“ये आसमां”

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नीला ये आसमां, बह रहा है
ठंडी हवाओ के संग, झरने सा

घास पर लेटे हुये, मैं खुद को
बादलो में, महफूज़ पा रहा हूँ

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“अक्स मेरा”

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जाने कब से, छुप कर बेठा
मुझमें, ये अक्स मेरा
हैरानी से, यूँ मुझे घूरता है
शायद, कहना चाह रहा
सबकी खबर, तू रखता है
फिर मुझसें, क्यूं है बेखबर
हर पल, तुझसे मिलना चाहूं
मगर तुझे, फुरसत कहां है
कभी आओ, वक्त निकालकर
बेठेंगे हम, दरिया किनारे
गुफ्तगू से, कुछ बात बने
पता तो चले, आखिर वजह क्या है
रूह की, अक्स से बेरूखी की
बहुत परेशां, जो करती है
अक्ल के परदों में, ना कोई जवाब
अधूरे से है, आज भी कई सवाल
लफ़्ज ना होते तो, केसे मैं कह पाता
एक अरसे से है अजनबी
मुझसे, ये अक्स मेरा…

“एक हादसा”

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एक हादसा, बड़ा ही दर्दनाक 
बेगुनाहों के लहू से, यूं भीगा हुआ 
हर तरफ मची है, इक भगदड़ सी 
मासूम बच्चे, इस कदर डरे हुए है 
हलक से, चींख भी नहीं निकल रही
सब हो रहे है, बदहवास से यहाँ 
कोई इधर भाग रहा, कोई उधर छुप रहा 
शायद, आज फिर कोई धमाका हुआ है 
कितने घर, उजड़ गए है
कितनी मांगे, सूनी हो गई
कितने बच्चे, यतीम हो गए 
कौन करेगा, इसका हिसाब यहाँ 
बाज़ार, अस्पताल, मंदिर, मस्ज़िद 
आखिर, कोनसी जगह बाक़ी है 
अब जहाँ, ये हादसे नहीं होते 
अधनंगी सैकड़ो लाशे, बिखरी हुई
भूखे बच्चे बिलख रहे, उनके पास 
खौफनाक मंज़र फैला, चारो तरफ 
हैवानियत का, जाने कैसा ये कहर 
इंसानी शक्ल में, छुपे है कुछ भेड़िये 
मासूम बन्दों को, जो गुमराह करते 
नफरत का बारूद, ज़ेहन में भरते 
उनमे से, कोई एक मिले तो पूछूँ 
ये दरिंदगी तुम में, कब से है 
दिखते तो तुम भी, एक इंसान ही हो 
फिर मजहब को, क्यूँ करते हो बदनाम 
हो जाओ ख़बरदार, अपने अंज़ाम से
हिसाब तो, ख़ुदा के घर होना है तुम्हारा 
कभी तो होगी आखिर, अमन कि सहर 
मौला मेरे सुन ले, ज़मीं पे तू रहम कर 
एक हादसा, बड़ा ही शर्मनाक 
इंसानियत कि मौत पे, यूं रोता हुआ

“हैरान हूँ मैं”

हुआ जो पहली दफ़ा, हैरान हूँ मैं
कहा था अब तक, ये लम्हा मेरा
बैचैनी में गुम, कहता कुछ भी नही
सोचकर बस यहाँ, परेशान हूँ मैं.

“कौन हूँ मैं”

कौन हूँ मैं, कहाँ है मेरा जहां 
खुद कि तलाश में, हो रहा हूँ लापता 
अनदेखे पहलुओ में, यूँही भटकता रहा 
जाने किस एहसास में, हो रहा हूँ गुमशुदा 
परछाई मेरी यहाँ, साथ अब देती नहीं 
अजनबी हालात में, हो रहा हूँ मुब्तिला 
गहरे ये सन्नाटे, साथ चलते हर कदम 
रूहानी इक खलिश में, खो रहा हूँ यहाँ 
अनजानी सब राहें, अपनी ओर बुलाती 
जाने किस गर्दिश में, हो रहा हूँ धुँआ 
कहीं भी मिलता नहीं, मेरा कोई निशां
वक़्त कि साज़िश में, हो रहा हूँ फ़ना 
कौन हूँ मैं, कहाँ है मेरा जहां
अपनी ही तलाश में, हो गया हूँ लापता

