“मन को मत रोको”

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मन को मत टोको, मन को मत रोको
मन तो है आवारा, मन को मत रोको

है ये बेहद अनमोल, बोले सच्चे बोल
तन के बाज़ार में, मन को मत झोंको

चुपचाप रहता है, सब कुछ सहता है
रंज की कढ़ाई में, मन को मत छोंको

दिलो दिमाग की, साझा उपज है ये ग़म
ग़मों की दलील को, मन पे मत ठोको

सिकंदर भी है यही, कलंदर भी है यही
मन तो है ये बंजारा, मन को मत रोको ।।

#RockShayar ‘Irfan’

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“कल अगर मैं ना रहूँ कहीं तो”

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कल ! अगर मैं ना रहूँ कहीं तो
कल ! अगर मैं ना मिलू कहीं तो
हैरान मत होना, परेशान मत होना
सुन मैं तुझमें हूँ कहीं, देख मैं तुझमे हूँ यहीं
गर महसूस कर पाओ, हाँ मैं तुझमे हूँ कहीं

याद आये तो, मेरी डायरी पलट लेना
बेवक्त ही कभी, मेरी शायरी पढ़ लेना
हाँ रोना कभी ना, चैन खोना कभी ना
सुन मैं तुझमें हूँ कहीं, देख मैं तुझमे हूँ यहीं
गर महसूस कर पाओ, हाँ मैं तुझमे हूँ कहीं

ख़ामोशी में मेरी, ग़ज़ल गुनगुना लेना
नज़्म पढ़ते पढ़ते, यूँही मुस्कुरा देना
बस इतना याद रखना, आहें कभी ना भरना
सुन मैं तुझमें हूँ कहीं, देख मैं तुझमे हूँ यहीं
गर महसूस कर पाओ, हाँ मैं तुझमे हूँ कहीं

कल ! अगर मैं ना रहूँ कहीं तो
कल ! अगर मैं ना मिलू कहीं तो
उदास मत होना, मायूस मत होना
सुन मैं तुझमें हूँ कहीं, देख मैं तुझमे हूँ यहीं
गर महसूस कर पाओ, हाँ मैं तुझमे हूँ कहीं ।।

#RockShayar ‘Irfan’

“ज़िंदगी ये मुझको, इख़्तियार है रब से”

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इंतजार को भी हाँ, इंतजार है तब से
इंतजार में ये दिल, बेक़रार है जब से

हर कदम जो ठोकर खाई, दिल से ये सदां आई
ख़ुदाया तुझ पे ही, ऐतबार है अब से

ताउम्र हसरत में जिनकी, ये फ़ितरत पली
वफ़ा जफ़ा और शफ़ा, इंकार है सब से

इश्क़ में तेरे या मौला, बना मैं कलंदर सूफ़ी
हयात को भी रूह पे, इक़रार है तब से

मौत जब आई, तो पता ये चला ‘इरफ़ान’
ज़िंदगी ये मुझको, इख़्तियार है रब से ।।
——————————————–

इख़्तियार – अधिकृत
सदां – आवाज़
ऐतबार – विश्वास
हसरत – इच्छा
फ़ितरत – प्रकृति, स्वभाव
वफ़ा – वादा निभाना
जफ़ा – अन्याय
शफ़ा – राहत
कलंदर – मस्त मलंग फ़क़ीर
सूफ़ी – जो ईश्वर की आराधना प्रेमी और प्रेमिका के रूप में करते हैं
हयात – ज़िन्दगी
इक़रार – स्वीकार

“ज़िन्दगी तू मौत से क्यूँ घबराती है”

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खुद अपने ही अक्स से कतराती है
ज़िन्दगी तू मौत से क्यूँ घबराती है

आया है जो, उसे जाना है इक दिन
पाया है जो, उसे खोना है इक दिन

कोई भी नहीं, इस जहां में ज़ाविदाँ
हर घड़ी तो यहाँ, है बस अलविदा

खुद से ही भागती रहती ये हरपल
कल से भी मांगती रहती ये कल

पानी का बुलबुला हक़ीक़त इसकी
भूलो ना कभी तुम नसीहत इसकी

यूँ तो अपने हर अक्स पे इतराती है
ज़िन्दगी तू मौत से क्यूँ घबराती है ।।

“अभ्यास का भी अभ्यास कर”

अभ्यास का भी अभ्यास कर, स्वयं के होने का आभास कर

मिटा दे दुःख के घनेरे बादल, स्वयं को पाने का प्रयास कर 

सीमा ना कोई ना कोई बंधन, असीमित अपनी परास कर 

स्तब्ध हो जाए हर कोई यहाँ, नया कुछ ऐसा इतिहास कर 

लक्ष्य ना तेरा दूर ‘इरफ़ान’, मन से तो कभी प्रयास कर ।। 

#RockShayar ‘Irfan’

“सुन ळे रे भाया”

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सुन ळे रे भाया, ओ जग तो कोरी माया
हर पल अडे, कदे है थावङो कदे है छाया

