“बन सरफिरा तू भी”

My new song..
ज़िंदगी है सरफिरी ये
बन सरफिरा तू भी
बहती जाये जिस तरह से
बह उस तरह तू भी
ज़िंदगी है शायरी ये
बन डायरी तू भी
लिखती जाये जिस तरह से
लिख उस तरह तू भी
ज़िंदगी है सरफिरी ये
बन सरफिरा तू भी
बहती जाये जिस तरह से
बह उस तरह तू भी…

किस्मत के झोंके चख ले
मिले जो दर्द सारे रख ले
बेवजह यहाँ कुछ नहीं है
गिर उठके रोके हँस ले
ज़िंदगी है एक परिंदा
बन आसमां तू भी
उङती जाये जिस तरह से
उङ उस तरह तू भी
ज़िंदगी है सरफिरी ये
बन सरफिरा तू भी
बहती जाये जिस तरह से
बह उस तरह तू भी…

ख़ामोशी में जवाब ढूँढ ले
थोङा नहीं बेहिसाब ढूँढ ले
ख़्वामख़ाह यहाँ कुछ नहीं है
आवारगी बेहिसाब ढूँढ ले
ज़िंदगी है एक पहेली
बन खिलाङी तू भी
चले ये बाजी जिस तरह से
चल उस तरह तू भी
ज़िंदगी है सरफिरी ये
बन सरफिरा तू भी
बहती जाये जिस तरह से
बह उस तरह तू भी…

खुदी से इश्क़ कर ले बंदे
क़रम नहीं तेरे इतने गंदे
बेवजह तो उङते नहीं है
ख़्वाबो के नादान परिंदे
ज़िंदगी है एक सफ़र
बन हमसफ़र तू भी
मुङे जब ये जिस तरह से
मुङ उस तरह तू भी
ज़िंदगी है सरफिरी ये
बन सरफिरा तू भी
बहती जाये जिस तरह से
बह उस तरह तू भी ।।

Copyright © 2015, RockShayar
Irfan Ali Khan
All rights reserved.

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“या ख़्वाजा ग़रीब नवाज़”

दे रहा हूँ कब से तुझे, सुन ले मेरी भी आवाज़
दर पे तेरे आया हूँ आज, या ख़्वाजा ग़रीब नवाज़

आँखों में हैं आँसूओं के रेले, हर तरफ तन्हाई के मेले
खुद में हुआ पराया खुद, तक़दीर कैसा ये खेल खेले

रो रहा हूँ कब से मैं, सुन ले मेरी भी आवाज़
दर पे तेरे आया हूँ आज, या ख़्वाजा ग़रीब नवाज़

सीने में मेरे दर्द छुपा है, चेहरे का नूर ज़र्द हुआ है
हाल ये कैसा बदहाल है, जीने की ना कोई वजह है

दे रहा हूँ कब से तुझे, सुन ले दिल की भी आवाज़
दर पे तेरे आया हूँ आज, या ख़्वाजा ग़रीब नवाज़

धोखे खाये इस क़दर, के यक़ीन पर भी यक़ीं नहीं
अंधेरे साये हर सहर, के रोशनी वो अब कहीं नहीं

दे रहा हूँ कब से तुझे, सुन ले मेरी भी आवाज़
दर पे तेरे आया हूँ आज, या ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ ।।

“तआरूफ़ (Introduction)”

रंग रंगीले गुलाबी उस जहान से आया हूँ,
मैं वीरो की धरती, राजस्थान से आया हूँ ।

नाम तो सुना ही होगा, राॅकशायर इरफ़ान,
फ़क़त खुद से खुद की पहचान से आया हूँ ।।

“उर्दू (Urdu)”

Urdu Poem

बाअसर कुछ इस क़दर शीरीं ज़बान है उर्दू,
सुतून-ए-अदब वो तहज़ीब की पहचान है उर्दू ।

मुंतज़िर सब इसके अदीब-ओ-महफ़िल यहाँ,
सुख़नगोई के लिए हाँ यक़ीनन वरदान है उर्दू ।

साये में जितना नूर है हर्फ़ उतने मशहूर हैं,
ज़िंदगी की ग़ज़ल का ज़िंदा कोई उन्वान है उर्दू ।

शहद सी तासीर भी है शऊर की ताबीर भी है,
दिल की ज़मीं पर जन्नत सा एक जहान है उर्दू ।

अहसास का ये अलिफ़ शोबे जिसके मुख़्तलिफ़,
शायरी की वो जान फ़क़त बज़्म की शान है उर्दू ।

ख़ामोशी बोलती है राज़ खुद बखुद खोलती है,
वज़्नी अल्फ़ाज़ से तामीर हुआ मकान है उर्दू ।

आग का दरिया भी है जीने का ज़रिया जहाँ,
मरीज़े मोहब्बत के लिए हक़ीमे लुक़मान है उर्दू ।

हो वो चाहे मीर-ओ-ग़ालिब रहे सदा इसके ही तालिब,
आबशार-ए-अदब की सदियों से निगहबान है उर्दू ।

ग़ज़ल नज़्म क़ता रूबाई लिखू मैं क्या क्या ‘इरफ़ान’,
दो लफ़्ज़ों में कहूँ तो मुकम्मल हिंदोस्तान है उर्दू ।।

