी की खुशबू लिए, लोकगीत गुनगुनाती हैं

फौलादी किलों की तरह, मज़बूत हैं इरादे यहाँ
मासूम दिलों की तरह, लोग हैं सीधे सादे यहाँ

सहनशीलता और कर्मठता, मिट्टी में इसकी घुली
त्याग ओज़ वचनबद्धता, विरासत में इसको मिली

इतिहास के पन्नों पर, दर्ज़ हैं जितनी कहानियां
वीरों की वो अमर गाथाएं, शौर्य की निशानियां

राजपूताना की यह आन बान, रखे सदा सबका मान
रण हो चाहे कृषि विज्ञान, बढ़ाई हमेशा हिंद की शान

विकास विद हैरिटेज की, नई डगर पर चल निकला है
बीमारू स्टेट की इमेज से, अब जाकर यह निकला है

सतरंगी जय राजस्थान, अतरंगी अंचल परिवेश
मेहमान को सब कहते जहाँ, पधारो नी म्हारे देस

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2016
राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान
‪#‎विषयवस्तुआधारितकविताएं‬(विआक)

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“म्हारो राजस्थान”

‪#‎ObjectOrientedPoems‬(OOPs)

रंगीलो म्हारो राजस्थान, हैैं रंगीला अडा रा भेस
मेहमान ने सगळा खेवे जडे, पधारो नी म्हारे देस

पन्ना-मीरा री धरती आ, बलिदान सू मांग भरती आ
रणबाँकुरां री जननी आ, वीर रस स्वांग रचती आ

मिसरी सी मीठी बोली, प्रेम री पावन परिभाषा
हर चार कोस के बाद अडे, बदल जावे हैं भाषा

रेतीला धोरा रे बीच, आ ज़िन्दगी मुस्कुरावे है
माटी री खशबू लिए, लोकगीत गुनगुनावे हैं

फौलादी गढ़ा री ज्यान, तगङा हैं जी ईका इरादा
भोळा मनङा री ज्यान, लोग अडा रा सीधा सादा

सहनशीलता और कर्मठता, माटी में ईकी घुली
त्याग ओज़ वचनबद्धता, विरासत में ईने मिली

इतिहास रा पन्ना पर, दरज़ हैं जितरी कहाणियां
वीरां री वा अमर गाथा, शौर्य री सब निशानियां

राजपूताना री आ आन बान, राखे सदा सबका मान
रण हो चाहे करसी विज्ञान, बढ़ावे सदा हिंद री शान

विकास सागे हैरिटेज री, नई डगर पे चाल पङ्यो है
बीमारू प्रदेश री छवि सू, अब जार ओ निकळ्यो है

सतरंगी जय राजस्थान, अतरंगी अंचल परिवेश
मेहमान ने भगवान खेवे जडे, पधारो नी म्हारे देस

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2016
राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान
‪#‎विषयवस्तुआधारितकविताएं‬(विआक)

“Kabir Khan”

Happy birthday….cute kabir…dear nephew. .
‪#‎ObjectOrientedPoems‬(OOPs)

मासूमियत विद नाॅटीपन का, मिक्सचर है कबीर
अनुशा एंड तराना का, क्यूट यंगर ब्रदर है कबीर

रूठने में तो भईया जी, इसका कोई जवाब नहीं है
बहाने बनाने में बेशक, इसका कोई हिसाब नहीं है

डैडी का यह लाडला, और दादा दादी की है जान
पूछे जो कोई नाम तो, कहता है मैं हूँ कबीर ख़ान

फट से नाराज़ होता है, झट से मान भी जाता है
कभी गुस्सा तो कभी इस पर, प्यार भी आता है

नये नये फिल्मी डायलॉग, इसे याद बहुत रहते हैं
बड़ा ही होशियार बच्चा है लोग यही सब कहते हैं

न टीचर से न क्रीचर से, बस पापा से यह डरता है
डाँटे जब भी वो जोर से तो सुबकियाँ यह भरता है

हर साल छब्बीस मार्च को, इसका बर्थ डे आता है
नाना नानी का यह दुलारा, सबके मन को भाता है

दिल चुराने में और बातें बनाने में, माहिर है कबीर
सितारों की तरह जैसे कोई नन्हा साहिर है कबीर

– Iffy Mamu (RockShayar)

साहिर – Magician/जादूगर

Copyright © 2016
RockShayar Irfan Ali Khan
All rights reserved.