“ज़िन्दगी एक वाटिका है”

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कुछ वृक्ष सूखे हुए, फूलों से कुछ ढंके हुए 
ज़िन्दगी के मौसम को, यूं बयां करते हुए

सुख है सावन ऋतु, दुःख आये पतझड़ सा 
जीवन के प्रवाह को, यूं उज्जवल करते हुए

तितलियाँ बेठी फूलों पे, पत्ते यूँही देखते 
समय के खेल को, यूं स्वीकृत करते हुए

छाया देते पेड़ कहीं, उजड़े से ठूंठ कहीं है 
काल के चक्र को, यूं सत्यापित करते हुए

भांति भांति के पक्षी, घोंसला बनाते यहाँ 
प्रकृति कि सरसता को, यूं मंगल करते हुए

कीट पतंगों का डेरा, खिलती कलियो पर 
प्रेम के सौंदर्य को, यूं निर्मल करते हुए

कोयल कि कुहूँ कुहूँ, पंछियो का कोलाहल 
सृष्टि के सृजन को, यूं सजीव करते हुए

कुछ फूल खिले हुए, पत्ते क़ुछ सूखे हुए 
ज़िन्दगी के मौसम को, यूं बयां करते हुए

“नफ़रत का ज़हर”

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हर तरफ फैला हुआ है, यहाँ नफ़रत का ज़हर
जहाँ देखो नज़र आये, बस दहशत का कहर

यह कैसा दौर आ गया, कुदरत भी है हैरान
इंसान का दुश्मन यहाँ, खुद बन गया इंसान

ना कोई मज़हब है इसका, ना कोई पहचान
इंसान कि शक्ल में, छुप कर बेठा है शैतान

क्यूँ भटक रहे है आज, राहों से ये नौजवान
कोई भी नहीं है यहाँ, ठहर कर अब ये सोचे

मासूम से चेहरे, आखिर कैसे बन रहे हैवान 
किसने बेठा दिया है, इनके ज़ेहन में शैतान

सियासतदारों को भी, कुछ तो सोचना होगा
आतंक के व्यापार को, बस यहीं रोकना होगा

नहीं तो कुछ भी नहीं बचेगा, कल हमारे पास 
इक बारूद का ढेर, दम तोड़ती इंसानियत बस

सबको हक़ अपना मिले, ना हो कोई भेदभाव 
इंसानियत के लिए, मिलकर सब करे प्रयास

“कहा है तू ज़िन्दगी” (Kaha hai tu zindagi)

मन नही लगता अब 
चमकती इस दुनिया में
कहा है तू ज़िन्दगी 
ले चल अपने जहां में
मिले इक पहचान मुझे भी 
खो गयी है जो यहाँ
फरेबी दिखावो से नही
दिल से मिले हर खुशी
खोखले रिवाज़ो से मुक्त
एक तहजीब हो नई 
किसी कि आज़ादी का यूं
घोंटे ना फिर कोई गला
मर्ज़ी से जीने कि
सबको मिले आज़ादी 
ना हो कोई बंधन 
ना भड़कती रंजिशे 
चैन-ओ-सुकूं हो हर तरफ
मुहब्बत कि बारिश में
भीग जाए हर इक रूह 
जो तड़पती रहती है 
सच्चे इश्क़ कि तलाश में 
दिल नहीं लगता अब
सुनहरे मायाजाल में 
कहा है तू ज़िन्दगी 
ले चल अपने जहां में

जाने केसा शऊर नुमायाँ है (Jaane kesa shaoor numaya hai)

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जाने केसा शऊर नुमायाँ है Jaane kesa shaoor numaya hai
   तेरे मेरे दरमियान  Tere mere darmiyan
मैं इक लफ्ज़ भी नहीं कहता  Main ik lafz bhi kahta nahi
   और समझ जाते हो तुम Aur samajh jaate ho tum
मेरी उस ख़ामोशी को…. Meri us khamoshi ko