कातिब :- रॉकशायर ‘इरफ़ान’ अली ख़ान

:-अल्फ़ाज़ के मानी:-

बाअसर – प्रभावशाली
शीरीं ज़बान – मीठी भाषा
सुतून-ए-अदब – साहित्य का स्तंभ
तहज़ीब – संस्कृति
मुंतज़िर – प्रतीक्षक
अदीब-ओ-महफ़िल – साहित्यकारो की सभा
सुख़नगोई – कविता, शायरी
साये में – छाया में
नूर – रोशनी
हर्फ़ – अक्षर
उन्वान – शीर्षक
तासीर – प्रकृति
शऊर – विवेक, ज्ञान
ताबीर – स्वप्नफल
जन्नत – स्वर्ग
जहान – संसार
अलिफ़ – उर्दू वर्णमाला का पहला अक्षर
शोबा – विभाग
मुख़्तलिफ़ – विभिन्न
फ़क़त – सिर्फ
बज़्म – सभा
रूहानी – आध्यात्मिक
अल्फ़ाज़ – शब्द
तामीर – निर्माण
मरीज़े मोहब्बत – प्रेम रोगी
हक़ीमे लुक़मान – विश्व प्रसिद्ध यूनानी वैद्य
मीर-ओ-ग़ालिब – मीर और ग़ालिब, उर्दू के दो श्रेष्ठ कवि
तालिब – इच्छुक
आबशार-ए-अदब – साहित्य का झरना
निगहबान – संरक्षक
ग़ज़ल नज़्म क़ता रूबाई – उर्दू काव्य की विभिन्न विधाए
लफ़्ज़ों – शब्दों
मुकम्मल – सम्पूर्ण
कातिब – लेखक

“चलों ना हादसों की खुशी मनाये”

चलों ना हादसों की खुशी मनाये
अधजली उन रातों को फिर से जलाये
मनचले इस मन को बिना बताये
ना तुम शर्माओ ना हम शर्माये
चलों ना हादसों की खुशी मनाये ।

हो गर कोई ग़म तो चबा लो बबलग़म
यूँही तो ना बैठे रहो सेड और गुमसुम
ज़िंदगी की कलरफुल पार्टी में टूनाइट
जी भर के हँसी के गुब्बारे फुलाये हम
सरफिरे इस मन को बिना बताये
ना तुम शर्माओ ना हम शर्माये
चलों ना हादसों की खुशी मनाये ।

बेशुमार पल तक रहे हैं राहें तेरी
इंतज़ार में हैं किसके ये निगाहें तेरी
लबों से चूम ले संग इनके झूम ले
पास बुलाये तुझको हमराहें तेरी
उन्ही हमराहों के संग कुछ वक्त बिताये
सुहाने सफ़र में गीत नये खुद गुनगुनाये
ना तुम शर्माओ ना हम शर्माये
चलों ना हादसों की खुशी मनाये ।

वक्त जैसा भी हो गुज़र जाएगा एक दिन
बाद गुज़रने के बङा याद आएगा ये दिन
लम्हे है ये जितने जी ले जी सके तू जितने
जीने का अहसास ना भूल पाएगा ये दिन
रूह की रोशनी से मन के अंधेरे मिटाये
मनचले इस मन को बिना बताये
ना तुम शर्माओ ना हम शर्माये
चलों ना हादसों की खुशी मनाये
अधजली उन रातों को फिर से जलाये
चलों ना हादसों की खुशी मनाये ।।

‪#‎RockShayar‬

“गिनती एक से दस”

After Object Oriented Poems (OOPs)…
Now its time to CHOPs…..
Save Childhood…Save Humanity….. @RockShayar

‪#‎ChildrenOrientedPoems‬(CHOPs)

एक था राजा का बेटा
दो दिन से मुर्दा सा लेटा

तीन महात्मा देखन आए
चार दवा की पुङिया लाए

पाँच मिनट उसे गरम कराया
छह छह घंटे बाद पिलाया

सातवे दिन में आँखें खोली
आठवे दिन नानी से बोले

नौवे दिन में खाना खाया
दसवे दिन में दौङ लगाई ।।

“इजाज़त को भी इजाज़त नहीं है”

इजाज़त को भी इजाज़त नहीं है, इस दिल में दाख़िल होने की,
मग़रूर मोहब्बत की मशहूर उस, महफ़िल में शामिल होने की ।

इबादत में रहो जब तलक, सज़्दारेज़ हो जाए फ़लक,
शर्त है बस इतनी सी यहाँ, रहमत के नाज़िल होने की ।

खूं से वो अंगारे बुझाए, बुझा बुझा कर फिर जलाए,
आसां नहीं तस्वीर यहाँ, हिम्मत के हासिल होने की ।

क़ाबिज़ हुआ है जब से मेरे, क़ल्ब पर क़ल्बसाज़ कोई,
मिलती नहीं फिर कोई निशानी, ईमान फ़ाज़िल होने की ।

मक़तूल फिर रहा वो शख़्स, तब से यहाँ से वहाँ,
गवाही दी जिस रोज उसने, अपने ही क़ातिल होने की ।

‘इरफ़ान’ लिखता ही रहा, दर्द के पन्नों पर हरफ़,
और लोग तारीफ़ करते रहे, गज़ल के क़ाबिल होने की ।।

‪#‎राॅकशायर‬ ‘इरफ़ान’ अली ख़ान

:-अल्फ़ाज़ के मानी:-

इजाज़त – अनुमति
दाख़िल – प्रवेश
मग़रूर – घमंडी
मशहूर – प्रसिद्ध
महफ़िल – सभा
इबादत – पूजा
सज़्दारेज़ – झुका हुआ
फ़लक – आसमान
रहमत – कृपा
नाज़िल – उतरना
क़ाबिज़ – कब्जा करना
क़ल्ब – दिल
क़ल्बसाज़ – खोटे सिक्के बनाने वाला
ईमान – सत्य
फ़ाज़िल – विद्वान
मक़तूल – मृत
हरफ़ – शब्द
क़ाबिल – योग्य

