“तो तस्वीर कुछ और ही होती”

हमारा मिलना-बिछुड़ना तो तक़दीर का लिखा है
जो हम साथ रह पाते, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

सालों से तुम्हारा इंतज़ार, और उस पर दिल ये बेक़रार
गर हम एक हो जाते, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

एक दूसरे को बहुत चाहते थे, हम कमियां और ख़ूबियां जानते थे
जो जज़्बात जताते हम, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

अपने हिस्से का दर्द हमने, ना बताया कभी, ना जताया कभी
गर ग़म ना छुपाते हम, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

बिन पूछे सब जान लेना, एक दूसरे को मान देना
जो नज़रें मिला लेते हम, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

जमाने की दीवार खड़ी थी, और ज़िंदगी ज़िद पर अड़ी थी
गर बंदिशें तोड़ जाते हम, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

अफ़साना अपनी मोहब्बत का, कुछ यूँ लिखा हमने इरफ़ान
जो हम पहले मिल जाते, तो तस्वीर कुछ और ही होती।।

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“हम जान बूझकर जाने जाँ तुमसे हार जाते है”

किसी से नहीं बस अपने दिल से हार जाते है
हम जान बूझकर जाने जाँ तुमसे हार जाते है।

जब भी तुमको देखते है, बड़ी हसरत से देखते है
दिलबर मेरे उसी पल, दिल ये तुम पे हार जाते है।

पहले तो मिलती नहीं, मिले तो फिर हटती नहीं
हम किसी से नहीं बस तेरी नज़र से हार जाते है।

तेरी शोख़ हसीन अदायें, मेरे दिल का चैन चुराये
अपने दिल का चैन हम बड़े आराम से हार जाते है।

खुशी का क्या है, पलभर में मिले सदियों तक ना मिले
तेरी खुशी के लिये हर खुशी हम, खुशी से हार जाते है।

हारी बाज़ी जीतने की, जब भी बारी आती है
किसी से नहीं बस अपने आप से हार जाते है।

ज़िंदगी की यह जंग भी, कैसी जंग है इरफ़ान
सब कुछ जीतकर भी आखिर में हार जाते है।।

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“मैं हर रोज़ तुम पर एक ग़ज़ल लिखना चाहता हूँ”

कई दिनों से तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ
मैं हर रोज़ तुम पर एक ग़ज़ल लिखना चाहता हूँ।

हालाँकि ज्यादा वक़्त नहीं हुआ है हमें मिले हुये
मैं फिर भी तुम्हारे बारे में सब जानना चाहता हूँ।

आँखों ने आँखों को चुन लिया, ओ रे पिया मोरे पिया
आँखों से आँखों के अनकहे अल्फ़ाज़ पढ़ना चाहता हूँ।

अब और क्या सोचना, बस यही अब सोचना
मैं तुम से ज्यादा तुमको अब सोचना चाहता हूँ।

चेहरों के घने जंगल में, चेहरा तेरा नूरानी है
मैं हर चेहरे में बस तेरा, चेहरा देखना चाहता हूँ।

दिल मेरा सहम जाता है,
जब भी दूर जाने का वक़्त पास आता है
मैं दूरियों का नहीं बस तुम्हारा होना चाहता हूँ।

दिलबर मेरे, दिल की खुशबू है तू, आरज़ू है तू
मैं रोज़ तुम्हें ज़िंदगी की तरह जीना चाहता हूँ।।

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“आज़ादी क्या होती है”

उड़ते हुये परिंदों से पूछो, आज़ादी क्या होती है
शहर के बाशिंदों से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

अंधेरे में साँस घुटती है, ज़िंदगी की लौ बुझती है
कभी किसी क़ैदी से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

जब कोई गाँव मरता है, उसकी क़ब्र पर शहर बसता है
कभी किसी घर से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

चाँद के पार चले जाना, सूरज को गले से लगाना
कभी किसी सहर से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

दिल में तूफ़ान जगाये, कश्ती किनारे सब भूल जाये
कभी किसी लहर से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

रास्तों से गुज़रते हुये, खुद अपना रस्ता ढूँढ़ते हुये 
कभी किसी सफ़र से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

हर रोज खुद से लड़ते हो, हर रोज खुद से डरते हो
कभी अपने उस डर से पूछो, आज़ादी क्या होती है।।

“तुम्हारी एक तस्वीर देखी तो दिल में ये ख़याल आया”

तुम्हारी एक तस्वीर देखी तो दिल में ये ख़याल आया
के तारीफ़ तो लाज़मी है, ये सलीक़ा ग़ज़ल ने बताया

शोख़ियों के सुर्ख़ जोड़े में सजी हुई कोई दुल्हन लगती हो
मन के मोतियों की माला पहनकर तुम तो ख़ूब जचती हो

खुद तो चैन से रहती हो, और बेचैनियाँ हमको देती हो
उनींदी आँखों में रातभर तुम ख़्वाब की तरह जगती हो

बड़ी ख़ूबसूरती से बुना गया है, तुम्हारी साँसों का ये ताना-बाना
पहली नज़र में तुम किसी शायर का ख़याल लगती हो

मेरे अलहदा अंदाज़ ने तुमको, इस क़दर दीवाना किया
कि ये अंदाज़ अच्छा लगता है मुझे, ये बार-बार कहती हो

तेरी आवाज़ के आगे हर आवाज़ बेआवाज़ हैं, क्योंकि
कानों में तुम खनकती हुई आवाज़ के झुमके पहनती हो

हुस्न की सुर्ख़ ज़री में सजी हुई कोई दुल्हन लगती हो
हया के हीरों का हार पहनकर तुम तो ख़ूब जचती हो

खुद तो सुकून से सोती हो, और रतजगे हमको देती हो
रात की आँखों में दीप जलाकर, नींद को तुम ठगती हो

पहली बार देखो, चाहे दूसरी बार, या फिर बार-बार
जब भी देखो तुम तो बस क़ुदरत का कमाल लगती हो

तुम्हारी एक तस्वीर देखी तो दिल में ये ख़याल आया
के तारीफ़ तो लाज़मी है, ये तरीका ग़ज़ल ने बताया।।

@RockShayar

“मुझको रोकने की कभी हिम्मत न करना”

मुझको रोकने की कभी हिम्मत न करना
गलती से भी टोकने की हिम्मत न करना।

दहकती आग हूँ मैं, मासूम मोम हो तुम
पास आने की कभी ज़ुर्रत न करना।

माफ़ कर देना, दिल को साफ़ कर लेना
रब से किसी की शिकायत न करना।

औरों के लिये, कोई और बनकर
खुद से कभी तुम बग़ावत न करना।

महसूस न कर पाओ जिसे खुद में तुम
उस शख़्स से कभी मोहब्बत न करना।

मौत भी तो एक मुकम्मल ज़िंदगी है
फिर ऐसी ज़िंदगी की चाहत क्या करना।

मरकर हमने तो इतना ही जाना इरफ़ान
के खुद से कभी तुम नफ़रत न करना।।

“गुच्छे की आखिरी चाबी भी कभी-कभी ताला खोल देती हैं”

गुच्छे की आखिरी चाबी भी कभी-कभी ताला खोल देती हैं
ये सच है कि निगाहें दिल की अनकही हर बात बोल देती हैं।

नज़रों की बेनज़ीर शमशीर, जब किसी पर चलती है तो
कुछ बोलने से पहले नज़रों में छुपा हर डर खोल देती हैं।

गुनगुनाते हुये गीत की तरह, मुस्कुराते हुये संगीत की तरह
इतनी गहरी है तुम्हारी आँखें कि मेरा मन टटोल लेती हैं।

