“तेरे लिए”

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छलकते हुए तेरे अश्क़ों को, यूँ पीता चला जाऊ
तेरे लिए एक ज़िन्दगी और मैं, जीता चला जाऊ

मेरी हर इक सांस पर, नाम लिखा है सिर्फ तेरा
तेरे सारे ज़ख्मो को, बस यूँही सिलता चला जाऊ

दुनिया के रस्मो रिवाज़ की, परवाह नहीं है मुझे
तेरे लिए ही सारी हदें, बस मैं तोड़ता चला जाऊ

तुम साथ हो गर तो, हर मुश्किल आसान लगे
तेरे लिए ही खुशिया, बस मैं जोड़ता चला जाऊ

इत्तेफाक नहीं कोई, खुदा की मर्ज़ी है मुहब्बत
तेरे लिए ही हर सितम, बस मैं सहता चला जाऊ

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“शायर”

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जैसे रूह के बिना नही होता है, ज़िस्म पूरा
वैसे ही कागज़ और कलम के बिना, शायर है अधूरा
हर घङी ज़हन में, ख्यालो कि नदी बहती रहती है
कोरे पन्नो पर एहसास उतरता है, वो आहिस्ता
ख्वाब तैरते है कई, खुली आँखों के दरमियां
पहनाता है यूँ लिबास, नज़्म कि शकल में
कभी दर्द में डूबे ज़ज्बात, रात भर सिसकते रहते है
कभी इश्क़ में भीगे हुए अल्फाज़, महकते रहते है
अपने अक्स को कागज़ पर, सजाता है शायर
हर दिन इक नया अन्दाज, ज़िन्दा करता है शायर
रूह कि गुज़ारिश को, लफ्ज़ो में बसाता है शायर
मगर आखिर में, ख्यालो कि इस हैरतअंगेज़ जंग में
कागज़ के मैदान पर, शायरी जीतती है, शायर नही
लोग शायर को, उसकी शायरी कि वजह से याद करते है…

“ना मिटा सकोगे मेरी पहचान को”

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साजिशें कर लो चाहे कितनी भी तुम
ना मिटा सकोगे मेरी पहचान को

बन्दिशें लगा दो तमाम फिर भी
ना रोक सकोगे मेरी रफ्तार को

कोशिशें कर लो चाहे कितनी भी
ना दबा सकोगे मेरी आवाज़ को

रंजिशे बुनते रहो ताउम्र फिर भी
ना बुझा सकोगे मुझमें आग को

ख्वाहिशें रखो चाहे कितनी भी तुम
ना मिटा सकोगे यूँ इरफ़ान को

“गुज़ारिश है तुमसे”

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बस इतनी गुज़ारिश है तुमसे
तसव्वुर पर बन्दिशे ना लगाना
रूह को बेहद सूकूं मिलता है
जब तुम्हारे बारे में सोचता हूँ
मगर ये जख्मी दिल डरता है
इसलिये लफ्ज़ो में बयां करता हूँ
थोङा ऐतबार करो मुझ पर
दोस्त हूँ मैं, कोई गैर नही
मुहब्बत हुई है, गुनाह तो नही
मेरे लिये, वोह एहसास हो तुम
महसूस करता हूँ, हर लम्हा जिसे
दूर होकर भी, मेरे पास हो तुम
कभी तो वो दिन भी आयेगा
जब मैं तुम्हे याद आउंगा बहुत
और तुम यूँ खामोश बैठी हुई
अल्फ़ाजों में ज़िन्दा पाओगी मुझे

“मैं रहूँ ना रहूँ, मेरे अल्फ़ाज़ ज़ाविदाँ हैं”

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मैं रहूँ ना रहूँ, मेरे अल्फ़ाज़ ज़ाविदाँ हैं 
कल मिलू ना मिलू, मेरा अंदाज़ अलहदा हैं

गर्दिशों में डूबता रहा, किरदार ये मेरा 
कैसे तलाशू अब उसे, वो वज़ूद गुमशुदा हैं

बैचैनी का सबब, कभी ना जान सका 
रूह में बस गई खलिश, ज़ज्बात ग़मज़दा हैं

आसमां लिखना है, फलक पर अभी मुझे 
इन्तेहा से दूर तलक, ये मेरी बस इब्तिदा हैं

 