“कुछ इस तरह, नुमायाँ तू मुझमें” (Kuch is tarah, Numaya tu mujhmein)

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कितनी घनी है, ये जुल्फ़े तेरी Kitni ghani hai, ye zulfe teri    
साये में है इनके, बेइन्तहा सूकूं Saaye me hai inke, Beinteha Sukoon  
दो आँखें तक रही है, चुपके से Do Aankhe tak rahi hai, Chupke se  
जेसे कहना हो, शायद उन्हे कुछ Jese kahna ho, shayad unhe kuch  
नज़रो कि ज़ुबां, दिल समझता है Nazro ki zubaa, dil samajhta hai  
आहिस्ता बिखरती, मद्धम मुस्कान Aahista bikhrti, Maddhham muskan  
दामन में अपने, इश्क को लपेटे हुये Daaman me apne, Ishq ko lapete huye  
नाजुक डगर पर, अब चल रही है Nazuk dagar par, ab chal rahi hai  
काँपते हुये, घबराते हुये, शरमाते हुये Kaampte huye, Ghabrate huye, Sharmate huye
हया के सुर्ख लिबास में, सिमटते हुये Hayaa ke surkh libas me, simat te huye  
बिखर रही है, आज हर तरफ यहाँ Bikhar rahi hai, Aaj har taraf yahan  
हुस्न-ओ-ज़माल कि, दिलकश अदाये Husn-o-zamal ki, Dilkash adaye  
मुहब्बत में भींगकर, मन हो गया बावरा Muhabbat me bhigkar, Man ho gaya baawra
लफ्ज़ो को संग अपने, यूं डूबो रहा है Lafzo ko sang apne, yoon doobo raha hai  
इश्क के दरिया में, जेसे तूफान उठा हो Ishq ke dariya me, Jese toofan utha ho  
जब कभी, पहली बारिश शुरू होती है Jab kabhi, Pahli barish shuru hoti hai  
और सारा जहां, खिल उठता है फिर Aur sara jahan, khil uthta hai phir  
कुछ इस तरह, नुमायाँ है अब तू मुझमें Kuch is tarah, Numaya hai ab tu mujhme..

“सही क्या है, गलत क्या है” (Sahi kya hai, Galat kya hai)

घनी ज़ुल्फो के साये तले Ghani zulfo ke saaye tale
वो इक चेहरा   Wo ik chehra  
मुझे खींचता रहता है  Mujhe khinchta rahta hai
अपनी ही ओर   Apni hi aur  
गहरी सोच में डूबा हुआ Gahri soch mein dooba hua
ये मन मेरा    Ye man mera  
इश्क़ माने इसे   Ishq maane ise  
या समझे साज़िश  Yaa samjhe sazish
क्या कोई है यहाँ Kya koi hai yahan
जो ये बतलाये   Jo ye batlaye  
सही क्या है, गलत क्या है  Sahi kya hai, Galat kya hai
रिश्तो कि उलझन में Rishto ki uljhan mein
बस जकड़ा हुआ  Bas jakda hua   
डरा सा, सहमा सा Dara sa, Sahma sa
ये अस्तित्व मेरा  Ye wujood mera
समझ नहीं पा रहा अब  Samajh nahi paa raha ab
सच क्या है, फरेब क्या है  Sach kya hai, Fareb kya hai

“वोह पुराना खेत हमारा”(Woh purana khet hamara)

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खम्भे से लग रहे है Khambhe se lag rahe hai
सूखे हुये ये दरख्त Sookhe huye ye darakht
उजङा सा नजर आ रहा Ujda sa nazar aa raha
वोह पुराना खेत हमारा Woh purana khet hamara
इक कुआं था यहीं पे Ik kuaa tha yahi pe
पानी से भरा जो रहता Pani se bhara jo rahta
खूब नहाते हम जहा Khoob nahate hum jaha
मगर अब जाने क्यूं Magar ab jaane kyun
सूखा पङा रहता है Sookha pada rahta hai
कबूतरो का आशियां Kabutaro ka aashiya
बन चुका है बस Ban chuka hai bas
कोई नही जाता वहां Koi nahi jata wahan
फुरसत अब किसे यहां Fursat ab kise yahan
गुजरी यादें समेटने की Guzri yaadein sametne ki
मगर जब मैं यूंही पहुचां  Magar jab main yunhi pahuncha
टहलते आज वहां पर Tahalte aaj waha par
सब लम्हे खुद बाखुद Sab lamhe khud bakhud
ज़िन्दा होने लगे Zinda hone lage
बिखरी यादें मुझसे लिपट गई Bikhri yaadein mujhse lipat gayi
और रोने लगा   Aur rone laga  
ज़ज्बाती होकर   Jajbati hokar  
वोह पुराना खेत हमारा Woh purana khet hamara

