“फ़ुर्सत मिले कभी तो आना उस झील के किनारे पर”

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फ़ुर्सत मिले कभी तो
आना उस झील के किनारे पर
जहाँ मैं अक्सर
शाम को रात में तब्दील होते हुए देखता हूँ

परिंदे अपने अपने घर लौटते रहते हैं
शाख़ों के पत्ते उनके बारे में सोचते रहते हैं

ढलते हुए सूरज के पुर्ज़े बहते रहते हैं
हैरान ज़िंदगी से जाने क्या कहते रहते हैं ?

लहरों को यूँ तो लहर बनाती हैं हवाएं
लहरों पर अपना घर सजाती हैं हवाएं

आसमां का लिबास सियाह होता जाता हैं
सितारों के आगोश में फ़ना होता जाता हैं

चाँद की चाँदनी अनगिनत रूप बदलती हैं
रात की रागिनी सफ़ेद रूह सी पिघलती हैं

फ़ुर्सत मिले कभी तो
आना उस झील के किनारे पर
जहाँ मैं अक्सर
शाम को रात में तब्दील होते हुए देखता हूँ ।।

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“My Sister”

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My sister poem english माय सिस्टर  Poem Bro sis pics
गलतियों पर मेरी सदा, फेरती आई हैं जो डस्टर
सबसे प्यारी इक राजकुमारी, वो हैं माय सिस्टर

बचपन की साथी हैं वो, स्नेह गीत गाती हैं वो
मिटटी के कच्चे घरोंदे, मेरे लिए बनाती हैं वो

पापा की जब भी डांट पड़ी, साथ वो मेरे ही खड़ी
मेरी ज़िद की ख़ातिर हमेशा, साथ वो मेरे ही अड़ी

छोटी मोटी बातों पर, उससे लड़ना अच्छा लगता हैं
रूठना मनाना और फिर से झगड़ना, अच्छा लगता हैं

अपनी पॉकिटमनी बचाकर, बर्थडे गिफ्ट देना मुझे
अपनी चीजों के लिए हाँ, कभी ना, ना कहना मुझे

स्कूल गली मोहल्ले में, भैय्या के नाम पर इतराना
भूली नहीं वो आज भी हाँ, शादी के नाम पर शर्माना

शहद से भी मीठा अहसास हैं, भाई बहन का प्यार
हर्ष उमंग ख़ुशी उल्लास हैं, भाई बहन की तक़रार

भाई पर हक़ जताकर, कहे जो सुन ओ मिस्टर
सबसे प्यारी इक राजदुलारी, वो हैं माय सिस्टर ।।

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“वादियों के जहाँ में रहती है वो”

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वादियों के जहाँ में रहती है वो
जन्नत से आई एक हूर लगती है
आवाज़ में तिलिस्म
अंदाज़ में शोखियां
बयां करू तो कैसे
लफ़्ज़ भी ना मिलते
दीदार जब भी होता है
हुस्न का इक बादल
पलकों पर उतर आता है
कई दफ़ा जिसकी ठंडक
महसूस की है मैंने
साँसों की वो लरज़ती ज़ुम्बिश
कि जैसे रात के सन्नाटे में कोई साया
चप्पू चला रहा हो
शिकारे में यूँ हौले हौले
शब की तन्हाई में अक्सर
जब कभी लिखने बैठा
बेनज़ीर से उस ख़्वाब को
अहसास की सियाही से
दिल के वरक़ पर
और ख़याल था
सुरमई उन निगाहों का
तो फ़क़त इतना ही मालूम हुआ
कि वादियों के जहाँ में रहती है वो
सितारों से आई मद्धम रौशनी लगती है ।।

Pray…

तमाम कायनात के ख़ालिक़-ओ-मालिक
अल्लाह रब्बुलइज्ज़त का शुक्रगुज़ार हूँ मैं
जिन्होंने मुझे इस ज़मीन पर पैदा फ़रमाया
जिन्होंने मुझे अपनी बेहतरीन नेअमतो से नवाज़ा
आज मैं उनसे अपने तमाम गुनाहों की माफ़ी माँगता हूँ
या अल्लाह मुझे नेक राह पर चलने की तौफ़ीक़ अता फरमा
या अल्लाह अपने वालिदैन की ख़िदमत करने की तौफ़ीक़ अता फरमा
या अल्लाह मेरी जायज तमन्नाओं को कुबूल फरमा….