“नबी-ए-क़रीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम”

प्यारे आका नबी-ए-क़रीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
नाम लेते ही जिनका, दिल से मिट जाएं हर ग़म

तमाम नबियों के सरदार, बुलंद है आपका किरदार
अल्लाह के साथ हमेशा, आता है नाम हर बार

दो जहां यह कायनात, बनी है जिनके सदक़े में
ज़मीन आसमान हर शै, सजी हैं उनके सदक़े में

इस्लाम के आप पैरोकार, मदनी आका है सरकार
या मुस्तफ़ा रसुलुल्लाह, सलाम आप पर बेशुमार

इस उम्मत की ख़ातिर आपने, क्या क्या नहीं सहा
ताउम्र फ़क़त दौर-ए-ज़मां आपका दुश्मन ही रहा

लफ़्ज़ों में इतनी कुव्वत कहाँ, जो कर सके आपका बयां
हर पल यूंही होता रहेगा, सुन्नतों पर आपकी अमल यहाँ

जनाब-ए-मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
ज़िक़्र होते ही आपका, दिल से मिट जाएं हर ग़म ।

‪#‎RockShayar‬ Irfan Ali Khan

Happy birthday Tabassum Aapa…

हिम्मत नहीं कभी हारे जो, आये कितने भी भँवर
आयरन लेडी की तरह, है मिसेज तबस्सुम तँवर

बचपन से ही प्रतिभाशाली, स्मार्ट और एक्टिव है
कॅरिअर के मामले में यह, शुरू से ही प्रोगेसिव है

यूँ तो अध्यापिका है मगर, कवयित्री छुपी है इनमें
परिवार की मुख्य स्तंभ, सहज स्त्री रहती है इनमें

पतिदेव इमरान साहब, और प्यारी बेटी है ज़ोया
दोनो ने मिलकर घर में, खुशियों का है पेङ बोया

डांसिंग के अलावा, कुकिंग में भी यह एक्सपर्ट है
मम्मी पापा की फ़िक्र में, बेचैन रहता इनका हर्ट है

हर साल इक्कीस मार्च को, इनका बर्थ डे आता है
उम्मीदों के गिफ्ट्स, वो खुशियों के पैग़ाम लाता है

जीवन रथ पर हो सवार, आगे बढ़ रही निरन्तर
आयरन लेडी की तरह, है मिसेज तबस्सुम तँवर
– इरफ़ान भाई

“Anusha Khan”

Happy birthday Anusha…my nephew. .

एक लङकी दीवानी सी, है जिसकी अलग पहचान
कभी कूल तो कभी एंग्री बर्ड, देट इज अनुशा ख़ान

सबसे बङी भांजी यह मेरी, एट्टियूड में रहती है
मन ही मन खुद से हर घङी, जाने क्या कहती है

अजमेर के सुप्रसिद्ध स्कूल, संस्कृति में पढ़ती है
होमवर्क से बचने को, नित नए बहाने गढ़ती है

मिस्ट्री नाॅवेल के किसी, कैरेक्टर सी यह लगती है
चिकनी चुपङी बातों से यूँ पलक झपकते ठगती है

नन्हा भाई कबीर ख़ान और बहन है छुटकी तराना
छोटा सा परिवार इनको, प्यारे है दादा और नाना

हर वर्ष इक्कीस मार्च को इसका जन्मदिन आता है
फैमिली का हर एक सदस्य एंटीक तोहफे लाता है

अम्मी की जो लाडली है, और पापा की है वो जान
थोङी नटखट थोङी मैच्योर, देट इज अनुशा ख़ान

– इरफ़ान मामू

For Anis Khan and Manoj Kumar Meena… PaPa banne ki mubaraqbad ho bhaiyo… For little angle..

एक मासूम फरिश्ते ने जब यूँ आँखें खोली
फिर धीरे से मुस्कुराकर ये ज़िन्दगी बोली

खुशियों की बारात लेकर, आई हूँ मैं तेरे लिए
बारिश की सौगात लेकर, आई हूँ मैं तेरे लिए

नन्ही नन्ही पलकों पर, खुदाई नूर उतर आया है
औलाद की शक्ल में अपना वज़ूद नज़र आया है

जिस रोज यह तोतली ज़बान मुझे पापा कहेगी
उस रोज ज़िन्दगी में, कमी न कोई बाक़ी रहेगी

ग़मों की वो परछाइयाँ, कोसो दूर हो गयी अब
सीने में छुपी तन्हाइयाँ, मीलों दूर हो गयी अब

बंजर था दिल का चमन, अब जाकर खिला है
बेचैनी को मेरी चैन कहीं, अब जाकर मिला है

एक मासूम फरिश्ते ने जब यूँ आँखें खोली
फिर धीरे से पास आकर ये ज़िन्दगी बोली

जीने की सौगात लेकर, आई हूँ मैं तेरे लिए
लम्हों की बारात लेकर, आई हूँ मैं तेरे लिए ।।

