“तलाश”

 

तलाश कभी भी ख़त्म नहीं होती है
तलाश तो बस सोच की एक किस्म होती है

तक़दीर के पन्नों पर कई सवाल लिखती है
तलाश तो खुद अपने बारे में सवाल करती है

भीड़ में अक्सर गुम हो जाती है
तलाश में आँखें नम हो जाती हैं

हर जगह ना जाने क्या ढूँढती है
तलाश तो बस खोयी हुयी एक आस ढूँढती है

हक़ीक़त जानना ही नहीं चाहती है
तलाश तो बस तलाश रहना चाहती है

पानी पर चलने का वहम पैदा करती है
तलाश तो खुद अपने क़दमों के निशां छोड़ती है

तलाश कभी भी पूरी नहीं होती है
तलाश तो बस मन की अधूरी प्यास होती है।

 

Advertisements

“मुझमें है जो मेरा उसे कहीं और ढूँढता हूँ”

 

20140824_145725.jpg

मुझमें है जो मेरा उसे कहीं और ढूँढता हूँ
मैं गुमशुदा राहों से अपना पता पूछता हूँ

हक़ीक़त से मुझको रूबरू कराने वाले
मैं ख़्वाब में भी तेरा ख़्वाब देखता हूँ

करने को तो बहुत कुछ हैं, इस दुनिया में मगर
दिल लगे जिसमें काम मैं वही करता हूँ

सुनने में अजीब है, लेकिन सच यही है
मैं अनजानों से नहीं अपनों से डरता हूँ

दूर है मंज़िल पास है मुश्किल, इसलिये
सफ़र के लिये कुछ साँसें बचाके रखता हूँ

चलना बेहद ज़रूरी है, रुकना तो खुद एक दूरी है
मैं बिना रुके बेसबब बस चलता रहता हूँ

सवालों के सफ़र में जवाब बस यही मिला
मुझमें है जो मेरा उसे कोई और कहता हूँ।

“मन की अतरंगी सतरंगी दुनिया”

79846930-0a49-11e6-abac-4f85bfec1ac4_Screen-Shot-2016-04-24-at-2-21-38-PM.png.cf (1).jpg

एक बुलबुले की तरह है, मन की यह अतरंगी दुनिया 
जो कि सरगोशी के साबुन से सतरंगी छल्ले बनाती है

थोड़ी देर को ही सही यह ज़िंदगी के कई रंग दिखाती है
मासूम बच्चे की तरह मुँह बनाती है और फिर चिढ़ाती है

मन के इन सतरंगी बुलबुलों की कहानी बहुत ही छोटी है
इतनी छोटी के सिर्फ मन की आँखों से ही नज़र आती है

अपने दम पे फैसले बदलने की कुव्वत रखते हैं मन के छल्ले ये
मन की सुनते हैं मन की करते हैं, ये रहते हैं मन के मोहल्ले में

पल में बनते हैं पल में बिगड़ते हैं
रोज़ नहीं कभी-कभी ही बनते हैं

मनचले बुलबुले की तरह है मन की यह हसीन दुनिया
जो कि मदहोशी के साबुन से सतरंगी छल्ले बनाती है

थोड़ी देर को ही सही यह लाइफ के कई कलर्स दिखाती है
किसी नाज़नीन के जैसे दिल को लुभाती है अपना बनाती है

मन के इन सतरंगी बुलबुलों का सफ़र बहुत ही मुख़्तसर होता है
इतना मुख़्तसर के जिसे सिर्फ मन की आँखें ही तय कर पाती हैं।।

“नेक दिल का दिल न तोड़ना कभी”

नेक दिल का दिल न तोड़ना कभी
एक उम्र गुज़र जाती है मातम मनाने में

दिल तोड़ने का हसीं तमाशा तो सदियों से चला आ रहा है
ये कोई आज की बात नहीं, ये तो बरसों से चला आ रहा है

जब भी कोई दिल टूटता है, खुद से और ज्यादा जुड़ता है
बरसों से एक यही तो नुस्खा है दिल का दिल बहलाने का

नेक राह के मुसाफ़िर को न छेड़ना कभी
एक भूल हज़ारों ज़िंदगियाँ बर्बाद कर देती हैं

साज़िश का शिकार भी अमूमन वही होता है
वो जो सबको साथ लेकर चलता है

सबको खुश रखने की चाह में 
अपने लिये वो आहें चुनता हैं

ठोकर खाकर ही तो वो हर बार संभलता है
चेहरे से तो हँसता है पर भीतर कहीं जलता है

नेक नीयत पे इल्ज़ाम न लगाना कभी
एक उम्र गुज़र जाती है बेकुसूर साबित होने में।

“ज़िंदगी: रूह दा रेडियो”

ये तमाम कायनात एक रेडियो ब्रॉडकास्टर की तरह है
जो हर वक़्त कायनात में मोहब्बत फैलाने की हसरत में
इश्क़ की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स रेडिएट करती रहती है

और ये ज़िंदगी उस महत्वाकांक्षी श्रोता लिस्टनर की तरह है
जो कि ज़िंदगीभर सही स्टेशन ट्यून करने की चाहत में
अपनी कोशिशों के ट्यूनर को चारों ओर घुमाता रहता है

लेकिन मनपसंद स्टेशन के आस-पास 
नाॅस्टेल्जिक नॉइज बहुत होता है
जिसे पूरी तरह से रिमूव करने में फ़ितरत का फिल्टर नाकाम रहता है

कायनात के इस चैनल की सबसे ख़ास बात यह है
कि यहाँ केवल प्यार की ढ़ाई हर्टज फ्रिक्वेंसी ही नहीं 
बल्कि श्रोताओं के नसीब की ब्रॉडकास्टिंग भी होती हैं

