“तो तस्वीर कुछ और ही होती”

हमारा मिलना-बिछुड़ना तो तक़दीर का लिखा है
जो हम साथ रह पाते, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

सालों से तुम्हारा इंतज़ार, और उस पर दिल ये बेक़रार
गर हम एक हो जाते, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

एक दूसरे को बहुत चाहते थे, हम कमियां और ख़ूबियां जानते थे
जो जज़्बात जताते हम, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

अपने हिस्से का दर्द हमने, ना बताया कभी, ना जताया कभी
गर ग़म ना छुपाते हम, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

बिन पूछे सब जान लेना, एक दूसरे को मान देना
जो नज़रें मिला लेते हम, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

जमाने की दीवार खड़ी थी, और ज़िंदगी ज़िद पर अड़ी थी
गर बंदिशें तोड़ जाते हम, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

अफ़साना अपनी मोहब्बत का, कुछ यूँ लिखा हमने इरफ़ान
जो हम पहले मिल जाते, तो तस्वीर कुछ और ही होती।।

RockShayar.wordpress.com

Advertisements

“हम जान बूझकर जाने जाँ तुमसे हार जाते है”

किसी से नहीं बस अपने दिल से हार जाते है
हम जान बूझकर जाने जाँ तुमसे हार जाते है।

जब भी तुमको देखते है, बड़ी हसरत से देखते है
दिलबर मेरे उसी पल, दिल ये तुम पे हार जाते है।

पहले तो मिलती नहीं, मिले तो फिर हटती नहीं
हम किसी से नहीं बस तेरी नज़र से हार जाते है।

तेरी शोख़ हसीन अदायें, मेरे दिल का चैन चुराये
अपने दिल का चैन हम बड़े आराम से हार जाते है।

खुशी का क्या है, पलभर में मिले सदियों तक ना मिले
तेरी खुशी के लिये हर खुशी हम, खुशी से हार जाते है।

हारी बाज़ी जीतने की, जब भी बारी आती है
किसी से नहीं बस अपने आप से हार जाते है।

ज़िंदगी की यह जंग भी, कैसी जंग है इरफ़ान
सब कुछ जीतकर भी आखिर में हार जाते है।।

RockShayar.wordpress.com

“मैं हर रोज़ तुम पर एक ग़ज़ल लिखना चाहता हूँ”

कई दिनों से तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ
मैं हर रोज़ तुम पर एक ग़ज़ल लिखना चाहता हूँ।

हालाँकि ज्यादा वक़्त नहीं हुआ है हमें मिले हुये
मैं फिर भी तुम्हारे बारे में सब जानना चाहता हूँ।

आँखों ने आँखों को चुन लिया, ओ रे पिया मोरे पिया
आँखों से आँखों के अनकहे अल्फ़ाज़ पढ़ना चाहता हूँ।

अब और क्या सोचना, बस यही अब सोचना
मैं तुम से ज्यादा तुमको अब सोचना चाहता हूँ।

चेहरों के घने जंगल में, चेहरा तेरा नूरानी है
मैं हर चेहरे में बस तेरा, चेहरा देखना चाहता हूँ।

दिल मेरा सहम जाता है,
जब भी दूर जाने का वक़्त पास आता है
मैं दूरियों का नहीं बस तुम्हारा होना चाहता हूँ।

दिलबर मेरे, दिल की खुशबू है तू, आरज़ू है तू
मैं रोज़ तुम्हें ज़िंदगी की तरह जीना चाहता हूँ।।

RockShayar.wordpress.com

“आज़ादी क्या होती है”

उड़ते हुये परिंदों से पूछो, आज़ादी क्या होती है
शहर के बाशिंदों से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

अंधेरे में साँस घुटती है, ज़िंदगी की लौ बुझती है
कभी किसी क़ैदी से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

जब कोई गाँव मरता है, उसकी क़ब्र पर शहर बसता है
कभी किसी घर से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