वैसे तो बेज़ुबां आँखें बोलती नहीं, राज़ कभी कोई खोलती नहीं
पर हो यक़ीं जिस पर, अपना हर राज़ उसे बोल देती हैं।

पढ़ने वाली और लिखने वाली, एक ही नज़र के कई हुनर
बिना तराजू और बाट के फट से वज़्नी हर्फ़ तोल देती हैं।

पहली नज़र का वो असर, नज़रों से कभी नज़र मिलाकर तो पूछो
बिना सोचे-समझे बिना पूछे-ताछे बस हाँ बोल देती हैं।

सारी ज़िंदगी गुज़र गयी, बस यही बात नज़र आयी
कि रोते वक़्त अमूमन आँखें अपना दिल खोल देती हैं।।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

“बदलते-बदलते आखिरकार पूरी तरह बदल गयी”

बदलते-बदलते आखिरकार पूरी तरह बदल गयी
गिरते-पड़ते चलते-चलते ज़िंदगी खुद संभल गयी।

कल को आज समझ बैठे, पल में कई सदियाँ समेटे
ये उम्र भी आखिर उम्र निकली, एक रोज़ ढ़ल गयी।

पकड़ने की बहुत कोशिश की, पर नतीजा यह निकला
के ज़िंदगी की मछली वक़्त के हाथों फिसल गयी।

पता ही नहीं चला कभी, कब दिन ढ़ला कब रात हुई
चुपके-चुपके दबे पाँव, तन्हाई मुझको निगल गयी।

सुना है कि पत्थरदिल पिघलते नहीं, गलत सुना है
मरते-मरते मौत भी खुद मौत देखकर पिघल गयी।

जो चाहा वो पाया, जो सोचा वो कर दिखाया
और कुछ नहीं बस मेरी तन्हाई मुझको खल गयी।

अब भी महसूस करता हूँ, वो तपिश अपने अंदर
ऐसी आग लगाई उसने कि रूह तक जल गयी।।

@राॅकशायर⁠⁠⁠⁠

“वो हुस्न ही क्या जो सही सलामत छोड़ दे”

वो हुस्न ही क्या जो सही सलामत छोड़ दे
वो इश्क़ ही क्या जो बग़ावत करना छोड़ दे।

इंतक़ाम की हसरत, बड़ी क़ातिल और हसीन हसरत
वो नफ़रत ही क्या जो नफ़रत करना छोड़ दे।

मुहाफ़िज़ बन बैठे हैं सब मुज़रिम आजकल
वो अदालत ही क्या जो खुद अपना क़ानून तोड़ दे।

गुनाहों से सौ बार डरना, फिर भी हर बार गुनाह करना
वो शरीफ़ ही क्या जो शराफ़त का दामन छोड़ दे।

खेल-खेल में रेल चलाना, हर बात को खेल समझना
वो बचपन ही क्या जो शरारत करना छोड़ दे।

अंदर ही अंदर रहती है, सोच में कहीं बहती है
वो हसरत ही क्या जो अपनी हसरत करना छोड़ दे।

नसीब का यह अजीब पहिया, नसीब ही जाने भय्या
वो किस्मत ही क्या जो पल-पल बदलना छोड़ दे।

ज़िंदगी से मोहब्बत, क्या खाक़ मोहब्बत
वो मोहब्बत ही क्या जो हमें ज़िन्दा छोड़ दे।।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

“ज़िंदगी बहुत हसीं है अभी”

जहाँ रखी थी वहीं है अभी
ज़िंदगी बहुत हसीं है अभी।

सवाल पूछकर क्या करोगे
जवाब हमारा नहीं है अभी।

कौन हूँ मैं, क्या कर सकता हूँ
ये एहसास तुम्हे नहीं है अभी।

वक़्त रहते जी लो ज़रा
वक़्त बहुत सही है अभी।

मुलाकात में अब वो बात कहाँ
ये मुलाकात अधूरी है अभी।

तुझसे मिलकर, मैं मैं न रहा
जानाँ तू मुझमें कहीं है अभी।

क्यों मानते हो हार इरफ़ान
पूरी ज़िंदगी बाक़ी है अभी।।

@राॅकशायर

“मैं दवा हूं, धीरे-धीरे असर करता हूं”

लहरों के दरमियाँ सफ़र करता हूं
मैं दवा हूं, धीरे-धीरे असर करता हूं।

जो कुछ कमाया है, जो कुछ पाया है
कदमों में आपके वो नज़र करता हूं।

तेरा याद आना लाज़िम है मेरे लिए
तेरी यादों के सहारे गुज़र-बसर करता हूं।

लबों से निकलकर जो आसमाँ तक जा पहुँचे
मैं दुआ हूं, तेरे दिल में घर करता हूं।

बता नहीं सकता तुझे इस क़दर करता हूं
मैं प्यार तुझसे इस क़दर करता हूं।

मेरी नज़रों में रहने वाले, ऐ मेरे हमसफ़र
तेरा इंतज़ार मैं हरपहर करता हूं।

चाहे तू मुझको सज़ा दे, चाहे तू अपना बना ले
कदमों में हाज़िर अपना ये सर करता हूं।।

rockshayar.wordpress.com⁠⁠⁠⁠

“गुलबदन गुलफ़ाम गुलपोश गुलज़ार है तू”

जाँ निसार मेरे यार, अन्वार आबशार है तू
गुलबदन गुलफ़ाम, गुलपोश गुलज़ार है तू।

कभी पैर जलते हैं, तो कभी ग़ैर जलते हैं
चिलचिलाती धूप में, मौसम-ए-बहार है तू।

माहरुख़ कहूँ या माहज़बीं, दिलबर कहूँ या दिलनशीं
मुश्क से तामीर हुई, बेनज़ीर निगार है तू।

बेतहाशा चढ़ता ही जाए, असर ये बढ़ता ही जाए
महीनों तक न उतरे जो, ऐसा ख़ुमार है तू।

जब भी मिलने आती हो, रूह भिगा जाती हो
सावन की पहली बारिश सी, ठंडी फुहार है तू।

ये तक़दीर का फैसला है, जो मुझे तू मिला है
अब और क्या कहूँ, मेरी साँसों में शुमार है तू।

बड़ी मुश्किलों के बाद मिले, जिस पर कि दाद मिले
ज़िन्दगी की ग़ज़ल का हर वो अशआर है तू।।

© RockShayar

शब्दावली:-

जाँ निसार – जान लुटाने वाला
अन्वार – प्रकाशवान
आबशार – झरना 
गुलबदन – फूलों जैसा शरीर 
गुलफ़ाम – फूलों जैसा रंग 
गुलपोश – फूलों से ढका हुआ 
गुलज़ार – बगीचा
माहरुख़/माहज़बीं – चाँद जैसा चेहरा
मुश्क – कस्तूरी 
बेनज़ीर – अद्वितीय 
निगार – मूर्ति
अशआर – शेर (बहुवचन), दोहे, छंद

“वो अधूरी गुज़ारिश मेरी, अब भी अधूरी है”

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वो अधूरी गुज़ारिश मेरी, अब भी अधूरी है
कम नहीं होती कभी, ये जाने कैसी दूरी है।

तेरा नाम तेरी बातें, तुझसे मेरी वो मुलाकातें
तुझे भुलाने के लिए तुझे याद करना ज़रूरी है।

सुना है ! माशूक, साथ जीते हैं साथ मरते हैं
हमारा यूँ दूर-दूर रहना, कितना ग़ैरज़रूरी है।