“बहुत भाग लिया है तू” (Bahut Bhag liya hai tu)

बहुत भाग लिया है तू Bahut Bhag liya hai tu   
अब तो जरा ध्यान कर Ab to jara dhyan kar    
तेरे भीतर ही छुपा है Tere bhitar hi chhupa hai  
राज़ तेरी कामयाबी का Raaz teri kamyabi ka  
अपनी परछाई को अब Apni Parchhayi ko ab  
बना दे इतनी विशाल Bana de itni vishal    
लोग फिर देने लगे   Log phir dene lage    
तेरी शिद्दत की मिसाल Teri shiddat ki misaal  
कोशिश और लगन को Koshish aur lagan ko  
रूह में अपनी बसा ले Rooh mein apni basa le  
हासिल होगा फिर तुझे Haasil hoga phir tujhe  
ख्वाबों का मुकम्मल जहां  Khawabo ka muqammal jahan  
वुज़ूद कि आवाज को Wujood ki aawaz ko    
लफ्ज़ो से अपने रंग दे Lafzo se apne rang de  
बहने लगे जो दरिया सा Bahne lage jo dariya sa  
बाहें खोले एहसास तेरा Baahe khole ehsas tera  
खामोशियों में है जकङा  Khamoshiyon mein hai jakda  
खुद को जरा आज़ाद कर Khud ko jara aazad kar  
जख्मो को अब तू अपने Jakhmo ko ab tu apne  
खोल नीले आसमां तले Khol neele aasman tale  
लगने दे कुछ मिट्टी इनपे Lagne de kuch mitti inpe  
भीगने दे खुली बारिश में Bhigne de khuli barish mein  
ना रहेगा बाकी वहाँ   Naa rahega baki wahan  
कोई भी निशान-ए-दर्द Koi bhi Nishan-e-Dard  
मिलेगी सच्ची इक राहत  Milegi sachhi ik rahat  
तलाश थी जिसकी तुझे Tlash thi jiski tujhe    
बहुत रो लिया है तू   Bahut ro liya hai tu    
अब तो जरा गौर कर Abt to jara gaur kar    
तेरे अन्दर ही बसा है Tere ander hi basa hai  
अक्स तेरी पहचान का Aqs teri pahchan ka    

“ज़िन्दगी के रंग” (Zindagi Ke Rang)

कई चटक रंगो से, मिलकर है बनी ज़िन्दगी Kayi chatak rango se, Milkar hai bani zindagi
यहाँ हर रंग, हर अंदाज़, इसका निराला है Yahan har rang, har andaz, iska nirala hai
कोई रहता है इंतज़ार में, दिनभर सूरज के Koi rahta hai intezar mein, Dinbhar sooraj ke
किसी कि रातो के, अंधेरो में भी उजाला है Kisi ki raato ke, Andhero mein bhi ujala hai
किसी ने संभाल कर इसे, खो दिया सब कुछ Kisi ne sambhal kar ise, Kho diya sab kuch
किसी ने सब कुछ खोकर, इसे सम्भाला है Kisi ne sab kuch khokar, ise sambhala hai

“उदासी में डूबा हुआ लम्हा” (Udasi me dooba hua lamha)