– Iffy Chachu

“Mrs. Meenu Bhati”

For my sister Meenu Bhati…

‪#‎ObjectOrientedPoems‬(OOPs)

ग़मों को हराकर जिन्होंने, ज़िंदगी में खुशियाँ बाँटी
आयरन लेडी की तरह, स्ट्रॉंग है मिसेज मीनू भाटी

स्वीट साइमा और मासूम मिशु, आँखों के तारे हैं
समीर साहब पतिदेव इनको, जान से भी प्यारे है

इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर है
ग्लोबल टेक्निकल कैम्पस में असिस्टेंट प्रोफेसर है

बीकानेर घर इनका, और चूरू में ससुराल है
घर ऑफिस दोनो संभाले, यही तो कमाल है

अम्मी-अब्बू की चहेती यह, लाडली बिटिया है
दिल से मुस्कुराए यूँ, जैसे बहती कोई नदियाँ है

अंधेरे मिटाकर जिन्होंने, ज़िंदगीभर खुशियाँ बाँटी
प्रगति पथ पर सतत् अग्रसर, है मिसेज मीनू भाटी

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‪#‎विषयवस्तुआधारितकविताएं‬(विआक)
राॅकशायर.वर्डप्रेस.काॅम

“तलाक (Divorce)”

विवाह नामक संस्था को, बर्बाद करता है जो फोर्स
घोर मानसिक त्रासदी है जी, तलाक कहो चाहे डिवोर्स

कहाँ फँस गए रे भय्या, कोर्ट कचहरी के चक्कर में
ज़िंदगी खुद लुटाई अपनी, शादी ब्याह के चक्कर में

अलग अलग हैं धाराए, अलग अलग सब मुकदमे
खुद को कटघरे में पाकर, मिले वो मानसिक सदमे

चौपट हुआ कॅरिअर सब, हुई जो पैसों की बर्बादी
अब जाकर मालूम हुआ, महंगी है कितनी आज़ादी

स्त्रियों को मिले हैं जब से, मनमाने अधिकार यहाँ
पुरूषों के तो तब से ही वो, खो गए अधिकार यहाँ

घरवाले रिश्तेदार सब, कहते हैं समझौता कर लो
नसीब का खेल है ये, हालात से समझौता कर लो

बिगङते रिश्तों के खेल में, झूठी साज़िश के मेल में
फ्यूचर नज़र आता है अब तो, क़ैद किसी जेल में

विश्वास नहीं होता है अब, विश्वास पर भी यहाँ
खो गए वो जज़्बात सब, मिलता नहीं कोई निशां

मैरिज के नाम से ही यारों, अब तो नफ़रत हो गई
खुद को पाना ही बस, इस दिल की हसरत हो गई

गृहस्थी नामक संस्था को, बर्बाद करता है जो कोर्स
एक्सट्रीम मेंटल टाॅर्चर है जी, तलाक कहो चाहे डिवोर्स ।।

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RockShayar Irfan Ali Khan
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“मेरा दाहिना हाथ काँपता है”

मेरा दाहिना हाथ काँपता है ।
अक्सर जब भी मैं कोई चीज पकङता हूँ ।
जैसे चाय, काॅफ़ी या फिर
रोजमर्रा की ज़रूरत का कोई सामान ।

पता नहीं ऐसा क्यों होता है ?
कई दफ़ा लोग हँसते हैं मुझ पर
यहाँ तक कि छोटे बच्चे भी ।

कभी जानने की कोशिश ही नहीं की मैंने
कि आख़िर ये मेरे साथ ही क्यों होता है ?

तभी एक दिन यूँ अचानक बैठे बैठे
अपनी कलाई पर बने हुए
उस चोट के निशान को देखते देखते
अपना बचपन याद आ गया ।

एक हादसा याद आया ।
जिस वक्त मैं बहुत छोटा था ।
फिर भी कुछ कुछ धुंधली यादें
ज़ेहन के अंदरूनी हिस्से में दबी पङी थी कहीं ।

शायद मैं पांच साल का रहा होगा ।
हमारे खेत पर एक
चारा काटने की मशीन लगी हुई थी ।
जिसे हम कुट्टी की मशीन कहते थे ।
मैं रोजाना उसे कौतूहल से देखता
कि ये चारा कैसे काट देती है ?
यूँही कुछ तिनके देकर उन्हें काटता रहता था ।