हद पार करता हूँ, कभी सरहद पार करता हूँ
जुनून को बढ़ाता है जो, नशा तेरा फितूरी है।

तुझको भुलाना जैसे, खुद को भुलाना लगता है
बेपनाह चाहूँ तुझे, कितनी हसीं ये मज़बूरी है।

जितना सोच पाता हूँ, लिखता चला जाता हूँ
ये कामयाबी तो, कड़ी मेहनत की मज़दूरी है।

तेरी मेरी वो कहानी, डायरी में है जो छुपानी
अभी तो आधी लिखी है, बाक़ी अभी पूरी है।।

“जो पहले मर चुका है, उसे मौत का क्या डर”

जो पहले मर चुका है, उसे मौत का क्या डर
ख़ानाबदोश का कहीं कोई, नहीं होता है घर।
 
जिस्म के जाली लिबास में, यह रूह छटपटाती है
उड़ने के लिए डर की ऊँची, छत पर फड़फड़ाती है।
 
इंतक़ाम की दहकती आग में, झुलस रही है ये ज़िंदगी
अपनी आँखों से देखी है इसने, अपने साथ हुई दरिंदगी।
 
खेल कौन शुरू करता है, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है
बाज़ीगर तो बस आपकी, कमज़ोर चाल को पकड़ता है।
 
क़ायदे-क़ानून सिर्फ, कहने सुनने में अच्छे लगते हैं
जो आपके अपने हैं, सबसे पहले आपको वही ठगते हैं।
 
अपने अनोखे तरकश में, कई तीर छुपा रखे हैं उसने
जख़्मी सीने पर, दुश्मन के नाम खुदा रखे हैं उसने।
 
मक़सद मिल जाए जिसे, फिर उसके लिए क्या आराम
जुनूनी के लिए तो कभी भी, नामुमकिन नहीं कोई काम।
 
वक़्त की क़द्र करना सीख गया, वो शख़्स आख़िर
जीने से पहले मरना सीख गया, वो शख़्स आख़िर।।
 
 

“कभी”

बाप-भाई पर भी तो गालियाँ बनाओ कभी
ज़िन्दगी है मुजरा, तालियां बजाओ कभी।

ग़ैरों पर तो हमेशा अपनी जान लुटा देते हो
हमें भी तो आगोश में अपने, सुलाओ कभी।

दरवेश है हम तो, दर-बदर भटकते रहते है
दिल के दर पर खड़े है, ख़ैरात लुटाओ कभी।

सुन मेरे ऐ सनम, इतने बुरे भी नहीं है हम
गली से रोज गुज़रते हो, घर आओ कभी।

क़तरा क़तरा जलने में, एक अलग ही मज़ा है
मेरी तरह, तुम भी तो दिल जलाओ कभी।

वैसे तो बड़े ही नेकदिल इंसान है हम, लेकिन
हद पार हो जाए, इतना भी न सताओ कभी।

वो चेहरा, वो आँखें, वो बातें, वो मुलाक़ातें
मैं सब बताऊँगा, ख़्वाब में तो आओ कभी।।

 
 
 

“जान लेना और देना, हमें दोनों आता है”

जान लेना और देना, हमें दोनों आता है
यह तुझ पर है, कि तू क्या चाहता है।

दर्द को जब से, बनाया है हथियार हमने
दर्द अब पहले जितना नहीं सताता है।

जो पूछा किसी ने, तो अपनों ने तआरूफ़ कुछ यूँ दिया
के पता नहीं काग़ज़ पर, चंद लकीरें बनाता है।

वक़्त बहुत लगा, कंकर से चट्टान बनने में
वक़्त है आखिर, सब को आज़माता है।

पहले बहुत रोता था, जो चैन अपना खोता था
सुना है वो आजकल जोशीले गीत सुनाता है।

ज़माना कहता है अक्सर, पागल शायर उसे
ज़ेहन में हर वक़्त जो ख़याली मुर्गे लड़ाता है।

कुछ इस तरह, तरसाती आयी है ज़िंदगी हमें
कि जैसे सूखी ज़मीं को काला बादल तरसाता है।।

 

Introducing The Rock Ghazal…

बासी पड़े ख़यालों से दिमाग़ी कॉन्स्टिपेशन हो गया
पता ही नहीं चला कब मुझ में मेरा सेपरेशन हो गया।
 
खुद से खुद की मुलाकात है, फिर डरने की क्या बात है
जब जुनून का सुकून से डायरेक्ट कनेक्शन हो गया।
 
मुश्किलों को पार करके, जब फल मिला तो लगा उसे
कि जैसे किसी जॉब का कम्पलीट प्रोबेशन हो गया।
 
इतने साल हो गए, वो लिखता रहा बस लिखता रहा
यादों का काग़ज़ पर लाइफटाइम रेस्टोरेशन हो गया।
 
बार-बार गलतियां करके, और बार-बार ठोकर खाके
खुद में करके सुधार हासिल उसे परफेक्शन हो गया।
 
धुन का वह धनी, कन्सिस्टन्सी से आगे बढ़ता रहा
विधि के हाथों लिखी गई यूनिक डेफिनेशन हो गया।
 
वक़्त ने एक रोज जब, संभलने का भी वक़्त न दिया
खुद को पाना ही फिर तो उसका ऑब्सेशन हो गया।।
 
RockShayar

“नज़र नहीं आता”

कहीं कोई दस्तगीर अब नज़र नहीं आता
शख़्स वो बेनज़ीर अब नज़र नहीं आता।

मंज़िल की ओर चला था, जो एक मुसाफ़िर कभी
खो गया वो राहगीर अब नज़र नहीं आता।

था जिसकी दुआओं में, असर भी शिद्दत भी
कहाँ गया वो फ़क़ीर अब नज़र नहीं आता।

एक अर्से से सींचा जिसे, ज़ख्मों ने अपने लहू से
शायर वो शबगीर अब नज़र नहीं आता।

बिक जाते हैं लोग आजकल, कौड़ियों के भाव में
पहले जैसा ज़मीर अब नज़र नहीं आता।

इंसानियत को सही राह पर ले जाए जो
ऐसा तो कोई मीर अब नज़र नहीं आता।

वतन के रहनुमाओं की मेहरबानी है कि, वतन
पहले जैसा कबीर अब नज़र नहीं आता।

लुट चुकी है मेरे दिल की सल्तनत ‘इरफ़ान’
वारिस न कोई वज़ीर अब नज़र नहीं आता।।

शब्दार्थ:-
दस्तगीर – मददगार
बेनज़ीर – अद्वितीय
शबगीर – रात को इबादत करने वाला
ज़मीर – अंतरात्मा
मीर – नेता
कबीर – महानज़मीर – अंतरात्मा
सल्तनत – साम्राज्य
वारिस – उत्तराधिकारी
वज़ीर – मंत्री

“जाएंगे जब इस दुनिया से तब लोग हमें याद करेंगे”

जाएंगे जब इस दुनिया से तब लोग हमें याद करेंगे
देकर वो मिट्टी क़ब्र पर हाँ शेर कुछ इरशाद करेंगे

पूरा होगा बेशक होगा, जब कभी इन्तक़ाम हमारा
दिल के इस वीरान घर को तभी हम आबाद करेंगे

वतनपरस्ती पर यहीं कहूंगा, ऐ मेरे वतन के लोगों
वतन को हम अपने सब मिलकर दिलशाद करेंगे

न गिड़गिड़ाएंगे, न हाथ फैलाएंगे किसी के आगे
फ़क़त अल्लाह की बारगाह में ही फरियाद करेंगे

