“सर्दियाँ दा लेज़ीपन (Laziness of Winters)”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)
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किन्ना सोणा लगदा, ऐ सर्दियाँ दा लेज़ीपन
गुलाबी मौसम, होर नाळ क्रेज़ी मेरा मन

स्वेरे स्वेरे उठना, ऐंवे एवेरेस्ट दी चढ़ाई
नहान दी जब वी सोच्या, अक्खां भर आई

छात ते बरसदी रेंदी, गुनगुनी सुहानी धूप
जाड़ों विच्च अक्सर, छाँह लगदी है रूड

अदरक वाळी चाय, विद कुरकुरे समोसे
प्लेट हो चाहे फुल, लगदे फिर भी थोड़े से

दिन लगदे छोटे, ते रातां वे लम्बी लम्बी
रज़ाई विच्च होवें, ते बातां वे लम्बी लम्बी

जैकेट, मफ़लर, जर्सी, कोट, होर दस्ताने
इक इक करके लगदे, सबा नु याद आने

सहर दे रूख़ पे छाया, धुंध दा पहरा घणा  
बर्फ़ नु सांसें जमे, जे हर तरफ कोहरा घणा

किन्ना सोणा लगदा, ऐ सर्दियाँ दा लेज़ीपन
ठण्ड दा मौसम, होर नाळ स्नोवी मेरा मन ।।

Copyright © 2015 RockShayar
Irfan Ali Khan 
All rights reserved.

Audio Poem

Video Poem

ऐ सर्दियाँ दा लेज़ीपन – ये सर्दियों का आलस्य
किन्ना सोणा लगदा – कितना प्यारा लगता
होर – और
नाल – साथ में
स्वेरे स्वेरे – सुबह सुबह
ऐंवे  – यूँही
नहान दी जब वी सोच्या – नहाने की जब भी सोचू
अक्खां – आँखें
छात ते बरसदी – छत पर बरसती
जाड़ों विच्च – सर्दियों में
छाँह लगदी है रूड – छाँव लगती है रूखी 
दिन लगदे छोटे ते – दिन लगते छोटे से
रज़ाई विच्च होवें ते – रज़ाई में होवें फिर
सबा नु  – सब ही
सहर दे रूख़ पे- सुबह के चेहरें पे
स्नोवी – हिमाच्छादित

 

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“सोचता तो हूँ मगर, लिख नहीं पाता हूँ मैं”

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चाहकर भी जाने क्यूँ, कह नही पाता हूँ मैं
सोचता तो हूँ मगर, लिख नहीं पाता हूँ मैं

अधजगे अल्फ़ाज़ मेरे
बनाये मुझे मिटाये मुझे
अधजले अहसास मेरे
जलाये मुझे तरसाये मुझे 

खुद से खुद की दूरी ये, सह नहीं पाता हूँ मैं
चाहता तो हूँ मगर, कह नहीं पाता हूँ मैं

देखकर भी जाने क्यूँ, देख नही पाता हूँ मैं
सोचता तो हूँ मगर, लिख नहीं पाता हूँ मैं

उजङे रस्ते छूटा साहिल
मिलाने से कभी मिलते नहीं
बिखरे रिश्तें टूटा ये दिल
जुङाने से कभी जुङते नहीं

तन्हाइयों में अकेला, रह नहीं पाता हूँ मैं
जानता तो हूँ मगर, कह नहीं पाता हूँ मैं

चाहकर भी जाने क्यूँ, कह नही पाता हूँ मैं
सोचता तो हूँ मगर, लिख नहीं पाता हूँ मैं

सोचकर भी जाने क्यूँ, सोच नही पाता हूँ मैं
चाहता तो हूँ मगर, लिख नहीं पाता हूँ मैं ।।
#RockShayar Irfan Ali Khan

“जो महसूस करता हूँ, उसे कहना चाहता हूँ”

जो महसूस करता हूँ, उसे कहना चाहता हूँ
मैं जैसा हूँ, जो भी हूँ, वैसा रहना चाहता हूँ ।

ना है कोई मंज़िल मेरी, ना कोई ठिकाना है
मुझको तो बस संग अपने, यूँही चलते जाना है
जो जैसा है, उसमें वैसे ही बहना चाहता हूँ
मैं जैसा हूँ, जो भी हूँ, वैसा रहना चाहता हूँ ।

