“Henna (मेंहदी/हिना)”

खुद को मिटाकर हमेशा दूसरों को खुशियाँ देती है
हिना तो हर महफ़िल को दिल के रंग में रंग देती है।

हिना की क़िस्मत है पिसना
हिना की फ़ितरत है रंगना
हिना की हसरत है खिलना
हिना की क़ुदरत है रचना।

हिना की कहानी भी कितनी बेमानी है 
ये जितना पिसती है उतना निखरती है।

दुल्हन के हाथों में लगने वाली मेंहदी भी यही है
हर औरत की ज़ेबोज़ीनत संवारती भी यही है।

बिना इसके ना कोई शगुन है
ना कोई फागुन
बिना इसके ना कोई मिलन है
ना कोई साजन।

मेंहदी लगे हाथों को खुद पर नाज़ होता है 
मेंहदी रचे हाथों में रुमानी एहसास होता है।

अपने अरमान दबाकर दिल में अरमान जगाती है
हिना तो पिसते-पिसते खुशी से लाल हो जाती है।

हिना का नसीब है पिसना
हिना को हबीब है जचना
हिना की तक़्दीर है रंगना
हिना को अज़ीज़ है रचना।

हिना की कहानी भी कितनी बेमानी है 
ये जितना पिसती है उतना निखरती है।

हिना की तासीर बहुत ही ठंडी होती है
जलन और तपिश को ये दूर कर देती है।

सब्ज़ पत्तियों की तरह, हिना के जज़्बात भी सब्ज़ होते हैं
हिना पर कोई कैसे लिखे, लिखने को लफ़्ज़ नहीं होते हैं।।

#RockShayar

हिना – मेंहदी
ज़ेबोज़ीनत – Beauty 
रुमानी – Romantic
हबीब/अज़ीज़ – Dear 
तासीर – Nature
सब्ज़ – Green
जज़्बात – Emotions
लफ़्ज़ – Word

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“जिस रिश्ते में यकीन न हो वो रिश्ता हमने तोड़ दिया है”

परवाह करना छोड़ दिया है
अपने हाल पर उन्हें छोड़ दिया है।

जिस रिश्ते में यकीन न हो
वो रिश्ता हमने तोड़ दिया है।

पथरीली राहों पर चलते-चलते
ज़िंदगी को नया मोड़ दिया है।

वक़्त ने मरहम लगा लगाकर
दिल को फिर से जोड़ दिया है।

नहीं भूले उस हादसे को अब तक
रूह को जिसने निचोड़ दिया है।

नफ़रत के काबिल है वो तो 
यक़ीन को जिसने तोड़ दिया है।

मेरे सवालों का जवाब दे ऐ ज़िंदगी
तूने मुझे अधमरा क्यों छोड़ दिया है।।

“वक़्त”

लोगों से सुना था कि वक़्त बदलता है
पर वक़्त ने बताया कि लोग बदलते हैं।

बदलते-बदलते आखिरकार, वो इतना बदल जाते हैं
के खुद पहचान ना सके खुद को, इतना बदल जाते हैं।

वक़्त पर तोहमत लगायी जाती है बदलने की
वक़्त को तो आदत है, हरवक़्त बस चलने की।

चलते-चलते आखिरकार, वक़्त इतना तेज़ चलता है
के वक़्त को भी सोचने का, फिर वक़्त नहीं मिलता है।

वक़्त पर इल्ज़ाम लगाया जाता है, गुज़र जाने का
वक़्त को कहाँ वक़्त है, अपने रंज़ो ग़म सुनाने का।

गुज़रते-गुज़रते आखिर में, वक़्त इतना बूढ़ा हो जाता है
के खुद वक़्त के पास फिर ज्यादा वक़्त नहीं रह पाता है।

वक़्त पर तंज कसा जाता है, हमेशा कम होने का
वक़्त को कहाँ वक़्त मिलता है, ज़रा भी सोने का।

सोते-सोते आखिरकार, ये गहरी नींद में चला जाता है
के जहाँ से ना आये कोई दोबारा, ये वहाँ चला जाता है।

लोगों से सुना था कि वक़्त बदलता है
पर वक़्त ने बताया कि लोग बदलते हैं।

बदलते-बदलते आखिरकार, वो इतना बदल जाते हैं
के कोई पहचान ना सके उनको, इतना बदल जाते हैं।।

#RockShayar⁠⁠⁠⁠

“वो तो लौटकर फिर एक बार दोबारा वहीँ आना चाहते थे”

वो तो लौटकर फिर एक बार दोबारा वहीँ आना चाहते थे
मगर हम थे के फिर एक बार धोखा नहीं खाना चाहते थे

उसकी हर इक याद को, हमें मिटाने में बहुत वक़्त लगा
बहुत मुश्किल था वो दौर, जब हम नहीं जीना चाहते थे

अँधेरे ने इस क़दर जकड़ लिया था, के गिरफ़्त में पकड़ लिया था
अपने आस-पास ज़रा भी उजाला नहीं देखना चाहते थे

किसी अपने ने जब सपने तोड़े, मुश्किल से जो थे बस थोड़े
अपनी मर्ज़ी से तो हम कोई रिश्ता नहीं तोड़ना चाहते थे