और तो और
प्रोग्राम के दौरान अक्सर एड भी वहीं आते हैं
जो सुनने वालों के मन के मन को बहलाते हैं
गीत सुनाते-सुनाते, अपनी दुनिया में ले जाते हैं

ये सब तो ठीक है, 
मगर अब तक ये पता नहीं चल पाया
के रूह के रिकॉर्डिंग रूम में 
आखिर वो आरजे कौन है?
जो हर वक़्त, वक़्त के अकाॅर्डिंग
नये-पुराने ट्रैक प्ले करता रहता हैं
और बीच-बीच में दिल की बातें
पुरानी वो यादें ताज़ा कर देता हैं 

तो चलिये दोस्तों
मैं जब तक उस आरजे का पता लगाता हूँ
आप तब तक इक एहसास की आवाज़ में
यह नग़्मा सुनिये

बोल है राॅकशायर इरफ़ान के
संगीत है मन के मीत का
और फिल्म का नाम है
ज़िंदगी: रूह दा रेडियो

“मनचाहा सफ़र”

अपनी ही धुन पर नाच रहा है ये मन
मनचाही डगर पर चल पड़ा है ये मन

रास्ते का नाश्ता ले लिया है
नाश्ते में रास्ता खा लिया है

तभी तो पैरों को थकान महसूस नहीं हो रही
उल्टा ये तो अब पहले से तेज़ चलने लगे हैं

चल भी रहे हैं या उड़ रहे हैं
रास्तों से रिश्ते दिल के जुड़ रहे हैं

मंज़िल दूर से ही इन्हें तक रही है
इंतज़ार में खड़ी-खड़ी थक रही है

मंज़िल को जिन रास्तों से रश्क़ है
दिल को उन्हीं रास्तों से इश्क़ है

देखते है ये बाज़ी कौन जीतता है
सबसे पहले वहाँ कौन पहुँचता है

जहाँ से फिर एक नया सफ़र शुरू हो जायेगा
पिछले सफ़र के किस्से ये वाला सफ़र सुनायेगा।

“डर के घर की दहलीज़ लांघकर जो ख़ुशी होती है”

डर के घर की दहलीज़ लांघकर जो ख़ुशी होती है
यक़ीन मानिये ऐसी ख़ुशी और कहीं नहीं होती है।

सोच के सागर को पार करना, महज एक दीवानगी है
ये दीवानगी तो अक्सर सोच से परे जाकर ही होती है।

बचपन से जो कहते आये, तुमसे ये ना हो पायेगा
वही जब ये कहे, “सच में ये तूने किया है !” तो ख़ुशी होती है।

सरहद के दोनों तरफ, एक उम्मीद बराबर बँटी है
बारूद से ढकी ज़मीं पे जो अमन के बीज बोती है।

तारों से दिल की बात करती है, अँधेरे से नहीं डरती है
सब सो जाते हैं लेकिन ये रात कभी नहीं सोती है।

बस एक यही सच तो बाक़ी रह गया है ज़िंदगी में
के कुछ पाने के लिये ज़िंदगी बहुत कुछ खोती है।

पत्थर के टुकड़ों को कीमती समझने वाले इंसान
सबसे कीमती इस जहान में तेरे मन का मोती है।।

“परिंदे को कब तक पिंजरे में रखोगे”

परिंदे को कब तक पिंजरे में रखोगे
एक न एक दिन तो वो उड़ जायेगा।

ऐसी उड़ान भरेगा के फिर
आसमान उसका घर बन जायेगा।

परिंदे को कब तक पिंजरे में रखोगे
एक न एक दिन तो वो उड़ जायेगा।

पलभर में पंखों से जो, नापे ये सारा जहान
बादलों से बातें करे, और चूमे गगन के गाल।

परिंदों को अपनी जान से ज्यादा, प्यारी अपनी आज़ादी हैं
परिंदों के लिये तो ये आकाश ही, सुनहरे सपनों की वादी है।

परिंदे को कब तक क़ैद में रखोगे
एक न एक दिन तो वो उड़ जायेगा।

ऐसी परवाज़ लेगा के फिर
नील अंबर उसका घर बन जायेगा।

परिंदे को कब तक पिंजरे में रखोगे
एक न एक दिन तो वो उड़ जायेगा।।

“कुछ बातें अनकही”

तेरे-मेरे दरमियान कुछ बातें अनकही रह गयी
आँखों में छुपी वो ख़ामोशी बहुत कुछ कह गयी

बहुत कुछ कहकर भी, कुछ नहीं कहा हमने
जो कुछ कहा हमने, वो सब कहीं था दिल में

जो आवाज़ हमने सुनी, वो आवाज़ हमारे दिल की थी
वो आवाज़ हमारे दिल की, अपनी आँखों से हमने सुनी

एक-दूसरे को चाहकर भी ना भुला पाये हम
एक-दूसरे को चाहकर भी ना बता पाये हम

के एक-दूसरे को कितना चाहते हैं हम
एक-दूजे से कितना झूठ बोलते हैं हम

झूठ भी ऐसा, के जो झट से पकड़ में आ जाये वैसा
प्यार भी ऐसा, के ना किया हो कभी किसी ने जैसा

तेरे-मेरे बीच कुछ अल्फ़ाज़ अनकहे रह गये
आँखों में छुपे वो जज़्बात बहुत कुछ कह गये

जो अल्फ़ाज़ हमने पढ़े, वो अल्फ़ाज़ हमारे दिल के थे
वो अल्फ़ाज़ हमारे दिल के, अपनी आँखों से हमने पढ़े।

RockShayar⁠⁠⁠⁠

“चलते-चलते इतनी दूर आ गये क़दम”