रंगीला ऐ सपणा थारा, असल में है गारा
टूटे चाईजे सगळा, बुण ले फिर सू दुबारा

आणो और जाणो, ना अडे है कोई ठाणो
गातो रीजे रे, ज़िन्दगी की ओई है गाणो

मुश्किला सू कदे, डरणो कोनी थने अडे
पल पल हर पल, मरणो कोनी थने अडे

सुन ळे रे भाया, ओ जग तो थोथी माया
हर पल अडे, कदे है थावङो कदे है छाया ।।

© राॅकशायर इरफ़ान अली खान

सुन ळे रे भाया – सुन ले ऐ भाई
अडे – यहाँ
कदे – कभी
थावङो – धूप
सपणा – सपना
थारा – तुम्हारा
गारा – मिट्टी
चाईजे – चाहे
सगळा – सभी
बुण – बुन
सू – से
आणो और जाणो – आना और जाना
ठाणो – ठिकाना, निवास
रीजे – रहना
ओई – यही
गाणो – गीत
कोनी – नही
थने – तुम्हें
थोथी – कोरी, केवल

“झील के किनारे गुज़री वो रात”

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जज़्बात मुलाकात चंद लम्हात
झील के किनारे गुज़री वो रात

साये बरसते रहे आसमान से
फिरदौस के किसी मर्तबान से

नूर की बारिश में भीगी पलके
कभी चुप सी कभी वो छलके

एहसास अल्फ़ाज़ और बात
रूह के सहारे गुज़री वो रात

हवा में बहती हुई नेक दुआ
फ़ज़ा से कहती ये क्यां हुआ

साँसें वो इक इक करके घुली
बाहें जो रोम रोम भरके खुली

निशात इरशाद चंद लम्हात
झील के किनारे गुज़री वो रात ।।

© RockShayar Irfan

“तेरे सवाल में ही तेरा जवाब छुपा है”

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तेरे सवाल में ही तेरा जवाब छुपा है
इक नमाज़ में भी पूरा सवाब छुपा है

जो भी करे, बस इतना तू याद रख
गुनाह के पीछे सदा अज़ाब छुपा है

मैले से ये क़रम, मन के झूठे भरम
ज़िन्दगी का जिनमें हिसाब छुपा है

अपने ही पीछे, फ़क़त भागता है तू
सहराओं में जैसे कोई सराब छुपा है

चाहत हो गर, तेरी सच्ची ‘इरफ़ान’
खामोशी में भी पूरा जवाब छुपा है ।।
————————————–
© रॉकशायर ‘इरफ़ान’

सवाब – पुण्य
अज़ाब – पीड़ा, सन्ताप, दंड
सहरा – जंगल
सराब – मृगमरीचिका

“बैचेन है रूह मेरी”

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तूने ही दी है खुशी, तूने ही दिये ग़म
बैचेन है रूह मेरी, आँखें है मेरी नम

कहना तो चाहे, मगर कह नही पाये
अश्क़ो के दरिया भी, बह नही पाये

ख़ामोश वज़ूद मेरा सितम सहता है
तन्हाइयों में भी तन्हा तन्हा रहता है

दुआए मेरी आसमां से लौट आती है
सदांए मेरी बारगाह से लौट आती है

ख़्वाब सब उजङे उजङे से लगते है
ख़्याल अब उखङे उखङे से लगते है

तूने ही दी है साँसें, तूने ही दिया दम
हैरान है रूह मेरी, पलकें है मेरी नम ।।

© RockShayar ‘Irfan’

“वो नन्हा पपी”

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सङक के किनारे जा रहा था मैं
कल शाम यूँही टहलते टहलते
तभी अचानक इक नन्हा सा पपी
मुझे सङक के बीचो बीच नज़र आया
मासूम सा वो पपी भूरे चितकबरे रंग का
एकदम से घबरा गया
तेज दौङती हुई
भागती हुई गाङियो के शोर से
चकाचौंध से
मैंने झट से उसे उठाया
फुटपाथ से दूर रख दिया
और फिर अपने रस्ते चलने लगा
थोङी देर बाद मैंने पाया कि
वो भी मेरे पीछे पीछे आ रहा है
नन्हें नन्हें कदमो से धीरे धीरे
जैसै ही मैं ठहरा तो
सीधे आकर मेरे पैरों को चाटने लगा
ऐसे उछल कूद करने लगा
जैसे घर मिल गया हो उसे
मैंने उसे गोद में उठाया
और प्यार से सहलाया
वो मासूम नज़रो से मुझे देख रहा था
और बहुत कुछ कह भी रहा था
मैंने उसे बिस्कुट खिलाया
फिर थोङा पानी पिलाया
इतनी देर में उसकी माँ आ गई
उसे तलाशते हुए ढूँढते हुए
मैंने ज्योंही उसे ज़मीन पर छोङा
वो तेजी से भागता हुआ
सीधा अपनी माँ से जाकर चिपट गया
उसकी माँ की आँखों में मैंने वही पानी देखा
जो हर माँ की आँखों में होता है
अपनी औलाद के लिए
जाते जाते वो नन्हा पपी
बार बार मुङ कर
मुझे देखे जा रहा था
शायद कहना चाह रहा था
शुक्रिया ‘इरफ़ान’ ।।