ज़ख्म अपने हम छुपाते गये, खुद मरहम उन पर लगाते गये
अपनी वजह से कभी किसी को तकलीफ़ नहीं देना चाहते थे

मालूम नहीं एक रोज़ क्या हुआ था, मगर कुछ तो हुआ था
बस जो हुआ था उस पर कभी यक़ीन नहीं करना चाहते थे

सब कहते थे अच्छा लिखते हो, तुम बहुत सच्चा लिखते हो
हमने सब लिखा, बस अपनी कहानी नहीं लिखना चाहते थे

उसने तो बहुत कोशिश की, एक अर्से तक ‘इरफ़ान’
मगर हम थे के फिर एक बार दिल अपना नहीं तोड़ना चाहते थे।

#RockShayar

“कश्मीर”

ख़ुदा ने जिस कश्मीर को जन्नत जैसा खूबसूरत बनाया
इंसान ने उसी कश्मीर को आज दोज़ख जैसा बना दिया।

एक अर्से से वादी में आज़ादी का खेल चल रहा है
कई बरसों से नफ़रत की आग में दिल जल रहा है।

ज़िहाद के नाम पर फ़साद करने वालों सुनो ज़रा
खुद अपने ही घरों को तुमने अपने हाथों जलाया।

जिन लोगों पर पागल होकर पत्थर फेंक रहे हो तुम
जब बाढ़ आई तब इन्हीं लोगों ने था तुमको बचाया।

सियासत के नाम पर हर जगह जो तिजारत हो रही हैं
मादर-ए-वतन से आज क्यों इतनी बग़ावत हो रही हैं।

नेता तो यही चाहते हैं ये बर्बादी यूँही चलती रहे
दहशतगर्दी के साये में यह वादी यूँही जलती रहे।

मज़हब के ठेकेदारों ने ख़ूब मोर्चा संभाल रखा है
मासूमियत के दिल में हैवानियत को पाल रखा है।

खिलौनों की जगह हाथों में बंदूक थमा दी जाती हैं
ज़ेहन में ज़हर भरकर मौत मंज़ूर करा ली जाती हैं।

अब तो ये पहाड़ भी कुछ बोलते नहीं
ख़ून के दाग़ धब्बे खुद पर टटोलते नहीं।

अब तो ये नदियाँ भी कुछ कहती नहीं
बहता ख़ून देखकर बहना बंद करती नहीं।

अब तो ये धुंध भी ज्यादा देर रुकती नहीं
सूरज की रौशनी से आजकल डरती नहीं।

अब तो झील पर शिकारे भी ख़ामोश चलते हैं
पानी पर चलते हैं, फिर भी जाने क्यों जलते हैं।

कोई कुछ नहीं बोलता अब, सबने जीना सीख लिया हैं
झूठी आज़ादी के लिये, समझौता करना सीख लिया हैं।

सब समझ चुके हैं यहाँ, जिसने भी अपना मुँह खोला
पहना दिया जाता हैं उसे, उसी पल फांसी का चोला।

ख़ुदा ने जिस कश्मीर को जन्नत जैसा हसीन बनाया
इंसान ने उसी कश्मीर को आज जहन्नुम बना दिया।

मुद्दत से वादी में आज़ादी का खेल चल रहा है
शिद्दत से नफ़रत की आग में दिल जल रहा है।

अफ़सोस, के अब तक कोई न समझ सका इस दर्द को
अफ़सोस, के अब तक कोई न पकड़ सका इस मर्ज़ को।

अपनी बदहाली पर कई बरसों से रो रहा है कश्मीर
अपने गुनाहों का बोझ सदियों से ढ़ो रहा है कश्मीर।।

@राॅकशायर⁠⁠⁠⁠

“जो आज तेरी हँसी उड़ा रही है, वही दुनिया कल तुझे सलाम करेगी”

अकेला चना भी अब भाड़ फोड़ेगा, और एक हाथ से ताली भी बजेगी।
जो आज तेरी हँसी उड़ा रही है, वही दुनिया कल तुझे सलाम करेगी।

जो भी है यहाँ, सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं
दिल के अँधेरे कोनों में, छुपे हुए ये तिलचट्टे हैं।

एक तीर से दो-दो नहीं, दस-दस तू शिकार कर
क़लम का सिपाही है, सो क़लम से ही वार कर।

आठों पहर चौंसठ घड़ी, माशूक़ मौत तेरे सर पर खड़ी
इधर कुआँ उधर खाई, क्योंकि ज़िन्दगी ज़िद पर अड़ी।

छाती पर जो तूने पत्थर रखे हैं, वही तो तेरे यार सगे हैं
तन्हाई की शिद्दत में अक्सर, सोये हुए अरमान जगे हैं।

घाट-घाट का पानी पिया है, हरेक लम्हा सदी सा जिया है
अपने दिल का हर फैसला तूने, ज़िन्दगी के नाम किया है।

कान का बहुत कच्चा है तू, मासूम अब भी बच्चा है तू
जमाना चाहे कुछ भी कहे, पर इंसान बहुत सच्चा है तू।