I dedicate this birthday to my friends…

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दोस्ती का दिन कोई, ना कोई वार होता है
ये वो एहसास है, जिसमें बस यार होता है

उसूलो आदाब से परे, स्कूली किताब से परे
ये वो अल्फ़ाज़ है, जिसमें बस प्यार होता है

ना किसी नक़ाब की, ना किसी हिज़ाब की ज़रूरत इसे
ये वो राज़ है, जिस पर बस ऐतबार होता है

चेहरे पर चेहरा लगाये, चेहरा ना कोई इसको भाये
ये वो अंदाज़ है, जिसमें बस ख़ुमार होता है

हर पल नया राग सुनाये, जोशीले सब गीत गाये
ये वो साज़ है, जिसमें राॅक बेशुमार होता है

पूरी ज़िंदगी का जिसमें, मुकम्मल सार होता है
मुसीबत में साथ खङा फ़क़त, दोस्त ही हर बार होता है

हसरत ना कोई ‘इरफ़ान’, ना कोई क़रार होता है
ये वो जज़्बात है, जिसमें बस यार होता है ।।

A letter for PAPA…..

Letter to papa

प्यारे पापा,
                  अस्सालामु अलैयकुम। मैं ख़ैरियत से हूँ और आपकी ख़ैरियत ख़ुदावंद क़रीम से नेक मतलूब चाहता हूँ। दिगर अहवाल यह है कि आज मेरा जन्मदिन है। आज मैं पूरे तीस बरस का हो गया हूँ। पापा मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ। अपने बारे में आपको कुछ बताना चाहता हूँ। कोई शिकायत नही ना कोई शिकवा, बस इक बात है मेरे दिल की बात। सुना है कि लफ़्ज़ों में बङी ताकत होती है। चूँकि आज मेरी पैदाइश का दिन है, तो मैंने सोचा कि आज आपको अपने दिल की बात ख़त के ज़रिए बता दू।

पापा आपको मेरी कितनी फ़िक्र रहती है ये मैं कभी समझ नही पाऊँगा। हर रोज शाम को आप फोन पर मुझसे बस हालचाल पूछकर अम्मी को फोन दे देते हो, पर कभी भी मुझसे मेरे बारे में नही पूछते हो? मेरा भी दिल करता है कि आपसे अपने मन की बातें करू। अपनी कामयाबी नाकामी के बारे में आपसे सलाह मशविरा करू। ईद के दिन जब ईदगाह में सब लोग गले मिलते है तब भी आप सिर्फ हाथ मिलाकर दूर हो जाते हो किसी अजनबी की तरह। क्यूँ कभी सीने से नही लगाते हो? क्यूँ कभी प्यार नही जताते हो? आख़िर मैं भी तो आपका सबसे छोटा बेटा हूँ। जब कभी घर आता हूँ तब भी आप बस कामकाज के बारे में ही पूछते रहते हो। क्यूँ कभी मुझसे मेरी पसंद नापसंद के बारे में नही पूछते हो? क्यूँ कभी मुझसे मेरी ज़िंदगी के बारे में नही जानते हो? मेरा भी दिल करता है आपको अपनी ख़ूबियों के बारे में बताऊँ।

ये शिकायतें नही है बस मेरी निगाहों में छुपे कुछ अनकहे अहसास है। पापा मैं कभी भी आपकी तरह नही बन सकता। आप बहुत नेकदिल और अच्छे इंसान है। ज़िंदगी में ठोकर लगी है इस वक्त मुझे आपकी सबसे ज्यादा ज़रूरत है। आप हर कदम मेरे साथ तो चलते पर कभी जताते नही कि मैं तेरे साथ हूँ बेटे। जैसे तैसे मैंने दर्द से उबरकर जीना सीख लिया है। उस दौर में ही मैंने टूटा फूटा लिखना शुरू किया था। आजकल अल्लाह के क़रम से अच्छा लिखने लगा हूँ। अम्मी और आपकी दुआओं ने मुझको हर कदम मुश्किलों से महफूज़ रखा है। लिखने से मुझको बेहद सुकून मिलता है। लिखने से मुझमें बेइंतहा जुनून पलता है। आपके कहे अनुसार मैंने कोई गलत आदत या बुरी संगत नही पाली है। जब कभी कुछ अच्छा लिखता हूँ तो वाह वाही मिलती है, मगर मेरी आँखों में बस एक ही सवाल उठता है कि वो दिन कब आयेगा जब आप मेरे लिए ताली बजायेंगे। मुझ पर फ़ख़्र करेंगे और प्यार से मुझको गले लगायेंगे।