चलते-चलते इतनी दूर आ गये क़दम
के लौटना जहाँ से नामुमकिन है अब।

वैसे भी क़दमों को रुकने की आदत कहाँ
ये तो वहीँ चले जाये, रास्ते ले जाये जहाँ।

जहाँ रास्तेभर रास्तों का सफ़र हो
और मंज़िल से दिल ये बेख़बर हो।

चलते-चलते इतनी दूर आ गये हैं हम
के लौटना जहाँ से नामुमकिन है अब।

वैसे भी हमको अब लौटने की चाहत कहाँ
हम तो वहीँ बस जाये, ज़िंदगी रहती जहाँ।

जहाँ ज़िंदगीभर ज़िंदगी बस एक सफ़र हो
फिर चाहे सामने मौत हो या मंज़िल, ना कोई डर हो। 

चलते-चलते इतनी दूर आ गये क़दम
के लौटना जहाँ से नामुमकिन है अब।।

RockShayar.wordpress.com

“फिर से वहीं ले आयी ज़िन्दगी”

फिर से वहीं ले आयी ज़िन्दगी
जहाँ ना आने की कसम थी खायी।

हालाँकि यह एहसास होने में बहुत वक़्त लगा
हर एक एहसास को खोने में बहुत वक़्त लगा।

एक शाम साहिल से बहुत दूर निकल गया समंदर
लौटा जब तक वो, ढ़ह चुका था उसका रेत का घर।

लहरों से कई दिनों तक नाराज़ रहा वो
गुमसुम सा महीनों बेआवाज़ रहा वो।

कितनी ही कश्तियाँ उसके ऊपर से गुज़र गयी 
वो फिर भी ख़ामोश सा एक जगह ठहरा रहा।

आखिरकार एक नदी ने अपना रुख़ मोड़ा
मुश्किल से दिल का रिश्ता जोड़ा।

फिर से वहीं ले आयी ज़िन्दगी
जहाँ ना आने की कसम थी खायी।

हालाँकि यह समझने में बहुत वक़्त लगा
हर एक याद को मिटने में बहुत वक़्त लगा।।

#राॅकशायर

“Henna (मेंहदी/हिना)”

खुद को मिटाकर हमेशा दूसरों को खुशियाँ देती है
हिना तो हर महफ़िल को दिल के रंग में रंग देती है।

हिना की क़िस्मत है पिसना
हिना की फ़ितरत है रंगना
हिना की हसरत है खिलना
हिना की क़ुदरत है रचना।

हिना की कहानी भी कितनी बेमानी है 
ये जितना पिसती है उतना निखरती है।

दुल्हन के हाथों में लगने वाली मेंहदी भी यही है
हर औरत की ज़ेबोज़ीनत संवारती भी यही है।

बिना इसके ना कोई शगुन है
ना कोई फागुन
बिना इसके ना कोई मिलन है
ना कोई साजन।

मेंहदी लगे हाथों को खुद पर नाज़ होता है 
मेंहदी रचे हाथों में रुमानी एहसास होता है।

अपने अरमान दबाकर दिल में अरमान जगाती है
हिना तो पिसते-पिसते खुशी से लाल हो जाती है।

हिना का नसीब है पिसना
हिना को हबीब है जचना
हिना की तक़्दीर है रंगना
हिना को अज़ीज़ है रचना।

हिना की कहानी भी कितनी बेमानी है 
ये जितना पिसती है उतना निखरती है।

हिना की तासीर बहुत ही ठंडी होती है
जलन और तपिश को ये दूर कर देती है।

सब्ज़ पत्तियों की तरह, हिना के जज़्बात भी सब्ज़ होते हैं
हिना पर कोई कैसे लिखे, लिखने को लफ़्ज़ नहीं होते हैं।।

#RockShayar

हिना – मेंहदी
ज़ेबोज़ीनत – Beauty 
रुमानी – Romantic
हबीब/अज़ीज़ – Dear 
तासीर – Nature
सब्ज़ – Green
जज़्बात – Emotions
लफ़्ज़ – Word

“ये कैसी आहट है, जो कभी सुनाई नहीं देती”

ये कैसी आहट है, जो कभी सुनाई नहीं देती
रूह की सरसराहट है, ये बस महसूस होती।

धड़कने की आदत को, दिल कभी छोड़ता नहीं
जो छोड़ता कभी, तो दिल ये लाखों तोड़ता कहीं।

ये कैसी ख़ामोशी है, जो कभी सुनाई नहीं देती
रूह की सरगोशी है, जो सुकूंभरे कुछ पल देती।

बदलने की आदत को, वक़्त कभी बदलता नहीं
जो बदलता कभी, तो यादें वो पीछे छोड़ता कई।

ये कैसी ख़्वाहिश है, जो कभी पूरी नहीं होती 
रूह की गुज़ारिश है, जो कभी अधूरी नहीं होती।

महकने की फ़ितरत को, ख़ुशबू कभी छोड़ती नहीं
जो छोड़ती कभी, तो ख़ुशबू वो अपनी छोड़ती कहीं।

ये कैसी आवाज़ है, जो कभी सुनाई नहीं देती
रूह की परवाज़ है, जो कभी दिखाई नहीं देती।

बरसने की आदत को, बादल कभी बदलते नहीं
जो गरज़ते हैं ज्यादा, वो बादल कभी बरसते नहीं।

ये कैसी ज़िन्दगी है, जो कभी जीने नहीं देती
जो जी उठे एक बार, तो फिर मरने नहीं देती।।

RockShayar.wordpress.com

“दरअसल मेरा घर था”

तुम लोगों ने जिसे ठूंठ समझकर जला दिया था
ख़्वाबों का वो ऊँचा शजर, दरअसल मेरा घर था।

बरसों लगे थे मुझको, जिसे बसाने में, सजाने में
यादो का वो पुराना शहर, दरअसल मेरा घर था।