चाँद के पार चले जाना, सूरज को गले से लगाना
कभी किसी सहर से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

दिल में तूफ़ान जगाये, कश्ती किनारे सब भूल जाये
कभी किसी लहर से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

रास्तों से गुज़रते हुये, खुद अपना रस्ता ढूँढ़ते हुये 
कभी किसी सफ़र से पूछो, आज़ादी क्या होती है।

हर रोज खुद से लड़ते हो, हर रोज खुद से डरते हो
कभी अपने उस डर से पूछो, आज़ादी क्या होती है।।

“तुम्हारी एक तस्वीर देखी तो दिल में ये ख़याल आया”

तुम्हारी एक तस्वीर देखी तो दिल में ये ख़याल आया
के तारीफ़ तो लाज़मी है, ये सलीक़ा ग़ज़ल ने बताया

शोख़ियों के सुर्ख़ जोड़े में सजी हुई कोई दुल्हन लगती हो
मन के मोतियों की माला पहनकर तुम तो ख़ूब जचती हो

खुद तो चैन से रहती हो, और बेचैनियाँ हमको देती हो
उनींदी आँखों में रातभर तुम ख़्वाब की तरह जगती हो

बड़ी ख़ूबसूरती से बुना गया है, तुम्हारी साँसों का ये ताना-बाना
पहली नज़र में तुम किसी शायर का ख़याल लगती हो

मेरे अलहदा अंदाज़ ने तुमको, इस क़दर दीवाना किया
कि ये अंदाज़ अच्छा लगता है मुझे, ये बार-बार कहती हो

तेरी आवाज़ के आगे हर आवाज़ बेआवाज़ हैं, क्योंकि
कानों में तुम खनकती हुई आवाज़ के झुमके पहनती हो

हुस्न की सुर्ख़ ज़री में सजी हुई कोई दुल्हन लगती हो
हया के हीरों का हार पहनकर तुम तो ख़ूब जचती हो

खुद तो सुकून से सोती हो, और रतजगे हमको देती हो
रात की आँखों में दीप जलाकर, नींद को तुम ठगती हो

पहली बार देखो, चाहे दूसरी बार, या फिर बार-बार
जब भी देखो तुम तो बस क़ुदरत का कमाल लगती हो

तुम्हारी एक तस्वीर देखी तो दिल में ये ख़याल आया
के तारीफ़ तो लाज़मी है, ये तरीका ग़ज़ल ने बताया।।

@RockShayar

“मुझको रोकने की कभी हिम्मत न करना”

मुझको रोकने की कभी हिम्मत न करना
गलती से भी टोकने की हिम्मत न करना।

दहकती आग हूँ मैं, मासूम मोम हो तुम
पास आने की कभी ज़ुर्रत न करना।

माफ़ कर देना, दिल को साफ़ कर लेना
रब से किसी की शिकायत न करना।

औरों के लिये, कोई और बनकर
खुद से कभी तुम बग़ावत न करना।

महसूस न कर पाओ जिसे खुद में तुम
उस शख़्स से कभी मोहब्बत न करना।

मौत भी तो एक मुकम्मल ज़िंदगी है
फिर ऐसी ज़िंदगी की चाहत क्या करना।

मरकर हमने तो इतना ही जाना इरफ़ान
के खुद से कभी तुम नफ़रत न करना।।

“गुच्छे की आखिरी चाबी भी कभी-कभी ताला खोल देती हैं”

गुच्छे की आखिरी चाबी भी कभी-कभी ताला खोल देती हैं
ये सच है कि निगाहें दिल की अनकही हर बात बोल देती हैं।

नज़रों की बेनज़ीर शमशीर, जब किसी पर चलती है तो
कुछ बोलने से पहले नज़रों में छुपा हर डर खोल देती हैं।

गुनगुनाते हुये गीत की तरह, मुस्कुराते हुये संगीत की तरह
इतनी गहरी है तुम्हारी आँखें कि मेरा मन टटोल लेती हैं।