खुद को कब से ढूँढ रहा हूँ, खुली दो आँखें मूंद रहा हूँ
दिल की ज़बान पढ़ता हुआ, अपनी राहें ढूँढ रहा हूँ
वक्त के जुल्म सब, अब खुद ही सहना चाहता हूँ
मैं जैसा हूँ, जो भी हूँ, वैसा रहना चाहता हूँ ।

दगा देना मुझको आता नहीं, बनावटीपन दिल को भाता नहीं
उतर जाए जो नज़रों से इक दफ़ा, फिर उसको आजमाता नहीं
तकरीर नहीं करता कोई बङी, बात बस इतनी कहना चाहता हूँ
मैं जैसा हूँ, जो भी हूँ, वैसा रहना चाहता हूँ ।

जो महसूस करता हूँ, उसे कहना चाहता हूँ
मैं जैसा हूँ, जो भी हूँ, वैसा रहना चाहता हूँ ।।

“कोई और तोङे, इससे पहले खुद तोङ देता हूँ”

कोई और तोङे, इससे पहले खुद तोङ देता हूँ
सुकूं मिले जहाँ पर, दिल को वहीं मोङ देता हूँ

टूटे जो कभी अचानक से तो
तक़लीफ ना हो कोई ज्यादा
रूठे जो कभी अचानक से तो 
अहसास ना हो कोई ज्यादा

मिट्टी की तरह कुछ ख़्वाब कच्चे जोङ लेता हूँ
कोई और तोङे, इससे पहले खुद तोङ देता हूँ
सुकूं मिले जहाँ पर, दिल को वहीं मोङ देता हूँ

वक्त ने जो घाव दिए हैं
वक्त रहते भर दिए सब
फिर भी क्यूँ जाने सदा
बेक़रारी है कायम अब

दर्द ना थम जाए कहीं, ज़ख्म अपने खुद फोङ लेता हूँ
कोई और तोङे, इससे पहले खुद तोङ देता हूँ
सुकूं मिले जहाँ पर, दिल को वहीं मोङ देता हूँ

जुनून की ऐसी आदत हुई
के खुद को पाना चाहत हुई
तज़ुर्बा इस क़दर हुआ फिर
ग़मों से दिल को राहत हुई

अम्मी ने भेजी है जो, दुआओं की चादर ओढ़ लेता हूँ
कोई और तोङे, इससे पहले खुद तोङ देता हूँ
सुकूं मिले जहाँ पर, दिल को वहीं मोङ देता हूँ ।।

“सज़ा को ही मज़ा बना ले”

सज़ा को ही मज़ा बना ले
जीने की तू वजह बना ले
दर्द ही लगने लगे हमदर्द
खुद को इस तरह बना ले
सज़ा को ही मज़ा बना ले
जीने की तू वजह बना ले 

ज़िंदगी इम्तिहान लेती है
रोज नई पहचान देती है
मैले ये तेरे क़रम धोकर 
कुव्वत और ईमान देती है
आह ही लगने लगे जो वाह
खुद को इस तरह बना ले
सज़ा को ही मज़ा बना ले
जीने की तू वजह बना ले 

हर दिन लगे कुछ बेहतर
हर रात कटे खुश रहकर
हर पल जियो कुछ ऐसे कि
याद आए वो रह रहकर
घाव ही लगने लगे छाँव
रूह को इस तरह बना ले

सज़ा को ही मज़ा बना ले
जीने की तू वजह बना ले 
दर्द ही लगने लगे हमदर्द
खुद को इस तरह बना ले
सज़ा को ही मज़ा बना ले
जीने की तू वजह बना ले ।।

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“ग़मों का अपना ही मज़ा है”

खुशियाँ तो रब की रज़ा है
ग़मों का अपना ही मज़ा है
यूँही तो नही मिलते जख़्म 
इनकी भी कोई वजह है
खुशियाँ तो रब की रज़ा है
ग़मों का अपना ही मज़ा है 
यूँही तो नही सिलते लब
इनकी भी कोई वजह है 
खुशियाँ तो रब की रज़ा है
ग़मों का अपना ही मज़ा है

नसीब में है जो भी लिखा
हर पल यहाँ वो ही दिखा
राज़ जब जब खोले इसने
दिल ने सदा वो ही लिखा
यूँही तो नही मिलते दर्द
इनकी भी कोई वजह है 
खुशियाँ तो रब की रज़ा है
ग़मों का अपना ही मज़ा है

मिले मुसीबत उतनी ही
सह पाये तू जितनी कि
फ़ित्ने फ़साद उतने ही
सह पाये तू जितने कि
यूँही तो नही होते सितम
इनकी भी कोई वजह है 

