“पहली नज़र का वो असर, अब तक याद है”

पहली नज़र का वो असर, अब तक याद है
नज़रों से नज़रों का सफ़र, अब तक याद है।

इक़रार इंकार तक़रार ऐतबार, और फिर प्यार
जज़्बातों का वो जादुई सफ़र, अब तक याद है।

ख़यालों की एक नदी, यादों के जंगल में बहती थी
एहसास की वो ऊँची लहर, अब तक याद है।

ख़्वाबों का घर लगता था, नहीं जहाँ पर डर लगता था
उम्मीदों का वो उम्दा शहर, अब तक याद है।

कई चेहरे देख लिये, सब रंग सुनहरे देख लिये
पर वो एक चेहरा शाम-ओ-सहर, अब तक याद है।

यादें हैं कि मिटती नहीं, रातें हैं कि कटती नहीं
ज़िंदगी की वो कड़ी दोपहर, अब तक याद है।

नफ़रत जिसके सामने, ज्यादा देर टिक न पाये
मोहब्बत तेरी वो इस क़दर, अब तक याद है।।

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“मैं दवा हूं, धीरे-धीरे असर करता हूं”

लहरों के दरमियाँ सफ़र करता हूं
मैं दवा हूं, धीरे-धीरे असर करता हूं।

जो कुछ कमाया है, जो कुछ पाया है
कदमों में आपके वो नज़र करता हूं।

तेरा याद आना लाज़िम है मेरे लिए
तेरी यादों के सहारे गुज़र-बसर करता हूं।

लबों से निकलकर जो आसमाँ तक जा पहुँचे
मैं दुआ हूं, तेरे दिल में घर करता हूं।

बता नहीं सकता तुझे इस क़दर करता हूं
मैं प्यार तुझसे इस क़दर करता हूं।

मेरी नज़रों में रहने वाले, ऐ मेरे हमसफ़र
तेरा इंतज़ार मैं हरपहर करता हूं।

चाहे तू मुझको सज़ा दे, चाहे तू अपना बना ले
कदमों में हाज़िर अपना ये सर करता हूं।।

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“शर्त यही थी के कोई शर्त न हो”

 

शर्त यही थी के कोई शर्त न हो
रुख़्सत के वक़्त कोई दर्द न हो।

सहेजकर रखी है जिसे दिल में
उस तस्वीर पर कोई गर्द न हो।

नफ़रत की ज़हरीली आँधी में
सब्ज़ पत्तों का रंग ज़र्द न हो।

बड़ा तड़पाता है, बड़ा सताता है
दर्द का मौसम कभी सर्द न हो।

तसव्वुर में तकब्बुर आ जाता है
जज़्बाती जब कोई फ़र्द न हो।

न जीने दे, न मरने दे
ज़िंदगी इतनी भी बेदर्द न हो।

दिल को बहुत बुरा लगता है
हमदर्द ही जब हमदर्द न हो।।

“हमने ख़ुद को ज़ुबान दी है”

हमने ख़ुद को ज़ुबान दी है
अपने लिए ख़ुद जान दी है।

ज्योंही पैर डगमगाने लगे
बन्दूक सिर पर तान दी है।

दो गज ज़मीन के अलावा
अपनी पूरी ज़मीन दान दी है।

गिरवी ख़्वाब छुड़ाने की ख़ातिर
खेत मकान और दुकान दी है।

ज्यादा कुछ नहीं बस अपनी
आन बान और शान दी है।

जिसने भी दिल की सुनी है
दिल ने उसे ज़ुबान दी है।

शहीदों को सलाम करो इरफ़ान
देश के लिए इन्होने जान दी है।।

“गुज़रता नहीं ये लम्हा जाने कैसा लम्हा है”

ज़ेहन के हर हिस्से पर उसका ही कब्ज़ा है
गुज़रता नहीं ये लम्हा जाने कैसा लम्हा है।

चलता ही चला जाता है, मंज़िलों के पार
ठहरता नहीं ये रस्ता जाने कैसा रस्ता है।

बेजान पड़ा रहता है, अपनी ज़िद पर अड़ा रहता है
धड़कता नहीं ये हिस्सा जाने कैसा हिस्सा है।

जिस्म की तपिश में भी रूह को पहनता है
पिघलता नहीं ये नुत्फ़ा जाने कैसा नुत्फ़ा है।

जो पैदा हुआ है, उसे मरना है एक रोज
बदलता नहीं ये नुस्ख़ा जाने कैसा नुस्ख़ा है।

मुद्दे की बात करे तो आज़ादी एक मुद्दा है
उछलता नहीं ये मुद्दा जाने कैसा मुद्दा है।

मछली की तरह बार-बार फिसल जाता है
ठहरता नहीं ये लम्हा जाने कैसा लम्हा है।।