दिल के शहर में, बंजारे की तरह दर-दर भटकना 
ख़यालों का वो तन्हा सफ़र, दरअसल मेरा घर था।

मुस्कुराते हुये जलता रहा, वो मुरझाकर भी खिलता रहा
ख़ताओं से था जो बेख़बर, दरअसल मेरा घर था।

कहानी से तो कर ली, पर पानी से ना कर पाये दोस्ती
डूब जाने का वही पुराना डर, दरअसल मेरा घर था।

मोहब्बत ने ऐसा सिला दिया, के नफ़रत से नाता जोड़ लिया
दर्द-ए-दिल से अमीर वो दर, दरअसल मेरा घर था।

ज्यादा समझ नहीं है मुझे दुनियादारी की इरफ़ान
जो मिल गया वही मुकद्दर, दरअसल मेरा घर था।।

“ना जाने तक़दीर में अभी और क्या-क्या लिखा है”

ना जाने तक़दीर में अभी और क्या-क्या लिखा है
यूँ समझ लीजिये के दर-ब-दर भटकना लिखा है।

मोहब्बत तो दिल से की, पर कह न पाये उसे कभी
ताउम्र अब तो मोहब्बत के लिये तरसना लिखा है।

जहाँ कहीं भी है तू, सुन मेरे दिल की आवाज़ तू
तुझे भुलाने की कोशिश में तुझे याद करना लिखा है।

हादसों पर हादसे मिले, तभी तो बने हम दिलजले
सौ बार गिरकर आखिर में खुद संभलना लिखा है।

अभी कहाँ रुकने की बात, अभी कहाँ वो चैन की रात
अभी तो दोपहर में दूर तक, नंगे पाँव चलना लिखा है।

अपने होने का एहसास हुआ, कुछ तो है जो ख़ास हुआ
ख़्वाबों के गुलशन में खुशबू बनकर महकना लिखा है।

कम उम्र में बड़ी पहचान, इत्तेफाकन नहीं है इरफ़ान
इतना तो है कि किस्मत में कुछ अलहदा लिखा है।।

“जिस रिश्ते में यकीन न हो वो रिश्ता हमने तोड़ दिया है”

परवाह करना छोड़ दिया है
अपने हाल पर उन्हें छोड़ दिया है।

जिस रिश्ते में यकीन न हो
वो रिश्ता हमने तोड़ दिया है।

पथरीली राहों पर चलते-चलते
ज़िंदगी को नया मोड़ दिया है।

वक़्त ने मरहम लगा लगाकर
दिल को फिर से जोड़ दिया है।

नहीं भूले उस हादसे को अब तक
रूह को जिसने निचोड़ दिया है।

नफ़रत के काबिल है वो तो 
यक़ीन को जिसने तोड़ दिया है।

मेरे सवालों का जवाब दे ऐ ज़िंदगी
तूने मुझे अधमरा क्यों छोड़ दिया है।।

“कश्मीर”

ख़ुदा ने जिस कश्मीर को जन्नत जैसा खूबसूरत बनाया
इंसान ने उसी कश्मीर को आज दोज़ख जैसा बना दिया।

एक अर्से से वादी में आज़ादी का खेल चल रहा है
कई बरसों से नफ़रत की आग में दिल जल रहा है।

ज़िहाद के नाम पर फ़साद करने वालों सुनो ज़रा
खुद अपने ही घरों को तुमने अपने हाथों जलाया।

जिन लोगों पर पागल होकर पत्थर फेंक रहे हो तुम
जब बाढ़ आई तब इन्हीं लोगों ने था तुमको बचाया।

सियासत के नाम पर हर जगह जो तिजारत हो रही हैं
मादर-ए-वतन से आज क्यों इतनी बग़ावत हो रही हैं।

नेता तो यही चाहते हैं ये बर्बादी यूँही चलती रहे
दहशतगर्दी के साये में यह वादी यूँही जलती रहे।

मज़हब के ठेकेदारों ने ख़ूब मोर्चा संभाल रखा है
मासूमियत के दिल में हैवानियत को पाल रखा है।

खिलौनों की जगह हाथों में बंदूक थमा दी जाती हैं
ज़ेहन में ज़हर भरकर मौत मंज़ूर करा ली जाती हैं।

अब तो ये पहाड़ भी कुछ बोलते नहीं
ख़ून के दाग़ धब्बे खुद पर टटोलते नहीं।

अब तो ये नदियाँ भी कुछ कहती नहीं
बहता ख़ून देखकर बहना बंद करती नहीं।

अब तो ये धुंध भी ज्यादा देर रुकती नहीं
सूरज की रौशनी से आजकल डरती नहीं।

अब तो झील पर शिकारे भी ख़ामोश चलते हैं
पानी पर चलते हैं, फिर भी जाने क्यों जलते हैं।

कोई कुछ नहीं बोलता अब, सबने जीना सीख लिया हैं
झूठी आज़ादी के लिये, समझौता करना सीख लिया हैं।

सब समझ चुके हैं यहाँ, जिसने भी अपना मुँह खोला
पहना दिया जाता हैं उसे, उसी पल फांसी का चोला।

ख़ुदा ने जिस कश्मीर को जन्नत जैसा हसीन बनाया
इंसान ने उसी कश्मीर को आज जहन्नुम बना दिया।

मुद्दत से वादी में आज़ादी का खेल चल रहा है
शिद्दत से नफ़रत की आग में दिल जल रहा है।

अफ़सोस, के अब तक कोई न समझ सका इस दर्द को
अफ़सोस, के अब तक कोई न पकड़ सका इस मर्ज़ को।

अपनी बदहाली पर कई बरसों से रो रहा है कश्मीर
अपने गुनाहों का बोझ सदियों से ढ़ो रहा है कश्मीर।।

@राॅकशायर⁠⁠⁠⁠

“तारों की दुनिया”

jesus-ultra-hd-ii-taringa-1738600.jpg

तारों की दुनिया देखी है कभी !
तारों की दुनिया देखना चाहोगे !