“जनता”

Yeh public hain….sab chupchap sahti hain…

जाने क्यों बहती हुई गंगा में बहती हैं जनता,
सब कुछ देखकर भी यूँ चुपचाप रहती हैं जनता ।

पहले तो उसे सुनती हैं फिर वोट देकर चुनती हैं,
और बाद में उसी की तानाशाही सहती हैं जनता ।

बातें करवा लो चाहे दुनिया भर की बङी बङी,
मगर जब ज़ुल्म होता हैं तो गूंगी खङी रहती हैं जनता ।

चट कर रहे जो हर पल देश को दीमक की तरह,
उन्ही नेताओं को अपना रहनुमा कहती हैं जनता ।

कहने को तो सब जनता का हैं जनता के लिए,
बस इसी फ़रेब तले सब कुछ सहती हैं जनता ।।

“पीर पराई जाणे ना कोई”

Ek koshish Punjabi mein Gazal likhne ki…
Ignore literary part…Enjoy feeling…

पीर किना नु दस्सा दिल दी, पीर पराई जाणे ना कोई,
घाव लग्या जे भीतर भीतर, बाहर ते पहचाणे ना कोई ।

गल्ला करदी रेंदी दुनिया, ज़िंदङी दे नाल रोज ऐंवई,
जाणे के मौत आणी एक दिन, मगर ऐत्थे माणे ना कोई ।

यूँ तो कर लेंदे सबा नु, बातें खूब वड्डी वड्डी यहाँ,
बारी आवे जद करण की, ते वादे असी निभाणे ना कोई ।

जज़्बातां नु छुपा ले तू वी, सीणा विच्च कित्ता वी बंदया,
दिल दे घार विच्च दबी हैं जे, यादां नु मिटाणे ना कोई ।

लिखणे बैठा जे मैं गज़ल, इत्ता वी मेनु समझ नी आया,
बंजारे होवे हरफ़, जिणके घर बार ठिकाणे ना कोई ।।

‪#‎राॅकशायर‬

पीर – पीङा
पराई – दूसरो की
किना नु – किस से
दस्सा – कहूँ
दी – की
जाणे – जाने
लग्या – लगा है
पहचाणे – पहचाने
गल्ला करदी रेंदी – बातें करती रहती
ज़िंदङी दे नाल – ज़िंदगी के साथ
ऐंवई – यूँही
जाणे के – जानते हैं कि
मौत आणी – मौत आएगी
ऐत्थे माणे – यहाँ माने
कर लेंदे सबा नु – कर लेते हैं सब ही
वड्डी वड्डी – बङी बङी
जद करण की – जब करने की
ते – तो
असी निभाणे – यहाँ निभाने
जज़्बातां नु – जज़्बातों को
तू वी – तू भी
सीणा विच्च – सीने के अंदर
कित्ता वी बंदया – कितना भी बंदे
घार विच्च – घर के अंदर
जे – जो
यादां नु मिटाणे – यादों को मिटाने
इत्ता वी मेनु – इतना भी मुझे
नी – नहीँ
बंजारे – घुमंतू, ख़ानाबदोश
हरफ़ – शब्द
जिणके – जिनके
ठिकाणे – ठिकाना

Unplugged Life…

जाने ये कैसी लत लगी है, जाने कैसा है एडिक्शन
सलीकेदार ज़िंदगी का, बेसलीका सा है सलेक्शन

घंटो गुज़र जाते हैं, काग़ज़ और पेन की संगत में
थोट नज़र आते हैं, चेहरे की बदलती हुई रंगत में

मैजिकल से माइंड में ही, खुराफ़ाती नाग पलता है
ड्रीम्स का भूत भी, ख़्वाहिशों की आग में पलता है

अहसास के मिरर में, सब कुछ क्लीयर दिखता है
दूर हो चाहे जो जितना, उतना वो नियर दिखता है

ख़यालों की जिस पेंसिल को, हर पल है छीला यहाँ
दिल की वहीं मंज़िल है, रस्ता है बङा पथरीला यहाँ

जोशीले जज़्बात जब आये, रोमांटिक रातें वो लाये
दिल को मेरे मामू बनाकर, इमोशनल सब गीत गाये

पोएट शायर राइटर कवि, डिफरेंट हैं सब नाम मेरे
मैनस्ट्रीम से हटकर ज़रा, डिफरेंट हैं सब काम मेरे

जाने ये कैसी लत लगी है, जाने कैसा है अट्रैक्शन
इरादों की ज़मीन पर, ख्वाबों का है जीरो फ्रैक्शन ।।

“एक आवाज़ सुनी है”

ख़ामोश नदी सी बहती हुई, एक आवाज़ सुनी है
बाद उसके ही आज मैंने, फिर ये कहानी बुनी है

लबों पर कुछ लफ़्ज़ रखे हैं, चंद शबनमी क़तरे
सुनकर जिन्हें ये दिल कह उठे, चाँद से है उतरे

परत दर परत खुलती गई, कानों में घुलती गई
आवाज़ की रूह फिर, अल्फ़ाज़ से धुलती गई

नूर के वो बादल कभी, बरसे जो सहरा में कहीं
गूँज रही हैं सदाएं सभी, वो लम्हा ठहरा है वहीं

शहद सी वो मीठी बोली, उर्दू की तरह लागे है
जाने किसके पीछे हर पल, मन ये मेरा भागे है