एक दिन पता नहीं मुझे क्या सूझी !
खेलते खेलते उस मशीन को ग़ौर से देखने लगा
और मन ही मन सोचने लगा !
आज तो पता लगाकर ही रहूंगा
कि ये साला सिस्टम है क्या ?
बाल मन में जिज्ञासा का कीङा जाग चुका था ।

चारे के साथ एकदम से यूँ अचानक
मेरा हाथ भी अंदर चला गया ।
और मैं जोर से चिल्लाया ।
वो तो उस मोटी ऊनी जर्सी ने बचा लिया
वरना उस दिन तो
मैं अपने हाथ से ही हाथ धो बैठता ।

बहुत खून निकला ।
और पापा ने भी खूब डांटा ।
मुझे तुरंत हाॅस्पिटल ले जाया गया ।
तीन टाँके आए दाहिनी कलाई पर
नब्ज़ के ठीक पास ।
खुदा ने बचा लिया उस दिन तो मरते मरते ।

मगर उस दिन के बाद से ही
ये हाथ काँपना शुरू हो गया ।

शायद अहसास की कोई नाज़ुक रग
कट गई थी उस रोज हादसे में कहीं !
इसीलिए ये दाया हाथ काँपता है मेरा ।

हर एक चीज इसे जाने क्यों
वहीं कुट्टी की मशीन लगती है ।
शायद इसीलिए डर के मारे काँपता है
या फिर यूँही बेवजह !

पता नहीं ये क्या है ?
पता नहीं ये क्यों है ?

गर जो भी हो
इतना ज़रूर यक़ीं है
कि ये कोई बीमारी नहीं है ।
सिर्फ डर है
मेरे अंदर का डर ।
जिस पर काबू पाना
सीख रहा हूँ मैं अब धीरे धीरे ।।

“सफ़र कभी मुकम्मल नहीं होता है”

सफ़र कभी मुकम्मल नहीं होता है
जहाँ से शुरू हुआ, वहीं ख़त्म होता है
ख़याल कभी दरअसल ख़याल नहीं होता है
जहाँ से पैदा हुआ, वहीं दफ़्न होता है
सफ़र कभी मुकम्मल नहीं होता है
जहाँ से शुरू हुआ, वहीं ख़त्म होता है ।

सफ़र के हमसफ़र हैं जो ये रास्ते
चल रहे यूँही ना जाने किसके वास्ते
राह में जो भी मिला साथ रख लिया
मंज़िल है एक मगर बदलते गए रास्ते ।

ख़्वाब कभी दरअसल ख़्वाब नहीं होता है
जहाँ से ताबीर हुआ, वहीं ख़त्म होता है
सफ़र कभी मुकम्मल नहीं होता है
जहाँ से शुरू हुआ, वहीं ख़त्म होता है ।

वक्त हर पल हर घङी गुज़रता जाता है
वक्त के साथ और भी निखरता जाता है
वक्त की बिसात पर शतरंज है मुकद्दर
बनता बिगङता और सँवरता जाता है ।

सवाल कभी दरअसल सवाल नहीं होता है
जहाँ से पैदा हुआ, वहीं दफ़्न होता है
सफ़र कभी मुकम्मल नहीं होता है
जहाँ से शुरू हुआ, वहीं ख़त्म होता है ।।

“भागते हुए पेङ”

भागते हुए से नज़र आते हैं पेङ
बस या ट्रेन में सफ़र करते हुए
अक्सर जब खिङकी से बाहर देखो तो
यही नज़ारा दिखता है ।

जाने किसके पीछे भाग रहे हैं ?

ट्रेन आगे की ओर भागती है
और पेङ पीछे की ओर ।

कई बार सोचा
कि रोककर पूछू इन्हें !
यूँ किसके पीछे भाग रहे हो तुम ?

पर फिर सोचा कि
किसी दौङते हुए को
बीच में ही क्यों टोका जाए !

बचपन में घर से खेत तक वो जो रेस लगती थी
बङी कमाल की होती थी वो ।
फर्स्ट आने पर ढ़ेर सारी टाॅफियां मिलती थी ।

शायद इन पेङो को भी
टाॅफियो का लालच दिया गया हो !

जब ट्रेन रूकती है तो ये भी रूक जाते हैं ।
रेस्ट करते हैं थोङी देर को
और फिर शुरू हो जाती है वही रेस ।

“वो बचपन का वहम अब तक नहीं टूटा
के पेङ नहीं भागते है बल्कि हम भागते हैं”

पेङ तो पैदाइश से लेकर मौत तक
हमेशा से वही खङे रहते हैं ।

इन्हें क्या मालूम सफ़र किसे कहते हैं ?