खुशियाँ तो रब की रज़ा है
ग़मों का अपना ही मज़ा है
यूँही तो नही मिलते जख़्म 
इनकी भी कोई वजह है
इनकी भी कोई वजह है ।।

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“जुनूनी इक बार हो जा”

नींद से बेदार हो जा, रूहानी किरदार हो जा
सोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

बहुत जी लिया मर मर कर,
लहू के आंसू भर भर कर
रोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

नींद से बेदार हो जा, रूहानी किरदार हो जा
सोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

साया तेरा तुझसे कहे, पलकों से ना ये अश्क़ बहे
नुमायाँ तुझमें तू रहे, अब और ना यह सितम सहे

बहुत खोया है तूने खुदको, आबाद इस बार हो जा
रोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

नींद से बेदार हो जा, रूहानी किरदार हो जा
सोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

यूँही नहीं तू पैदा हुआ, यूँही नहीं तेरी ज़िन्दगी
कर्ज़ चुका इन साँसों का, तुझसे कहे ये ज़िन्दगी

बहुत रोका है तूने खुदको, आज़ाद इस बार हो जा
रोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

नींद से बेदार हो जा, रूहानी किरदार हो जा
सोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

वज़ूद तेरा पूछे तुझसे, कहाँ हूँ मैं बता ज़रा
जुनून तेरा कहे तुझसे, कर ले यक़ीं खुद पे ज़रा

बहुत टोका है तूने खुदको, हिम्मती इस बार हो जा
रोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

नींद से बेदार हो जा, रूहानी किरदार हो जा
सोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा

बहुत जी लिया मर मर कर,
लहू के आंसू भर भर कर
सोने का अब वक्त नहीं है, जुनूनी इक बार हो जा ।।

“क्या ढूँढ रहा है तू”

क्या ढूँढ रहा है तू कब से यहाँ
क्या पूछ रहा है तू खुद से यहाँ
हाथ पर हाथ रखकर यूँही बस
क्या सोच रहा है तू कब से यहाँ
क्या ढूँढ रहा है तू कब से यहाँ
क्या पूछ रहा है तू खुद से यहाँ 

सफ़र तो है मगर मंज़िल नही
सागर भी है पर साहिल नही
खुद में ही पराया लागे खुद तू
खुद में इस क़दर शामिल नही
क्या कह रहा है तू खुद से यहाँ
क्या सह रहा है तू खुद में यहाँ
दिल पर हाथ रखकर यूँही बस
क्या सोच रहा है तू कब से यहाँ
क्या ढूँढ रहा है तू कब से यहाँ
क्या पूछ रहा है तू खुद से यहाँ

बेचैनियो में ही चैन खोजता है
तन्हाइयो सा तन्हा सोचता है
कहाँ गुम है तू ऐ मेरी ज़िंदगी
ख़ामोशियों से हर रोज पूछता है
क्या बुन रहा है तू खुद में यहाँ 
क्या चुन रहा है तू खुद से यहाँ
कान लबों पर रखकर यूँही बस
क्या सुन रहा है तू कब से यहाँ
क्या ढूँढ रहा है तू कब से यहाँ
क्या पूछ रहा है तू खुद से यहाँ 
दिल पर हाथ रखकर यूँही बस
क्या सोच रहा है तू कब से यहाँ ।।

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Irfan Ali Khan 
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“जाग तू, रे जाग तू”

जाग तू, रे जाग तू 
है यक़ीनन, आग तू
ये हक़ीक़त जान ले
खुद से ना अब, भाग तू 
जाग तू, रे जाग तू
है यक़ीनन, आग तू 

तुझ में है तू ही अगन
छू ले अपना ही गगन
पायेगा सब कुछ यहाँ
लागी जो मन की लगन
जाग तू, रे जाग तू
है यक़ीनन, आग तू 
ये हक़ीक़त जान ले
खुद से ना अब, भाग तू 

क्यों नहीं करता कभी
खुद पे इतना तू यक़ीं 
जो भी है सब है तेरा
तुझ में है काबिल तू ही
जाग तू, रे जाग तू
है यक़ीनन, आग तू 
ये हक़ीक़त जान ले
खुद से ना अब, भाग तू ।।

“खुद से कुछ तू वादे कर ले”

खुद से कुछ तू वादे कर ले
मन ही मन इरादे कर ले
बहता जा तू चलता जा
गिरके यूँही सम्भलता जा
सहता जा तू जलता जा
साँसों में यूँही पिघलता जा
खुद से कुछ तू वादे कर ले
मन ही मन इरादे कर ले