सुने हैं सरल अंदाज़ में, ज़िंदगी के सुनहरे किस्से
देखे हैं फ़क़त आवाज़ ने, उजालों के अंधेरे हिस्से

ख़ामोश वक्त सी बहती हुई, एक आवाज़ सुनी है
बाद उसके यूँ आज मैंने, फिर ये कहानी बुनी है ।।

“महसूस किया है मैंने तुझ को कल ख़्वाब में”

महसूस किया है मैंने तुझ को कल ख़्वाब में,
नज़रों ने खुद ख़त लिखे नज़रों के जवाब में ।

ढूँढता आया मैं जिसे बरसो यहाँ से वहाँ,
ज़िंदगी वो मिली यूँ आज रूह के हिज़ाब में ।

वक्त तो लगा बहुत वक्त के मिलने में मगर,
वक्त गुज़रता ही गया खुद वक्त के हिसाब में ।

कह गए वो शायर सब इश्क़ ही इबादत है,
सुकूं मिला जो अब कहीं इबादत के सवाब में ।

मीर की ग़ज़ल कहूं या कहूं नज़्म गुलज़ार की
लिखी है जो सुरमई इन पलकों की किताब में ।।

“सीने में जाने कब से एक आग जल रही है”

सीने में जाने कब से एक आग जल रही है
लपटों में जिसकी ये मेरी ज़िंदगी पल रही है ।

अंगारों से आजकल, डरती नहीं ये रूह भी
जलकर हाँ हर दफ़ा फिर से जो जल रही है ।

शिकवा करे तो क्यूँ, अपनी बर्बादी का यहाँ
बदलते वक्त के साथ हर तस्वीर बदल रही है ।

दीदार किया है दिल ने, जब से दर्दे दिल का
निगाहों को वो तब से हाँ रोशनी ख़ल रही है ।

अब और क्या इल्ज़ाम लगाओगे ‘इरफ़ान’ तुम
मुझको ये खुदगर्ज़ मेरी ख़्वाहिशें छल रही है ।।

“Electronics and Communication”

‪#‎ObjectOrientedPoems‬ (OOPs)

ज़िंदगी को स्मार्ट बनाये, हर रोज़ जिसके यूनिक क्रिएशन
ब्रांच है थोड़ी हट के ज़रा, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन

यूँ तो अध्ययन होता है इसमें, इलेक्ट्रॉन के प्रवाह का
सूक्ष्म तरंगे, सिलिकॉन चिप, और ऊर्जा के अपवाह का

डायोड, ट्रांजिस्टर, रेसिस्टर, कहलाये बेसिक कॉम्पोनेन्ट
सर्किट की फुल एबीसीडी, इंडक्टैंस रियक्टेंस कैपेसिटेंस

अब आती हैं सब्जेक्ट्स की बारी, ईडीसी है सबसे भारी
सिग्नल सिस्टम की बात छोडो, डीएसपी ने सबकी मारी

ऐसी-डीसी का खेल खेले, इन्वर्टर और रेक्टिफायर यहाँ
अलादीन का चिराग आईसी, पूरी करे हर डिजायर यहाँ

हरे भरें खेतों की तरह, लगता हैं जो पीसीबी
डिवाइस की ज़मीं ये, सोल्डरिंग लाइक जेसीबी

टीवी टेलीफोन, रेडियो मोबाइल, कमाल है माइक्रोवेव के
एलईडी एलसीडी सोलर सिस्टम, पिलर है एनर्जी सेव के

सीआरओ, मल्टीमीटर, ब्रेड-बोर्ड, कनेक्टिंग केबल
लैब ही है वो प्लेटफार्म जो, छात्रों को बनाये ऐबल

एनालॉग हो या डिजिटल, सिस्टम यहाँ सब हाई-फाई
द्रुतगामी हुई डेटा सर्विस, थ्रू इंफ्रारेड ब्लूटूथ वाई-फाई

वीएलएसआई, माइक्रोप्रोसेसर, एंड ऑप्टिकल फाइबर
वायरलेस हो गई दुनिया अब, गूँज रहा है संगीत साइबर

बदल रहा हैं ज़माना, कहते जिसे हम इलेक्ट्रॉनिक क्रान्ति
ई युग की शुरुआत हैं यह तो, नहीं है इसमें कोई भ्रान्ति

लाइफ को ऑटोमैटिक बनाये, हर दिन जिसके न्यू अपग्रेडेशन
इंजीनियरिंग विद सोल हैं जी, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन ।।

Copyright © 2015, RockShayar
Irfan Ali Khan
All rights reserved.

“भरोसा”

भरोसा जब कभी टूट जाता है
इंसान पीछे कहीं छूट जाता है ।

औरों से खुद को बचाते हुए वो
खुद में खुद को लूट जाता है ।

हद गुज़र जाती है जब दर्द की
फफोला खुद बखुद फूट जाता है ।

अब और ना सताओ ‘इरफ़ान’ हमें
दिल है काँच हमारा टूट जाता है ।

“ख़्वाब जो देखा था कल”

Dream Girl…

ख़्वाब जो देखा था कल, खुशनुमा रूमानी पल
याद नहीं कुछ भी मुझे, हाँ याद नहीं कुछ भी मुझे

जुल्फ़ों के सुनहरे बादल, आँखों में था गहरा काजल
उङा ले गया वो दर्द मेरे, ज़िंदगी का लहराता आँचल

साँसों में भीनी सी खुशबू, बातों में महकी थी आरज़ू
होश के भी खुद होश उङे, निगाह में थे जज़्बात रूबरू

माहताब जो देखा था कल, हुस्न की उम्दा ग़ज़ल
याद नहीं कुछ भी मुझे, हाँ याद नहीं कुछ भी मुझे