आज़ादी हक़ है जब तो, हमको भी मिलकर रहेगी
दर्द की इन बेड़ियों से रूह को अब आज़ाद करेंगे

बहाएंगे दरिया जुनून का, निभाएंगे रिश्ता ख़ून का
अपने अंदर की बुराई को, इस क़दर बर्बाद करेंगे

याद रखना यह बात, दिल में अपने ऐ दुनियावालों
एक दिन हम फिर से, खुद में खुद को ईजाद करेंगे

@RockShayar

“जलजलों के डर से घर बनाना छोड़ दिया”

जलजलों के डर से घर बनाना छोड़ दिया
दर्द से इतना टूटे के मुस्कुराना छोड़ दिया

ज़िन्दगी ने जब से खेली है बाजी जान की
ज़िन्दगी से तब से शर्त लगाना छोड़ दिया

वादों की दुनिया के तजुर्बे जब देखे हमने
वादा करके फिर वादा निभाना छोड़ दिया

दिल के इशारों पर नाचते रहे यूँही सदा हम
दिल ने जब कहा तो दिल लगाना छोड़ दिया

तरसते रहे यूं तो प्यार के लिए ताउम्र यहां
प्यार ना मिला तो प्यार जताना छोड़ दिया

खिलखिलाते भी थे, कभी मुस्कुराते भी थे
जमाने हो चले हमने वो जमाना छोड़ दिया

एक नादानी की सज़ा बहुत ही शदीद मिली
खुद से यूं रूठे के खुद से नज़र मिलाना छोड़ दिया।

@RockShayar

“क्या वहीं हो तुम”

दुआओं में मांगा जिसे, क्या वहीं हो तुम
शिद्दत से चाहा जिसे, क्या वहीं हो तुम

रातों में ढ़लते हुए, जलते हुए, मचलते हुए
ख़्वाबों में देखा जिसे, क्या वहीं हो तुम

क़लम को थामे हुए, दर्द वो सब आधे हुए
ख़यालों में सोचा जिसे, क्या वहीं हो तुम

पहली ही नज़र में, दर्द की भरी दोपहर में
मन ने मेरे छुआ जिसे, क्या वहीं हो तुम

पलकों के इस घर में, अश्क़ों के सफर में
सीने में छुपाया जिसे, क्या वहीं हो तुम

बनती हुई बिगड़ती हुई, रूठी हुई तक़दीर में
रब ने मेरे लिखा जिसे, क्या वहीं हो तुम।

“मुझको बातें तुम्हारी सच्ची लगती हैं “

 

चुभती तो है मगर अच्छी लगती हैं
मुझको बातें तुम्हारी सच्ची लगती हैं

दर्द की बरसती हुई बारिश में अक्सर
घर जाने की राहें सब कच्ची लगती हैं

ज़िन्दगी जब खुश होती है कभी तो
मासूम जैसे कोई बच्ची लगती है

तुम साथ हो फिर भी ना जाने क्यों
दिल को ये तन्हाई अच्छी लगती है।

“यक़ीन मानिए कुछ लोग कभी भी सुधरते नहीं”

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हादसों के बाद भी खुद को वो बदलते नहीं
यक़ीन मानिए कुछ लोग कभी भी सुधरते नहीं

एहसास जब भी होता है, मालूम तब ये चलता है
के मरते तो इन्सान हैं, एहसास कभी मरते नहीं

भर जाता होगा बेशक, वक़्त के साथ हर ज़ख्म
अपनों के दिए ज़ख्म तो इतनी जल्दी भरते नहीं

तलाशते हैं खुद को जो, खुदगर्ज़ कहलाते हैं वो
ख़ामोश रहते हैं अक्सर, बात ज्यादा करते नहीं

पीठ पीछे बुराई करना, और सामने बड़ाई करना
ऐसे नामुरादों की तो, परवाह हम भी करते नहीं

सुन लो ऐ दुश्मनों, चाहे जितना भी ज़ोर लगा लो
एक अल्लाह के अलावा हम किसी से डरते नहीं ।

“कोई पागल कहता है, कोई नादान समझता है”

कोई पागल कहता है, कोई नादान समझता है
हर शख़्स यहाँ मुझे खुद सा इंसान समझता है ।

वो नज़रअंदाज़ करता है मुझे, कुछ इस तरह से
जैसे घर में रखा पुराना कोई सामान समझता है ।

कीमत चुकाई है मैंने, चट्टानों की तरह बनने में
और वो है कि खुदगर्ज़, नाफ़रमान समझता है ।

नहीं रखता कोई राब्ता, उस मुसाफ़िर से कभी मैं
जो दिल को मेरे किराये का मकान समझता है ।

मत जलाओ तुम घर अपने, नफ़रत के शोलों से
मोहब्बत की ज़ुबान तो हर बेज़ुबान समझता है ।

क़त्ल किया था जिसने इक रोज मेरे यक़ीन को
आज तलक वो शख़्स मुझे इरफ़ान समझता है ।।

– राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान

शब्दकोश:-

खुदगर्ज़ – स्वार्थी
नाफ़रमान – कहना नहीं मानने वाला
राब्ता -संबंध
मुसाफ़िर – यात्री
शख़्स – व्यक्ति

“इतना तो मेरा भी मुझ पर हक़ बनता है”

इतना तो मेरा भी मुझ पर हक़ बनता है,
मन की सोच का दायरा जहाँ तक बनता है ।

कोशिश करो गर दिल से तो क्या नहीं होता यहाँ,
जमा लो कदम जहाँ वहीं पर फलक़ बनता है ।

कई रात ठिठुरता है, खारापन लिए ये पानी
तब कहीं वो जाकर झील में नमक बनता है ।

हर सफ़र की यहाँ, दास्तान है बस इतनी सी
दर्द ही आख़िर इस ज़िन्दगी का सबक बनता है ।

कमी नहीं किसी चीज़ की, रब के दरबार में
रोकर तो माँगो कभी, मुकद्दर बेशक बनता है ।

देर लगी, पर अहसास हुआ ये अब इरफ़ान
अपनी ज़िन्दगी पर अपना भी तो हक़ बनता है ।।

@rockshayar.wordpress.com

“आस्तीन के साँपों से ज़रा सावधान रहना”

आस्तीन के साँपों से ज़रा सावधान रहना,
किसी भी मज़हब के हो मगर इंसान रहना ।

पहचान कोई पूछे तो, बताना उसे हिन्दी हैं हम,
वतन पर मर मिटने वाले सदा तुम जवान रहना ।

हो कड़वाहट कितनी भी, दिलों में फैली हुई
उर्दू की तरह मगर तुम मीठी एक ज़बान रहना ।

मिलेंगी कई हैरानियाँ, सफ़र के दौरान तुम्हें
मुश्किलों के भँवर में मज़बूत एक चट्टान रहना ।

ज़िन्दगी जीते हुए, इतना भी याद रख लीजिए
मक़सद हो चाहे जो भी पर साहिबे ईमान रहना ।

दिल-ओ-दिमाग के मसले, हल करने हो अगर
कभी समझदार बन जाना, कभी नादान रहना ।

लाख कहे दुनिया तुम्हें, भला बुरा यहाँ लेकिन
जैसे भी हो तुम हमेशा, वैसे ही इरफ़ान रहना ।।

@RockShayar

“बिना जज़्बात के लफ़्ज़ ये बिना मोती के सदफ़ हैं”

बिना जज़्बात के लफ़्ज़ ये बिना मोती के सदफ़ हैं
बेसलीक़ा बातों का जैसे कोई सलीक़ेदार लक़ब है