‪#‎RockShayar‬ ‘Irfan’

“नज़्म बन गया था मैं”

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ग़ज़ल पढ़ रही थी वो, नज़्म बन गया था मैं
ग़ज़ल गढ़ रही थी वो, बज़्म बन गया था मैं

फिरता रहा जो दर बदर, हर सू यहाँ से वहाँ
देखकर वो नूर उसका, जज़्म बन गया था मैं

पता भी ना चला, ख़्यालो की वादी में हाँ कब
ख़ामोशियों का ख़ामोश, रज़्म बन गया था मैं

मुसाफिर कई मिले, ना मिला कोई उस जैसा
शोख़ अन्दाज़ को देख, बज़्म बन गया था मैं

पहली नज़र का फ़क़त, असर है ये ‘इरफ़ान’
निगाहें पढ़कर उसकी, नज़्म बन गया था मैं ।।
————————————————-
© रॉकशायर ‘इरफ़ान’

ग़ज़ल/नज़्म – उर्दू/फ़ारसी में कविता के रूप
बज़्म – सभा
दर बदर – यहाँ से वहां
सू – तरफ
नूर – प्रकाश
जज़्म – दृढ़
रज़्म – युद्ध
फ़क़त – केवल

“रूह के परिन्दे को सदा आज़ाद उड़ने दो”

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सफ़र को मंज़िल की बंदिशों में मत बांधो
सफ़र को भी कभी सफ़र का मजा लेने दो

उगते हुए सूरज का शर्बत इसे पी लेने दो
बहती हवाओ सी हसरत इसे जी लेने दो

पहाड़ों की तरह तुम अपनी चाह बनाओ
नदियों की तरह तुम अपनी राह बनाओ

रूह के परिन्दे को सदा आज़ाद उड़ने दो
अजनबी से हर मोड पर बेबाक मुड़ने दो

लहर को साहिल की बंदिशों में मत बांधो
लहर को भी कभी लहर का मजा लेने दो ।।

© RockShayar

“सुन मेरे हमसफ़र कहाँ है तू”

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सुन मेरे हमसफ़र जाने जहां है तू
ढूँढ रहा मैं तुझको जाने कहाँ है तू
हर गली हर शहर दर बदर हर सू
पूछ रहा मैं तुझको जाने कहाँ है तू…

शब में कभी यूँही चले आओ तुम
मुझमें कभी यूँही बस जाओ तुम
तन्हाई में हरदम ख़ल रहा हूँ मैं
जुदाई में हमदम जल रहा हूँ मैं
सुन मेरे हमसफ़र जाने वफ़ा है तू
ढूँढ रहा मैं तुझको जाने कहाँ है तू
हर गली हर शहर दर बदर हर सू
पूछ रहा मैं तुझको जाने कहाँ है तू…

खाली खाली से है दिन रात मेरे
ख़फ़ा सवाली से है जज़्बात मेरे
तेरा साया ही फ़क़त मेरा साया
चाहत में तेरी सब कुछ है पाया
सुन मेरे हमसफ़र जाने जहां है तू
ढूँढ रहा मैं तुझको जाने कहाँ है तू
हर गली हर शहर दर बदर हर सू
पूछ रहा मैं तुझको जाने कहाँ है तू…

दर्द से इस क़दर परेशान हूँ यहाँ
खुद से शामो सहर हैरान हूँ यहाँ
ज़िन्दा तो हूँ पर ज़िन्दगी नही है
बन्दा भी हूँ मगर बन्दगी नही है
सुन मेरे हमसफ़र जाने अदा है तू
ढूँढ रहा मैं तुझको जाने कहाँ है तू
हर गली हर शहर दर बदर हर सू
पूछ रहा मैं तुझको जाने कहाँ है तू…

सुन मेरे हमसफ़र जाने जहां है तू
ढूँढ रहा मैं तुझको जाने कहाँ है तू
हर गली हर शहर दर बदर हर सू
पूछ रहा मैं तुझको जाने कहाँ है तू ।।
————————————–

© RockShayar ‘इरफ़ान’ अली खान

“तेरे शहर में आये हम मुसाफिर बनकर”

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तेरे शहर में आये हम मुसाफिर बनकर
पर्दा-नशीं ना कोई अदा साहिर बनकर

ना तू मिला, ना तेरी कोई खबर मिली
फिर यादों ने लूटा मुझे काफ़िर बनकर

पहुंच गए यूँ तो, मंज़िल तक अपनी
पता है मगर लापता मुहाजिर बनकर

इक़रार भी ना करे, इंकार भी ना करे
नादाँ कहे जो खुद को माहिर बनकर

हसरत-ए-दीदार लिए बैठा मैं ‘इरफ़ान’
मिला हाँ खुद से थोड़ा ज़ाहिर बनकर
—————————————-
© RockShayar 

