“बहती हुयी हवाएँ, बारिश में गीली होकर ज़मीं पर उतर आती हैं”

दिल से निकली दुआएँ,
बारिश की बूँदें बनकर ज़मीं पर उतर आती हैं
सुबह की उजली सदाएँ,
सूरज की किरनें बनकर ज़मीं पर उतर आती हैं।

बहती हुयी हवाएँ,
बारिश में गीली होकर ज़मीं पर उतर आती हैं
काली घनी घटाएँ,
सावन में सीली होकर ज़मीं पर उतर आती हैं।

एहसास की निगाहें,
अश्क़ों की आरामगाह बनने ज़मीं पर उतर आती हैं
दिल में दबी वो आहें,
रंजो-ग़म की पनाहगाह बनने ज़मीं पर उतर आती हैं।

बादल की खुली बाहें,
आसमान की पेशानी चूमने ज़मीं पर उतर आती हैं
शायर की सभी आहें,
क़लम से रोज कहानी सुनने ज़मीं पर उतर आती हैं।

फ़ुर्कत भरी फ़िज़ाएँ,
अल्हड़ सी अंगड़ाई लेकर ज़मीं पर उतर आती हैं
चाँद की रौशन अदाएँ,
संग रात की तन्हाई लेकर ज़मीं पर उतर आती हैं।

आँसुओं से नम निगाहें,
पलकों के गीले पर्दे को छूने ज़मीं पर उतर आती हैं
राह चलती वो राहें,
खुद से किये वादे पूरे करने ज़मीं पर उतर आती हैं।

दर्द-ए-दिल की सज़ाएँ,
अपने रब की बंदगी करने ज़मीं पर उतर आती हैं
और बदले में नेक वफ़ाएँ,
ज़िंदगी की तस्वीर बदलने ज़मीं पर उतर आती हैं।

बेज़ुबान सी बेनज़ीर ये निगाहें,
जब किसी को याद करे तो इनमें नमी उतर आती हैं
ठीक उसी वक़्त, वक़्त की हवाएँ,
ओस की बूँदें बनकर दिल की ज़मीं पर उतर जाती हैं।।

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“आज तुम्हे मैं जादू दिखाऊँगा”

मन की आँखों से, आज तुम्हे मैं जादू दिखाऊँगा
दिल की बातों से, आज तुम्हे मैं जादू सिखाऊँगा।

जो तुम सोच रहे हो, यक़ीनन आज वही होने वाला हैं
अपनी आँखों पर तुम्हे, आज यक़ीन नहीं होने वाला हैं।

दिल थामकर बैठना, ऐ मुझको देखने वालों
कहीं दिल दे न बैठना, ऐ मुझको चाहने वालों।

कब तुम्हे तुमसे चुरा लूंगा, पता भी नहीं चलेगा
कब तुम्हे खुद में छुपा लूंगा, पता भी नहीं चलेगा।

अपनी अलग एक दुनिया में, आज तुम्हे मैं लेकर जाऊँगा
क्या है मेरी उस दुनिया का सच, आज तुम्हे मैं ये बताऊँगा।

वहाँ न कोई झूठ-कपट है, वहाँ न कोई डाँट-डपट है
वहाँ तो बस अपना घर है, पड़ोस में जिसके नील समंदर है।

फिक्रे अपनी भुला दो आज, नज़रें अपनी जमा लो आज
भरने दो खुद को तुम आज, ख़्वाबों ख़यालों की परवाज़।

तो अब बताइये हुज़ूर, मेरा ये जादू आपको कैसा लगा
कुछ हटकर नया लगा, या फिर वही पहले जैसा लगा।।

@RockShayar

“दोस्ती” (Unforgettable Day…2nd August 2015)

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दोस्ती का दिन कोई, न कोई वार होता है
दोस्तों के साथ तो, हर वार ही शनिवार होता है।

चाहे माइंड की मिस्ट्री हो, या हसरतों की हिस्ट्री
दोस्तों के दरमियाँ होती हैं, कमाल की कैमिस्ट्री।

सेटिंग चाहे मोबाइल की हो, या फिर दिल की
दोस्तों ने तो इन पर, पूरी पीएचडी हासिल की।

हुस्न देखकर ये फँस जाते हैं, रोज उसकी गली तक जाते हैं
दोस्ती के बिना दोस्तों, ये ज़िंदगी के सफ़र में भटक जाते हैं।

यारों दा ठिकाना कोई, न कोई घरबार होता हैं
यारों के साथ तो, हर लम्हा ही यादगार होता हैं।

मुसीबत हो या मोहब्बत, या हो कोई फड्डा
हर थड़ी पे होता हैं, साड्डे यारों दा अड्डा।