ग़ैरों की क्या बात करे, खुद से ही शुरूआत करे
अदब की इस दुनिया में हर शख़्स ही बेअदब है ।

दिन गुज़रे साल बीते, तब कहीं यह पता चला
के ये जो दर्द है, दर्द नहीं बल्कि रूह की रसद है ।

लाख टोके बज़्म चाहे, सुनता नहीं मैं किसी की
बहर में नहीं है जो महबूब मुझ को वो ग़ज़ल है ।

जला देना डायरी मेरी, गर मौत चाहो तुम मेरी
मुझ में मेरे होने की बाक़ी अब तो यहीं सनद है ।

शब्दकोश:-

सदफ़ – सीपी
बेसलीक़ा – बेढंगा
सलीक़ेदार – भद्र, शिष्टापूर्ण
लक़ब – पदवी, ओहदा, खिताब, उपाधि
अदब – सम्मान, साहित्य
शख़्स – व्यक्ति
बेअदब – असभ्य, अभद्र
शब – रात
रसद – आहार, राशन
बज़्म – सभा
बहर – शब्द मापनी
महबूब – प्रिय
ग़ज़ल – उर्दू-फ़ारसी में पद्य का एक रूप
सनद – सबूत, प्रमाण

“वो शायर था, वो दीवाना था, दीवाने की बातें क्यूँ”

वो शायर था, वो दीवाना था, दीवाने की बातें क्यूँ
हम तो ठहरे दिलफर्याद, दिल दुखाने की बातें क्यूँ

मालूम है तुम्हें भी, वो अंजाम-ए-इंतक़ाम बखूबी
जो जा चुका है कल उस गुज़रे जमाने की बातें क्यूँ

जब सारे जहान से अच्छा, है हिन्दोस्तान हमारा
फिर मज़हब के नाम पर खून बहाने की बातें क्यूँ

माना के वक़्त हर ज़ख्म की दवा है बेशक फिर भी
यूँ सब भुलाकर दुश्मन का घर बसाने की बातें क्यूँ

खुद पर यक़ीन अच्छी बात है, पर इतना जान लो
जहाँ तय है हार, वहीं हाथ आज़माने की बातें क्यूँ

हक़ीक़त में जब, कुछ भी नहीं है हक़ीक़त इरफ़ान
दिल को बहलाने वाले मस्नूई फ़साने की बातें क्यूँ

@राॅकशायर

“दिल दे घार विच, बता इन्ना अंधेरा क्यूं है”

दिल दे घार विच, बता इन्ना अंधेरा क्यूं है
दर्द देवे जे तेनू, उण यादां दा बसेरा क्यूं है

सोचण दी बात है, कदे ते बंदया ग़ौर कर
एहसास दी ज़मीनां पर, डर दा डेरा क्यूं है

सफ़र दे हमसफ़र, ज़िन्दड़ी नु ऐंवई छडकर
कल्ला लबदा फिरे, ऐसा साया तेरा क्यूं है

खुद ने पाण दी, ऐत्थे होड़ मची है हर तरफ
ग़म दी चादर ओढ़ के, सो रहा सवेरा क्यूं है

होर कुछ नहीं, बस इक गल्ला दसो मेनू वी
मुझ पर मुझसे ज्यादा, बता हक़ तेरा क्यूँ है

लिख चावे सौ हरफ़, देख अपणी वी तरफ
तू खुद अपणे दिल दे, सुकूं दा लुटेरा क्यूं है

ग़ज़ल लिखदा ही रवा, पता न कभी जे चला
सुफ़ेद रूहा दे नाल, ऐ परछाई दा घेरा क्यूं है ।।
‪#‎RockShayar‬

“मेरे दोस्त को जब उसका जुनून मिल गया”

उस रोज मुझे भी सीने में सुकून मिल गया,
मेरे दोस्त को जब उसका जुनून मिल गया ।

पहचान मिली जिस्म को, तब कहीं जाकर यहां
वतन की मिट्टी में जब मेरा ये ख़ून मिल गया ।

डरेगा कोई क्यों भला, जुर्म के अंजाम से यहाँ ?
कानून से बचने का जब उसे कानून मिल गया ।

प्यासे को पानी मिला, लिखू कैसे एहसास को ?
बाद मुद्दत के जैसे शायर को मज़्मून मिल गया ।

हर्फ़ बने वो हमदम मेरे, उङ चले संग संग मेरे
लिखने का इस क़दर जोश ओ जुनून मिल गया ।

माँ ने सुलाया जब गोद में, तो यूं लगा इरफ़ान
बेचैनी को मेरी जैसे मुकम्मल सुकून मिल गया ।।

– ‘राॅकशायर’ इरफ़ान अली ख़ान

जिस्म – शरीर
वतन – मातृभूमि
मुद्दत – अवधि
शायर – कवि
मज़्मून – लेखन का विषय
हर्फ़ – अक्षर
मुकम्मल – सम्पूर्ण

 
 

“सवाल सारे गलत थे, जवाब क्या देते”

सवाल सारे गलत थे, जवाब क्या देते
अपनी मोहब्बत का उन्हें हिसाब क्या देते ।

वो इल्ज़ाम लगाते रहे, संगदिल होने का हम पर
काँटों भरा दामन है, उन्हें गुलाब क्या देते ।

रात भर जागकर भी, कम न हुई बेचैनी कभी
वो नींद थी, नींद को अधूरे ख़्वाब क्या देते ।

बेवजह कुछ भी नहीं है, इतना समझ लीजे
जो पढ़ नहीं सकता, उसे किताब क्या देते ।

खुद ही कर बैठे जब बग़ावत अपने आप से,
दुश्मन का किसी और को खिताब क्या देते ।

वो पूछ बैठे हमसे, अपना पता इक रोज यूं
हम खुद लापता थे, भला जवाब क्या देते ।।

“अपनी तो नींद उङ गई तेरे फ़साने में”

अपनी तो नींद उङ गई तेरे फ़साने में,
और तूने खुद आग लगाई मेरे आशियाने में ।

एक दिन में नहीं बन गया मैं ऐसा यहां,
सदियाँ लगी हैं मुझे तो तुझ को भुलाने में ।

याद रखना इक बात, मेरे जाने के बाद
मिलेगा न कोई मुझ जैसा इस जमाने में ।

वक़्त से मिला है वो, वक़्त तो लगेगा ही
लिखा है जो भी दिल पर, उसे मिटाने में ।

आसां नहीं है इतना, बरसों लग जाते हैं
दर्द में होकर भी यूं हर रोज मुस्कुराने में ।

मुकम्मल हो ही जाती, हमारी भी कहानी
अफ़सोस, तुमने देर कर दी ज़रा आने में ।

मरते वक़्त ये मालूम हुआ इरफ़ान मुझे,
ज़िन्दगी गुज़र गई खुद को आज़माने में ।।

“वो भी मेरी तरह ही शहर में तन्हा होगा”

वो भी मेरी तरह ही शहर में तन्हा होगा,
बस्ती से गुज़रता हुआ कोई रस्ता होगा।

बङा मग़रूर है ये नौजवां, और जिद्दी भी
मेरे बारे में दुश्मन सदा यहीं कहता होगा।

गर दहशतगर्द है वो तो ! कंधों पर उसके,
खूं में तर बतर ख़्वाहिशों का बस्ता होगा।

हो शायर ! गर आपका महबूब कोई तो,
गुफ़्तगू करने का अलग ही लहज़ा होगा।

बचपन में देखा था जिसे, मिट्टी में खेलते हुए
वो बच्चा आज भी मेरे भीतर रहता होगा।

बिक गए जो इंसान, चंद रुपयों में इरफ़ान
सोचिए उनका ज़मीर कितना सस्ता होगा।।

“कट जाएँ मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या”