पलकों पर है शोख़ अदा, हो गया मैं जिस पर फ़िदा
दीदार हुआ जब से उसका, खुद में रहता हूँ मैं ज़ुदा

सुरमई दो सहर सी आँखें, रात भर जगाती रही
मख़मली बाहों की गिरह, पास मुझे बुलाती रही

अहसास जो छुआ था कल, रूह की ज़िंदा शकल
याद नहीं कुछ भी मुझे, हाँ याद नहीं कुछ भी मुझे

ख़्वाब जो देखा था कल, खुशनुमा रूमानी पल
याद नहीं कुछ भी मुझे, हाँ याद नहीं कुछ भी मुझे ।।

My two poems published…

Shukr ALLAH…..First publication of my writing…. two poems published in annual magazine of bhilwara literary council….. (Smarika 2015)…
Ammi Abbu this is for you…

Aasman likhna hai abhi falaq par mujhe
Intiha se door talaq ye meri bas ibtida hai…

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“मैं अपनी जङो को यहाँ खुद काटता हूँ”

दिल की ज़मीं पर दर्द के बीज छांटता हूँ
मैं ज़बान से ज़हर बुझे खंज़र चाटता हूँ

अहसास ना हो, दर्द का कहीं भी कभी
मैं अपनी जङो को यहाँ खुद काटता हूँ ।।

“An Unplugged Memory”

For Pinkcity Poets, Artists n Unplugged….

मचलते हुए माइंड में आज
एक अनप्लग्ड याद उभरी है
यूँही कहीं
दिमाग के किसी कोने में
सुन पङी थी ना जाने कब से
वक्त की हवा के झोंके से आज
वो बिखरी हुई याद
ज़ेहन से यूँ फिसलती हुई
उतर गई इस काग़ज़ पर
ज्यों कि त्यों
किसी कार्बन काॅपी की तरह

अहसास का वो पोर्ट्रेट
उतरा था जो उस दिन
पिंकसिटी के किसी घर में
लम्हों के कैनवास पर
ख़्यालो के पोएटिक ब्रश से कहीं
खो गया है वो अब ना जाने कहीं
बहुत कोशिश की मैंने उसे ढूंढने की
पर मिला नही वो हाँ दुबारा कहीं
गर मिले किसी को तो बताना मुझे

मिस्टीरियस से माइंड में आज
एक अनप्लग्ड याद उभरी है
यूँही कहीं ।।

जाने वो कौन थी ?

जाने वो कौन थी, कल रात जो ख़्वाब में आई थी
चुपके चुपके देखकर मुझे, मन ही मन मुस्काई थी

पहली नज़र में ही यारों, इस दिल से हाथ धो बैठा
बाद उसके फिर धीरे धीरे, चैन-ओ-सुकूं सब खो बैठा

आँखों ही आँखों में, कुछ बातें हुई, यूँ मुलाकातें हुई
सोहबत में उसकी चाँद को, नसीब चाँदनी रातें हुई

रूख़सार लग रहे थे यूँ, ओस में भीगे गुलाब कोई
ना था अधूरा सवाल कोई, ना था अधूरा जवाब कोई

लबों पर लरज़ती ख़ामोशी, बहुत कुछ कह रही थी
लबों से लबों की ये दूरी, शोख़ नदी सी बह रही थी

जाने वो कौन थी, कल रात जो ख़्वाब में आई थी
चोरी चोरी देखकर मुझे, मन ही मन मुस्काई थी ।।

“अपनी कमज़ोरी को ही अपनी ताकत बना ले”

अपनी कमज़ोरी को ही अपनी ताकत बना ले
गिरकर फिर उठने को तू अपनी आदत बना ले

हिम्मत वो हासिल कर, खुद को तू काबिल कर
अधूरे ख़्वाबों को इस ज़िंदगी की चाहत बना ले

ग़म हो जाए खुद ग़मज़दा, कुछ ऐसा कर यहाँ
दर्द की बौछार को फिर रूह की राहत बना ले

खुद में है तू आज भी, कर ले जरा अहसास भी
दिल की टूटी ज़मीं पे फिर से कोई इमारत बना ले

ज़बान से तू आग चख, बस इतना तू याद रख
अपने मक़सद को ही हाँ अपनी इबादत बना ले

कह रही ये ज़िंदगी, सुन ले ज़रा ‘इरफ़ान’ तू
मंज़िल है अभी दूर बहुत उङने की आदत बना ले ।।

“ग़मों का अपना ही मज़ा है”

खुशियाँ तो रब की रज़ा है
ग़मों का अपना ही मज़ा है
यूँही तो नही मिलते जख़्म
इनकी भी कोई वजह है
खुशियाँ तो रब की रज़ा है
ग़मों का अपना ही मज़ा है
यूँही तो नही सिलते लब
इनकी भी कोई वजह है
खुशियाँ तो रब की रज़ा है
ग़मों का अपना ही मज़ा है

नसीब में है जो भी लिखा
हर पल यहाँ वो ही दिखा
राज़ जब जब खोले इसने
दिल ने सदा वो ही लिखा
यूँही तो नही मिलते दर्द
इनकी भी कोई वजह है
खुशियाँ तो रब की रज़ा है
ग़मों का अपना ही मज़ा है

मिले मुसीबत उतनी ही
सह पाये तू जितनी कि
फ़ित्ने फ़साद उतने ही
सह पाये तू जितने कि
यूँही तो नही होते सितम
इनकी भी कोई वजह है

खुशियाँ तो रब की रज़ा है
ग़मों का अपना ही मज़ा है
यूँही तो नही मिलते जख़्म
इनकी भी कोई वजह है
इनकी भी कोई वजह है ।।

Copyright © 2015, RockShayar
Irfan Ali Khan
All rights reserved.