मुसाफिर – यात्री
पर्दा-नशीं – आवरण में छुपा हुआ
अदा – शैली
साहिर – जादूगर
काफ़िर – नास्तिक
मुहाजिर – प्रवासी
इक़रार – स्वीकार
इंकार – मना
नादाँ – अनजान
माहिर – निपुण
हसरत – इच्छा
दीदार – दर्शन
ज़ाहिर – प्रयत्क्ष

“किसके लिए शामो सहर फिरता है”

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दिल में यूँ तो सागर लिए फिरता है
प्यासा फिर भी दर बदर फिरता है

तलाश में ना जाने किसकी तू यहाँ
हर गली हर सू हर शहर फिरता है

ख़ाना बदोश हुई जब से तेरी दुआ
रास्ता हो जैसे इस क़दर फिरता है

मंज़िल की तलब का जादू है ये तो
सफ़र की तरह रहगुज़र फिरता है

ज़िन्दगी की डोर थामे हुए ‘इरफ़ान’
किसके लिए शामो सहर फिरता है ।।

© RockShayar

“उम्र भर क़ब्र की तरह जगता रहा”

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रात भर रात की तरह जगता रहा
नैनन से ख़्वाब सब मैं ठगता रहा

ज़िन्दगी इस क़दर बेक़दर हो चली
अश्क़ से महरूम दुआ लगता रहा

महफ़िल की तलाश में दर बदर हाँ
दोपहर में भी नंगे पाँव चलता रहा

सच्चे दिल को सदा जख़्म ही मिले
मासूमियत को जमाना ठगता रहा

खुद को पाने की ज़िद में ‘इरफ़ान’
उम्र भर क़ब्र की तरह जगता रहा ।।

#RockShayar

“लाइफ इज लाइक वन टाइम पासवर्ड (Life is Like O.T.P.)”

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लाइफ इज लाइक वन टाइम पासवर्ड
मेक इट हैप्पी नही तो फुर्र लाइक बर्ड

समटाइम्स जाॅय ट्रेक पे रनिंग शनिंग
समटाइम्स ऑफ ट्रेक पे बर्निंग शर्निंग

डिफरेंट कलर्स विद वाइब्रेंट वैराइटी
लिविंग फुल ऑन सच लाइक माइटी

हैप्पीनेस की करो यूँ जमकर शॉपिंग
सेडनेस की करो हाँ खुलकर क्राॅपिंग

ग़म वो सब अपने फ्लश आउट करो
खुशीयों का नेट हर तरफ राउट करो

लाइफ इज लाइक वन टाइम पासवर्ड
मेक इट हैप्पी नही तो फुर्र लाइक बर्ड

© RockShayar
http://www.rockshayar.wordpress.com

“निर्मोही हो चला ये मन मेरा”

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निर्मोही हो चला ये मन मेरा
विद्रोही हो चला जीवन मेरा

खुद की भी अब सुनता नहीं
राह कोई भी ये चुनता नहीं

दिल में सागर लिए चलता है
फिर भी क्यूँ प्यासा जलता है

ना जाने किसके लिए है व्याकुल
अपने ही साये के पीछे ये आकुल

तोड़कर सब सतरंगी सपने
निर्मोही हो चला ये मन मेरा

छोड़कर वो सब संगी अपने
विद्रोही हो चला जीवन मेरा ।।

‪#‎RockShayar‬

“खुद अपना ही ज़िंदा मज़ार हूँ मैं”

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तेरी बेरूख़ी का शुक्रगुज़ार हूँ मैं
खुद अपना ही ज़िंदा मज़ार हूँ मैं

नापतोल जो करना है कर लो तुम
गुमनामी का बेनामी बज़ार हूँ मैं

महसूस कर सको गर मुझमें कभी
इक शख़्स में अक्स हज़ार हूँ मैं

दर्द की आमद हो चाहे जितनी
दौरे ख़िज़ा में भी गुलज़ार हूँ मैं

छू सको गर मुझको तुम ‘इरफ़ान’
जज़्बातों का फ़क़त इज़ार हूँ मैं

#RockShayar

बेरूख़ी – उपेक्षा, विमुखता
शुक्रगुज़ार – आभारी, कृतज्ञ
ज़िंदा – जीवित
मज़ार – किसी पीर फ़कीर की क़ब्र
बेमानी – बिना मायने के
बज़ार – बाज़ार, मण्डी, मार्केट
अक्स – परछाई
आमद – आगमन
दौरे ख़िज़ा – पतझङ का समय
गुलज़ार – हरी भरी वाटिका
जज़्बात – भावना
फ़क़त – केवल, सिर्फ
इज़ार – रूख़सार, गाल

“निकल चल रे निकल चल” (My first Song Composition)

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निकल चल रे निकल चल
राहों पे अपनी निकल चल
मचल चल रे मचल चल
आहों पे अपनी मचल चल…

मंज़िल बुला रही है तुझको
महफ़िल गा रही है अब तो
तोङकर फिर बंधन सारे
जोङकर कुछ टूटे तारे
अब तो ये हालात बदल
निकल चल रे निकल चल
राहों पे अपनी निकल चल
मचल चल रे मचल चल
आहों पे अपनी मचल चल…