वैसे तो बेज़ुबां आँखें बोलती नहीं, राज़ कभी कोई खोलती नहीं
पर हो यक़ीं जिस पर, अपना हर राज़ उसे बोल देती हैं।

पढ़ने वाली और लिखने वाली, एक ही नज़र के कई हुनर
बिना तराजू और बाट के फट से वज़्नी हर्फ़ तोल देती हैं।

पहली नज़र का वो असर, नज़रों से कभी नज़र मिलाकर तो पूछो
बिना सोचे-समझे बिना पूछे-ताछे बस हाँ बोल देती हैं।

सारी ज़िंदगी गुज़र गयी, बस यही बात नज़र आयी
कि रोते वक़्त अमूमन आँखें अपना दिल खोल देती हैं।।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

“बदलते-बदलते आखिरकार पूरी तरह बदल गयी”

बदलते-बदलते आखिरकार पूरी तरह बदल गयी
गिरते-पड़ते चलते-चलते ज़िंदगी खुद संभल गयी।

कल को आज समझ बैठे, पल में कई सदियाँ समेटे
ये उम्र भी आखिर उम्र निकली, एक रोज़ ढ़ल गयी।

पकड़ने की बहुत कोशिश की, पर नतीजा यह निकला
के ज़िंदगी की मछली वक़्त के हाथों फिसल गयी।

पता ही नहीं चला कभी, कब दिन ढ़ला कब रात हुई
चुपके-चुपके दबे पाँव, तन्हाई मुझको निगल गयी।

सुना है कि पत्थरदिल पिघलते नहीं, गलत सुना है
मरते-मरते मौत भी खुद मौत देखकर पिघल गयी।

जो चाहा वो पाया, जो सोचा वो कर दिखाया
और कुछ नहीं बस मेरी तन्हाई मुझको खल गयी।

अब भी महसूस करता हूँ, वो तपिश अपने अंदर
ऐसी आग लगाई उसने कि रूह तक जल गयी।।

@राॅकशायर⁠⁠⁠⁠

“वो हुस्न ही क्या जो सही सलामत छोड़ दे”

वो हुस्न ही क्या जो सही सलामत छोड़ दे
वो इश्क़ ही क्या जो बग़ावत करना छोड़ दे।

इंतक़ाम की हसरत, बड़ी क़ातिल और हसीन हसरत
वो नफ़रत ही क्या जो नफ़रत करना छोड़ दे।

मुहाफ़िज़ बन बैठे हैं सब मुज़रिम आजकल
वो अदालत ही क्या जो खुद अपना क़ानून तोड़ दे।

गुनाहों से सौ बार डरना, फिर भी हर बार गुनाह करना
वो शरीफ़ ही क्या जो शराफ़त का दामन छोड़ दे।

खेल-खेल में रेल चलाना, हर बात को खेल समझना
वो बचपन ही क्या जो शरारत करना छोड़ दे।

अंदर ही अंदर रहती है, सोच में कहीं बहती है
वो हसरत ही क्या जो अपनी हसरत करना छोड़ दे।

नसीब का यह अजीब पहिया, नसीब ही जाने भय्या
वो किस्मत ही क्या जो पल-पल बदलना छोड़ दे।

ज़िंदगी से मोहब्बत, क्या खाक़ मोहब्बत
वो मोहब्बत ही क्या जो हमें ज़िन्दा छोड़ दे।।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

“ज़िंदगी बहुत हसीं है अभी”

जहाँ रखी थी वहीं है अभी
ज़िंदगी बहुत हसीं है अभी।

सवाल पूछकर क्या करोगे
जवाब हमारा नहीं है अभी।

कौन हूँ मैं, क्या कर सकता हूँ
ये एहसास तुम्हे नहीं है अभी।

वक़्त रहते जी लो ज़रा
वक़्त बहुत सही है अभी।

मुलाकात में अब वो बात कहाँ
ये मुलाकात अधूरी है अभी।

तुझसे मिलकर, मैं मैं न रहा
जानाँ तू मुझमें कहीं है अभी।

क्यों मानते हो हार इरफ़ान
पूरी ज़िंदगी बाक़ी है अभी।।

@राॅकशायर

“Faded पुरानी Jeans की तरह होती हैं यादें”