घरवाले जब इन्हें डाँटते हैं, बुरा नहीं ये मानते हैं
दोस्त लोग तो हमेशा, दोस्तों में खुशियाँ बाँटते हैं।

ज़िंदगी ने एक रोज जब, मुझसे मेरी खुशियों का राज़ पूछ लिया
मुस्कुराकर मैंने भी, अपने दिल के काग़ज़ पर दोस्ती लिख दिया।।

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“इस दुनिया से अलग एक दुनिया है मेरी”

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इस दुनिया से अलग
एक दुनिया है मेरी।

जब भी डर लगता है
वहाँ चला जाता हूं।

वहाँ डर नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ घर नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ अपने नहीं हैं, सिर्फ खुशी है
वहाँ सपने नहीं हैं, सिर्फ खुशी है।

वहाँ मक़सद नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ हसरत नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ दीवारें नहीं हैं, सिर्फ खुशी है
वहाँ किनारे नहीं हैं, सिर्फ खुशी है।

वहाँ होड़ नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ दौड़ नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ तड़पना नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ तरसना नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ उम्मीद नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ ईद नहीं है, फिर भी खुशी है।

वहाँ हँसी है, सिर्फ हँसी है
वहाँ खुशी है, सिर्फ खुशी है।।

“ऊपर बैठा है मदारी, और जमूरा है नीचे”

ऊपर बैठा है मदारी, और जमूरा है नीचे
तू आगे-आगे, तेरी परछाई पीछे -पीछे।
 
कुछ भी कर ले चाहे तू, मगर होनी तो एक दिन होकर रहेगी
सुन बस अपने दिल की तू, हालाँकि दुनिया तुझे जोकर कहेगी।
 
सबसे निकम्मा चेला तू, और सबसे बड़ी गुरु ज़िन्दगी
जिस पल भी तू गिरता है, वहीँ से असल शुरू ज़िन्दगी।
 
काल का यह डमरू, सब को अपनी ताल पर नचाये
हर प्राणी के लिए यहाँ, नाना प्रकार के खेल रचाये।
 
जैसी करनी वैसी भरनी, बहुत सुना और बहुत देखा
न्याय तो केवल वो करे, उसके पास है सब का लेखा।
 
न किसी का मज़ाक उड़ाओ, न किसी का दिल दुखाओ
न किसी का तलाक़ कराओ, न किसी का घर जलाओ।
 
सब कुछ उसके सामने है, सब कुछ उसकी मर्ज़ी से है
सबसे अक़्लमंद है फिर भी, कर्म इंसान के फर्जी से है।
 
ऊपर बैठा है उस्ताद, और शागिर्द है नीचे
तू आगे-आगे, तेरी तक़दीर पीछे -पीछे।।

“कोई और बनकर जी रहा है तू”

यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू
यह पता है तुझे, फिर भी सह रहा है तू
यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू।

एक अर्से से मुकद्दर, अजीब खेल खेलता आया है
तू ही तुझ में ना रहा, अब तो कोई और नुमायाँ है।

अपनों के लिए क्यों अपने आप को भूल रहा है
किस्मत और कोशिश के दरमियान झूल रहा है।

सब पता है तुझे, कि तू किस चीज के लिए बना है
मासूम मोहब्बत के उस, गाढ़े लाल ख़ून में सना है।

सब तो खुशियां मना रहे हैं, पर तू खुश नहीं है
सब तो हासिल है लेकिन, तू खुद, खुद नहीं है।

यह कैसी तलब है, जो कभी खत्म ही नहीं होती
यह कैसी तड़प है, जो कभी भस्म ही नहीं होती।

जब-जब तू आगे बढ़ा, खींचकर यह ज़िन्दगी पीछे ले आई
जब-जब तू ऊपर चढ़ा, घसीटकर यह फिर नीचे ले आई।

यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू
खुद में ही अजनबी की तरह रह रहा है तू
यक़ीनन कोई और बनकर जी रहा है तू।।

-RockShayar

“लफ़्ज़ों में नुमायां दर्द को हाल-ए-दिल न समझना”

लफ़्ज़ों में नुमायां दर्द को हाल-ए-दिल न समझना
ज़िन्दगी के काग़ज़ पर खुशी लिखना सीख चुके है

हालाँकि वक़्त बहुत लगा है, इस फ़न को पाने में
और एक उम्र गुज़र गयी है, खुद को आज़माने में

पहले हम हैरान होते थे, अब वो हैरान होते हैं
देखकर यह तलब अब, लफ़्ज़ परेशान होते हैं

ख़्वाब सब महताब हुए, ख़्वाहिशों ने लिखे हैं ख़त
रूह को भी आजकल इन सबकी, लग गयी है लत