 

“शायर”

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शायर तो एक अधूरी कहानी है
लफ्ज़ो में जिसे आहें छुपानी है 

चोट खाकर ही समझा ये दिल 
बीते रिश्ते वक़्त की नादानी है 

ख्वाबों में तलाशता रहा हूँ जिसे 
वोह तस्वीर ज़ेहन में पुरानी है 

लबों से छूकर यह मालूम हुआ 
ग़ज़ल तो एहसास की रवानी है 

जो महसूस करो तब पता चले 
ख्यालों की ये खुशबू रूहानी है 

फ़क़त ‘मिर्ज़ा’ की तकदीर इतनी 
तन्हाई में अब यूँ रातें जलानी है 

“माँ की गोद”

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माँ की गोद में जब भी लेटता हूँ 
मुझको जीने का एहसास होता है

परियो की कहानी जब वो सुनाये 
सुनहरा इक जहाँ महसूस होता है

नमाज़ पढ़कर जब वो दुआए मांगे 
फ़रिश्तों का साया मेरे साथ होता है

मैं जब भी कहीं कामयाब होता हूँ 
माँ के लिए वो दिन खास होता है

माथे को चूमकर जब वो हाथ फेरे 
मुक़द्दर को भी खुद पे नाज़ होता है

माँ की गोद में जब भी लेटता हूँ 
मुझको ज़न्नत का एहसास होता है…

“मैं जिन्दगी को अब कागज़ पर सजाता हूँ”

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कच्चे ख्यालों के पक्के मकां बनाता हूँ
मैं शायरी में दिल की बैचैनी छुपाता हूँ

मुख़्तसर में भरपूर का एहसास है ग़ज़ल
मैं चंद लफ्ज़ो में पूरी कहानी सुनाता हूँ

ख्वाबों के परिंदे यूँ कैद है मुझमें कहीं
नज़्म के फलक पर मैं उनको उङाता हूँ

गुजरी यादों से भीगा है वक्त का लिबास
रूह की तपिश से मैं जिसको सुखाता हूँ

गर महसूस कर सको तो ये है इक अदा
मैं जिन्दगी को अब कागज़ पर सजाता हूँ…

“मुलाकात”

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बाद मुद्दतो के आखिर 
आज तुमसे मुलाकात हो गई 
बंज़र थी दिल की ज़मीं
वोह पहली बरसात हो गई 
मुझे अब तक याद है 
जब मिलते थे हम कभी
मौसम मेहरबां हो उठता था 
रिमझिम फुहारे शुरू हो जाती 
बारिश में भीगकर
तुम यूँ लगती थी 
जैसे कोई शोख जलपरी 
एहसास के दरिया में, तैर रही हो 
जब भी तुम्हे, चुपके चुपके देखता था 
हया का इक झोंका आकर
नज़रो को झुका देता था, आहिस्ता आहिस्ता 
आज मगर क्यूँ 
खामोश बैठे हुए है, हम दोनों 
जैसे कोई अजनबी, मिल रहे हो 
पहली मुलाकात में, कहीं पर 
मेने तुम्हारी वो तस्वीर 
अब तक छुपा रखी है
अपनी पुरानी डायरी में
जिसे मैं अक्सर 
तकिये के नीचे रखकर सोता हूँ 
शायद इस वजह से
ख्याल कहीं उड़कर दूर ना चले जाए 
कुछ तो था शायद 
तेरे मेरे दरमियान 
बेनाम रिश्ता ही सही 
यूँही नहीं कोई 
इक तस्वीर को, दिल में बसा कर
लफ्ज़ो के अनगिनत फ़साने 
लिखता चला जाता है 
मैं आज तक नहीं जान पाया हूँ
आखिर राज़ क्यां है 
इस सूफ़ियाना फितूर का 
जब भी तुम्हे सोचता हूँ 
यह फिर से ज़िंदा हो जाता है.