आज जब ट्रेन की खिङकी से बाहर
पेङो को यूँ बेलगाम भागते हुए देखा
तो पता चला
कि खुद से कितनी दूर आ गया हूँ
भागते भागते !

ख़्वाहिशों की इस ट्रेन का
कोई स्टोपेज नहीं दिखता कहीं !

चलती ही जा रही है बस
वक्त की पटरी पर यूँ नाॅनस्टोप ।
और वो जो चैन थी
इमरजेंसी ब्रेक के लिए
वो भी टूट चुकी है कब की यहाँ ।

अब तो पेडों के साथ साथ
खुद को भी भागते हुए देखता हूँ ।

वहम अच्छा है
अब तक नहीं टूटा
यकीनन पेङ भागते हैं
मैं तो आज भी वहीं पर ठहरा हुआ हूँ
जहाँ कल था ।
इन भागते हुए पेङो को देखते देखते
शायद मैं खुद एक पेङ बन गया हूँ
बिना फल फूल वाला सूखा पेङ ।।

RockShayar

“मेरे दोस्त को जब उसका जुनून मिल गया”

उस रोज मुझे भी सीने में सुकून मिल गया,
मेरे दोस्त को जब उसका जुनून मिल गया ।

पहचान मिली जिस्म को, तब कहीं जाकर यहां
वतन की मिट्टी में जब मेरा ये ख़ून मिल गया ।

डरेगा कोई क्यों भला, जुर्म के अंजाम से यहाँ ?
कानून से बचने का जब उसे कानून मिल गया ।

प्यासे को पानी मिला, लिखू कैसे एहसास को ?
बाद मुद्दत के जैसे शायर को मज़्मून मिल गया ।

हर्फ़ बने वो हमदम मेरे, उङ चले संग संग मेरे
लिखने का इस क़दर जोश ओ जुनून मिल गया ।

माँ ने सुलाया जब गोद में, तो यूं लगा इरफ़ान
बेचैनी को मेरी जैसे मुकम्मल सुकून मिल गया ।।

– ‘राॅकशायर’ इरफ़ान अली ख़ान

जिस्म – शरीर
वतन – मातृभूमि
मुद्दत – अवधि
शायर – कवि
मज़्मून – लेखन का विषय
हर्फ़ – अक्षर
मुकम्मल – सम्पूर्ण

 
 

“शुक्रिया ऐ ज़िंदगी”

दिल से तुझे मैं शुक्रिया कहना चाहता हूं ऐ ज़िंदगी
संग तेरे ही अब तो बस रहना चाहता हूं ऐ ज़िंदगी

न मैं तुझसे नाराज़ हूं, न तू मुझसे नाराज़ होना
हर घङी बस उम्मीदों के, आकाश में परवाज़ होना

गिले शिकवे जो भी हैं, बैठकर हम बतिया लेंगे
आहें गिरहें जो भी हैं, मिलकर सब सुलझा लेंगे

गुज़र चुका है जो यहां, आओ उसे हम भूल जाएं
जीते कैसे है सीखने, चलो ज़िंदगी के स्कूल जाएं

लग जा गले से, आ तुझे मैं प्यार करना चाहता हूं
आशिक हूं तेरा दिल से ये इक़रार करना चाहता हूं

बहुत सह लिया दर्द यहां अब और नहीं ऐ ज़िंदगी
बहुत रह लिया ज़र्द यहां अब और नहीं ऐ ज़िंदगी

अब जाकर ये समझ आया, मुझको तेरा इशारा
दो पल की मेहमान है तू, मिलेगी न फिर दोबारा

दिल से तुझे मैं शुक्रिया कहना चाहता हूं ऐ ज़िंदगी
संग तेरे ही अब तो बस बहना चाहता हूं ऐ ज़िंदगी

@RockShayar Irfan Ali Khan

 
 

क्या पुरुष होना अपराध है ?

क्या पुरुष होना अपराध है ?
मन में अचानक एक प्रश्न उठा आज
अकारण नहीं अकस्मात नहीं असहज नहीं
कई अनुभवों के बाद, कई कटु पलों के बाद
मन पूछ ही बैठा ये प्रश्न आख़िर स्वयं मन से ।

हमेशा से हर जगह बस यही सुनते आए
कि हमारा समाज पुरुष प्रधान है ।
महिलाओं की स्थिति बहुत दयनीय है यहाँ
जो कि गलत भी नहीं है ।
मगर इस तथ्य के चलते यह मान लेना
कि समस्त पुरुष
निष्ठुर
निर्दयी
कठोर
अपराधी
अत्याचारी
संवेदना रहित होते हैं
या पुरुष है तो सदैव गलत ही होगा !
ये कहाँ का न्याय है ?