कट जाएँ मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या
उजङ जाएँ उम्मीदों के घर, तुमको इससे क्या ।

इज्ज़त देने की बातें, बकवास दोगली सौगातें
गिर जाएँ चाहे पैरों में सर, तुमको इससे क्या ।

इश्क़ है ये कहते हो, फिर भी तुम चुप रहते हो
कट जाएँ गर तन्हा सफ़र, तुमको इससे क्या ।

न देखों टकटकी बांधे, पलकों के परदों से तुम
लग जाएगी हम को नज़र, तुमको इससे क्या ।

हिज़्र में जल रही हैं रातें, मिलने क्यूं नहीं आते
हो जाएँ इस शब भी सहर, तुमको इससे क्या ।

कहते हो यूं तो खुद को पङोसी तुम इरफ़ान,
जल जाएँ गर ये मेरा घर, तुमको इससे क्या ।।

“ख़्वाहिशें वो जब से मेरी बेहिसाब हो गई”

ख़्वाहिशें वो जब से मेरी बेहिसाब हो गई,
ज़िंदगी ये तब से मेरी इक अज़ाब हो गई ।

इरादों की धूल, बन गयी जिस रोज बवंडर
वक़्त की वो साज़िशें सब बेनक़ाब हो गई ।

खुद को पाने की, लगी है जब से तलब यहां
आदत की वो तब से आदत ख़राब हो गई ।

सवालों के सफ़र में, क्या करे उस नज़र का
जवाब ढूँढते ढूँढते जो लाजवाब हो गई ।

ये इश्क़ की बाज़ी है, कोई खेल नहीं मियाँ
यूं हारकर भी जीतने में कामयाब हो गई ।

मन की मनगढंत बातें, तन्हा रातें मुलाक़ातें
लिख नहीं पाया जिसे मैं वो किताब हो गई ।

मौत जब आई तो, पता यही चला इरफ़ान
ज़िंदगी की तलाश में ज़िंदगी ख़्वाब हो गई ।।

‪#‎RockShayar

“न मंज़िल पहचानती है न रास्ते पहचानते हैं”

न मंज़िल पहचानती है, न रास्ते पहचानते हैं
मुझको दोस्त मेरे किसी और नाम से पहचानते हैं

ये सियाह तज़ुर्बे हैं, इन्हें रख लो सम्भालकर
वो अंधेरे ही हैं जो उजालों की शक़्ल पहचानते हैं

चेहरे पर हैं जो चेहरे, राज़ इनमें कितने गहरे
जानते तो सब हैं, पर बात कोई नहीं मानते हैं

दावे करता रहा जो, ताउम्र मेरी तरबियत के
मुझको उस घर के अलावा यहां सब जानते हैं

कोई सही वक्त नहीं आता, कोई सही माहौल नहीं होता
दर्द की जब बारिश हुई, मन के नाले तभी उफ़ानते हैं

लाख कहे दुनिया चाहे, फर्क़ नहीं पङता कुछ भी
जो दिल चाहता है, करने की हम बस वहीं ठानते हैं

गर लिख नहीं पाता, तो क्या होता इरफ़ान मैं
मुझको लोग आजकल मेरे कलाम से पहचानते हैं ।।

© RockShayar

“कुछ भी न बचा कहने को हर बात हो गई”

कुछ भी न बचा कहने को हर बात हो गई,
मुझसे मेरी न जाने कब मुलाक़ात हो गई ।

ये कुदरत का कमाल है, कुदरत ही जाने
बिन बादल यूं आज कैसे बरसात हो गई ।

दिल ने कहा अलविदा, जिस रोज शोर को
ख़ामोशी से उस रोज मेरी हर बात हो गई ।

बादशाह वज़ीर प्यादा फक़ीर, सब ने ठगा
वक़्त की चाल पर ज़िन्दगी बिसात हो गई ।

ग़ज़ल लिखने का वो, शऊर न आया कभी
आवारगी को मेरी हर्फ़ की सौगात हो गई ।

हमसे क्या पूछते हो, हाल-ए-दिल इरफ़ान
चलो दर्द सहलाए, आज फिर रात हो गई ।।

:-राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान

“काग़ज़ क़लम दवात कुछ भी नहीं हैं”

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काग़ज़ क़लम दवात कुछ भी नहीं हैं,
बाक़ी मुझमें जज़्बात कुछ भी नहीं हैं ।

दिल का मौसम, जाने कब होगा सुहाना 
बिन बादल बरसात कुछ भी नहीं हैं ।

वक्त की आँखों में ठहर गया है वक्त कहीं,
अलविदा या मुलाक़ात कुछ भी नहीं हैं ।

ग़ैरों के हवाले किया है जब से खुद को,
खुद से खुद की वो बात कुछ भी नहीं हैं ।

साँसों की शतरंज पर बिछी है ज़िंदगी,
बिसात शह और मात कुछ भी नहीं हैं ।

बर्बाद हो चुका पूरी तरह से इरफ़ान,
मुझमें मेरी अब ज़ात कुछ भी नहीं हैं ।।

#RockShayar

“रिश्तों में एक दूसरे पर ऐतबार ज़रूरी है”

रिश्तों में एक दूसरे पर ऐतबार ज़रूरी है,
कभी प्यार तो कभी तक़रार ज़रूरी है । 

यूँही तो नहीं बन जाते फ़साने इश्क़ के, 
कभी इंकार तो कभी इक़रार ज़रूरी है ।

ख़्वाहिशों के घर में मनचले इस सफ़र में,
कभी ठहराव तो कभी रफ़्तार ज़रूरी है ।

गर महसूस कर पाओ तो इतना समझ लो,
ख़ामोशियों में भी यहाँ झंकार ज़रूरी है ।

ये ज़िन्दगी है ! वीरान कोई जंगल नहीं,
दोस्त दुनिया दुश्मन घर बार ज़रूरी है ।।

#RockShayar

“परिंदो से उनका खुला जहान मत छीनिए”

परिंदो से उनका खुला जहान मत छीनिए,
ज़मीन तो छीन ली आसमान मत छीनिए ।

दिल बहुत रोता है जब कोई बेघर होता है,
कभी किसी से उसका मक़ान मत छीनिए ।

जाने ये कैसी हवा चल पङी है नफ़रत की,
मज़हब का नाम लेकर इंसान मत छीनिए ।

लूटमार जो करनी है शौक से कर लीजिए,
पाया है दिल ने जिसे वो ईमान मत छीनिए ।

तरक्की के इस दौर में यूँ खुद से होकर दूर,
अहसास से वो उसकी ज़बान मत छीनिए ।

सब कुछ छीन लो है फ़क़त इतनी गुज़ारिश,
मुझमें है जो शख़्स वो ‘इरफ़ान’ मत छीनिए ।।

#RockShayar

“मेरा हाफ़िज़ है ख़ुदा”

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सफ़र-ए-हयात में तन्हा नहीं हूँ मेरा हाफ़िज़ है ख़ुदा
सुन ले ऐ दुश्मन मेरी तक़दीर का कातिब है ख़ुदा

पर्वरदिगारे आलम की मोहताज हैं ये दुनिया सारी
हर शै हो चाहे ज़िंदा मुर्दा सबका हाकिम है ख़ुदा

तारीफ सब उसके लिए, बनाया है जिसने दो जहां
सबसे बङा और मेहरबान यक़ीनन वाहिद है ख़ुदा