हयात के तन्हा सफ़र में, साथ चली हरघड़ी क़लम
इंसानी रिश्तों से परे, कुछ ख़ास है यह मेरी क़लम

कहीं भी, कभी भी, कुछ भी, कैसा भी हो लिखना
ख़याल मज़बूत हो वो, याद बस इतना ही रखना

हद न हो जिसकी कोई, उस मुकाम तक पहुँचना है
बाज़ार की ज़ीनत और तकब्बुर से हमेशा बचना है

नज़्मों में बयां दर्द को हाल-ए-दिल न समझना
ज़िन्दगी के हाथ पर खुशी लिखना सीख चुके है।

@RockShayar

“वो यार”

एक एक करके वो, यार सब चले गए
बीच सफ़र में कुछ यार अब मिले नए

अपने अपने दौर में सबने अपना साथ दिया
बिखरा मैं जब कभी तो सबने अपना हाथ दिया

किसी ने नखरे झेले मेरे, तो किसी ने झेली नादानी
यारों के संग बीते लम्हों की, है बस इतनी सी कहानी

शिकायतें हो वो कितनी भी, ना हुई नाराज़गी कभी
देखकर हाँ बेरुख़ी मेरी, ना हुई उन्हें हैरानगी कभी

हो चाय की वहीं वाली थड़ी, या हो ग़मों की झड़ी
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर, साथ है अपने यारी खड़ी

दर्द के वो सख़्त पल, या हो खुशी के हसीं लम्हें
गुज़र गया पर आज भी, याद आते हैं वहीं लम्हें

अपनी अपनी ज़िन्दगियों में, हैं सब मशगूल अब
रूठना मनाना मस्ती तकरार, हैं सब मक़्बूल अब

धीरे धीरे फिर, यार वो सब चले गए
बीच सफ़र में कुछ यार अब मिले नए ।।

“आज मैंने, ये जाना है”

Today I am very happy.
I have donated blood for the first time.
It’s a beautiful feeling to save a life.
I wrote a poem to express my feelings……

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लहू के चंद कतरे देकर
आज मैंने, ये जाना है
इंसानियत से बढ़कर कुछ नहीं
आज मैंने, ये माना है
बह जाता है अक्सर जो
झगड़े फसाद में हर रोज
बचा सके गर ज़िन्दगी वो
इससे बेहतर और क्यां है
ख़ुदग़र्ज़ियों में जीते जीते
ख़ामोशियों को पीते पीते
खूं की वो उम्दा अहमियत
रूह की वो ज़िंदा कैफ़ियत
रिश्तों से बड़ी है इंसानियत
आज मैंने, ये जाना है

© RockShayar

“थम सी गई है, ज़िन्दगी क्यूँ आजकल”

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थम सी गई है
ज़िन्दगी क्यूँ आजकल
मुस्कुराना गर ये चाहे तो
परमिशन लेनी पड़ती है
सोच के बेतरतीब पुर्ज़ों से
उड़ते रहते है, अक्सर जो
ख़्यालों के बोझिल दायरे में
हर दफ़ा ना सुनकर
मायूस हो जाती है ये
ख़ामोश सी
यूँ, गुमसुम रहती है आजकल
शायद
इसी से, कोई राह निकल आये नई
फिर से, सफ़र की चाह निकल आये नई
थम सी गई है
ज़िन्दगी क्यूँ आजकल

© RockShayar

“जी भर के जी ले”

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जी भर के जी ले यारा
छोटी सी हैं ज़िंदगानी
ना कुछ संग लाया तू
ना कुछ संग जाना तेरे
मिटटी से बना ये जिस्म
मिटटी में मिल जायेगा आखिर
तो छोड़ फिर सब फ़िक्र-ओ-ग़म
पीले जुनूं का प्याला भरकर
खुशियों से रूह तर कर ले
वक़्त फिसलता जा रहा हैं
हर लम्हा तू खुलकर जी ले
इससे पहले के दम निकले  
यारा तू बस..जी भर के जी ले

“जाने कब आयेंगे अच्छे दिन”