पापा मैं नालायक नही हूँ, बस अपनी मर्ज़ी से जीना चाहता हूँ। अपने सपनो की उङान भरना चाहता हूँ। बस अपने दिल की सुनना चाहता हूँ। मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ नफ़रत नही। बस मुझे आपसे थोङा प्यार चाहिए और कुछ नही। वादा है ये मेरा आपसे कि कभी भी आपका दिल नही दुखाऊंगा। कोई ऐसा काम नहीं करूंगा जिससे आपको शर्मिंदगी महसूस हो। बस मुझे आपका मुझ पर थोङा भरोसा चाहिए और कुछ नहीं। ये सब गिले शिकवे और शिकायतें नही है बल्कि मेरे दिल में बचपन से छुपे हुए अनछुवे जज़्बात है। ये दर्द है मेरे सीने का जो आज निकल कर बाहर आया है काग़ज पर। जिसे सिर्फ आप ही महसूस कर सकते है। जिसे सिर्फ आप ही समझ सकते है। पापा अगर मेरी कोई बात आपको बुरी लगी हो तो मुझे नादान समझकर माफ़ कर देना। पापा मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ ।।

“सर्प ना कोई दंश हूँ मैं, तेरा ही तो अंश हूँ मैं
ज़ुदा ना कर मुझको यूँ, तेरा ही तो वंश हूँ मैं”

— आपका इफ्फ़ी (इरफ़ान)

My first Song Composition

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निकल चल रे निकल चल
राहों पे अपनी रे निकल चल
मचल चल रे मचल चल
आहों पे अपनी रे मचल चल
पिघल चल रे पिघल चल
साँसों में अपनी रे पिघल चल
निकल चल रे निकल चल
राहों पे अपनी रे निकल चल
मचल चल रे मचल चल
आहों पे अपनी रे मचल चल

मंज़िल बुला रही है तुझको
महफ़िल गा रही है कुछ तो
तोङकर फिर बंधन सारे
जोङकर कुछ टूटे तारे
अब तो ये हालात बदल
निकल चल रे निकल चल
राहों पे अपनी रे निकल चल
मचल चल रे मचल चल
आहों पे अपनी रे मचल चल

हर कदम आयेगी परेशानी
हर कदम भायेगी बेईमानी
तोङकर फिर भरम सारे
जोङकर कुछ क़रम हाँ रे
अब तो ये हालात बदल
निकल चल रे निकल चल
राहों पे अपनी रे निकल चल
मचल चल रे मचल चल
आहों पे अपनी रे मचल चल

मिलेंगे कई मुसाफिर तुझे
करेंगे वो जो मुतासिर तुझे
तोङकर फिर कच्चे क्यारे
मोङकर कुछ रस्ते न्यारे
अब तो ये हालात बदल
निकल चल रे निकल चल
राहों पे अपनी रे निकल चल
पिघल चल रे पिघल चल
साँसों में अपनी रे पिघल चल
मचल चल रे मचल चल
आहों पे अपनी रे मचल चल ।।

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असीम भाई से मिलकर बहुत अच्छा लगा हमें…

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@Aakhir Aseem bhai se mualaqat ho hi gayi meri….wo bhi optics shop par…to nazreen pesh hai….us manazr ka shayarana bayaan…..