मैं यह नहीं कहता
कि महिलाओं के अधिकार कम कर दिए जाए
या समाप्त कर दिए जाए ।
क्योंकि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो
सर्वाधिक अपराध एवं अत्याचार
उन्ही पर हो रहा हैं ।
परंतु इस अवधारणा के चलते
पुरुष को सिर्फ पुरुष होने की वजह से
प्रथम दृष्ट्या तौर पर दोषी मान लेना
वैधानिक तौर पर बिल्कुल अनुचित है ।
आज कै इस वैज्ञानिक दौर में
मनुष्य के मौलिक अधिकारों और
मानवाधिकार नियमों की समुचित व्याख्या एवं
यथार्थपरक क्रियान्वन अत्यंत आवश्यक है ।
न कि केवल पुराने तथ्यों और सामाजिक
कहीं सुनी बातों के आधार पर
एकपक्षीय निर्णय सुना दिया जाए ।

कहने का आशय सिर्फ इतना है कि
हम सब मानव जाति के अभिन्न अंग हैं ।
स्त्री और पुरूष एक दूसरे के स्पूरक हैं
न कि कट्टर विरोधी या घोर प्रतिद्वंदी ।
अतः बिना किसी जातिगत भेदभाव के
सबके हितों की रक्षा होनी चाहिए ।

“किसी के भी मन में
यह प्रश्न नहीं उठना चाहिए,
कि उसका अस्तित्व खतरे में है
या उसका स्त्री/पुरूष होना ही
उसका अपराध है”

आज ज़रूरत है हमें
इस विषय पर सोचने की ।
ताकि कल फिर किसी के मन में
ऐसा कोई प्रश्न न उठे
अपने अस्तित्व बोध को लेकर ।
हम सब अपने आसपास ध्यान रखें
कि नियम और कानून की आङ में
कहीं कोई मनुष्य चाहे वो स्त्री हो या पुरुष मानसिक हिंसा का शिकार तो नहीं हो रहा है ।

हो सकता है
यह मेरे व्यक्तिगत विचार हो !
परंतु कल जो प्रश्न उठा था इस मन में कहीं
अपना उत्तर खोज रहा है वो आज भी कहीं ।।

“राजस्थान पत्रिका (Rajasthan Patrika)”

‪#‎ObjectOrientedPoems‬(OOPs)
(Since 7th March 1956…..60 years journey)

ख़बरों ने जिसकी बदला है, लोगों के सोचने का तरीका
विश्वसनीयता का दूसरा नाम, यूँ तो है राजस्थान पत्रिका

कुलिश जी ने बोया था जो, बीज क़लम की ताकत का
बन गया हरा भरा पेङ वो अब, आवाम की ताकत का

पत्रकारिता और सच्चाई, हैं जिसके आधार सदा
आधुनिकता में भी अच्छाई, ये सबसे अख़बार ज़ुदा

परिवार को एक सूत्र में बांधे, परिवार परिशिष्ट यहाँ
युवाओं के दिल में पत्रिका प्लस का, स्थान है विशिष्ट यहाँ

सिटी का सम्पूर्ण हालचाल, सिटी पत्रिका के नाल
समस्याओं पर पैनी नज़र, ये तो जी पेपर कमाल

नेशनल ग्लोबल स्पोर्ट्स बिज़नेस, या हो चाहे राजनीति
पाठकों को सबसे रूबरू कराना, रही है सदा इसकी रीति

देश दुनिया स्पाॅटलाइट, सम्पादकीय और बात करामात
समाचार पत्र ये बयान करता हैं, समाज के बदलते हालात

कोठारी जी के नेतृत्व में, निरंतर आगे बढ़ रहा है
प्रिंट मीडिया में कीर्तिमान, नित नये ये गढ़ रहा है

शब्दों से सिखाया जिसने, ज़िंदगी जीने का तरीका
न्यूज पेपर विद सोल, वो है जी राजस्थान पत्रिका

Copyright © 2016
RockShayar Irfan Ali Khan

“सवाल सारे गलत थे, जवाब क्या देते”

सवाल सारे गलत थे, जवाब क्या देते
अपनी मोहब्बत का उन्हें हिसाब क्या देते ।

वो इल्ज़ाम लगाते रहे, संगदिल होने का हम पर
काँटों भरा दामन है, उन्हें गुलाब क्या देते ।

रात भर जागकर भी, कम न हुई बेचैनी कभी
वो नींद थी, नींद को अधूरे ख़्वाब क्या देते ।