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जाने कब आयेंगे अच्छे दिन
हर शख्स के मन में आजकल
उठता हैं बस यही सवाल
आसमां छूती महंगाई
कमर तोड़ रही हैं
एक झटके में नही
हर रोज किश्तों में
दो वक्त की रोटी के लिए
हर आदमी यहाँ दौङ रहा हैं
धूप हो या छाँव
तन को जला रहा हैं
कोई मेहनत करके पसीना बहाता हैं
और कोई मजहब के नाम पर लहू
कहीं भी ईमान की परछाई नही दिखती
भूख से बैचेन वो बच्चा
बैंठा हैं जो फुटपाथ पर
पूँछता हैं बस यही सवाल
जाने कब आयेंगे अच्छे दिन
ऊँची डिग्रीया लेकर भी
बेरोजगार हैं सब नौजवान
नौकरी की तलाश में
मारे मारे यूँ भटक रहे हैं
कहीं भी सच्चाई को पनाह नही मिलती
कुछ ने ख्वाबों का गला घोंट दिया
और कुछ ने ज़मीर ही बैच दिया
निराशा से कुंठित वो युवक
खड़ा हैं जो कतार में
पूँछता हैं बस यही सवाल
जाने कब आयेंगे अच्छे दिन
बारिश के इंतज़ार में
आँखें पड़ गयी हैं पीली
बंजर हो गए सारे खेत
कहीं भी उम्मीद की किरण नहीं दिखती
किसी ने फिर शहर का रूख अपनाया
और किसी ने मौत को गले लगाया
बेबसी से लाचार वो किसान
डूबा हैं जो क़र्ज़ में
पूँछता हैं बस यही सवाल
जाने कब आयेंगे अच्छे दिन
जाने कब आयेंगे अच्छे दिन

*** इरफ़ान “मिर्ज़ा” ***

“ऐ दिल, तू क्यूँ मायूस रहता हैं”

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ऐ दिल, तू क्यूँ मायूस रहता हैं 
जिन्दगी को गले लगाकर ही यहाँ
मिलेगा तुझे एक नया रास्ता 
ले जायेगा जो अपने जहां में 
हर ख्वाहिश जहाँ पूरी होगी तेरी
उम्मीदों को इक नई रोशनी मिलेगी
वहीं रोशनी, जिसकी तलाश में
तू दर बदर भटकता रहा हैं
तेरी हर कोशिश गवाह हैं
उस वक्त की
जब तू गिरता रहा
उठता रहा
सम्भलता रहा
और खुद को यूँ
हौंसला देता रहा
ऐ दिल, तू क्यूँ बैचेन रहता हैं
दर्द में रूह को जलाकर ही यहाँ
होगा तुझे फिर दीदार तेरा

“मुझको जिन्दगी तेरा पता मिल जाये”

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फिरसे जीने की इक वजह मिल जाये
मुझको या रब तेरी पनाह मिल जाये

खुली हवा में साँस ले सकू जहाँ मैं
सूकून की ऐसी कोई जगह मिल जाये

अन्धेरों में क़ैद हूँ सदियों से यहाँ मैं
मुझको नूर का वोह साया मिल जाये

गुज़रे वक्त के दर्द को भुलाकर यहाँ
हयात को सच्ची इक वफ़ा मिल जाये

गुनाहो में पलता रहा हैं मेरा वज़ूद
रूह को मेरी बस नेक दुआ मिल जाये

मर्ज़ी से जी सकू हर लम्हा जहाँ मैं
ख्वाबों का ऐसा इक जहां मिल जाये

फ़क़त गुज़ारिश कर रहा यूँ ‘इरफ़ान’
मुझको जिन्दगी तेरा पता मिल जाये

“ज़िन्दगी पिघलती जा रही है”

Zindagi

ज़िन्दगी पिघलती जा रही, बर्फ कि तरह 
आओ इस पर, खुशियों कि चाशनी छिड़क दे 
कुछ खून ही बढ़ जायेगा, जरा मुस्कुराने से 
चलो इसके इशारों पे, आज हम सब थिरक दे 
चहकते हुए कई लम्हे, उड़ते फिरते है यहाँ
पकड़ो जो इनको तो, रूह को फिर यूं महका दे 
ढेरो हैरानियाँ रहती है, ज़िन्दगी के दामन में 
देखो इन्हे गौर से, जीवन के सब राज़ खोल दे 
ज़िन्दगी पिघलती जा रही, बर्फ कि तरह 
आओ इस पर, मुहब्बत का नमक छिड़क दे

“ये ज़िन्दगी”

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पढ़कर मेरे अल्फाज़, सब मिटा देती है वोह
सदां-ए-दिल को भी, अनसुनी करती है वोह

अब और कितने इम्तिहाँ, लेगी ये ज़िन्दगी
ठहर कर कुछ देर, फिर से चल देती है वोह

“अब जाकर दीदार हुआ”

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जो चेहरा बसा था ख्वाबो में, उसका यूँ तलबगार हुआ 
गुज़ारिश इक ज़िंदा है अब तक, एहसास भी बेदार हुआ 

बरसो से तलाशता रहा हूँ, उस खुशनुमा मंज़र को यहाँ
ज़िन्दगी के अनजान सफ़र में, अब जाकर दीदार हुआ