नूर-ए-नज़र मय दो आँखें लिए शान से
जा पहुँचे भई हम तो चश्मों की दुकान में
एक एक करके वो फ्रेम सब देखते गये
आईने में खुद को बख़ूबी निहारते गये
मुलाकात हुई तभी उस शख़्सियत से
रंग भर दे जो अल्फ़ाज़ में क़ैफ़ियत से
सलाम हुआ तआरूफ़ हुआ और हाथ मिले
गुलाबी नगरी से है पर आज एक साथ मिले
असीम भाई से मिलकर बहुत अच्छा लगा हमें
मासूमियत वो सादापन बहुत सच्चा लगा हमें
बाद खुशी के मौके पर
स्टाइलिश सेल्फ़ी तो बनती है
पिंकसिटी के पोएट्स पर
राॅकिंग शायरी तो बनती है.

“मैं ज़िंदा रहूँगा”

मिटा दो चाहे तुम मुझे पूरी तरह से
जला दो चाहे तुम मुझे पूरी तरह से
मैं ज़िंदा रहूँगा फिर भी उस राख़ में
मैं ज़िंदा रहूँगा फिर भी इस आस में
कि आवारा हवा का झोंका कोई
उङा ले जाए मुझको दूर कहीं
और जाकर मिला दे उस बवंडर से
उङने लगे जहाँ बाहें मेरी खुद बखुद

मिटा दो चाहे तुम मुझे पूरी तरह से
डुबा दो चाहे तुम मुझे पूरी तरह से
मैं ज़िंदा रहूँगा फिर भी इक साँस में
मैं ज़िंदा रहूँगा फिर भी इस आस में
कि उफनता हुआ दरिया कोई
बहा ले जाए मुझको दूर कहीं
और जाकर मिला दे उस समंदर से
मुङने लगे जहाँ राहें मेरी खुद बखुद

मिटा दो चाहे तुम मुझे पूरी तरह से
जला दो चाहे तुम मुझे पूरी तरह से
मैं ज़िंदा रहूँगा फिर भी उस राख़ में
मैं ज़िंदा रहूँगा फिर भी इस आस में
कि मैं ज़िंदा हूँ जब तक मुझमें मैं हूँ
हाँ मैं ज़िंदा हूँ जब तक मुझमें मैं हूँ ।।

‪#‎RockShayar‬ Irfan Ali Khan

मैं, मैं हूँ ?

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कहने को तो मैं, मैं हूँ
मगर मुझे अभी तक मुझमें कुछ ऐसा मिला नही है
देखकर जिसे कह सकू कि मैं, मैं हूँ

हालांकि लोग कहते है कि मैं, मैं हूँ
मगर मुझे अभी तक मुझमें कुछ ऐसा दिखा नही है
पाकर जिसे कह सकू कि मैं, मैं हूँ

कई बार कोशिश की है मैंने
दबे पांव एहसास की नदी में उतरने की
बनावट फ़रेब और दिखावे के कपङे उतारकर
जज़्बात की लहरों ने भिगोया तो ख़ूब
मगर मुझे अभी तक मुझमें कुछ ऐसा मिला नही है
छूकर जिसे कह सकू कि मैं, मैं हूँ

वैसे तो आइने कभी झूठ नही बोलते है
जो जैसा है उसे हूबहू वैसा ही तोलते है
नज़रों के तराज़ू दिल के राज़ खोलते है
हर रोज शीशे के सामने खङे होकर
निहारा है जिसे इतने सालों से
वो शख़्स है या फिर अक्स कोई

चलो जो भी हो
एक ना एक दिन तो पता चल ही जायेगा
कि मैं मैं हूँ या कोई और
फिलहाल तो मैं, मैं हूँ
मगर मुझे अभी तक मुझमें कुछ ऐसा मिला नही है
महसूस कर जिसे लिख सकू कि मैं, मैं हूँ
हाँ जीकर जिसे खुद कह सकू कि मैं, मैं हूँ ।।

#RockShayar Irfan Ali Khan

ये मोहब्बत में होता क्या है आख़िर ?