एक लम्हा, उदासी में डूबा हुआ   Ak lamha, Udasi mein dooba hua  
मुझमें आकर, थम गया   Mujhmein aakar, Tham gaya  
जब कभी बैचैन होता हूँ   Jab kabhi baichain hota hoon  
चेहरे पर नज़र, आ जाता   Chehre par nazar, aa jata     
खामोश आँखों से, जाने क्या कह रहा  Khamosh aankho se, Naa jane kya kah raha
दिल में छुपी, बेबसी का अक्स है Dil mein chhupi, Bebasi ka aqs hai  
जेसे इक गहरा, नीला समंदर    Jese ik gahra, Neela samander  
सीने में, ज़ज्बात दफन किये बेठा हुआ Seene mein, Jajbat dafn kiye betha hua  
साहिल पे खड़ा हूँ, कबसे यहाँ    Saahil pe khada hoon, Kabse yahan  
कोई किनारा मगर, दिखता नहीं   Koi kinara magar, Dikhta nahi  
कहा चले गए, हंसी के वो बादल Kha chale gaye, Hansi ke wo badal  
ख़ुशी में जो सदा, बरसते रहते   Khushi mein jo sada, Baraste rahte   
तलाश भी अब, धुंधली होने लगी है  Talash bhi ab, dhundhli hone lagi hai  
पलकों के, उदास पानी से    Palko ke, Udas pani se    
एक शख्स, दर्द में डूबा हुआ    Ak shakhs, Dard mein dooba hua  
मुझमें आकर, थम गया   Mujhmein aakar, Tham gaya  

“यारीयां” (Yaariyaan)

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फ़लक पर उतर आये, सितारे आज चमकते हुए Falak par utar aaye, Sitare aaj chamakte huye
रोशनी से अब जिनकी, खिल उठा है यह समां Roshni se ab jinki, Khil utha hai yah sama
यारीयां फिर ज़िन्दा हुई, दोस्तो कि महफिल में Yaariyaan phir zinda huyi, Dosto ki mahfil mein
चेहरे पर नज़र आये, नज़ारे आज इतराते हुए Chehre par nazar aaye, Nazare aaj itrate huye

“पुकार”

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नज़रे इनायत तेरी, मुझपे अब हो खुदाया
बस इतनी सी अरज़, मुझको दे मेरा पता 

अन्धियारों में भटक रहा, मैं हूँ जाने कहाँ
पुकार रहा दिल तुझे, कूबूल कर यह दुआ

इस जहाँ में कोई नही, तेरे सिवा मेरा यहाँ
तूने ही जीवन दिया, अता कर तूहीं वफ़ा

नादानी बहुत हुई, गलतीया भी की हज़ार
गफूर है दो जहां का तू, बख्श दे मेरे गुनाह

मुफ़लिसी के दौर में, सबने साथ यूँ छोङा
जिन्दगी में अब जीने की, दे मुझे कोई वजह

उम्मीद का दामन पकङे, चल रहा हूँ मैं यहाँ
बस इतनी सी अरज़, मुझको दे मेरा निशां

“वो कहलाती औरत”

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ख़ुदा ने बनाया है उसे, मुजस्समा मुहब्बत का
मर्द को जो मुकम्मल बनाती, वो कहलाती औरत

सबसे अफ़जल दर्ज़ा है, माँ के किरदार का
कदमो में जिसके जन्नत रहती, वो कहलाती औरत

पाकीज़ा इक मिठास रहती, बहन के स्नेह में
बचपन से जो ख्याल रखती, वो कहलाती औरत

अधूरा लगता है उसके बिना, हयात का सफर
हर मुश्किल में साथ निभाती, वो कहलाती औरत

मौला की रहमत जहाँ, बेटी बनकर घर आये
हमेशा सबको जो खुश रखती, वो कहलाती औरत

अलग-अलग सब रूप, फिर भी एक समानता
कदम कदम जो त्याग करती, वो कहलाती औरत

भौतिकवादी इस दौर में, अस्मत अपनी बचाती
हक़ के लिये जो संघर्ष करती, वो कहलाती औरत

अपनी ज़िन्दगी सदा यहाँ, दूसरो पर कुर्बान करती
इन्सान को जो इन्सान बनाती, वो कहलाती औरत