बेवजह कुछ भी नहीं है, इतना समझ लीजे
जो पढ़ नहीं सकता, उसे किताब क्या देते ।

खुद ही कर बैठे जब बग़ावत अपने आप से,
दुश्मन का किसी और को खिताब क्या देते ।

वो पूछ बैठे हमसे, अपना पता इक रोज यूं
हम खुद लापता थे, भला जवाब क्या देते ।।

For my niece Zoya… Happy birthday Zoya…

आसमान से उतरी एक मासूम परी है ज़ोया
सर्द में निकली हो जैसे धूप सुनहरी है ज़ोया ।

खिलौनों का इसके पास कलेक्शन पिटारा है
चाँद के नज़दीक ये चमकता हुआ सितारा है ।

नानू नानी के पास अपने ननिहाल में रहती है
मुझ को देखते ही यह एलियन मामू कहती है ।

सेंट मार्शल स्कूल में रोजाना ये पढ़ने जाती है
घर पर आते ही फिर जो खुद मैम बन जाती है ।

सबसे हटकर नानू पर यह दादागिरी चलाती है
हर वक़्त बस अपनी ही फिलाॅसोफी झाङती है ।

मम्मा डैडी के आते ही सब खुशियां मिल जाती है
बाद उनके जाते ही चेहरे पर उदासी छा जाती है ।

टीवी चालू होते ही यह रिमोट पर कर लेती है कब्जा
लगाओ न प्रोग्राम मेरा तारक मेहता का उल्टा चश्मा ।

कार में बैठने से इसका जी बहुत घबराता है
ज़ौहेर मेरा भाई है कहकर उस प्यार आता है ।

ध्यान से जाना नानू रोज खुदा हाफ़िज़ कहती है
अपनी मुमानी के हाथों से ही यह तैयार होती है ।

जो कहता है वोही होता है यही है तकिया कलाम
लाओ मेरे टेन रूपीज नानू तभी करूंगी काम ।

नानी को न पाकर घर पर बेचैन सी हो जाती है
बातें करते करते नानू की गोद में ही सो जाती है ।

शबनम से निथरी हुई नूर की बूंद है ज़ोया
ख़ामोश बहती हुई आवाज़ की गूंज है ज़ोया ।।

– एलियन मामू (Iffy Mamu)

For my nephew Zohair Kamil… Happy birthday Zohair…

यूं तो सबकी आँखों का तारा है ज़ौहेर
मम्मी पापा का राजदुलारा है ज़ौहेर ।

शरारतों से अपनी ये दिल जीत लेता है
मासूमियत से सबका मन मीत लेता है ।

रोज सुबह तैयार होकर स्कूल जाता है
होमवर्क करना मगर यह भूल जाता है ।

क्लास में हमेशा अव्वल नम्बर आता है
सबसे मिलता है, सबके मन को भाता है ।

नानू नानी इसे प्यार से बबला कहते हैं
घर में इसके होने से सब खुश रहते हैं ।

शरमाकर मुझ को यह इफ़्फी चाचू कहता है
जाता हूं जब भी मिलने, मेरे ही पास रहता है ।

मुस्कुराहट की मख़मली चादर ओढ़े हुए
रौशनी बिखेरता हुआ सितारा है ज़ौहेर ।

यूं तो सबकी आँखों का तारा है ज़ौहेर
मम्मी पापा का राजदुलारा है ज़ौहेर ।।

-इफ़्फी चाचू

Happy Birthday to you PaPa…I love you… (1st March 1953) …64th Birthday…

हैप्पी बर्थडे टू यू पापा
तिरेसठ साल हो गए हैं
न आपने कभी बताया
न हमने कभी मनाया
पता नहीं हमारे दरमियान
इतने फ़ासले क्यूं हैं ?
जज़्बात दोनों तरफ हैं
मगर पहल कोई नहीं करना चाहता ।
मैं भी बिल्कुल आपकी तरह ही हूं
मन ही मन सब छुपाकर रखता हूं
कुछ भी ज़ाहिर नहीं होने देता हूं ।
पता नहीं पापा हम ऐसे क्यूं हैं ?
सच कहूं तो हमारे घर में सब ही ऐसे है
दिलों में मोहब्बत छुपाए रखते हैं
और बाहर बस दिखावा दुनियादारी
इधर उधर की बातें करते रहते हैं
कोई एक दूसरे से ये नहीं कहता
कि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं ।
वक़्त आ गया है पापा
हमें अब बदलना चाहिए
नहीं तो हमारा परिवार
यूंही बिखर जाएगा
धीरे धीरे टुकङो में ।
कहने को तो सब पास रहते हैं
पर असल में बहुत दूर हो चुके हैं
हालातों के इस जंगल में ।
पापा ! इस बर्थडे पर
मैं आपसे यही विश चाहता हूं
कि अब से हम अपने जज़्बातों को छुपायेंगे नहीं
बल्कि हर मौज़ूअ पर खुलकर बात करेंगे ।
हम पाँचों भाई बहन आप और अम्मी
कुल मिलाकर हम सात जनो के बीच में
अब से कुछ भी अजनबी नहीं रहना चाहिए ।
मैंने जो भी महसूस किया है
लिख दिया आज सब यहां
अगेन हैप्पी बर्थडे टू यू पापा
आप जियो हज़ारों साल
साल में दिन हो बेशुमार ।।
-आपका इफ़्फी