परेशानी हर कदम आयेगी
बेईमानी हर कदम भायेगी
तोङकर फिर भरम सारे
जोङकर कुछ क़रम हाँ रे
अब तो ये हालात बदल
निकल चल रे निकल चल
राहों पे अपनी निकल चल
मचल चल रे मचल चल
आहों पे अपनी मचल चल…

मुसाफिर कई मिलेंगे तुझे
मुतासिर यूँ तो करेंगे तुझे
जोङकर वो कच्चे क्यारे
मोङकर कुछ रस्ते न्यारे
अब तो ये हालात बदल
निकल चल रे निकल चल
राहों पे अपनी निकल चल
मचल चल रे मचल चल
आहों पे अपनी मचल चल ।।

© RockShayar

“स्लिम सी हो गई है ये ज़िन्दगी”

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स्लिम सी हो गई है ये ज़िन्दगी
फैट का कहीं भी कोई निशां नही
सुगर फ्री लगती है ये साँसें अब
ख़्याल भी करने लगे है डाइटिंग
खुद से करने लगे सब फाइटिंग
खुद पर करने लगे अब राइटिंग
ख़्वाबों की फास्ट ट्रैड मिल पर
ख़्वाहिशें कर रही है सब रनिंग
यूँ ऐब्स बना रही माइंडब्लोईंग
मैजिक सी कुछ एक्सरसाइज
बदल रही है लाइफ का साइज
वक्त के है जो स्टफ शिटअप्स
मुश्किलो के बेशुमार पुशअप्स
जुनूं के डम्बल सुकूं के कम्बल
शेप में लाए बेतरतीब रूह को
स्लिम सी हो गई है ये ज़िन्दगी
फैट का कहीं भी कोई निशां नही

#RockShayar

तेरा मुस्तक़बिल तुझी में रहता है

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तेरा मुस्तक़बिल तुझी में रहता है
देख कभी तो साया कैसे बहता है

वज़ूद तेरा ख़ामोशियों में लिपटा हुआ
सुन कभी तो तुझसे क्याँ कहता है

ख़ुशी भी है तुझमें ग़म भी है तुझमें
सोच कभी तो सब कैसे सहता है

यादों का मकां लबों के दरमियां
देख कभी तो हर्फ़ कैसे कहता है

हैरां है क्यूँ तू यहाँ पर ‘इरफ़ान’
मान कभी तो रब तुझी में रहता है ।।

‪#‎RockShayar‬

मुस्तक़बिल – भविष्य
साया – परछाई
वज़ूद – अस्तित्व
मकां – निवास
लबों – होंठो
दरमियां – बीच में
हर्फ़ – अक्षर
रब – पालनहार

“जहाँ देखो वहाँ है तू, जाने कहाँ कहाँ है तू”

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हर इक हर्फ़ में है तू, हर इक शर्फ़ में है तू
ज़मीन-ओ-आसमां, हर इक जर्फ़ में है तू

दिन के उजालो में तू, शब के अंधेरो में तू
दिल की दीवारों पर, सुर्ख़ से अंधेरो में तू

वफ़ा में तू दुआ में तू, फ़क़त दो जहां में तू
जहाँ देखो वहाँ है तू, जाने कहाँ कहाँ है तू

ख़ामोशी में मिले है तू, शोर में खिले है तू
मन के कच्चे क़रम हाँ, ग़म भी सिले है तू

दिल में नुमायाँ है तू, हर सू समाया है तू
ज़िन्दगी की ज़िन्दा, आरज़ू खुदाया है तू

कैसे कहूँ या मौला, मुझमें मैं नही ‘इरफ़ान’
हाँ मुझमें कहीं है तू, हाँ मुझमें यही है तू

‪#‎रॉकशायर‬

हर्फ़ – अक्षर
शर्फ़ – सम्मान
ज़र्फ़ – सहनशीलता
शब – रात
सुर्ख़ – गाढ़ा लाल
फ़क़त – केवल
नुमायाँ – प्रत्यक्ष
सू – तरफ
आरज़ू – इच्छा

“क्रेज़ी मेरी बाइक”

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बाइक बाइक बाइक क्रेज़ी मेरी बाइक
सुपरस्मार्ट है क्रेज़ी मेरी बाइक
राइड राइड राइड क्रेज़ी वेरी राइड
सुपरफास्ट है क्रेज़ी मेरी बाइक…

इंजन गाये व्रूम व्रूम व्रूम
उङती जाये बूम बूम बूम
राॅकिंग शाॅकिंग जैसे बोइंग
रोङ पे छाये धूम धूम धूम

हाईप हाईप हाईप वेरी वेरी हाईप
सुपरफास्ट है क्रेज़ी मेरी बाइक
बाइक बाइक बाइक क्रेज़ी मेरी बाइक
सुपरस्मार्ट है क्रेज़ी मेरी बाइक…

बात करे हवा से सुर्र सुर्र सुर्र
पलक झपकते ही फुर्र फुर्र फुर्र
पिक अप है यप माइंडब्लोईंग
हाॅर्न ये बजाये हुर्र हुर्र हुर्र