“वो धुँआ है शायद कोई, जलकर ही झूमता है”

कहने को है ज़िंदा, खुद में लाश लिए घूमता है
वो काग़ज़ के लबों से, दहकते अंगारे चूमता है

लोग कहते हैं अक्सर उसे, पागल दीवाना
वो धुँआ है शायद कोई, जलकर ही झूमता है ।।

“क़ाफ़िया”

गुमनाम ग़ज़लों को मेरी क़ाफ़िया मिल गया
ख़्याली ख़तों को मक़ामी डाकिया मिल गया

ज़हालत में कट रही थी, ज़िंदगी कब से मेरी
ज़िंदगी को इल्म का एक जामिया मिल गया ।।

क़ाफ़िया – तुक, ग़ज़ल के शेर में तुकांत शब्द
मक़ामी – स्थानीय
ज़हालत – अज्ञानता
इल्म – ज्ञान
जामिया – विश्वविद्यालय

“कहीं भी कोई अतराफ़ नहीं दिखती”

कहीं भी कोई अतराफ़ नहीं दिखती
नज़र को खुद नज़र साफ़ नहीं दिखती

हर तरफ फैली है बू, आँखों से टपके है खूं
ख़ताएं क्यूँ आजकल मुआफ़ नहीं दिखती

औरों से क्या शिकवा करे, जब हालात हो ऐसे
के ज़िन्दगी खुद मौत के ख़िलाफ़ नहीं दिखती

काँप रही है रूह मेरी, दर्द के मौसम सर्द में
सुकून की चादर कोई लिहाफ़ नहीं दिखती

ये कैसा दौर चल पङा है ‘इरफ़ान’ यहाँ
इंसाफ़ की नज़र भी इंसाफ़ नहीं दिखती ।।

अतराफ़ – चार दिशाएँ
लिहाफ़ – आवरण

“साथ मेरे वालिदैन की दुआएं हैं बहुत”

ज़िंदगी में हर क़दम पर ख़ताएं हैं बहुत
पर साथ मेरे वालिदैन की दुआएं हैं बहुत

इश्क़ में डूब जा मगर इतना तू याद रख
ऐतबार-ए-हुस्न में अक्सर सज़ाएं हैं बहुत

खुद ही से भागता रहता है वो शातिर
फ़ितरत में खुद जिसकी ज़फ़ाएं हैं बहुत

राह की तकलीफ़ों से मंज़िल ना बदल
जिस्म पर रूहानियत की वफ़ाएं हैं बहुत

जो ना मिला उसका भी शुक्र अदा कर
परवर दिगार की तुझ पर अताएं हैं बहुत

गुनाहों के साये से ना डर तू ‘इरफ़ान’
अब साथ तेरे ईमान की सदाएं हैं बहुत ।।

“हर शख़्स यहाँ एक जैसा नहीं होता”

हर शख़्स यहाँ एक जैसा नहीं होता
जो दिखता है अक्सर वैसा नहीं होता

डोर विश्वास की इक बार जो टूटे
फिर जुङाव उसमें वो पहले जैसा नहीं होता

ख़्वाब में जो हर रोज नज़र आता है मुझे
हक़ीक़त में क्यूँ कभी वैसा नहीं होता

ज़माने के खरीददार बस इतना तू समझ ले
हर चीज़ का मोल यहाँ पैसा नहीं होता

यूँ तो रिश्तें कई हैं दुनिया में ‘इरफ़ान’
रिश्ता मगर कोई माँ जैसा नहीं होता ।।

“माँ तेरी याद बहुत आती है”

ज़िन्दगी कि उलझनो से
मैं जब भी निराश हो जाता हूँ
टूटकर कहीं बेठ जाता हूँ
दिल यूँ भर आता है
पलकों से बहने लगे समंदर
जब सारी कोशिशे नाकाम हो
उम्मीद दम तोड़ देती है
तन्हाई के उस मंज़र में
माँ तेरी याद बहुत आती है…..
मगर तू कितनी दूर हैं
ये सोचकर आँखे छलकती है
काश मैं तेरे पास होता
झट से गले लगा लेती
मेरी सब उलझनो को
अपने आँचल से पोंछ देती
गोद में सर रखकर
बेफिक्र होकर सो जाता
तू प्यार से मेरे सर पर
हाथ फेरती जाती
ज़िन्दगी यूँ मुन्तज़िर है
माँ तेरी दुआओ कि
आज भी जब किसी मुश्किल में होता हूँ
माँ तेरी याद बहुत आती है…..
इतना दूर क्यूँ मुझे भेजा
मैं सदा तेरे पास रहना चाहता था
पढ़ा लिखा कर क़ाबिल बनाया
क्यूँ मगर फासले आ गए है दरमियाँ
यहाँ मेरा मन भी नहीं लगता है
भीड़ में रह कर भी
खुद को अकेला ही पाता हूँ
जब भी कोई कांटा चुभता है यहाँ
मैं खड़ा बस तेरी राह देखू
कब तू आकर दिलासा देगी मुझे
जेसे बचपन में दिया करती थी
गिरते सम्भलते आखिरकार
चलना तो सीख गया हूँ
खुद को सख्त भी बना लिया मेने
मगर आज भी, जब मायूस हो जाता हूँ
माँ तेरी याद बहुत आती है……..
कई दिनों तक रोता रहा था मैं
जब पहली दफा तुमने
घर से दूर मुझे पढ़ने भेजा
फिर धीरे धीरे एहसास हुआ
कि ये जरुरी भी है
आगे बढ़ने के लिए
लेकिन वो सिलसिला तो यूँ बढ़ा
घर से दूरी फिर बढ़ती ही गई
जाने केसी तक़दीर है ये मेरी
इक हादसे ने दिल को
पत्थर सा बना दिया
सुनसान मोड़ पर लाकर
यूँही तड़पता छोड़ दिया
अब चाहकर भी नहीं जा पाता हूँ
बचपन के उस आँगन में
मगर आज भी, जब रात में
बुरे ख्वाब से डरकर घबराता हूँ
माँ तेरी याद बहुत आती है
माँ तेरी याद बहुत आती है……