सपनो को अपने थाम ले तू
इनको नया कोई नाम दे तू
बहता जा तू चलता जा
फिर से यूँही मचलता जा
सहता जा तू पलता जा
आहों को यूँही निगलता जा
खुद से कुछ तू वादे कर ले
मन ही मन इरादे कर ले

शर्तो पर अपनी जीना है तुझे
जख़्मों को नही अब सीना है तुझे
बहता जा तू चलता जा
गिरके यूँही सम्भलता जा
सहता जा तू जलता जा
साँसों में यूँही पिघलता जा

खुद से कुछ तू वादे कर ले
मन ही मन इरादे कर ले
बहता जा तू चलता जा
गिरके यूँही सम्भलता जा
खुद से कुछ तू वादे कर ले
मन ही मन इरादे कर ले ।।

Copyright © 2015, RockShayar 
Irfan Ali Khan 
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“मोहब्बत की है तुमसे जिसका कोई हिसाब नहीं”

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एक सवाल है मेरा, जिसका कोई जवाब नहीं
मोहब्बत की है तुमसे, जिसका कोई हिसाब नहीं

पता नहीं तुम्हारी कौनसी आदत दिल को छू गई ?
पता नहीं तुम्हारी कौनसी अदा दिल में उतर गई ?

ना मैंने तुम्हारी आँखें देखी, ना कोई अंदाज़ छुआ
ना मैंने तुम्हारी बातें सुनी, ना कोई अल्फ़ाज़ सुना

हिज़ाब से ढ़का वो एक चेहरा, था जिस पर पहरा
खुशबू से महसूस किया फिर, अहसास वो गहरा

पता नहीं तुम्हारी मौज़ूदगी क्यों अच्छी लगती है?
पता नहीं तुम्हारी सादगी क्यों सच्ची लगती है ?

ना मैंने तुम्हारा ख़्वाब देखा, ना कोई ख़याल बुना
ना मैंने तुम्हारा जवाब पढ़ा, ना कोई सवाल बुना

तुम्हारे साथ जब होता हूँ, बारिश होने लगती है
आसमां से ज़मीं की यूँ, सिफ़ारिश होने लगती है

पता नहीं तुम्हारे लिए, दिल ये बेक़रार क्यों है ?
पता नहीं तुम्हारे लिए, दिल में इंतज़ार क्यों है ?

ना मैंने तुम्हारा कल देखा, ना कोई आज पूछा
ना मैंने तुम्हारा मन पढ़ा, ना कोई सवाल पूछा

हाँ एक आमाल है मेरा, जिसका कोई सवाब नहीं
मोहब्बत की है तुमसे, जिसका कोई हिसाब नहीं ।।

#RockShayar

“ज़ख्म वो अपने सब, उधेड़कर फिर सीने हैं तुझे”

ज़हर के वो कड़वे घूँट, रह रहकर पीने हैं तुझे,
बेदर्द ज़िंदगी के सितम, सब सहकर जीने हैं तुझे ।

वक़्त आ गया अब, दर्द को दर्दनाक मौत देने का,
ज़ख्म वो अपने सब, उधेड़कर फिर सीने हैं तुझे ।।

फिर से वही इतिहास पुराना दोहराये क्यों ?

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फिर से वही इतिहास पुराना दोहराये क्यों ?
दिल के किले पर परचम पुराना फहराये क्यों ?

जब पत्थर की आदत हुई, धूप में राहत हुई
फिर बंजर जमीन पर फसल हम लहराये क्यों ?

दर्द को हमदर्द बनाया, जो चाहा वो सब कराया
फिर बेवजह इस सीने में दर्द वो गहराये क्यों ?

ग़ैरों की बातों में आकर, खुद को खुद में ना पाकर
इस ज़िंदगी को कसूरवार हर बार ठहराये क्यों ?

जानते हुए भी सब, बनकर यूँ अनजान अब
बावफ़ा हाँ हर दफ़ा खुद ही खुद को हराये क्यों ?