** इरफ़ान “मिर्ज़ा” **

मुजस्समा = Statue
मुकम्मल = Complete
अफ़जल = Highest
पाकीज़ा = Holy
हयात = Zindagi

“हाल-ए-दिल”

वोह कहते है, हम उनसे मिलते नहीं
उन्हें क्यां पता, हाल-ए-दिल हमारा 

खुद से मिले हुए, एक अर्सा हो गया
ना मिल सका यहाँ, रूह को किनारा

“हैरत”

कितनी हैरत से, यूं मुझे वो देखता है
यकीन नहीं शायद, उसे मेरे होने का

झुकती आँखों में, छुपे है कई फ़साने 
खौफ नहीं शायद, उन्हें अब खोने का

“पहचान”

 

आँखों में चमक, चेहरे पे दमक
सबसे ज़ुदा हो, पहचान तेरी
इरादो के खौलते, उबाल से
पिघला दे, हर दर्द तू अपना
ना रहे, कोई जख्म बाकी
ना अब कोई बन्धन वहां
मिटा दे, सब उलझनो को
फौलाद सा है, तेरा वुजूद
बारूद बना, उखङती सांसो को
तुझ में ही बसता है, तेरा खुदा
कुबूल कर इसे, ना हो निराश तू
अभी तो बहुत आगे जाना है
राहें हो चाहे, कितनी भी मुश्किल
सफर को तू, हमसफर बना ले
लफ्ज़ो कि यारीयां, दिल में बसा
ख्वाबो का जहां, फिर से बना
खुदको अब तू, खुदसे मिलवा
बनेगी तब यूं, मुकम्मल पहचान

“इश्क कि ख़ुमारी”

 

इश्क कि है जो ख़ुमारी
बङी ही लाइलाज बीमारी
कोई ना बच पाया इससे
ऐसी है दिलकश अदाकारी
दिन में चैन मिलता नही
रात होती कितनी भारी
हर जगह बस एक चेहरा
आँखों में रहता है तारी
महफिल में रहकर भी
ज़ेहन में बसती ख़ुमारी
पहली बारिश में खिलती है
मुहब्बत कि वो फुलवारी
आग का दरिया कह दो
या कहो गुलाबी समंदर
प्यार कि कश्ती में मगर
खौफ़ नही है डूबने का
रूहानी ताकत बसी जिसमें
इश्क कि है वोह तैय्यारी

“ग़ज़ल और नज़्म”

 

ग़ज़ल और नज़्म, दोनों लिखता हूँ 
फ़र्क़ बस इतना सा है 
नज़्म में खुद रहता हूँ 
ग़ज़ल में कोई और 
दिल जब रोता है, अकेले में
अश्क़ो के दरिया में, भीगे हुए 
चंद लफ्ज़ो से, बनती है नज़्म
सुलगते एहसास समेटे हुए
ग़ज़ल कि कहानी, कुछ अलग है
ज़िन्दगी के सच को, बयां करती
अनछुवे पहलुवों पर, नज़र फेरती 
कभी आंसू, कभी ख़ुशी बिखेरती
शब्दो कि जमावट, इस तरह दिखती 
जेसे सपनो का घर, बनाया हो किसी ने 
एक ग़ज़ल में, सौ ज़िंदगियाँ छुपी हुई
महसूस जो कर सके, तो पता चले
नहीं तो बस, शब्दो का मायाजाल है
शायर और कवि, मैं दोनों हूँ 
फ़र्क़ बस इतना सा है 
शायरी में खुद बसता हूँ 
कविता में कोई और

“कोई रहबर आयेगा”

 

पिन्जरे में कैद किसी परिन्दे सा
नादाँ ये दिल फङफङाता रहता
सख्त दिवारो से टकराता हुआ
पंख वो अपने फिर खोता हुआ
आखिर में टूट जाता है
उङने कि हर कोशिश नाकाम
बुझती आँखो में इक उम्मीद है
शायद कोई मददगार आयेगा
आज़ादी कि शिफ़ाअत करने
मगर अफसोस यहां कोई नही
शिरकत कर सके जो तन्हाई में
खलाओ में छुपी हुई है बैचैनी
ज़िस्म के हिजाब से ढकी हुई
फ़ना हो रही पल पल जिन्दगी
सियाह दर्द के उस तसव्वुर में
तक़दीर की पेशकश अजीब है
रूह की जुम्बिश भी हैरान यूँ
किस मोङ पर आकर ठहरी
हर तरफ बस बरस रहे है
खौफ़ के काले बादल यहाँ
भीगते मन में इक उम्मीद है
शायद कोई रहबर आयेगा
सफर को अब आसान करने