इस शहर में मेरे गाँव सी बात कहाँ है ?

इस शहर में मेरे गाँव सी बात कहाँ है ?
रौशनी तो बहुत हैं, सितारों भरी वो रात कहाँ है ?

गली गली भटक लिया, दर बदर सब नाप लिया
मिट्टी की तरह वो ख़ालिस सौंधे जज़्बात कहाँ हैं ?

“अपनी सबसे प्यारी चीज़ क़ुर्बान कर दे”

अपनी सबसे प्यारी चीज़ क़ुर्बान कर दे
राहे इलाही में सदक़ा अपनी जान कर दे

अख़्लाक़ कहे खुद बखुद फ़साना तेरा
ज़िंदगी को कुछ इस क़दर हैरान कर दे ।।

“अपनी आँखों से अपनी मौत का मंज़र देखा है”

अपनी आँखों से अपनी मौत का मंज़र देखा है
दिल की ज़मीन को तब से ही हाँ बंजर देखा है

यूँही नहीं तैर रहा, इन आँखों में खूं ‘इरफ़ान’
इक अर्से से अपनी पीठ में घुपा खंज़र देखा है ।।

“मेरी कहानी की शुरूआत”

सुबह के नौ बजे है । हर रोज की तरह आज भी वो वर्ग पहेली भरने में लगा हुआ है । आँखों पर मोटा चश्मा, हाथों में पेन और माथे पर खिचीं हुई लकीरें, ये साफ़ बता रही हैं कि आज फिर कोई लफ़्ज़ उसे उलझा रहा है । वैसे तो कई नाम है उसके इरफ़ान, इफ्फ़ी, राॅकशायर, एलियन और सीपू । खुद को मगर आज भी वो गुमनाम ही पाता है ।
जिस दिन अख़बार नहीं आता, उस दिन थोङा परेशान सा लगता है । पता नहीं क्यूँ ? सबकी ख़बर रखने वाला अक्सर खुद से बेख़बर रहता है । बचपन से ही किताबों कहानियों का शौकीन है । जहाँ पर भी बालहंस, चम्पक, चंदामामा, चित्रकथाए मिल जाती थी, बस वहीं चिपक जाया करता था गोंद की तरह ।

पहले पढ़ना अच्छा लगता था, अब लिखना अच्छा लगता है । पिछले दो सालों में जाने कितनी ही कविताएं लिख चुका है । मगर ज्योंही कहानी का नाम सुनता है, क़लम वहीं ठहर जाती है अपने आप ही । मन तो बहुत करता है कहानी लिखने का, पर जाने किस बात से डरता है । यह जानते हुए भी कि वो लिख सकता है, कभी लिखता नहीं ।
शायद डर है उसे इस बात का, कि कहानी लिखते लिखते कहीं वो फिर से वहीं मासूम बच्चा ना बन जाए । जिसे शौक था कभी किस्से कहानियाँ पढ़ने का, बेवजह खिलखिलाने का, शरारतें करने का, हँसने मुस्कुराने का । वो नादान बच्चा खो गया है कहीं । ज़िंदगी की पटरी पर कोई हादसा उसे लील गया । लाल रंग में सनी यादें, गवाह है उस घाव की । जो वक्त ने दिया है बेवक्त ही कभी । आज वर्ग पहेली भरते हुए जब कहानी शब्द नज़र आया तो ये कहानी खुद बखुद बनती चली गई । हिचकिचाहट की धूल हटाते हुए । जमी है जो दिल के पन्नों पर कई बरसों से । दुनिया चाहे कुछ भी कहे मगर मैं इतना जानता हूँ कि,
मेरी कहानी की शुरूआत हो चुकी है । तब से जब मैं पैदा हुआ था । अब देखना यह है कि इस कहानी का अंज़ाम क्या होता है ।।

‪#‎RockShayar‬

रात की सिसकियां सुनी हैं कभी ?

Inspired by Gulzar Sahab’s “Rooh dekhi hai kabhi….Rooh ko mahsoos kiya hai ?

रात की सिसकियां सुनी हैं कभी ?
अंधेरे के दर्द को महसूस किया है ?

बादलों की बैचैनियां ग़रजती रहती हैं
रातभर शबनमी बूँदें बरसती रहती हैं

ख़्वाबों के तकिये सब गीले हो जाते हैं
नींद के साये खुद नींद को तरसाते हैं

रात की हिचकियां सुनी हैं कभी ?
चाँद के दर्द को महसूस किया है ?

साहिल पर लहरें मचलती रहती हैं
रेत के घरौंदे सब निगलती रहती हैं

अधजगे ख़त अपने घर लौटते रहते हैं
ज़िंदगी के किस्से मन कचोटते रहते हैं

रात की खामोशियां सुनी हैं कभी ?
अंधेरे के दर्द को महसूस किया है ?