तो चलो फिर आज हम, तारों की उस दुनिया में चले
हैं जहाँ पे तारें ही तारें, अपनी अलग एक दुनिया लिये।

तारों का अपना एक वज़ूद होता हैं
इन्हें सूरज की ज़रूरत नहीं
सूरज तो खुद इनकी बिरादरी का
एक छोटा सा हिस्सा है।

सूरज की ज़रूरत तो चाँद को है
सूरज से मोहब्बत तो चाँद को है।

सूरज दिनभर खुद को ऐसे जलाता है
जैसे कोई आशिक इश्क़ में खुद को मिटाता है।

और फिर ये रश्क़-ए-क़मर
जिसे चाँद कहो या माहताब
रातभर सूरज की दिनभर की तपिश को
ठंडक में कुछ इस तरह तब्दील करता है
जैसे कोई महबूबा अपने थकेहारे महबूब को
नर्म बाहों के दरमियाँ सुकून और राहत देती है।

सुना है कि तारें ज़मीन से बहुत दूर होते हैं
इतनी दूर
के खुद दूरी को भी अपने पास होने का एहसास होता है।

तारों का अपना कोई घर नहीं
इसलिये तो आँखों में बसते हैं।

चाँद को तो ज़रूर इनसे जलन होती होगी ना!
तभी तो अंदर ही अंदर बस कुढ़ता रहता है
सोच सोचकर देखो !
पेशानी पर कितने गड्ढे पड़ गये हैं।

तारों में मद्धम रौशनी की सरसराहट होती है
कभी टिमटिमाहट तो कभी जगमगाहट होती है।

लोग कहते हैं कि लोग मरकर एक तारा बन जाते हैं
यानी फिर कभी नहीं मरने लोग ही तारा कहलाते हैं।

तारें वो हैं जो खुद रौशनी बिखेरते हैं
तारें वो हैं जो तन्हा स्पेस में तैरते हैं।

तारों का अपना एक वज़ूद होता हैं
इन्हें सूरज की ज़रूरत नहीं
सूरज तो खुद इनकी फैमिली का
एक छोटा सा हिस्सा है।

हालाँकि सूरज ने बहुत कोशिश की
खुद को जलाने की
लेकिन आखिर में वो भी बस एक तारा ही निकला
खुद से दूर, सबसे दूर
इस जहां से मीलों दूर
पूरी कायनात की आँखों का तारा।

तो बताओ फिर
कैसी लगी तारों की दुनिया
अपने जैसी
या कोई और ही दुनिया।।

@राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान⁠⁠⁠⁠

“Faded पुरानी Jeans की तरह होती हैं यादें”

किसी Faded सी पुरानी Jeans की तरह होती हैं यादें
वक़्त के Rear Mirror में खुद को देखकर रोती हैं यादें।

दिनभर सोचते-सोचते, ख़याली Work out से चूर होकर
ख़्वाबों के आगोश में सुकूनभरी Sleep सोती हैं यादें।

Pain की बरसती Rain में, धीरे-धीरे Dissolve होना है
पलकों के साथ Sometimes Soul भी भिगोती हैं यादें।

खोना और पाना, Lifetime यही Cycle चलता रहता है
Tiny-Tiny आँखों में Triple XL सपने संजोती हैं यादें।

I have never understood, किस तलाश में हूँ यहाँ मैं
Real में कहूं तो समंदर के जितना Deep डुबोती हैं यादें।

Life की यह Philosophy, लगे जो किसी Race की Trophy
कुछ पाने की खातिर Always बहुत कुछ खोती हैं यादें।

Flashback में जाकर जो, गुज़रा हुआ कल दिखाये
दिल की Film के उस Scene की तरह होती हैं यादें।।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

“बहती हुयी हवाएँ, बारिश में गीली होकर ज़मीं पर उतर आती हैं”

दिल से निकली दुआएँ,
बारिश की बूँदें बनकर ज़मीं पर उतर आती हैं
सुबह की उजली सदाएँ,
सूरज की किरनें बनकर ज़मीं पर उतर आती हैं।

बहती हुयी हवाएँ,
बारिश में गीली होकर ज़मीं पर उतर आती हैं
काली घनी घटाएँ,
सावन में सीली होकर ज़मीं पर उतर आती हैं।

एहसास की निगाहें,
अश्क़ों की आरामगाह बनने ज़मीं पर उतर आती हैं
दिल में दबी वो आहें,
रंजो-ग़म की पनाहगाह बनने ज़मीं पर उतर आती हैं।

बादल की खुली बाहें,
आसमान की पेशानी चूमने ज़मीं पर उतर आती हैं
शायर की सभी आहें,
क़लम से रोज कहानी सुनने ज़मीं पर उतर आती हैं।

फ़ुर्कत भरी फ़िज़ाएँ,
अल्हड़ सी अंगड़ाई लेकर ज़मीं पर उतर आती हैं
चाँद की रौशन अदाएँ,
संग रात की तन्हाई लेकर ज़मीं पर उतर आती हैं।

आँसुओं से नम निगाहें,
पलकों के गीले पर्दे को छूने ज़मीं पर उतर आती हैं
राह चलती वो राहें,
खुद से किये वादे पूरे करने ज़मीं पर उतर आती हैं।

दर्द-ए-दिल की सज़ाएँ,
अपने रब की बंदगी करने ज़मीं पर उतर आती हैं
और बदले में नेक वफ़ाएँ,
ज़िंदगी की तस्वीर बदलने ज़मीं पर उतर आती हैं।