“जाने क्यूं पापा से कह नही पाता हूँ”

 

जाने क्यूं पापा से कह नही पाता हूँ
मेरे वुजूद में नेकदिली के निशां उनसे है
बाहर से सख्त दिखे पर अंदर से नरम
सादगी से संवारा है उन्होने परिवार
माँ से हमेशा हर बात खुल कर कही
जाने क्यूं पापा से कह नही पाता हूँ
मुश्किले हँसकर यूंही झेलते रहे है
चेहरे पर शिकन ना आने देते
सबको मुहब्बत बस बाँटते रहते
दर्द में भी उफ तक ना करते
मैं उनके पास रहना चाहता हूँ
जाने क्यूं पापा से कह नही पाता हूँ
साफदिल इतने लोग मिसाल देते है
कई दफ़ा हैरान हो जाता हूं
अपनी कुछ अच्छाईयों पर
फिर ख्याल आता है
मुझमें ये आदत उनसे है
मौला से बस इतनी सी दुआ है
तौफ़िक मुझे मिल जाये अब
सदा उन्हे खुश रखने की
बहुत प्यार मै उनसे करता हूं
जाने क्यूं पापा से कह नही पाता हूँ

“रिश्तो कि डोर”

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रिश्तो में कडवाहट इस कदर आ गई
सामने होकर भी तू सामने नही होता
झूठी वो तेरी कसमे वादे सब बेशुमार
यकीन करता रहा मैं जिन पर हर बार
नासमझ था शायद या था मैं अनजान 
जो भी हो पर कीमत तो अब चुकानी है
कांच कि तरह नाजुक है रिश्तो कि डोर
एक बार जो टूटे फिर जोड्ना आसां नही
गर जुड भी जाये एंठन बाकी रहती सदा
थक हार के आखिर समझोता कर लिया
शायद तकदीर का लिखा था यह फसाना

 

“बस इक किनारा चाहिये”

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मुफ़लिसी दौर में जीने का सहारा चाहिये
डूबती कश्ती को बस इक किनारा चाहिये

पलके यह भीगी हुई अश्को के दरिया से
मुरझाई आंखो को खुशनुमा नज़ारा चाहिये

फुरकत में जल रहा हूं आतिशी अन्गारे सा
मुझे भी अब यहां जशन-ए-बहारा चाहिये

दर्द कि परछाई क्यूं पीछा नही अब छोड्ती
खुदाई नूर में डूबा हुआ इक सितारा चाहिये

“शबनम कि बूंदे”

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सहर में चमक उठी, रात भर टपकती रही
शबनम कि कुछ बूंदे, ज़मींन पर ठहरी हुई

इक अनजान उल्फत में, वुजूद यूं खोती हुई
रफ्ता रफ्ता पिघल कर, आहें बस भरती रही

केसी ये मुहब्बत है, कोई भी ना समझ पाया
खुद को मिटा कर, आशिक को संवारती रही

“मेरी ख्वाहिश”

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आज़ाद हवा में बहने को अब दिल करे
मर्जी से जीने कि बस मेरी ख्वाहिश है

ना कोई बंधन रहे ना कोई गिरह रहे
खुली सांस ले लू बस यही ख्वाहिश है

दर्द से भरपूर है जुल्म के समंदर यहां
फराज़ दो मौला बस यही गुज़ारिश है

वुजूद को मिटा रहा एक काला साया
थाम ले कोई हाथ बस यही ख्वाहिश है

मेरे घर में मुझे अब कोई नही है जानता
पहचान दे दो मुझे बस यही ख्वाहिश है

बनावटी रिवाजो से सब बांधते रहे मुझे
सादगी से जीने की बस मेरी ख्वाहिश है

साज़िश रची हुई है हर तरफ हर जगह
कुव्वत दे दो मौला बस यही ख्वाहिश है

लफ्ज़ो में यूं नुमायां है वो शख्स इरफ़ान
ज़िन्दा रहूं सदा मैं बस यही ख्वाहिश है

“शैतानी बंदिश”