बाइक बाइक बाइक क्रेज़ी मेरी बाइक
सुपरस्मार्ट है क्रेज़ी मेरी बाइक
राइड राइड राइड क्रेज़ी वेरी राइड
सुपरफास्ट है क्रेज़ी मेरी बाइक ।।

#RockShayar

“यादों की दहलीज”

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यादों की संदली दहलीज पर
जब मैंने आज कदम रखे तो
यादें खुद बखुद ज़िन्दा हो गई
वक्त की धूप में परिन्दा हो गई

कुछ बातें जो थी भूली बिसरी
कुछ रातें जो थी खुली बिखरी
कुछ मर्तबान गुज़रे लम्हों के
कुछ बारदान उजङे लम्हों के
कुछ जमाल रेशमी लिबास में
कुछ कमाल पेशगी हिजाब में
कुछ लम्स खुरदुरे से गर्म भी
कुछ शम्स भुरभुरे से नर्म भी
कुछ ख़्वाब लगते जो ख़्वाब से
कुछ सवाल बनते जो ख़्याल से

जाने कितनी यादें कितने वादें
ज़हन के किसी कोने में छुपे थे
यादों की संदली दहलीज पर
जब मैंने आज इन्हे टटोला तो
यादें खुद बखुद ज़िन्दा हो गई
वक्त की धूप में परिन्दा हो गई

#RockShayar

“तलाशता ही रहा”

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जिस्म के चोगे में सदा, रूह तलाशता ही रहा
ना मिला वो मकां, यादों में तलाशता ही रहा

हर कदम हर मोङ पर, राहें मिली आहें खिली
ना दिखा वो कारवाँ, वादों में तलाशता ही रहा

बहाने बनाने के सदा, बहाने मिलते रहे हजार
ना गिला ना शिकवा, बातों में तलाशता ही रहा

मुकद्दर की लकीरें यूँ, मिटने लगी है आजकल
ना ज़मीं ना आसमां, हाथों में तलाशता ही रहा

ज़िन्दगी गुज़रती गई, वक्त के साये में ‘इरफ़ान’
ना मिला वो आशियां, रातों में तलाशता ही रहा

‪#‎RockShayar‬

मैं तो हूँ एक आज़ाद परिन्दा

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उङ चला मैं उस रोज डाल से
आज़ाद होकर वक्त के जाल से

नन्हें नन्हें पंख फङफङाकर ही
उङना सीखा लङखङाकर ही

बाज़ मिले अनजान राहों में कई
साज़ खिले वीरान आहों में कई

आसमां को ओढ़ा ज़मीं पे सोया
दर्द हो कितना भी कभी ना रोया

हौसला अब अपना तराशता हूँ
घोंसला वोह अपना तलाशता हूँ

दुनिया करे चाहे लाख निन्दा
मैं तो हूँ एक आज़ाद परिन्दा

#RockShayar ‘इrफ़aन’

“तुझमें ही है वोह किरदार”

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बेक़रारियो से कुछ क़रार बीन ले
मौत से ज़िन्दगी का सार बीन ले

ख़्यालो का मज़माँ है बहुत भारी
चुनिंदा से कुछ अशआर बीन ले

जिस्म ये खोखला है बड़ा दोगला
रूहानियत का तू ख़ुमार बीन ले

वज़ह हमेशा वोह ज़रूरी तो नहीं
बेवज़ह ही कभी इंतजार बीन ले

ढूँढता है जिसे तू हर घडी ‘इरफ़ान’
तुझमें ही है वोह किरदार बीन ले

‪#‎RockShayar‬

मज़माँ – भीड़
अशआर – दोहे

“कागज़ ही मुझको मेरा घर लगता है”

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तन्हाईयो से इस कदर डर लगता है
सफ़र ही अब तो हमसफ़र लगता है

एहसास की स्याही से लिपटा हुआ
कागज़ ही मुझको मेरा घर लगता है

परछाइयों में नुमायाँ है अक्स मेरा
पतझड़ में जैसे कोई शज़र लगता है

दिल पर चोट ऐसी लगी कि फिर
हुस्न भी अब तो यूँ ज़हर लगता है

आबोहवा जब से ये बदली ‘इरफ़ान’
गाँव भी अब तो वो शहर लगता है

‪#‎RockShayar‬

“आ ही गया आख़िर, दर्द से दर्द को भुनाना”

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अजनबी है राहें सब, बियाबान मेरा ठिकाना
ज़िन्दगी हैरान मुझसे, मौत है मेरा फ़साना

रास नहीं आती मुझे, बोझिल सी साँसे यहाँ
आता है खूब अब तो, यादों से यादें मिटाना

वक़्त तो लगा बहुत, एहसास भी हुआ बहुत
आ ही गया आख़िर, दर्द से दर्द को भुनाना

अरसा लगता है इक, आसां नहीं है इतना
बिखरे रिश्तों की, ज़मीन पर रिश्तें उगाना

चोट जब खाई, तब कही जाकर ‘इरफ़ान’
सीखा है हमने, दुनिया से नज़रे मिलाना

#RockShayar

“कई दिन हो गए कोई नज़्म नहीं लिखी”