#RockShayar

“अहसास की अपनी कोई ज़बां नहीं होती”

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अहसास की अपनी कोई ज़बां नहीं होती,
ज़िंदगी ये कभी हमनवा नहीं होती ।

घूम लो चाहत के इस बाज़ार में तुम भी, 
खुशियों की बेशक कोई दुकां नहीं होती ।

जाने कितने ही दिल बच जाते टूटने से,
ज़माने में गर इश्क़ की हवा नहीं होती ।

उम्रे गुज़र जाती हैं इंतज़ार में यूँ तो, 
ख़्वाहिशें मगर कभी जवां नहीं होती ।

बचके रहना ज़रा दिल की तन्हाई से तुम,
खुद से जो कभी हमज़बां नहीं होती ।

वहम में जीता है, ताउम्र ये दिल ‘इरफ़ान’
दर्दे दिल की यहाँ कोई दवा नहीं होती ।।

#RockShayar

“सोचा ना था तुमसे यूँ मोहब्बत हो जायेगी”

सोचा ना था तुमसे यूँ मोहब्बत हो जायेगी
तेरा आदत होना ही अपनी आदत हो जायेगी 

अंधेरों में जीते रहे जो, क्या मालूम उन्हें इक दिन 
दर्दे दिल पर यूँ इश्क़ की इनायत हो जायेगी 

सुनेगा जिस पल तू, अपने दिल की आवाज़ ऐ बंदे
ये ज़िंदगी खुद तेरे लिए एक बशारत हो जायेगी 

जो चाहत हो सच्ची, तो पता चले यह राज़ भी 
किसी को चाहना ही खुद एक इबादत हो जायेगी 

नफ़रत की दीवारों में, क़ैद रहा जो ‘इरफ़ान’ सदा
मोहब्बत की गवाही से उसकी ज़मानत हो जायेगी ।।

#RockShayar

“मन के शीशे”

यूँ तो कहने को तुम कहीं नहीं हो
फिर भी क्यूँ लगता है तुम यही हो
हर वक्त हर घङी, मेरे आस पास
जब भी मन के शीशे टटोलता हूँ
तुम्हें अपने पास खङा देखता हूँ
मैं आईने में तुम्हें देखता रहता हूँ
और तुम मेरी आँखों के आईने में
यूँ खुद को निहारती रहती हो
बिना पलकें झपकाये एकटक
ताकि वो खुशी के आंसू
जो तुम्हारी आँखों में ठहरे हैं
छलक कर कहीं आ ना जाए बाहर
इसी कोशिश के चलते
कई दफ़ा तुमने अपनी आँखें सुजाई थी ।

अब जबकि तुम जा चुकी हो दूर कहीं
मगर ये मन मानने को राज़ी ही नहीं है
आज भी हर रोज जब आईना देखता हूँ
तो तुम पास खङी मुस्कुराती रहती हो
ये जताने के लिए 
के सब कुछ ठीक है, वैसा ही है
मगर अपने दिल के सुर्ख़ शीशे का क्या करू
जिसमें तेरे अक्स का नक्श क़ैद है
और कोई अक्स ये दिखाता ही नहीं
यही सोचकर आज मैंने
अपने मन का हर शीशा ढ़क दिया हैं
वक्त की चादर से 
ताकि कोई अक्स बने ही ना ।

यूँ तो कहने को तुम कहीं नहीं हो
फिर भी क्यूँ लगता है तुम यही हो
बस यही कहीं हो मुझमें कहीं ।।

#RockShayar

“महिला आधारित कानूनों का दुरूपयोग” (IPC 498a and Domestic Violence Act)

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

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एक लॉ है जो असंतुष्ट पत्नियों का सबसे फेवरेट,
भारतीय दंड संहिता की धारा फोर नाइंटी ऐट ।

गृहस्थी में हुई जो अनबन, पति पत्नी का फिर बदला मन,
दायर किया मुकदमा फट से, डाउरी का यूँ आनन फानन ।

कहने को तो यह, संविधान की एक महत्वपूर्ण धारा है,
दहेज प्रताङना की आङ में बस, फर्जी केसो का पिटारा है ।

अधिकांश मामलों में देखे तो, झूठमूठ का ये रोग होता है,
हद से ज्यादा आजकल इसका, बेहद दुरूपयोग होता है ।

सास ससुर पति जेठ ननद देवर समेत समूचा ससुराल पक्ष,
पल भर में गिरफ्तार होकर, पहुँच जाते हैं सीधे कारागार कक्ष ।

इतना नहीं तमाशा काफ़ी, घरेलू हिंसा अधिनियम हैं अभी बाक़ी,
परिवादी के सामने जहाँ यूँ, हाथ जोङे नज़र आता है हर वादी ।

गुज़ारा भत्ता एवं भरण पोषण के लिए, फिर जो ऑर्डर देती है कोर्ट,
तारीख़ पे तारीख़, हर तारीख़ पे हाज़िर होने का ऑर्डर देती है कोर्ट ।