टूट कर बिखर गया, वक्त कि साज़िश में
वुजूद भी सहमा हुआ, शैतानी बंदिश से

कहां गया नूर-ए-इलाही, तलबगार हूं मैं
सूकून अता कर दो मौला, गुनाहगार हूं मैं

“अम्मी के हाथो का जादू”

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अम्मी के हाथो में, केसा गजब जादू है
एक बार जो खाये, कभी ना भूल पाये

पूरी दुनिया घूमा, ना मिला वो ज़ायका
खुशबूं यूं दिलकश, सांसो में बस जाये

मिट्टी के चूल्हे पर, चढती है इक हांडी
महक फिर पकती है, दहकते अंगारे पर

मसालो में घुलता है, स्वाद बेशकीमती
एक बार जो खाये, कभी ना भूल पाये

“मेरा घर “

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मिट्टी की खुशबू, सौन्धी लगती है जहां
बचपन कि शरारत भी, यूं बसती है वहां

कितना प्यारा लगता है, रेत का घरौंदा
खिलौनो कि दुनिया में, साथी वो सलोना

खेतो में बिछी रहती है, हरे रंग कि चादर
खिलते है फूल जहां, कुछ नीले कुछ पीले

परिन्दो का बसेरा है, पीपल के दरख्त पर
ठंडी छांव के तले, नीले आसमां का साया

एक अलग ही मज़ा है, मेरे घर के आंगन में
कुछ पल में आज जहां, सदियां जी लेता हूं

लफ्ज़ खुश हो जाते है, जूनून बसता है जहां
रूह को दिलकश सूकूं, मिलता है अब यहां

“सफर अजनबी”

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सफर अजनबी, रास्ते फिर भी अच्छे लगे
मुझको अब जहां, अधूरे ख्वाब सच्चे लगे
 
कोई किनारा नही, नही है कोई रहगुज़र
हसरतो के ख्याल, हर दिन सवंरने लगे
 
एक पल में बसता है, खुशी का वोह पल
हर पल को जीयो, जिन्दगी यूं हंसने लगे
 
कल को देखा नही, अब तक किसी ने भी
बेशुमार लम्हो में, मन बावरा खिलने लगे
 
राहों में हर मोड पर, कान्टे बहुत मिले है
सूफ़ियाना इश्क में, रूह भी जलने लगे
 
हैरान भी हुआ हूं, कई दफ़ा इस सफर मे
अब जाकर यूं मुझे, लफ्ज़ भी मिलने लगे

“खुद से रूठा हूँ मैं”

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खुद से रूठा हूँ मैं, जाने क्या हुआ मुझे
ख़ुशी में अब, लबों पर हंसी आती नहीं

कुछ तो कमी है शायद, मेरे जीने में
अनजानी राहें, ले जा रही जाने कहाँ

बनावटी दुनिया, ना भाये अब मुझको
सपनो के जहाँ में, मेरा दिल है लगता

परवाह नहीं अब, झूठे रस्मो रिवाज कि
सच्चा यार मिल जाये, दुआ है ये रब से

मिलते ही जिसके, ख़ुशी से ये मन झूमे 
सुहाना वो सफ़र, फिर कभी खत्म ना हो

उस पल को जीकर, ज़िंदा रहू मैं हर पल
हर दिन मिले वहाँ, सुनहरी यादों का कल 

दर्द कि इन्तेहा में, रूह मेरी धुल सी गई
अल्फाज़ो के भीतर, अधूरापन छुपा बेठा 

वक़्त से टूटा हूँ मैं, ऐसा क्या हुआ मुझे 
ख्वाबो में अब, आँखों पर नमी नहीं 

खुद से रूठा हूँ मैं, जाने क्या हुआ मुझे
ख़ुशी में अब, लबों पर हंसी आती नहीं