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कई दिन हो गए कोई नज़्म नहीं लिखी
रूह से वाबस्ता कोई नज़्म नहीं लिखी

अल्फ़ाज़ वो सब जाने कहाँ गुम हो गए
अशआर एक एक करके यूँ कम हो गए

ना कोई सरसराहट है ना कोई सरगोशी
एहसास बेमानी लगे ना कोई गर्मजोशी

वीरान जज़ीरे से है ये कागज़ के पुलिन्दे
ख़ामोश लग रहे अब ख़यालो के परिन्दे

दाद मिले जिन पर वो लफ्ज़ कहाँ गए
हमसफ़र रहे जो मेरे वो हर्फ़ कहाँ गए

कई दिन हो गए कोई नज़्म नहीं लिखी
ख़्वाब में भी यूँही कोई नज़्म नहीं दिखी

#RockShayar

“गर तू ना सही, वो तेरी हमशक़्ल ही सही”

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बेअदब, बेअमल, बेअसर, बेअक़्ल ही सही
जैसी भी है यह, देख तू मेरी शक़्ल ही सही

आईने भी देखो ये, इस कदर बात करते है
दिल से तो कर कभी, अपनी नक़्ल ही सही

ज़रूरत नहीं मुझे, उम्दा किसी तज़ुर्बे की
तेरे लिए जो ठहरा, मैं कमअक़्ल ही सही

नक़ाब पर नक़ाब, ना जाने कितने हिजाब
दिखा तू कभी, अपनी कोई शक़्ल ही सही

काम हो कोई भी, शिद्दत से पूरा कर उसे
हो चाहे कोई वो, झूठी मूठी नक़्ल ही सही

खुद में तलाशा है, मैंने तुझको ऐ ज़िन्दगी
गर तू ना सही, वो तेरी हमशक़्ल ही सही

‪#‎RockShayar ‘इरफ़ान’

“खुद से खुद की, मुलाकातें नसीब हो गई”

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यादें यतीम हो गई, रातें रक़ीब हो गई
फितूर से भरी, कुछ बातें हबीब हो गई

लूट लेता है अक्सर, चैन को शोर यहाँ
कहते कहते यूँ, ख़ामोशी करीब हो गई

सुकूं अता कर, कुछ तो मुझको इलाही
दर्द सहते सहते, ज़िंदगी ग़रीब हो गई

आईने भी अब तो, पहचानते नही सूरत
बहते बहते जब से, आँखें अजीब हो गई

तन्हाई का बयां, है बस यही ‘इरफ़ान’
खुद से खुद की, मुलाकातें नसीब हो गई

‪#‎RockShayar‬ ‘इrफ़aन’

“बावरियाँ”

अंग से मोहे तोरा अंग लगा दे
अंग पे मोहे तोरा रंग लगा दे

मैं बावरियाँ सब कुछ भूली
तोरे संग रासरंग सब झूली

सुर ताल स्वर लय छंद से
नाचू तोरे मन की सुगंध से

कारे कारे तोरे नैना दो कारे
दिल पर तीखी छुरियाँ वारे

मैं बावरियाँ सब कुछ भूली
तोरे संग प्रीतरंग सब झूली

अंग से मोहे तोरा अंग लगा दे
अंग पे मोहे तोरा रंग लगा दे ।।

‪#‎RockShayar‬ ‘इrफ़aन’

“मुहब्बत से ही मुहब्बत ना रही”

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मुहब्बत से ही मुहब्बत ना रही
जब से तू मेरी इबादत ना रही

गुमशुदा लगे वज़ूद भी अब तो
मुझपे ये तेरी इनायत ना रही

सीने में अब तलक ज़िन्दा है तू
जीने की फिर क्यूँ चाहत ना रही

ढूँढता मैं रहूँ ख़्वाबो में तुझको
नींद में भी अब तो राहत ना रही

ज़ुदा हुआ है जब से तू ‘इरफ़ान’
दुआओ में मेरी करामत ना रही

‪#‎RockShayar‬ ‘इrफ़aन’

— दो बूँद भी बहुत है — (Save Water Save Life)

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प्यासे परिन्दो के लिए, दो बूँद भी बहुत है
बचा सको गर पानी तो, दो बूँद भी बहुत है

बेइंतहा जरुरी नही, मुख़्तसर जो बह चले
अश्क़ों में हो शिद्दत तो, दो बूँद भी बहुत है

ख़्वाब सी तलब नही, आब सी तड़प नही
बंजर ज़मीं के लिए तो, दो बूँद भी बहुत है

झुलस रही है ज़िन्दगी, बिन पानी के यहाँ
सुकून दे जो रूह को तो, दो बूँद भी बहुत है

बोल नही सकते, बेज़ुबां ये परिन्दे ‘इरफ़ान’
पिला सको इन्हे पानी तो, दो बूँद भी बहुत है

‪#‎RockShayar‬ ‘इrफ़aन’