महिला के लिए तो सरकार ने, घरेलू हिंसा के नियम बना दिए,
पुरुष को मगर जो मानसिक हिंसा हुई, उसके नियम कहाँ गए ।

दहेज प्रतिषेध कानून का जो, हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है,
मर्द की बर्बादी में वो औरत, अपने औरत होने का इस्तेमाल करती है ।

महिला आधारित कानूनों का, इस क़दर मिस यूज़ हो रहा हैं,
के शादी का नाम सुनकर ही, बंदा हर कोई फ्यूज हो रहा हैं ।

एक कानून है जो असंतुष्ट पत्नियों का ऑल टाइम फेवरेट,
भारतीय दंड संहिता की धारा फोर नाइंटी ऐट ।।

“अहसास के ख़त”

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अहसास के ख़त, दिल के वरक़ पे लिखे जाते हैं
रूह की रोशनी में, दिल के शरफ़ से पढ़े जाते हैं ।

लिखावट में ना कोई बनावट, ना कोई दिखावा होता हैं
ख़ामोशी के काग़ज़ पर, बस क़लम का पहनावा होता हैं ।

तसव्वुर की दवात में सियाही ख़यालों की होती हैं
मुलाक़ात की मुंतज़िर, वो रात उजालों की होती हैं

यादों के कारवाँ लिए, अल्फ़ाज़ जो उतर आते हैं
ख़ाहिशों की ज़मीं पर, हमराज़ वो नज़र आते हैं ।

सिसकती हुई आहें भी हैं, ठिठकती हुई राहें भी हैं
काग़ज़ के पुर्ज़ो में क़ैद,झिझकती हुई निगाहें भी हैं

कभी कोई पन्ना, ज़िंदगी का किस्सा लगता हैं
तो कभी किसी किताब का अधूरा हिस्सा लगता हैं

कातिब में सिफ़त होती है, क़ैफ़ियत को गढ़ने की
चाँद की चट्टानों और, ख़्वाबों के कोहसार पर चढ़ने की । 

अहसास के ख़त, दिल के वरक़ पे लिखे जाते हैं
रूह की रोशनी में, दिल के शरफ़ से पढ़े जाते हैं ।।

“घर कहाँ अपना यहाँ, एक अरसे से बेघर है हम”

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घर कहाँ अपना यहाँ, एक अरसे से बेघर है हम,
बेदख़ल जो किया घर ने, तब से दर बदर है हम 

ले आई जिस मोङ पर, बेदर्द ज़िंदगी हमको आज,
राह में उस ज़िंदगी की, आज भी रहगुज़र है हम 

औरों की क्या बात करे, खुद से ही शुरूआत करे,
अपना घर जलाने में, यूँ तो सबसे बेहतर है हम 

उङ चला एक रोज परिंदा, घर से अपने दूर कहीं,
तब से लेकर अब तक हाँ, वीरान कोई शजर है हम

जज़्बातों का काम क्या, जब संगदिल हैं नाम यहाँ
काँप उठे देखकर ये रूह, बेरहम इस क़दर है हम 

खुद को खोया है, जब से इक हादसे में ‘इरफ़ान,
अपनी ही तलाश में, खुद अपने हमसफ़र है हम ।।

#RockShayar

“राॅक ग़ज़ल”

अपने पैशन को ही अपना प्रोफेशन बना ले
प्रॉब्लम्स को सोल्व करना तू अब फैशन बना ले

अर्ली मोर्निंग उठकर, जी जान से जुटकर
दिल की ज़मीं पे ख़्वाबों का हिल स्टेशन बना ले 

हो खुद को पाने की चाहत, या दर्दे दिल से राहत 
अपने मक़सद को ही अपना ऑब्सेशन बना ले 

जज़्बातों की फोकटिया ऐंट्री, रोकनी हो अगर तो
नैनों के कैमरे से दिल का स्टिंग ऑपरेशन बना ले

सुनता जा ये नई कहानी, राॅक ग़ज़ल की ज़बानी
तन के इस घर में मन से भी कोई रिलेशन बना ले ।।

#RockShayar

“इंसान”

क्या ख़ूब तरक्की कर रहा हैं इंसान
हर सू हर जगह, बस मर रहा हैं इंसान ।

उजङी बस्तियां, बिखरी लाशें, जलते मक़ान 
हैवानियत को भी शर्मसार, कर रहा हैं इंसान ।