“रोशनी”

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दरख़्तो के झुरमट से छनकर
रोशनी जब, इन आँखों पर पङती है
यूँ लगता है, जैसे कहीं
ख़ुश्क ज़मीं पर, बारिश हो रही हो
सब्ज़ पत्तो को, चीरती हुई
अपना रास्ता, ये खुद बना लेती है
रोशनी जो आज़ाद है, हमेशा से
बन्दिशो में इसे, ना कोई क़ैद कर सका
दिल कि गीली ज़मीं पर, जब भी गिरती है
उगने लगते है, एहसास के नन्हे अँकुर
जब कभी, गर्दिशो में खोने लगता हूँ
उम्मीद कि किरण, ये फिर से जगा देती है
ख्यालों के लिबास में लिपटकर
रोशनी जब, मेरी साँसो में घुलती है
यूँ लगता है, जैसे कोई
रूहानी खुशबू, मुझमें ज़िन्दा हो रही है

“माँ”

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घने अंधेरो से, अब मैं डरता नही 
माँ की दुआए, मेरे साथ चलती है 
दुनिया के किसी कोने में, चाहे रहूँ 
बुरी नज़र से मुझे, महफूज़ रखती है 
तकलीफे मेरी, बिन कहे समझ लेती
इक माँ ही है, जो मुझे हौंसला देती है
इक माँ…….जो मुझे टूटने ना देती है
जब भी चूमता हूँ, माँ के कदमो को
जन्नत की घटाए, बरसने लगती है
अपने बच्चो को, बेपनाह चाहती है माँ
खुद भूखी रहकर, पहले उन्हें खिलाती है माँ
जब भी परेशान होता हूँ, बहुत याद आती है
दूर होकर भी सदा, वो मेरे पास रहती है
सिर पर हाथ फेरकर, यूँ माथे को चूमती है
जीता रहे तू, माँ मुझसे ये अक्सर कहती है
काले सायो से, अब मैं घबराता नहीं
माँ की दुआए, मेरे साथ चलती है ……
 

“सफ़र”

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अनजानी राहों पर, चल रहा हूँ मैं 
रूख़ हवाओ का, बदल रहा हूँ मैं 

तन्हा सफ़र में, मिले थे शख़्स कई
अधूरा इक ख्वाब लिये, जल रहा हूँ मैं 

जब भी लिखने बैंठू, लगता है यूँ 
लफ्ज़ो की सोहबत में, पल रहा हूँ मैं 

दर्द का एहसास, रूह को होता नही
ख़्वाहिशों की तरह, बदल रहा हूँ मैं 

मंजिले रुस्वा, नहीं है कोई ठिकाना 
शायराना अंदाज़ में, बस ढल रहा हूँ मै…

“यादें”

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सूखे पत्तों की तरह, यादें उड़ती रहती है 
किसके इंतज़ार में, ये आँखे जगती रहती है

ख्यालों के दरमियां, रहता है इक अजनबी 
देखकर जिसको मेरी, सांसे चलती रहती है

ख्वाबों के ही आसपास, ढूंढता हूँ वो जगह 
ख़ामोशी भी यूँ जहाँ, बातें करती रहती है

चाहत पर ऐतबार, दिल को अब होता नहीं 
अल्फ़ाज़ों के शहर में, रातें कटती रहती है

रूखे लम्हों की तरह, शामें ढलती रहती है 
किसके इंतज़ार में, ये आहें भरती रहती है……

 

 

“तेरा चेहरा”

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तेरा चेहरा रहता है, निगाहों में मेरी 
रात ढलते ढलते, ख्वाबों में उतर आता है

सही गलत के पार, मिले थे हम जहाँ 
वो पता अब इन, आँखों में नज़र आता है

तलाशता रहता हूँ, महकती खुशबू तेरी 
लिखूं जो नज़्म तुझपे, एहसास उभर आता है

धुंधले से लगते है, गुजरे हुए सब लम्हे 
सुनहरा वो दौर, कुछ यादो में ठहर जाता है

महफ़िल में अक्सर, यूँ खामोश रहता हूँ
दिल को मेरे अब, ख्यालों का शहर भाता है

सूफ़ी शायर बसता है, ख़लाओं में मेरी 
रूह का उठता धुँआ, ग़ज़ल में नज़र आता है

“या गरीब नवाज़”