एक सवाल पूछा था तुमने कल मुझसे
कि ये मोहब्बत में होता क्या है आख़िर ?
और मैंने हँसकर बस टाल दिया था तुम्हें
कि मोहब्बत में तो यूँही सब होता है आख़िर

बेवजह कोई शख़्स इतना प्यारा लगने लगता है
कि जैसे अपनी आँखों का तारा लगने लगता है
पसंद वो उसकी कब अपनी पसंद बन जाती है
फ़िक्रे भी खुद उसके लिए फ़िक्रमंद बन जाती है
ख़ुद से ज्यादा ख़ुद में यहाँ कोई और रहता है
साँसों ही साँसों में ख़ामोश कोई शोर बहता है
दिमाग़ी फ़ैसले भी यूँ तो अब दिल ही करता है
और आहें भी बेइंतहा वो सब दिल ही भरता है

एक सवाल पूछा था तुमने कल मुझसे
कि ये मोहब्बत में होता क्या है आख़िर ?
और मैंने उस ख़याल से ही तख़्लीक़ हुई
नज़्म के ज़रिए आज जवाब भेजा है तुम्हें
कि मोहब्बत में तो यूँही सब होता है आख़िर
फ़क़त मोहब्बत में ही तो रब होता है ज़ाहिर
फ़क़त मोहब्बत में ही तो रब होता है आख़िर ।।

‪#‎RockShayar‬ Irfan Ali Khan

“For Legendary Gulzar Sahab”

82th Birthday of Poetic Maestro….

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————
अर्श से पिघलकर
नूर का इक क़तरा
छलका था ज़मीं पर कहीं
उसी मिट्टी से बना है ये शख़्स
अल्फ़ाज़ यूँ संग महकते है इसके
जैसे साँसों से बह रहा हो ख़ुमार
कलम को जब वो छुए
बेज़ान पुर्ज़े ज़िंदा होने लगते है
रात की तन्हाई में अक्सर
नज़्म के लरज़ते हुए लबों से
चाँद की पेशानी चूमा करता है
वो शायर
यक़ीनन रूह को महसूस करता है ।

एहसास को पीकर
शबनम का इक बादल
बरसा था कायनात में कहीं
उसी बारिश में उगा है ये शख़्स
लफ़्ज़ यूँ संग थिरकते है इसके
जैसे कोई साहिर
बदल रहा हो ख़याल
ज़ेहन की गहराईयों में उतरकर
काग़ज पर जब हर्फ़ रखे
ख़ामोश लम्हे बात करने लगते है
नदी जंगल पहाङ झरने वादियां
हो चाहे काॅस्मिक वर्ल्ड और प्लूटो
हर शय को महसूस करके
नज़्म तख़्लीक़ करने वाला
रूहानियत का वो रहबर
खुशबू जिसकी गुलज़ार है
खुशबू जिसकी “गुलज़ार” ।।

‪#‎RockShayar‬ ‘Irfan’ Ali Khan

“रब”

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बिन मांगे जी भरके अता करता है वो
और एक एक करके ख़ता करता है तू

बख़्श देता है वो हर दफ़ा तेरे गुनाह सब
यूँही नही कहती दुनिया उसे अपना रब

तू फिर भी सब जानकर नहीं समझता है क्यूँ ?
तू फिर भी सब जानकर वहीं उलझता है क्यूँ ?

ज़िंदगी उसने दी है तो ज़रिया भी वहीं देगा
प्यास उसने दी है तो दरिया भी वहीं देगा

तुझसे बेपनाह मोहब्बत करता है रब तेरा
तुझ पर बेइंतहा इनायत करता है रब तेरा

माफ़ कर देता है पर्वरदिगार अपने बंदो को
शदीद गुनाहगारो और अच्छे अच्छे गंदो को

तू फिर भी नहीं उस राह पर चलता है क्यूँ ?
तू फिर भी वहीं बस चाह में जलता है क्यूँ ?