बेज़ुबान सी बेनज़ीर ये निगाहें,
जब किसी को याद करे तो इनमें नमी उतर आती हैं
ठीक उसी वक़्त, वक़्त की हवाएँ,
ओस की बूँदें बनकर दिल की ज़मीं पर उतर जाती हैं।।

http://www.rockshayar.wordpress.com⁠⁠⁠⁠

“आज तुम्हे मैं जादू दिखाऊँगा”

मन की आँखों से, आज तुम्हे मैं जादू दिखाऊँगा
दिल की बातों से, आज तुम्हे मैं जादू सिखाऊँगा।

जो तुम सोच रहे हो, यक़ीनन आज वही होने वाला हैं
अपनी आँखों पर तुम्हे, आज यक़ीन नहीं होने वाला हैं।

दिल थामकर बैठना, ऐ मुझको देखने वालों
कहीं दिल दे न बैठना, ऐ मुझको चाहने वालों।

कब तुम्हे तुमसे चुरा लूंगा, पता भी नहीं चलेगा
कब तुम्हे खुद में छुपा लूंगा, पता भी नहीं चलेगा।

अपनी अलग एक दुनिया में, आज तुम्हे मैं लेकर जाऊँगा
क्या है मेरी उस दुनिया का सच, आज तुम्हे मैं ये बताऊँगा।

वहाँ न कोई झूठ-कपट है, वहाँ न कोई डाँट-डपट है
वहाँ तो बस अपना घर है, पड़ोस में जिसके नील समंदर है।

फिक्रे अपनी भुला दो आज, नज़रें अपनी जमा लो आज
भरने दो खुद को तुम आज, ख़्वाबों ख़यालों की परवाज़।

तो अब बताइये हुज़ूर, मेरा ये जादू आपको कैसा लगा
कुछ हटकर नया लगा, या फिर वही पहले जैसा लगा।।

@RockShayar

“दोस्ती” (Unforgettable Day…2nd August 2015)

ashu1.jpg

दोस्ती का दिन कोई, न कोई वार होता है
दोस्तों के साथ तो, हर वार ही शनिवार होता है।

चाहे माइंड की मिस्ट्री हो, या हसरतों की हिस्ट्री
दोस्तों के दरमियाँ होती हैं, कमाल की कैमिस्ट्री।

सेटिंग चाहे मोबाइल की हो, या फिर दिल की
दोस्तों ने तो इन पर, पूरी पीएचडी हासिल की।

हुस्न देखकर ये फँस जाते हैं, रोज उसकी गली तक जाते हैं
दोस्ती के बिना दोस्तों, ये ज़िंदगी के सफ़र में भटक जाते हैं।

यारों दा ठिकाना कोई, न कोई घरबार होता हैं
यारों के साथ तो, हर लम्हा ही यादगार होता हैं।

मुसीबत हो या मोहब्बत, या हो कोई फड्डा
हर थड़ी पे होता हैं, साड्डे यारों दा अड्डा।

घरवाले जब इन्हें डाँटते हैं, बुरा नहीं ये मानते हैं
दोस्त लोग तो हमेशा, दोस्तों में खुशियाँ बाँटते हैं।

ज़िंदगी ने एक रोज जब, मुझसे मेरी खुशियों का राज़ पूछ लिया
मुस्कुराकर मैंने भी, अपने दिल के काग़ज़ पर दोस्ती लिख दिया।।

rockshayar.wordpress.com

“इस दुनिया से अलग एक दुनिया है मेरी”

CYMERA_20140621_180316.jpg

इस दुनिया से अलग
एक दुनिया है मेरी।

जब भी डर लगता है
वहाँ चला जाता हूं।

वहाँ डर नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ घर नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ अपने नहीं हैं, सिर्फ खुशी है
वहाँ सपने नहीं हैं, सिर्फ खुशी है।

वहाँ मक़सद नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ हसरत नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ दीवारें नहीं हैं, सिर्फ खुशी है
वहाँ किनारे नहीं हैं, सिर्फ खुशी है।

वहाँ होड़ नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ दौड़ नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ तड़पना नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ तरसना नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ उम्मीद नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ ईद नहीं है, फिर भी खुशी है।

वहाँ हँसी है, सिर्फ हँसी है
वहाँ खुशी है, सिर्फ खुशी है।।

“ऊपर बैठा है मदारी, और जमूरा है नीचे”

ऊपर बैठा है मदारी, और जमूरा है नीचे
तू आगे-आगे, तेरी परछाई पीछे -पीछे।
 
कुछ भी कर ले चाहे तू, मगर होनी तो एक दिन होकर रहेगी
सुन बस अपने दिल की तू, हालाँकि दुनिया तुझे जोकर कहेगी।
 
सबसे निकम्मा चेला तू, और सबसे बड़ी गुरु ज़िन्दगी
जिस पल भी तू गिरता है, वहीँ से असल शुरू ज़िन्दगी।
 
काल का यह डमरू, सब को अपनी ताल पर नचाये
हर प्राणी के लिए यहाँ, नाना प्रकार के खेल रचाये।
 
जैसी करनी वैसी भरनी, बहुत सुना और बहुत देखा
न्याय तो केवल वो करे, उसके पास है सब का लेखा।
 
न किसी का मज़ाक उड़ाओ, न किसी का दिल दुखाओ
न किसी का तलाक़ कराओ, न किसी का घर जलाओ।
 
सब कुछ उसके सामने है, सब कुछ उसकी मर्ज़ी से है
सबसे अक़्लमंद है फिर भी, कर्म इंसान के फर्जी से है।
 
ऊपर बैठा है उस्ताद, और शागिर्द है नीचे
तू आगे-आगे, तेरी तक़दीर पीछे -पीछे।।

“कोई और बनकर जी रहा है तू”

यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू
यह पता है तुझे, फिर भी सह रहा है तू
यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू।

एक अर्से से मुकद्दर, अजीब खेल खेलता आया है
तू ही तुझ में ना रहा, अब तो कोई और नुमायाँ है।

अपनों के लिए क्यों अपने आप को भूल रहा है
किस्मत और कोशिश के दरमियान झूल रहा है।

सब पता है तुझे, कि तू किस चीज के लिए बना है
मासूम मोहब्बत के उस, गाढ़े लाल ख़ून में सना है।

सब तो खुशियां मना रहे हैं, पर तू खुश नहीं है
सब तो हासिल है लेकिन, तू खुद, खुद नहीं है।

यह कैसी तलब है, जो कभी खत्म ही नहीं होती
यह कैसी तड़प है, जो कभी भस्म ही नहीं होती।

जब-जब तू आगे बढ़ा, खींचकर यह ज़िन्दगी पीछे ले आई
जब-जब तू ऊपर चढ़ा, घसीटकर यह फिर नीचे ले आई।

यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू
खुद में ही अजनबी की तरह रह रहा है तू
यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू।।

-RockShayar

“लफ़्ज़ों में नुमायां दर्द को हाल-ए-दिल न समझना”

लफ़्ज़ों में नुमायां दर्द को हाल-ए-दिल न समझना
ज़िन्दगी के काग़ज़ पर खुशी लिखना सीख चुके है

हालाँकि वक़्त बहुत लगा है, इस फ़न को पाने में
और एक उम्र गुज़र गयी है, खुद को आज़माने में

पहले हम हैरान होते थे, अब वो हैरान होते हैं
देखकर यह तलब अब, लफ़्ज़ परेशान होते हैं

ख़्वाब सब महताब हुए, ख़्वाहिशों ने लिखे हैं ख़त
रूह को भी आजकल इन सबकी, लग गयी है लत

हयात के तन्हा सफ़र में, साथ चली हरघड़ी क़लम
इंसानी रिश्तों से परे, कुछ ख़ास है यह मेरी क़लम

कहीं भी, कभी भी, कुछ भी, कैसा भी हो लिखना
ख़याल मज़बूत हो वो, याद बस इतना ही रखना

हद न हो जिसकी कोई, उस मुकाम तक पहुँचना है
बाज़ार की ज़ीनत और तकब्बुर से हमेशा बचना है

नज़्मों में बयां दर्द को हाल-ए-दिल न समझना
ज़िन्दगी के हाथ पर खुशी लिखना सीख चुके है।

@RockShayar

“वो यार”

एक एक करके वो, यार सब चले गए
बीच सफ़र में कुछ यार अब मिले नए

अपने अपने दौर में सबने अपना साथ दिया
बिखरा मैं जब कभी तो सबने अपना हाथ दिया

किसी ने नखरे झेले मेरे, तो किसी ने झेली नादानी
यारों के संग बीते लम्हों की, है बस इतनी सी कहानी

शिकायतें हो वो कितनी भी, ना हुई नाराज़गी कभी
देखकर हाँ बेरुख़ी मेरी, ना हुई उन्हें हैरानगी कभी

हो चाय की वहीं वाली थड़ी, या हो ग़मों की झड़ी
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर, साथ है अपने यारी खड़ी

दर्द के वो सख़्त पल, या हो खुशी के हसीं लम्हें
गुज़र गया पर आज भी, याद आते हैं वहीं लम्हें

अपनी अपनी ज़िन्दगियों में, हैं सब मशगूल अब
रूठना मनाना मस्ती तकरार, हैं सब मक़्बूल अब

धीरे धीरे फिर, यार वो सब चले गए
बीच सफ़र में कुछ यार अब मिले नए ।।

“आज मैंने, ये जाना है”

Today I am very happy.
I have donated blood for the first time.
It’s a beautiful feeling to save a life.
I wrote a poem to express my feelings……

Blood donate1
लहू के चंद कतरे देकर
आज मैंने, ये जाना है
इंसानियत से बढ़कर कुछ नहीं
आज मैंने, ये माना है
बह जाता है अक्सर जो
झगड़े फसाद में हर रोज
बचा सके गर ज़िन्दगी वो
इससे बेहतर और क्यां है
ख़ुदग़र्ज़ियों में जीते जीते
ख़ामोशियों को पीते पीते
खूं की वो उम्दा अहमियत
रूह की वो ज़िंदा कैफ़ियत
रिश्तों से बड़ी है इंसानियत
आज मैंने, ये जाना है

© RockShayar

“थम सी गई है, ज़िन्दगी क्यूँ आजकल”

3840x2400 (1) mystery_walks-wallpaper-1366x768

थम सी गई है
ज़िन्दगी क्यूँ आजकल
मुस्कुराना गर ये चाहे तो
परमिशन लेनी पड़ती है
सोच के बेतरतीब पुर्ज़ों से
उड़ते रहते है, अक्सर जो
ख़्यालों के बोझिल दायरे में
हर दफ़ा ना सुनकर
मायूस हो जाती है ये
ख़ामोश सी
यूँ, गुमसुम रहती है आजकल
शायद
इसी से, कोई राह निकल आये नई
फिर से, सफ़र की चाह निकल आये नई
थम सी गई है
ज़िन्दगी क्यूँ आजकल

© RockShayar

“जी भर के जी ले”

IMG_0020
जी भर के जी ले यारा
छोटी सी हैं ज़िंदगानी
ना कुछ संग लाया तू
ना कुछ संग जाना तेरे
मिटटी से बना ये जिस्म
मिटटी में मिल जायेगा आखिर
तो छोड़ फिर सब फ़िक्र-ओ-ग़म
पीले जुनूं का प्याला भरकर
खुशियों से रूह तर कर ले
वक़्त फिसलता जा रहा हैं
हर लम्हा तू खुलकर जी ले
इससे पहले के दम निकले  
यारा तू बस..जी भर के जी ले