परिन्दे – पक्षी
बेइंतहा – अपार
मुख़्तसर – अल्प
अश्क़ों – आंसुओं
शिद्दत – प्रबलता
तलब – इच्छा
आब – नदी
रूह – आत्मा

— नैना —

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कज़रारे नैना तोरे, प्रीत की डोर डारे
जबसे लागे है नैना, हारे ये दिल हारे

नैनो की भाषा तो, नैना ही समझे है
नैनो की गिरह में, नैना ही उलझे है

ख़्वाब भी बुने ये, ख़्याल भी चुने ये
नैनो के रंग कई, सवाल भी सुने ये

अनकही बातें कहे, उनींदी रातें सहे
सुरमई नैना तो, मस्त पवन से बहे

मतवारे नैना तोरे, नदियाँ के किनारे
जबसे लागे है नैना, हारे ये दिल हारे

#RockShayar ‘IrFaN’

— दरवेश के वेष में भी दलाल मिलते है —

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निगाहो में अनकहे वो सवाल मिलते है
यहाँ जो भी मिलते है बदहाल मिलते है

चलो चला जाये अब तो गाँवों की ओर
शहरों में तो सब ही तंगहाल मिलते है

बीमार दिखते है वही लोग अक्सर यहाँ
जेबों में जिनकी साफ रुमाल मिलते है

हराम की आदत इस कदर है फैली कि
मुख़्तसर ही अब तो हलाल मिलते है

ठोकर खाई तो पता ये चला ‘इरफान’
दरवेश के वेष में भी दलाल मिलते है

‪#‎रॉकशायर‬ ‘इरफ़ान’

— फेसबुक —

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स्टाइलिश सेल्फियाँ, ते लाइमलाइट लुक
कुङियाँ वे मुन्डे जे, चिपके रेंदे है फेसबुक

नवी नवी पिक्स, ते मूवी विडियो क्लिप्स
टाईमलाइन पे सानु, करदे रेंदे है क्लिक्स

ऐंवई लाइक करणा, टैग नु हाइक करणा
प्रोफाइल पिक पे, कमेन्ट्स टाइप करणा

फेक आईडी इन्नी, कि लगदा है फेकबुक
स्मार्ट स्टेट्स सिम्बल, लगदा है फेसबुक

नित नई इत्थे, आंदी रेंदी है फ्रेंड रिक्वेस्ट
ब्लाॅक किन्ना वी करो, मिटे ना होर क्वेस्ट

वाइब्रेंट वेल्फियाँ, ते हाइप शाइप लुक
कुङियाँ वे मुन्डे जे, चिपके रेंदे है फेसबुक

‪#‎RockShayar‬ ‘IrFaN’

–ज़िन्दगी को कोई मानी मिल जाये–

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प्यासे परिन्दे को पानी मिल जाये
ज़िन्दगी को कोई मानी मिल जाये

झुलस रही है सदियों से रूह मेरी
मासूम इसे ज़िन्दगानी मिल जाये

भटक रहा हूँ रौशनी की तलाश में
रहनुमा कोई शादमानी मिल जाये

सुनते आये जिसे बचपन से सदा
परियों की वो कहानी मिल जाये

मरते वक्त आरज़ू यही है’इरफ़ान’
माँ की चुनरी वो धानी मिल जाये

© RockShayar ‘IrFaN’

मानी – मतलब
रहनुमा – पथदर्शक
शादमानी – खुशहाल
आरज़ू – इच्छा

— चाय की चुस्की —

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ले लो जी चुस्की ले लो
चाय की चुस्की ले लो
सर्दी सरदर्द या जुकाम
झटपट से देती आराम
रसोईघर की है ये शान
कहने को तो है जलपान
प्याली से होंठ लगाकर
खुशी की चुस्की ले लो
ले लो जी चुस्की ले लो
चाय की चुस्की ले लो…

थकन उदासी या लेज़ीपन
दिल में जगाती है क्रेज़ीपन
मेहमानवाज़ी की ये शान
कहने को तो है जलपान
टेंशन वेंशन दूर भगाकर
मस्ती की चुस्की ले लो
ले लो जी चुस्की ले लो
चाय की चुस्की ले लो ।।

— नादान परिन्दे —

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कुदरत से हैरान परिन्दे, गर्मी से परेशान परिन्दे
प्यास बुझाने की खातिर, उङ रहे नादान परिन्दे

मौसम की ये मार झेले, आँधी तूफ़ानो से है खेले
बोले फिर भी कुछ नही, मूक से बेज़ुबान परिन्दे

पंख जलाती हुई तेज हवा, फैला है बारूदी धुआँ
बेख़ौफ़ उङे हर पहर, खतरो से अनजान परिन्दे

ज़िन्दगी की उङान सदा, आग़ाज़ से बढ़ाते हुए
आसमां के लिए तो बस, है वो मेहमान परिन्दे

पिलाओ गर पानी इन्हें, देते है ये दुआए ‘इरफ़ान’
इंसानियत के शुक्रगुज़ार, रहते है नादान परिन्दे

#RockShayar