जहाँ तक जाये नज़र, रात दिन शाम-ओ-सहर
ज़मीन-ओ-आसमां हर जगह यूँ ग़ालिब है ख़ुदा

ज़िंदगी का फ़लसफ़ा, कुन फाया कुन में है छुपा
इंसान हो या जिन्नात हर मख़्लूक़ का साहिब है ख़ुदा

ग़ज़ल में इतनी कुव्वत कहाँ कर पाए जो बयान-ए-इलाही
बेशक इस तमाम कायनात का ख़ालिक़-ओ-मालिक है ख़ुदा ।।

#RockShayar

सफ़र-ए-हयात – ज़िंदगी की यात्रा
तन्हा – अकेला
हाफ़िज़ – रक्षक
ख़ुदा – अल्लाह, रब
तक़दीर का कातिब – भाग्य का लेखक
पर्वरदिगारे आलम – दुनिया को पालने वाला
मोहताज – आश्रित
शै – वस्तु
हाकिम/साहिब – मालिक
वाहिद – एक अल्लाह
शाम-ओ-सहर -सुबह शाम
ग़ालिब – शक्तिशाली
फ़लसफ़ा – दर्शन
कुन फाया कुन – अल्लाह की ज़बान से निकले शब्द जिनसे सृष्टि की उत्पत्ति हुई, हो जा
जिन्नात – जिन्न (बहुवचन)
मख़्लूक़ – प्राणी, जीव
कुव्वत – ताकत
बयान-ए-इलाही – अल्लाह का गुणगान
कायनात – सृष्टि
ख़ालिक़-ओ-मालिक
सर्वाधिकारी, सम्पूर्ण स्वामित्व

 

“पीठ पर शदीद गुनाहों का बोझ ढ़ो रहा हूँ”

पीठ पर शदीद गुनाहों का बोझ ढ़ो रहा हूँ,
ना जाने कितनी सदियों से यूँही रो रहा हूँ ।

चाहत का पेङ था जिस ज़मीं पर कभी,
उस ज़मीं पर आज नफ़रत के बीज बो रहा हूँ ।

हक़ीक़त को खुद से नज़रअंदाज़ करते हुए,
यूँ आईने के पीछे कब से दीवाना हो रहा हूँ ।

ख़्वाब में भी ख़्वाब अब तलक आते नहीं,
जागती आँखों के दरमियान कहीं सो रहा हूँ ।

दर्द का अहसास वो भूल ना जाये दिल कहीं !
तेज़ाब से उन ज़ख़्मों के निशान सब धो रहा हूँ ।

पाया था जितना भी मैंने खुद को ‘इरफ़ान’,
धीरे धीरे रफ़्ता रफ़्ता शख़्स वो अब खो रहा हूँ ।।

शदीद – अत्यंत, बहुत ज्यादा
गुनाह – पाप
हक़ीक़त – वास्तविकता
नज़रअंदाज़ – अनदेखी
रफ़्ता रफ़्ता – धीमे धीमे
शख़्स – व्यक्ति

“ज़िंदगी का तू मेरी कामयाब फलसफ़ा लिख दे”

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ज़िंदगी का तू मेरी कामयाब फलसफ़ा लिख दे
बन जाए बिगङी मेरी, तक़दीर इस दफ़ा लिख दे

जो भी हूँ जिस हाल में, नामा-ए-आमाल में
गुनाहों को नेकियों से बदलकर, सौ फ़ीसद नफ़ा लिख दे

हादसों की मार से, सहमा हुआ है दिल मेरा
ज़िंदगी के सफ़र में, हमसफ़र नेक वफ़ा लिख दे

बहुत देख ली दुनियादारी, ग़मों की लाइलाज बीमारी
किस्मत में मेरी तू अब, दीदार-ए-मुस्तफ़ा लिख दे

बेहतरीन कारसाज़ है तू, सुन ले मेरी आवाज़ तू
मर्ज़-ए-रूह है या मौला, कामिल शिफ़ा लिख दे ।।

‪#‎RockShayar‬

फलसफ़ा – Philosophy
नामा-ए-आमाल – कर्मो का लेखाजोखा
दीदार – दर्शन
मुस्तफ़ा – पवित्र, निर्मल, स्वच्छ, पुनीत, शुद्ध, हज़रत मुहम्मद साहब का ख़िताब
कारसाज़ – करने वाला
मर्ज़-ए-रूह – आत्मा की बीमारी
मौला – खुदा
कामिल शिफ़ा – पूरी तरह से राहत

“खुद को पाने की ज़िद कर बैठा”

खुद को पाने की ज़िद कर बैठा,
मैं किस्मत आज़माने की ज़िद कर बैठा ।

तोङकर वो सारे बंधन अब,
आसमान पर छाने की ज़िद कर बैठा ।

औरों के घर बचाते बचाते आख़िर,
खुद अपना घर जलाने की ज़िद कर बैठा ।

खुली आँखों से देखा जो हर ख़्वाब तो, 
ख़्वाब सच कर जाने की ज़िद कर बैठा ।

खुद को दर्द पर दर्द दिए इस क़दर,
के सितम को ही सताने की ज़िद कर बैठा ।

ग़ैरों की चाहत में यूँ खुद से दूर होकर,
दूरियों को पास लाने की ज़िद कर बैठा ।

खुदग़र्ज़ इतना हुआ के ‘इरफ़ान’ वो,
खुद ही को मिटाने की ज़िद कर बैठा ।।

#RockShayar

फिर से वही इतिहास पुराना दोहराये क्यों ?

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फिर से वही इतिहास पुराना दोहराये क्यों ?
दिल के किले पर परचम पुराना फहराये क्यों ?

जब पत्थर की आदत हुई, धूप में राहत हुई
फिर बंजर जमीन पर फसल हम लहराये क्यों ?

दर्द को हमदर्द बनाया, जो चाहा वो सब कराया
फिर बेवजह इस सीने में दर्द वो गहराये क्यों ?

ग़ैरों की बातों में आकर, खुद को खुद में ना पाकर
इस ज़िंदगी को कसूरवार हर बार ठहराये क्यों ?

जानते हुए भी सब, बनकर यूँ अनजान अब
बावफ़ा हाँ हर दफ़ा खुद ही खुद को हराये क्यों ?

#RockShayar

“अहसास की अपनी कोई ज़बां नहीं होती”

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अहसास की अपनी कोई ज़बां नहीं होती,
ज़िंदगी ये कभी हमनवा नहीं होती ।

घूम लो चाहत के इस बाज़ार में तुम भी, 
खुशियों की बेशक कोई दुकां नहीं होती ।

जाने कितने ही दिल बच जाते टूटने से,
ज़माने में गर इश्क़ की हवा नहीं होती ।

उम्रे गुज़र जाती हैं इंतज़ार में यूँ तो, 
ख़्वाहिशें मगर कभी जवां नहीं होती ।

बचके रहना ज़रा दिल की तन्हाई से तुम,
खुद से जो कभी हमज़बां नहीं होती ।

वहम में जीता है, ताउम्र ये दिल ‘इरफ़ान’
दर्दे दिल की यहाँ कोई दवा नहीं होती ।।

#RockShayar

“सोचा ना था तुमसे यूँ मोहब्बत हो जायेगी”

सोचा ना था तुमसे यूँ मोहब्बत हो जायेगी
तेरा आदत होना ही अपनी आदत हो जायेगी 

अंधेरों में जीते रहे जो, क्या मालूम उन्हें इक दिन 
दर्दे दिल पर यूँ इश्क़ की इनायत हो जायेगी 

सुनेगा जिस पल तू, अपने दिल की आवाज़ ऐ बंदे
ये ज़िंदगी खुद तेरे लिए एक बशारत हो जायेगी 