ज़मीन को फाङकर, आसमान को चीरकर
फ़ज़ाओ में ये कैसा ज़हर, भर रहा हैं इंसान ।

जिस्म के बाज़ार की तो बात ही छोङिए,
रुह तक अब अपनी, फ़रोश कर रहा हैं इंसान ।

मिट्टी से बना हैं जो, गुनाहों में सना हैं जो 
इंसानियत के, वो कोरे दावे कर रहा हैं इंसान ।

हक़ीक़त बस इतनी, जान ले ‘इरफ़ान’ तू
इंसान के हाथों ही यहाँ, मर रहा हैं इंसान ।।

“मैं जितना बर्बाद होता हूँ”

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दर्द है ख़ुराक़ मेरी, दर्द से ही दिलशाद होता हूँ, 
मैं जितना बर्बाद होता हूँ, उतना आबाद होता हूँ

घाव के अलाव में, यूँ जल जलकर राख़ होता हूँ
मैं जितना बर्बाद होता हूँ, उतना आबाद होता हूँ ।

गिरता हूँ, उठता हूँ, सम्भलता हूँ, फिर चलता हूँ
अधजले दिये की तरह जल बुझकर फिर जलता हूँ

खुद को मिटाकर यूँ, खुद में फिर ईज़ाद होता हूँ
मैं जितना बर्बाद होता हूँ, उतना आबाद होता हूँ ।

दर्द को हमदर्द बनाकर, रूहानी इरशाद होता हूँ
हैरां हो जाए सितम, कुछ इस क़दर शाद होता हूँ

ख़्वाबों के पंख लगाकर, नींद से आज़ाद होता हूँ
मैं जितना बर्बाद होता हूँ, उतना आबाद होता हूँ

अंदर अंदर यूँ टूटकर, खुद ही खुद से रूठकर
हद से ज्यादा बेदर्द, हद गुज़रने के बाद होता हूँ

दर्द है ख़ुराक़ मेरी, दर्द से ही दिलशाद होता हूँ, 
मैं जितना बर्बाद होता हूँ, उतना आबाद होता हूँ ।

#RockShayar

“हाँ मैं एक मुसलमान हूँ” (Yes, I’m a Muslim)

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वतन परस्ती पे शक ना करो मेरी,
वतन पर क़ुर्बान हूँ
ख़ान है नाम मेरा, हाँ मैं एक मुसलमान हूँ 

पुरखों ने देकर लहू 
सींचा जिसे सँवारा जिसे
रूका वोही यहाँ पर फिर
बँटवारा ना था गंवारा जिसे 
मातृभूमि से मोहब्बत के 
सबूत माँगने बंद करो अब
हिंदोस्ताँ सारे जहां से अच्छा, 
सलाम करे इसे आओ सब

वतन परस्ती पे शक ना करो मेरी,
वतन पर क़ुर्बान हूँ
ख़ान है नाम मेरा, हाँ मैं एक मुसलमान हूँ…

मज़हब नहीं सिखाता नफ़रत, 
दंगे फ़साद शैतानी फ़ितरत
मज़हब की अगर मानो तो, 
इंसानियत में सारी कुदरत
मज़हब के नाम पर, 
सियासत करना बंद करो अब
दिल की यही तमन्ना है कि
मिल जुलकर रहे हम सब 

वतन परस्ती पे शक ना करो मेरी,
वतन पर क़ुर्बान हूँ
ख़ान है नाम मेरा, हाँ मैं एक मुसलमान हूँ… 

चंद सरफिरे नौजवानों ने, 
पूरी कौम को बदनाम किया
मासूमियत का क़त्ल करके, 
वहशीपन खुलेआम किया
इस्लाम के नाम पर हमेशा, 
दहशत फैलाने वालों सुन लो
अपने ही हाथों तुमने खुद, 
अपना काम तमाम किया

घूर कर ना देखो मुझे, तुम जैसा इंसान हूँ
ख़ान है नाम मेरा, हाँ मैं एक मुसलमान हूँ 

वतन परस्ती पे शक ना करो मेरी,
वतन पर क़ुर्बान हूँ
ख़ान है नाम मेरा, हाँ मैं एक मुसलमान हूँ ।।

#RockShayar

“कदम कदम पर यहाँ”

कदम कदम पर यहाँ, छल फ़रेब और धोखे हैं
ज़िंदगी के झूठे बेर, सचमुच कितने अनोखे हैं

कोई बातों से फाँस लेता है
कोई आँखों से
कोई हँसी से झाँस लेता है
कोई निगाहों से

कदम कदम पर यहाँ, झूठ नकाब और वादे हैं
सच के फर्ज़ी दस्तख़त, एकदम सीधे सादे हैं

कोई कहता है मैं सच्चा हूँ
कोई कहता है मैं अच्छा हूँ
अपनी अपनी चलाये सब
जैसे के मैं तो कोई बच्चा हूँ