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बिखरे मुक़द्दर के कतरे, दामन में लपेटकर 
थमती साँसों कि अर्ज़िया, पलकों पे संजोकर 
आया हूँ मैं तेरे दर पर, या गरीब नवाज़ 
गुनाहो से मेरा दिल, सियाह हो गया है
गुमनाम ज़िन्दगी में, मकसद खो गया है 
ढहते हुए वज़ूद को, सहारे कि जरुरत है 
इनायत मुझ पर हो, या गरीब नवाज़ 
शहंशाह-ए-हिन्द के दरबार का, है ये मंज़र 
रहमत बरसती है, यूँ बनकर इक समंदर 
जो भी आते है यहाँ, बिगड़ी उनकी बनती है 
सच्चे दिल से मांगी, हर मन्नत पूरी होती है 
ज़िन्दगी के दर्द-ओ-ग़म, यूँ फ़ना हो जाते है
भींगने लगे जब मन, सूफियाना बारिश में 
ख्वाज़ा के करम कि, मुझ पर अब हो नवाज़िश 
रूह को करार आ जाये, बस इतनी है गुज़ारिश 
रूठी तक़दीर के टुकड़े, आँखों में समेटकर 
जख्मी दिल कि फरियादें, अश्क़ो से भिगोंकर 
आया हूँ मैं तेरे दर पर, या गरीब नवाज़…….

“कुत्ते का एक बच्चा”

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सूखी हड्डियो का ढांचा
तन के टुकङो में लपेटकर
बैठा है यूँ , दुबककर
कुत्ते का एक बच्चा
धूप से परेशां होकर
भूख से बिलखता हुआ
तलाश रहा है, कब से
सुकून की ज़मी यहाँ
गली के बदमाश बच्चे
कभी पूँछ से उठा लेते 
कभी पत्थर से मारते 
दर्द से ये, गुर्राता भी है
लेकिन छोटा है, अभी उम्र में
इसीलिये, कोई डरता नही 
मेने जब, इक रोटी डाली
खाने लगा, यूँ चांव से
जेसे, सब मिल गया इसे
और हिलाने लगा, पूंछ अपनी
बेज़ुबान है ये, मगर खुदगर्ज नही 
इन्सां के लिये, जो हैरत की बात है

“दिल-ए-नादान”

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दिल-ए-नादान, क्यां हो गया है तुझे
दर्द सहकर भी, यूँ मुस्कुराने चला है

शीशे की तरह है, नाजुक मेरे ज़ज्बात
बिखेरकर इन्हे तू, फिर समेटने चला है

सोहबत में किसकी, रंगत बदलती रही 
होश गवांकर यूँ, फिर सम्भलने चला है

ख्यालो के कारवां, लफ्ज़ो में बसने लगे
लिखकर जिन्हे तू, फिर सवाँरने चला है

एहसास के वजूद की, खुशबू शायराना
पढकर इक गज़ल, रूह महकाने चला है

दिल-ए-नादान, क्यां हो गया है तुझे
इश्क दां सफर, फिर आज़माने चला है…

“पलकों की ज़ुबां”

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पलको के पर्दो से
झाँक रही दो आँखें
कुछ कहना चाहती
यूँ चुपके चुपके 
नैनो की ज़ुबां
अक्सर दिल ही समझता है
इशारो में अब जिनसे
गुफ्तगू करता रहता हूँ
मिली हो जब से तुम
लफ्ज़ो में ताजगी आ गई
तेरे होने का एहसास
इनको भी हो रहा शायद
मासूम अदाओ में
लिपटा हुआ सादापन
दीवाना करता है मुझे
लबो से झरते है मोती
जब पुकारती हो तुम
तलाश रहा हूँ तुम्हे
कहीं भी मिलती नही क्यूँ
और दिल कहता रहता है
तुम अब मुझमें कहीं हो……