“रूह का क़त्ल हुआ था उस रोज”

जिस्म के भीतर
कहीं कोई हिस्सा
मर चुका है बहुत पहले
गलकर सङ चुका है शायद
उसी की बदबू है ये
जो वक्त बेवक्त हर कभी
आती रहती है
ना दिन देखती है ना रात
बस चली आती है
साँसों से आँखों से
आहों से निगाहों से
बदहवास सी एक बू
टपकती रहती है, लहू की तरह
सुबकती रहती है, लबों की तरह
कई बरस हो गए हैं
अहसास की वो खुशबू
रूह के कातिल को ढूँढ रही है
जिस्म के भीतर कहीं
कोई क़त्ल हुआ था
उस रोज शायद
दिल के नज़दीक कहीं
किसी नर्म जज़्बात का
ये बदबू उसी लाश की है
तफ़्तीश जारी है
तब से लेकर अब तक
यक़ीनन रूह का क़त्ल हुआ था उस रोज ।।

“वो शायर ही है”

खुद को चट्टान कभी, कभी सरफिरी हवा कहता है
हर्फ़ को औलाद अपनी, क़लम को हमनवां कहता है

वो शायर ही है, यक़ीनन शख्स कोई ‘इरफ़ान’
जो दर्द-ए-दिल को, दिल की दवा कहता है ।।

“कवि”

चरित्र नहीं कोई मेरा, ना कोई चित्र है
मन ही है शत्रु मेरा, और मन ही मेरा मित्र है ?

शब्दों के दरमियां रहता हूँ, लोग कहते है कवि
पल भर में पहुंच जाऊ वहाँ, जहाँ ना पहुंचे रवि

कल्पना के भव सागर में, नित नए गोते लगाता हूँ
कविताओं के मोती, संवेदनाओं के शंख में पाता हूँ

सब कुछ लिखकर भी, सब कह नहीं पाता हूँ
मैं खुद से खुद की दूरी यह, सह नहीं पाता हूँ

राग द्वेष प्रेम त्याग करूणा, अनगिनत रूप धर लेता हूँ
मैं मन ही मन स्वयं को, उस भाव के अनुरूप भर लेता हूँ

चरित्र नहीं कोई मेरा, ना कोई चित्र है
मुझी में है शत्रु मेरा, और मुझी में मेरा मित्र है ।।

“Govt. Polytechnic College Ajmer”

‪#‎ObjectOrientedPoems‬(OOPs)

सिखाई जिसने हमको यहाँ, जीने की सब टेक्निक
सबसे प्यारा कॉलेज हमारा, अजमेर पॉलिटेक्निक

विभिन्न शाखाओं में यहाँ, होता है डिप्लोमा कोर्स
ड्राइंग की एबीसीडी, या हो कोई मैकेनिकल फोर्स

फर्स्ट ईयर के बाद यूँ तो, छात्र कहलाते हैं सीनियर
जॉब मिलता हैं ज्योंही, बन जाते स्मार्ट इंजीनियर

रैगिंग के लिए रहा जो सदा, जमाने भर में मशहूर
नाइंटी डिग्री, इंट्रो प्रतिज्ञा, और वो बॉस सब क्रूर

अलग अलग थी ब्रांचेज, अलग अलग थे ब्लॉक
इंटरवल में जहाँ हम सब, मिलकर करते थे रॉक

कैंटीन की वो चाय गरम, मूड जहाँ हो जाए नरम
खिलखिलाये फिर ज़िंदगी, भूलकर सब लाज शरम

बहुत याद आती है वो, एनसीसी की ईवनिंग परेड
अजब सी पनिशमेन्ट और, समोसे विद चटनी रेड

फाइल, ड्राफ्टर, ट्यूटोरियल, एज लाईक स्टूडेंट स्वोर्ड
पेपर ऑलवेज टफ़ ही बनाये, प्राविधिक शिक्षा बोर्ड

बगल में चलता है यूँ तो, इंजीनियरिंग कॉलेज यहाँ
बावजूद इसके जी हाँ, मिलती है असल नॉलेज यहाँ

सिखाई जिसने हमको सदा, जीने की ऑल टेक्निक
सबसे प्यारा कॉलेज हमारा, अजमेर पॉलिटेक्निक ।।

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मैं खुद नहीं जानता, ये मेरी कुदरत क्या है ?

मैं खुद नहीं जानता, ये मेरी कुदरत क्या है ?
दबी है जो दिल में कहीं, वो हसरत क्या है ?

तोहमत लगाते है लोग अक्सर, खुदग़र्ज़ी की मुझ पर
और मुझे अब तक पता नहीं, के मेरी फ़ितरत क्या है ?

“इंतजार”

ये किसका इंतज़ार है
एक जमाने से चल रहा है जो
खत्म ही नहीं होता
जब भी खत्म होने का दौर आता है
फिर से शुरू हो जाता है

हाँ वहीं इंतजार
इंतजार में जिसके सदियाँ गुज़र गई
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी जिये हुए
ये फिर भी ज़िंदा है तब से
दुनिया यह बनी है जब से

किसी को ज़िन्दगी का इंतजार है
तो किसी को ज़िन्दगी के हमसफ़र का
किसी को खुशी का इंतजार है
तो किसी को खुशी के अहसास का
और उस पर ख़्वाहिशों का
कभी ना खत्म होने वाला इंतजार

आईने के भीतर छुपे आईने को
जब ग़ौर से देखा
तो पता ये चला के
खुद के इंतजार में है ये तब से
खुद इंतजार भी ना था जब से
हर इंतजार की यही कहानी तो है ।।