किसी Faded सी पुरानी Jeans की तरह होती हैं यादें
वक़्त के Rear Mirror में खुद को देखकर रोती हैं यादें।

दिनभर सोचते-सोचते, ख़याली Work out से चूर होकर
ख़्वाबों के आगोश में सुकूनभरी Sleep सोती हैं यादें।

Pain की बरसती Rain में, धीरे-धीरे Dissolve होना है
पलकों के साथ Sometimes Soul भी भिगोती हैं यादें।

खोना और पाना, Lifetime यही Cycle चलता रहता है
Tiny-Tiny आँखों में Triple XL सपने संजोती हैं यादें।

I have never understood, किस तलाश में हूँ यहाँ मैं
Real में कहूं तो समंदर के जितना Deep डुबोती हैं यादें।

Life की यह Philosophy, लगे जो किसी Race की Trophy
कुछ पाने की खातिर Always बहुत कुछ खोती हैं यादें।

Flashback में जाकर जो, गुज़रा हुआ कल दिखाये
दिल की Film के उस Scene की तरह होती हैं यादें।।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

“लौटकर तो सिर्फ यादें आती हैं, कभी वो वक़्त नहीं”

1014167_152440558282239_589204630_n.jpg

लौटकर तो सिर्फ यादें आती हैं, कभी वो वक़्त नहीं
उसकी कही बातें याद आती हैं, अब वो शख़्स नहीं।

सिर्फ पढ़ने से ही जिसे, जग उठे वो एहसास फिर से
ज़िंदगी सब कुछ लिख देती हैं, मगर वो लफ़्ज़ नहीं।

कह गये वो शायर सयाने, इश्क़ के जो थे दीवाने
मिल जाये जो बड़ी आसानी से, असल वो इश्क़ नहीं।

शिद्दत और मेहनत, शर्त यही के दोनों साथ हो
फिर पूरी न की जा सके जो, ऐसी तो कोई शर्त नहीं।

साये की किस्मत है, सुबह से शाम चलना और ढ़लना
धूप का तिलिस्म है ये तो, साये का अपना कोई अक्स नहीं।

ज़ईफ़ जिस्म का नहीं, जवां रूह का हुस्न है मोहब्बत
देखकर जिसे खुद नैन कहे, कभी देखा ऐसा नक्श नहीं।

वक़्त की बेवक़्त ख़ामोशी का, बयान है यह तो इरफ़ान
एक वक़्त के बाद सब लौट आते हैं, मगर वो वक़्त नहीं।।

http://www.rockshayar.wordpress.com⁠⁠⁠⁠

“पहली नज़र का वो असर, अब तक याद है”

पहली नज़र का वो असर, अब तक याद है
नज़रों से नज़रों का सफ़र, अब तक याद है।

इक़रार इंकार तक़रार ऐतबार, और फिर प्यार
जज़्बातों का वो जादुई सफ़र, अब तक याद है।

ख़यालों की एक नदी, यादों के जंगल में बहती थी
एहसास की वो ऊँची लहर, अब तक याद है।

ख़्वाबों का घर लगता था, नहीं जहाँ पर डर लगता था
उम्मीदों का वो उम्दा शहर, अब तक याद है।

कई चेहरे देख लिये, सब रंग सुनहरे देख लिये
पर वो एक चेहरा शाम-ओ-सहर, अब तक याद है।

यादें हैं कि मिटती नहीं, रातें हैं कि कटती नहीं
ज़िंदगी की वो कड़ी दोपहर, अब तक याद है।