ज़िंदगी उसने दी है तो ज़रिया भी वहीं देगा
ज़िंदगी जीने का खुद नज़रिया भी वहीं देगा ।।

‪#‎RockShayar‬

“जश्न-ए-आज़ादी”

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(Independence Day 15th August)
———————-
जश्न-ए-आज़ादी कुछ ऐसे मनाये हम
सरफ़रोशी की शमां दिल में जलाये हम

अपना फ़र्ज़ ईमान से अदा करते हुए
हिंद को दुनिया का सरताज़ बनाये हम

मुल्क़ में फैली बुराइयों के ख़िलाफ
इन्क़िलाब का बिगुल फिर से बजाये हम

शहीदों की क़ुर्बानी याद करते हुए
मुकद्दस तिरंगा शान से फहराये हम

वतन की मोहब्बत का जज़्बा लिए
अपनी प्रतिभा जमाने को दिखाये हम

सरहद की हिफ़ाजत में डटें हुए
रणबाँकुरों को सर आँखों पर बिठाये हम

देश के लिए जानो तन लुटाकर
मिट्टी का क़र्ज़ अब लहू से चुकाये हम

हँसते हँसते जां निसार कर गए वो
शहादत के किस्से फ़ख्र से सुनाये हम

सबको बराबरी का हक़ दिलाते हुए
आज़ादी के सही मायने सिखलाये हम

मेहनत और लगन से आगे बढ़ते हुए
हर सूबे में अपना परचम लहराये हम

मज़हब, ज़ुबां, नस्ल से ऊपर उठकर
तराना-ए-हिंद आज यूँ गुनगुनाये हम

जश्न-ए-आज़ादी कुछ ऐसे मनाये हम
गुल है हिंदोस्ताँ आओ इसे सजाये हम ।।

**** राॅकशायर ‘इरफ़ान’ अली ख़ान ****

“नमाज़” (NAMAAZ)

In the name of ALLAH, most Beneficent and Merciful…

ख़ुदा से माँगने का ज़रिया है नमाज़
रहमत-ए-इलाही का दरिया है नमाज़

अल्लाह की इबादत का तरीका है नमाज़
मौला की इताअत का सलीक़ा है नमाज़

बेहयाई और बुराई से बचाती है नमाज़
क़ुलूब में इश्क़े-हक़ीक़ी जगाती है नमाज़

आलिमुलग़ैब से बंदे का तअल्ल़ुक़ है नमाज़
हाकिमुलफ़ैज से बंदे का तआरूफ़ है नमाज़

अज़ान तक्बीर दुआ मुकम्मल रक्अत है नमाज़
गुनाहों से सौ दफ़ा मुसल्सल शफ़ाअत है नमाज़

अहकमुल हाकिमीन की हम्दो सना है नमाज़
रब्बुलआलमीन की रब्तो पनाह है नमाज़

फ़र्ज़-ओ-सुन्नत वित्र-ओ-नवाफ़िल है नमाज़
कायनात की रहबर ईमान का दिल है नमाज़

असहाबे वफ़ा की साँसों का रूकूअ है नमाज़
अहमदे मुस्तफ़ा की आँखों का सुकूं है नमाज़

बारगाह-ए-रब में रूह का सज़्दा है नमाज़
हर इश्क़ से अफ़जल इश्क़े-यज़्दा है नमाज़

शबे मेराज में हासिल हुआ क़ामिल अहकाम है नमाज़
आसमान से नाज़िल हुआ पाक़ीज़ा पयाम है नमाज़

फ़ज्र ज़ुह्र अस्र मग़्रिब इशा और जुमा है नमाज़
अहले ज़मीं के लिए हाफ़िज़ रहनुमा है नमाज़

मालिकुलमुल्क़ की उम्मत पर इनायत है नमाज़
हर इबादत से उम्दा अशरफ़ुल इबादत है नमाज़ ।।
———
कातिब:- राॅकशायर ‘इरफ़ान’ अली ख़ान