हर गली हर मोङ पर मिलते, ठग दरोगा गुंडे हैं
किराये के टट्टू यह सब, तगङे और मुस्टंडे हैं

कदम कदम पर यहाँ, छल फ़रेब और धोखे हैं
ज़िंदगी के झूठे बेर, सचमुच कितने अनोखे हैं ।।

“चलों ना हादसों की खुशी मनाये”

 

चलों ना हादसों की खुशी मनाये
अधजली उन रातों को फिर से जलाये 
मनचले इस मन को बिना बताये
ना तुम शर्माओ ना हम शर्माये
चलों ना हादसों की खुशी मनाये ।

हो गर कोई ग़म तो चबा लो बबलग़म
यूँही तो ना बैठे रहो सेड और गुमसुम
ज़िंदगी की कलरफुल पार्टी में टूनाइट
जी भर के हँसी के गुब्बारे फुलाये हम
सरफिरे इस मन को बिना बताये
ना तुम शर्माओ ना हम शर्माये
चलों ना हादसों की खुशी मनाये ।

बेशुमार पल तक रहे हैं राहें तेरी
इंतज़ार में हैं किसके ये निगाहें तेरी
लबों से चूम ले संग इनके झूम ले
पास बुलाये तुझको हमराहें तेरी
उन्ही हमराहों के संग कुछ वक्त बिताये 
सुहाने सफ़र में गीत नये कुछ गुनगुनाये 
ना तुम शर्माओ ना हम शर्माये
चलों ना हादसों की खुशी मनाये ।

वक्त जैसा भी हो गुज़र जाएगा एक दिन
बाद गुज़रने के बङा याद आएगा ये दिन
लम्हे है ये जितने जी ले जी सके तू जितने
जीने का अहसास ना भूल पाएगा ये दिन
रूह की रोशनी से मन के अंधेरे मिटाये
मनचले इस मन को बिना बताये 
ना तुम शर्माओ ना हम शर्माये
चलों ना हादसों की खुशी मनाये 
अधजली उन रातों को फिर से जलाये 
चलों ना हादसों की खुशी मनाये ।।

#RockShayar

“या ख़्वाजा ग़रीब नवाज़”

दे रहा हूँ कब से तुझे, सुन ले मेरी भी आवाज़ 
दर पे तेरे आया हूँ आज, या ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ 

आँखों में हैं आँसूओं के रेले, हर तरफ तन्हाई के मेले
खुद में हुआ पराया खुद, तक़दीर कैसा ये खेल खेले 

रो रहा हूँ कब से मैं, सुन ले मेरी भी आवाज़
दर पे तेरे आया हूँ आज, या ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ 

सीने में मेरे दर्द छुपा है, चेहरे का नूर ज़र्द हुआ है
हाल ये कैसा बदहाल है, जीने की ना कोई वजह है

दे रहा हूँ कब से तुझे, सुन ले दिल की भी आवाज़
दर पे तेरे आया हूँ आज, या ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ 

धोखे खाये इस क़दर, के यक़ीन पर भी यक़ीं नहीं
अंधेरे साये हर सहर, के रोशनी वो अब कहीं नहीं

दे रहा हूँ कब से तुझे, सुन ले मेरी भी आवाज़
दर पे तेरे आया हूँ आज, या ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ ।।

“कंजूस(Miser)”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

बिना सालन के रोटी खाता है वो,
जाने किसके लिए इतना पैसा बचाता है वो ।

अपनी ज़रूरतों पर परदा डालकर,
हर रोज ज़रूरत से ज्यादा ही कमाता है वो ।

पैसा बचाना ही पैसा कमाना कहे जो,
रात हो या दिन राग बचत का गुनगुनाता है वो ।

ख़र्च करता है ज़िंदगी, ख़र्चो के चर्चो पर,
ख़र्चा हो जब औरों का तब ही मुस्कुराता है वो ।

हजम करके किफ़ायत का अचार, इस क़दर लेता है डकार,
बिना कुछ खाये ही सब कुछ पचाता है वो ।

जूस का भी जूस निकाले, ख़्यालों में अंडे उबाले,
तब जाकर कहीं यारों कंजूस कहलाता है वो ।।

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Irfan Ali Khan
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