जो चाहत हो सच्ची, तो पता चले यह राज़ भी 
किसी को चाहना ही खुद एक इबादत हो जायेगी 

नफ़रत की दीवारों में, क़ैद रहा जो ‘इरफ़ान’ सदा
मोहब्बत की गवाही से उसकी ज़मानत हो जायेगी ।।

#RockShayar

“घर कहाँ अपना यहाँ, एक अरसे से बेघर है हम”

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घर कहाँ अपना यहाँ, एक अरसे से बेघर है हम,
बेदख़ल जो किया घर ने, तब से दर बदर है हम 

ले आई जिस मोङ पर, बेदर्द ज़िंदगी हमको आज,
राह में उस ज़िंदगी की, आज भी रहगुज़र है हम 

औरों की क्या बात करे, खुद से ही शुरूआत करे,
अपना घर जलाने में, यूँ तो सबसे बेहतर है हम 

उङ चला एक रोज परिंदा, घर से अपने दूर कहीं,
तब से लेकर अब तक हाँ, वीरान कोई शजर है हम

जज़्बातों का काम क्या, जब संगदिल हैं नाम यहाँ
काँप उठे देखकर ये रूह, बेरहम इस क़दर है हम 

खुद को खोया है, जब से इक हादसे में ‘इरफ़ान,
अपनी ही तलाश में, खुद अपने हमसफ़र है हम ।।

#RockShayar

“राॅक ग़ज़ल”

अपने पैशन को ही अपना प्रोफेशन बना ले
प्रॉब्लम्स को सोल्व करना तू अब फैशन बना ले

अर्ली मोर्निंग उठकर, जी जान से जुटकर
दिल की ज़मीं पे ख़्वाबों का हिल स्टेशन बना ले 

हो खुद को पाने की चाहत, या दर्दे दिल से राहत 
अपने मक़सद को ही अपना ऑब्सेशन बना ले 

जज़्बातों की फोकटिया ऐंट्री, रोकनी हो अगर तो
नैनों के कैमरे से दिल का स्टिंग ऑपरेशन बना ले

सुनता जा ये नई कहानी, राॅक ग़ज़ल की ज़बानी
तन के इस घर में मन से भी कोई रिलेशन बना ले ।।

#RockShayar

“क़ाफ़िये ढूँढता हूँ”

रूह से रदीफ़ वो, क़ुलूब से क़ाफ़िये ढूँढता हूँ
ज़िंदगी की किताब में बस हाशिये ढूँढता हूँ

ग़ज़ल से मोहब्बत मेरी, बढ़ रही हर रोज यूँ
ग़ज़ल की तख़्लीक़ के वो वाक़िये ढूँढता हूँ

लफ़्ज़ों का दिल में, उतरना हैं बेहद जरूरी
एहसास के ख़त लिए मैं डाकिये ढूँढता हूँ

साँसों से आती है बू, आँखों से टपके है खूं
सीने में जो दफ़्न कब से वो ताज़िये ढूँढता हूँ

अंधेरों में उजालों की, ज़िद किए बैठा यहाँ
नूर की तहरीर के पुरनूर वाक़िये ढूँढता हूँ

गज़लसरा नही मैं, ना कोई क़ातिब ‘इरफ़ान’
ना हुए जो अब तक वो काफ़िये ढूँढता हूँ ।।

‪#‎राॅकशायर‬ ‘इरफ़ान’ अली खान

रूह – आत्मा
रदीफ़ – वह समांत शब्द जो ग़ज़ल के हर शेर के अंत में आता है
क़ुलूब – ह्रदय, दिल
काफ़िया – तुक, ग़ज़ल के शेर में तुकांत शब्द
ग़ज़ल – उर्दू साहित्य की प्रसिद्ध काव्य विधा
तख़्लीक़ – रचना
वाक़िया – घटना
लफ़्ज़ – शब्द
ख़त – चिट्ठी, पत्र
डाकिया – संदेशवाहक
बू – गंध
खूं – रक्त, लहू, खून
ताज़िया – मकबरे के आकार का प्रतीक
नूर – प्रकाश
तहरीर – लिखित दस्तावेज
पुरनूर – प्रकाशमान, जगमग
गज़लसरा – अच्छी गज़ल पढ़ने वाला
क़ातिब – लेखक

“ज़िंदगी भी अब तो यूँ, बर्बाद अच्छी लगती है”

achhi lagti hai

तुमसे ज्यादा तुम्हारी याद अच्छी लगती है
मुझको दर्दे-दिल की फ़रियाद अच्छी लगती है

याद आना भी तेरा वो आख़िर, कैसी याद है ?
कि लम्हा गुज़र जाने के बाद अच्छी लगती है

सुकून मिलता है सदा, औरों को देकर यहाँ
मदद हो चाहे कैसी भी, इमदाद अच्छी लगती है

नज़र आने लगे, जिस्मो-जां ये ज़ुदा ज़ुदा
फिर भी जाने क्यूँ, अज़दाद अच्छी लगती है

ख़ुद को पाकर हमने, सीखा है यही ‘इरफ़ान’
ज़िंदगी भी अब तो यूँ, बर्बाद अच्छी लगती है ।।
—————————
#रॉकशायर ‘इरफ़ान’ अली खान

दर्दे-दिल – पीड़ित ह्रदय
फ़रियाद – प्रार्थना
लम्हा – पल
इमदाद – सहायता
जिस्मो-जां – शरीर और आत्मा
ज़ुदा ज़ुदा – अलग अलग
अज़दाद – परस्पर विरोधी

“बिस्मिल्लाह” (शुरू अल्लाह के नाम से)

In the Name of ALLAH, the All-beneficent, the All-merciful.

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शुरू अल्लाह के नाम से, अदब-ओ-एहतराम से
ज़िक्र-ए-रसूल से लबरेज़, रूहानियत के क़याम से

साँसें तेरी जब भी चले, ये पलकें तेरी जब भी ढ़ले
इश्क़-ए-सरवर में ग़ुरूब, सूफ़ियाना चंद कलाम से

ज़िंदगी तेरी कुछ ऐसी हो, हुज़ूर-ए-अक़दस जैसी हो
आयत-ए-कुरआन में बयां, इंसानियत के पयाम से

जो भी करे तू दिल से कर, नेकी न सही बदी न कर
राह-ए-हक़ पर चलते हुए, यूँ सदाक़त के पैग़ाम से

शुरू अल्लाह के नाम से, रूहानी विर्द-ओ-एहतमाम से
नबी-ए-क़रीम के सदका-ए-तुफ़ैल, दुरूद-ओ-सलाम से ।।
———————————————–
— रॉकशायर ‘इरफ़ान’ अली खान

“तू माँग कभी”

shaho ka jo shah

शाहो का जो शाह है, उस शाह से तू माँग कभी
ना रहे फिर चाह कोई, उस चाह से तू माँग कभी

अता करे वो आज भी, जानता है दिलों के राज़ भी
नम हो जाए निगाहें खुद, उस निगाह से तू माँग कभी

हर शय पर क़ादिर है जो, हर शय पर ज़ाहिर है वो
आह भरने लगे खुद आहें, उस आह से तू माँग कभी

हर कदम पर यहाँ जो, साथ है तेरे पास है तेरे
ज़िंदगी और मौत के, उस हमराह से तू माँग कभी

क़ुबूल होती है दुआएं, आज भी ‘इरफ़ान’ यहाँ
फ़क़त माँगते है जिस तरह, कुछ उस तरह से तू माँग कभी ।।

#TheRockShayar