*** अल्फ़ाज़ के मानी ***

1. इताअत – आज्ञा-पालन
2. क़ुलूब – दिल
3. इश्क़े-हक़ीक़ी – ईश्वर-प्रेम
4. आलिमुलग़ैब – अंतर्यामी
5. तअल्ल़ुक़ – सम्बन्ध
6. हाक़िमुलफ़ैज़ – बादशाही यश कीर्ति वाला
7. तआरूफ़ – परिचय
8. अज़ान – नमाज़ का बुलावा
9. तक्बीर – अल्लाहो अक्बर (अल्लाह सबसे बङा है) कहना, नमाज़ में क़याम रूकूअ और सज़्दे के दरमियान
10. दुआ – रब से मांगने का तरीका
11. मुकम्मल – सम्पूर्ण
12. रक्अत – नमाज़ में एक क़याम (खङा होना) एक रूकूअ (झुकना) और दो सज़्दों ( ज़मीन पर माथा टेकना) का मज्मून
13. मुसल्सल – निरंतर
14. शफ़ाअत – खुदा से अपने अनुयायियों के मोक्ष की सिफ़ारिश करना
15. अहकमुल हाकिमीन – मालिको का मालिक
16. हम्दो सना – खुदा की तारीफ
17. रब्बुलआलमीन – सारे ब्रम्हांड का मालिक
18. रब्तो पनाह – पूरी तरह से शरण में
19. फ़र्ज़ – अनिवार्य
20. सुन्नत – नियम
21. वित्र – विषम
22. नवाफ़िल – वे नमाज़े जो केवल सवाब के लिए पढ़ी जाए, फ़र्ज़ या वाजिब ना हो
23. कायनात – ब्रम्हांड, सृष्टि
24. रहबर – मार्ग दर्शक
25. ईमान – धर्म पर दृढ विश्वास
26. असहाबे वफ़ा – खुदा को मानने वाले
27. रूकूअ – झुकना
28. अहमदे मुस्तफ़ा – प्यारे आका नबी-ए-क़रीम हुज़ूरे अक़्दस सलल्लाहु अलैहि व सल्लम
29. बारगाह-ए-रब – अल्लाह का दरबार
30. रूह – आत्मा
31. सज़्दा – ज़मीन पर माथा टेकना
32. अफ़जल – बेहतरीन
33. इश्क़े-यज़्दा – ईश्वर-प्रेम
34. शबे मेराज – वह रात जिसमें नबी-ए-क़रीम सलल्लाहु अलैहि व सल्लम अर्श पर अल्लाह से मिलने गए थे
35. क़ामिल – सम्पूर्ण रूप से
36. अहकाम – आदेश
37. नाज़िल – उतरा
38. पाक़ीज़ा पयाम – पवित्र संदेश
39. फ़ज्र – सुबह की नमाज़
40. ज़ुह्र – दोपहर की नमाज़
41. अस्र – सूर्यास्त के पहले की नमाज़
42. मग़्रिब – सूर्यास्त के बाद की नमाज़, पश्चिम
43. इशा – रात की नमाज़
44. जुमा – शुक्रवार
45 अहले ज़मीं – संसारिक लोग
46. हाफ़िज़ – रक्षक
47. रहनुमा – पथ दर्शक
48. मालिक़ुलमुल्क़ – दुनिया का स्वामी
49. उम्मत – किसी विशेष पैग़म्बर को मानने वाला समुदाय
50. इनायत – कृपा
51. अशरफ़ुल इबादत – सर्वश्रेष्ठ आराधना
52. कातिब – लेखक

“सुनो जानाँ”

सुनो जानाँ
कुछ पूछना है तुमसे
अपने बारे में
कुछ जानना है तुमसे
खुद के बारे में
ज्यादा कुछ नही
बस एक सवाल है
हर घङी जो मैं
खुद से पूछता रहता हूँ
एक ख़याल है
हर लम्हा जिसे मैं
मन ही मन सोचता रहता हूँ
एक ख़्वाब है
हर शब जिसे मैं
नींद में देखा करता हूँ
सुनो जानाँ
कुछ पूछना है तुमसे…
क्या तुम्हें भी मेरी याद आती है ?
क्या तुम्हें भी तन्हाई तङपाती है ?
क्या तुम्हें भी ये एहसास होता है ?
हर पल हर घङी दिन रात होता है
क्या तुम्हें भी नींद नही आती है ?
क्या तुम्हें भी बेचैनीयां सताती है ?
क्या तुम्हें भी खुद को खोने का डर है ?
मुझसे ज्यादा यूँ मुझमें होने का डर है
क्या तुम्हें भी मैं हर सू नज़र आता हूँ ?
परछाई में अपनी हूबहू नज़र आता हूँ
क्या तुम्हें भी कभी कुछ महसूस होता है ?
सीने में धङकता हुआ कुछ महसूस होता है ?
सुनो जानाँ
कुछ पूछना है तुमसे
अपने बारे में
कुछ जानना है तुमसे
खुद के बारे में
ज्यादा कुछ नही
बस एक सवाल है
हर घङी जो मैं
खुद से पूछता रहता हूँ
आँखों ही आँखों में
बातों मुलाकातों में
बस इतना जता दो जानाँ
यादों में बरसातों में
अनकही सौगातों में
बस इतना बता दो जानाँ
क्या तुम्हें भी मोहब्बत है मुझसे ?
क्या तुम्हें भी मोहब्बत है मुझसे ?