“जाने कब आयेंगे अच्छे दिन”

boy-with-saw-bladePerson Holding Hire Me Sign in Crowdsainath 3

जाने कब आयेंगे अच्छे दिन
हर शख्स के मन में आजकल
उठता हैं बस यही सवाल
आसमां छूती महंगाई
कमर तोड़ रही हैं
एक झटके में नही
हर रोज किश्तों में
दो वक्त की रोटी के लिए
हर आदमी यहाँ दौङ रहा हैं
धूप हो या छाँव
तन को जला रहा हैं
कोई मेहनत करके पसीना बहाता हैं
और कोई मजहब के नाम पर लहू
कहीं भी ईमान की परछाई नही दिखती
भूख से बैचेन वो बच्चा
बैंठा हैं जो फुटपाथ पर
पूँछता हैं बस यही सवाल
जाने कब आयेंगे अच्छे दिन
ऊँची डिग्रीया लेकर भी
बेरोजगार हैं सब नौजवान
नौकरी की तलाश में
मारे मारे यूँ भटक रहे हैं
कहीं भी सच्चाई को पनाह नही मिलती
कुछ ने ख्वाबों का गला घोंट दिया
और कुछ ने ज़मीर ही बैच दिया
निराशा से कुंठित वो युवक
खड़ा हैं जो कतार में
पूँछता हैं बस यही सवाल
जाने कब आयेंगे अच्छे दिन
बारिश के इंतज़ार में
आँखें पड़ गयी हैं पीली
बंजर हो गए सारे खेत
कहीं भी उम्मीद की किरण नहीं दिखती
किसी ने फिर शहर का रूख अपनाया
और किसी ने मौत को गले लगाया
बेबसी से लाचार वो किसान
डूबा हैं जो क़र्ज़ में
पूँछता हैं बस यही सवाल
जाने कब आयेंगे अच्छे दिन
जाने कब आयेंगे अच्छे दिन

*** इरफ़ान “मिर्ज़ा” ***

“ऐ दिल, तू क्यूँ मायूस रहता हैं”

10525655_672731106108816_4789344628783743594_n

ऐ दिल, तू क्यूँ मायूस रहता हैं 
जिन्दगी को गले लगाकर ही यहाँ
मिलेगा तुझे एक नया रास्ता 
ले जायेगा जो अपने जहां में 
हर ख्वाहिश जहाँ पूरी होगी तेरी
उम्मीदों को इक नई रोशनी मिलेगी
वहीं रोशनी, जिसकी तलाश में
तू दर बदर भटकता रहा हैं
तेरी हर कोशिश गवाह हैं
उस वक्त की
जब तू गिरता रहा
उठता रहा
सम्भलता रहा
और खुद को यूँ
हौंसला देता रहा
ऐ दिल, तू क्यूँ बैचेन रहता हैं
दर्द में रूह को जलाकर ही यहाँ
होगा तुझे फिर दीदार तेरा

“मुझको जिन्दगी तेरा पता मिल जाये”

10479464_672434279471832_2066047281_n

फिरसे जीने की इक वजह मिल जाये
मुझको या रब तेरी पनाह मिल जाये

खुली हवा में साँस ले सकू जहाँ मैं
सूकून की ऐसी कोई जगह मिल जाये

अन्धेरों में क़ैद हूँ सदियों से यहाँ मैं
मुझको नूर का वोह साया मिल जाये

गुज़रे वक्त के दर्द को भुलाकर यहाँ
हयात को सच्ची इक वफ़ा मिल जाये

गुनाहो में पलता रहा हैं मेरा वज़ूद
रूह को मेरी बस नेक दुआ मिल जाये

मर्ज़ी से जी सकू हर लम्हा जहाँ मैं
ख्वाबों का ऐसा इक जहां मिल जाये

फ़क़त गुज़ारिश कर रहा यूँ ‘इरफ़ान’
मुझको जिन्दगी तेरा पता मिल जाये

“ज़िन्दगी पिघलती जा रही है”

Zindagi

ज़िन्दगी पिघलती जा रही, बर्फ कि तरह 
आओ इस पर, खुशियों कि चाशनी छिड़क दे 
कुछ खून ही बढ़ जायेगा, जरा मुस्कुराने से 
चलो इसके इशारों पे, आज हम सब थिरक दे 
चहकते हुए कई लम्हे, उड़ते फिरते है यहाँ
पकड़ो जो इनको तो, रूह को फिर यूं महका दे 
ढेरो हैरानियाँ रहती है, ज़िन्दगी के दामन में 
देखो इन्हे गौर से, जीवन के सब राज़ खोल दे 
ज़िन्दगी पिघलती जा रही, बर्फ कि तरह 
आओ इस पर, मुहब्बत का नमक छिड़क दे

“ये ज़िन्दगी”

Image

पढ़कर मेरे अल्फाज़, सब मिटा देती है वोह
सदां-ए-दिल को भी, अनसुनी करती है वोह

अब और कितने इम्तिहाँ, लेगी ये ज़िन्दगी
ठहर कर कुछ देर, फिर से चल देती है वोह

“अब जाकर दीदार हुआ”

Image

जो चेहरा बसा था ख्वाबो में, उसका यूँ तलबगार हुआ 
गुज़ारिश इक ज़िंदा है अब तक, एहसास भी बेदार हुआ 

बरसो से तलाशता रहा हूँ, उस खुशनुमा मंज़र को यहाँ
ज़िन्दगी के अनजान सफ़र में, अब जाकर दीदार हुआ