“अपनी तो नींद उङ गई तेरे फ़साने में”

अपनी तो नींद उङ गई तेरे फ़साने में,
और तूने खुद आग लगाई मेरे आशियाने में ।

एक दिन में नहीं बन गया मैं ऐसा यहां,
सदियाँ लगी हैं मुझे तो तुझ को भुलाने में ।

याद रखना इक बात, मेरे जाने के बाद
मिलेगा न कोई मुझ जैसा इस जमाने में ।

वक़्त से मिला है वो, वक़्त तो लगेगा ही
लिखा है जो भी दिल पर, उसे मिटाने में ।

आसां नहीं है इतना, बरसों लग जाते हैं
दर्द में होकर भी यूं हर रोज मुस्कुराने में ।

मुकम्मल हो ही जाती, हमारी भी कहानी
अफ़सोस, तुमने देर कर दी ज़रा आने में ।

मरते वक़्त ये मालूम हुआ इरफ़ान मुझे,
ज़िन्दगी गुज़र गई खुद को आज़माने में ।।

जब ओखली में सिर दिया, तो मूसलों से क्या डरना

जब ओखली में सिर दिया, तो मूसलों से क्या डरना
छोङो सब चिंताएं तुम, क्या जीना और क्या मरना
अपने ही साथी बन जाओ, छोङकर सब आहें
राही उन्मादी बन जाओ, मोङकर खुद राहें
पग पग पर मिलेंगे यहां, दमकते हुए दोराहे तुझे
कपट की कङकती धूप में, चमकते हुए चौराहे तुझे
कौन है अपना, कौन पराया ? सब जान ले तू
तुझी में है मनमीत तेरा, अब तो यह मान ले तू
डर को अपने डराना है, और खुद को पाना है
हर हाल में गुनाहों से यहां, खुद को बचाना है
करने वाला तो वो है, बस उसी पर यक़ीन रखो
मांगो जब भी रो रोकर, तर दिल की ज़मीन रखो
ज़िंदगी की तकलीफ़ों से, इतना भी क्या घबराना
कर लो न अपना एहसास, इतना भी क्या शर्माना
जब ओखली में सिर दिया, तो मूसलों से क्या डरना
छोङो सब फिक़्रे तुम, क्या जीना और क्या मरना ।।
RockShayar Irfan Ali Khan

“अभी तय करने हैं सफ़र कई”

अभी तय करने हैं सफ़र कई
बाक़ी हैं अभी मंज़िलें कई
अभी तो मैदान जीता है
पहाङो पर बने हैं किले कई
अभी तय करने हैं सफ़र कई
बाक़ी हैं अभी मंज़िलें कई ।
मेहनत करो तो सब मिलता है
जब चाहो वो तब मिलता है
कह गए वो सब पीर फ़कीर
चाहत हो सच्ची तो रब मिलता है
अभी फ़तह करने हैं डर कई
बाक़ी हैं सहमे हिस्से कई
अभी तो उन्वान लिखा है
बाक़ी है अभी तो किस्से कई
अभी तय करने हैं सफ़र कई
बाक़ी हैं अभी मंज़िलें कई ।
दिल की सुनो है वही सच्चा
जैसे हो कोई मासूम बच्चा
खुद को बना लो मज़बूत इतना
के ना रहे फिर कोई घाव कच्चा
अभी जय करने है सिकंदर कई
सीने में छुपे बवंडर कई
अभी तय करने हैं सफ़र कई
बाक़ी हैं अभी मंज़िलें कई ।
अभी तय करने हैं सफ़र कई
बाक़ी हैं अभी मंज़िलें कई
अभी तो मैदान जीता है
पहाङो पर बने हैं किले कई
अभी तय करने हैं सफ़र कई
बाक़ी हैं अभी मंज़िलें कई ।।
‪#‎RockShayar‬