“अक्स हूँ मैं तेरे इंतज़ार का”

जिस्म के दरमियानी हिस्से में
ना जाने क्या हुआ था आज
जब यूँ अचानक से देखा मैंने
तुम्हारी तरह दिखने वाले
इक चेहरे को
चेहरो के उस जंगल में कहीं
और फिर
पल भर के लिए जैसे
सब कुछ थम सा गया
लहू सीने में जम सा गया
होश को भी कुछ होश ना रहा
लम्हा वो मेरा ख़ामोश ना रहा
टकटकी बाँधे यूँही देखता रहा मैं
काफ़ी देर तक बस यहाँ से वहाँ
और तुम्हें तो पता ही नही चला
कि मेरी नज़रें
नज़रों ही नज़रों में
पूछ रही है उन नज़रों से
अनकहे से कई सवाल
लोबान सी साँसें मेरी
बातों में मुलाकातों में
खोल रही है उन यादों के
अनछुए से कई हिजाब
तेरे किताबी चेहरे पर
यही लिखा हुआ पाया है मैंने
कि याद हूँ मैं तेरी मोहब्बत की
कोरा तसव्वुर ना कोई ‘इरफ़ान’
महसूस कर मुझे
कभी तो खुद में
अक्स हूँ मैं तेरे इंतज़ार का
महफूज़ कर मुझे
हाँ कभी तो खुद में
फ़क़त नक़्श हूँ मैं तेरे खुमार का ।।

“क़ाफ़िये ढूँढता हूँ”

रूह से रदीफ़ वो, क़ुलूब से क़ाफ़िये ढूँढता हूँ
ज़िंदगी की किताब में बस हाशिये ढूँढता हूँ

ग़ज़ल से मोहब्बत मेरी, बढ़ रही हर रोज यूँ
ग़ज़ल की तख़्लीक़ के वो वाक़िये ढूँढता हूँ

लफ़्ज़ों का दिल में, उतरना हैं बेहद जरूरी
एहसास के ख़त लिए मैं डाकिये ढूँढता हूँ

साँसों से आती है बू, आँखों से टपके है खूं
सीने में जो दफ़्न कब से वो ताज़िये ढूँढता हूँ

अंधेरों में उजालों की, ज़िद किए बैठा यहाँ
नूर की तहरीर के पुरनूर वाक़िये ढूँढता हूँ

गज़लसरा नही मैं, ना कोई क़ातिब ‘इरफ़ान’
ना हुए जो अब तक वो काफ़िये ढूँढता हूँ ।।

‪#‎राॅकशायर‬ ‘इरफ़ान’ अली खान

रूह – आत्मा
रदीफ़ – वह समांत शब्द जो ग़ज़ल के हर शेर के अंत में आता है
क़ुलूब – ह्रदय, दिल
काफ़िया – तुक, ग़ज़ल के शेर में तुकांत शब्द
ग़ज़ल – उर्दू साहित्य की प्रसिद्ध काव्य विधा
तख़्लीक़ – रचना
वाक़िया – घटना
लफ़्ज़ – शब्द
ख़त – चिट्ठी, पत्र
डाकिया – संदेशवाहक
बू – गंध
खूं – रक्त, लहू, खून
ताज़िया – मकबरे के आकार का प्रतीक
नूर – प्रकाश
तहरीर – लिखित दस्तावेज
पुरनूर – प्रकाशमान, जगमग
गज़लसरा – अच्छी गज़ल पढ़ने वाला
क़ातिब – लेखक