नफ़रत जिसके सामने, ज्यादा देर टिक न पाये
मोहब्बत तेरी वो इस क़दर, अब तक याद है।।

http://www.rockshayar.wordpress.com⁠⁠⁠⁠

“मैं दवा हूं, धीरे-धीरे असर करता हूं”

लहरों के दरमियाँ सफ़र करता हूं
मैं दवा हूं, धीरे-धीरे असर करता हूं।

जो कुछ कमाया है, जो कुछ पाया है
कदमों में आपके वो नज़र करता हूं।

तेरा याद आना लाज़िम है मेरे लिए
तेरी यादों के सहारे गुज़र-बसर करता हूं।

लबों से निकलकर जो आसमाँ तक जा पहुँचे
मैं दुआ हूं, तेरे दिल में घर करता हूं।

बता नहीं सकता तुझे इस क़दर करता हूं
मैं प्यार तुझसे इस क़दर करता हूं।

मेरी नज़रों में रहने वाले, ऐ मेरे हमसफ़र
तेरा इंतज़ार मैं हरपहर करता हूं।

चाहे तू मुझको सज़ा दे, चाहे तू अपना बना ले
कदमों में हाज़िर अपना ये सर करता हूं।।

rockshayar.wordpress.com⁠⁠⁠⁠

“शर्त यही थी के कोई शर्त न हो”

 

शर्त यही थी के कोई शर्त न हो
रुख़्सत के वक़्त कोई दर्द न हो।

सहेजकर रखी है जिसे दिल में
उस तस्वीर पर कोई गर्द न हो।

नफ़रत की ज़हरीली आँधी में
सब्ज़ पत्तों का रंग ज़र्द न हो।

बड़ा तड़पाता है, बड़ा सताता है
दर्द का मौसम कभी सर्द न हो।

तसव्वुर में तकब्बुर आ जाता है
जज़्बाती जब कोई फ़र्द न हो।

न जीने दे, न मरने दे
ज़िंदगी इतनी भी बेदर्द न हो।

दिल को बहुत बुरा लगता है
हमदर्द ही जब हमदर्द न हो।।

“हमने ख़ुद को ज़ुबान दी है”

हमने ख़ुद को ज़ुबान दी है
अपने लिए ख़ुद जान दी है।

ज्योंही पैर डगमगाने लगे
बन्दूक सिर पर तान दी है।

दो गज ज़मीन के अलावा
अपनी पूरी ज़मीन दान दी है।

गिरवी ख़्वाब छुड़ाने की ख़ातिर
खेत मकान और दुकान दी है।

ज्यादा कुछ नहीं बस अपनी
आन बान और शान दी है।

जिसने भी दिल की सुनी है
दिल ने उसे ज़ुबान दी है।

शहीदों को सलाम करो इरफ़ान
देश के लिए इन्होने जान दी है।।

“गुज़रता नहीं ये लम्हा जाने कैसा लम्हा है”

ज़ेहन के हर हिस्से पर उसका ही कब्ज़ा है
गुज़रता नहीं ये लम्हा जाने कैसा लम्हा है।

चलता ही चला जाता है, मंज़िलों के पार
ठहरता नहीं ये रस्ता जाने कैसा रस्ता है।

बेजान पड़ा रहता है, अपनी ज़िद पर अड़ा रहता है
धड़कता नहीं ये हिस्सा जाने कैसा हिस्सा है।

जिस्म की तपिश में भी रूह को पहनता है
पिघलता नहीं ये नुत्फ़ा जाने कैसा नुत्फ़ा है।

जो पैदा हुआ है, उसे मरना है एक रोज
बदलता नहीं ये नुस्ख़ा जाने कैसा नुस्ख़ा है।

मुद्दे की बात करे तो आज़ादी एक मुद्दा है
उछलता नहीं ये मुद्दा जाने कैसा मुद्दा है।

मछली की तरह बार-बार फिसल जाता है
ठहरता नहीं ये लम्हा जाने कैसा लम्हा है।।