लोहे के चने भी चबाएगा, और पानी में आग भी लगाएगा
पहचान कर सके खुद अपनी, इसलिए करके भी बताएगाा।।

“लफ़्ज़ों में नुमायां दर्द को हाल-ए-दिल न समझना”

लफ़्ज़ों में नुमायां दर्द को हाल-ए-दिल न समझना
ज़िन्दगी के काग़ज़ पर खुशी लिखना सीख चुके है

हालाँकि वक़्त बहुत लगा है, इस फ़न को पाने में
और एक उम्र गुज़र गयी है, खुद को आज़माने में

पहले हम हैरान होते थे, अब वो हैरान होते हैं
देखकर यह तलब अब, लफ़्ज़ परेशान होते हैं

ख़्वाब सब महताब हुए, ख़्वाहिशों ने लिखे हैं ख़त
रूह को भी आजकल इन सबकी, लग गयी है लत

हयात के तन्हा सफ़र में, साथ चली हरघड़ी क़लम
इंसानी रिश्तों से परे, कुछ ख़ास है यह मेरी क़लम

कहीं भी, कभी भी, कुछ भी, कैसा भी हो लिखना
ख़याल मज़बूत हो वो, याद बस इतना ही रखना

हद न हो जिसकी कोई, उस मुकाम तक पहुँचना है
बाज़ार की ज़ीनत और तकब्बुर से हमेशा बचना है

नज़्मों में बयां दर्द को हाल-ए-दिल न समझना
ज़िन्दगी के हाथ पर खुशी लिखना सीख चुके है।

@RockShayar

“पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, ये देखो किस्मत का खेल”

पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, ये देखो किस्मत का खेल
एमबीए करे चाकरी, और मालिक है दसवीं फेल

घोर कलियुग है भय्या आप ही बताओ कहाँ जाये
कौआ चुगे हैं मोती आजकल, और हंस दाना खाये

बचपन से ही सपनों के ऊँचे झाड़ पर चढ़ा दिया
पढ़ाई पूरी हुई तो, नौकरी के नाम पर ठेंगा दिया

एक पोस्ट के लिए फिर, मचती है तगड़ी मारामारी
एक दूसरे को देख देखकर, डरती है ये भीड़ सारी

जहाँ देखो इंजीनियर ही इंजीनियर नज़र आते हैं
पहले लाखों खर्च करते हैं, बाद में वो पछताते हैं

कोई सपनों का गला घोंट रहा है, तो कोई खुद का
यहीं एकमात्र सच है, इस सोशल मीडिया युग का

ज़िन्दगी से ज्यादा हमें, सरकारी नौकरी प्यारी है
बिना इसके तो जीना, हाँ एक लम्हा भी दुश्वारी है

पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, ये देखो किस्मत का खेल
पीएचडी बने क्लर्क, और मंत्रीजी है दसवीं फेल ।

@RockShayar

“एक कोशिश”

बिखरे हुए परिवार को फिर से जोड़ना चाहता हूँ
मैं नफ़रत की दीवारों को अब तोड़ना चाहता हूँ

घर में सबसे छोटा हूँ, पर इरादे हैं मेरे मुझ से बड़े
औरों का तो पता नहीं पर खुद से किए हैं वादे बड़े

गुटबाजी होती है कहीं भी तो अकेला पड़ जाता हूँ
बेवजह तो यूँही नहीं अपनी ज़िद पर अड़ जाता हूँ

हर एक शख़्स यहाँ गलतफहमियों का शिकार है
बनावट और फ़रेब के उसूलों का फरमाबरदार है

ओहदा और रुतबा देखकर ही क्यूँ सब बर्ताव करते हैं
दिखावे के बाज़ार में जज़्बातों का मोलभाव करते हैं

एक हादसे की वजह से, बस थोड़ा भटक गया हूँ
खुद ही खुद का हौसला बढ़ाते बढ़ाते थक गया हूँ

वक़्त रहते अगर सब समझ जाएं, तो अच्छा ही होगा
नहीं तो बाद में तो सिर्फ पछतावा, और अफसोस ही होगा

रिश्तों के कच्चे धागों को फिर से जोड़ना चाहता हूँ
मैं नफ़रत की दीवारों को अब तोड़ना चाहता हूँ ।।

– Sipu

“खिल उठे बचपन फिर से: एक कोशिश”

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My little poetic feel for the Team Pallavan: Blooming Lives

“A Small Donation For a Big Smile”.

गरीबी की मार ने, बस्ता छुड़ा दिया
पेट की आग ने, बचपन जला दिया
वक़्त की मार, खिलौनों पर ऐसी पड़ी
कि, हाथ में कारखानों का औज़ार थमा दिया

वैश्विक दौर में शिक्षा, बन गई बस व्यापार
अशिक्षा से ना रहा, समाज का कोई सरोकार
विलासिता की होड़ ने, अलगाव ही बढ़ाया
मनुष्य को सदैव यहाँ, मनुष्य से लड़वाया

इल्म ही से बनता है, मुकम्मल इंसान यहाँ
कर पाये जो खुद, सही गलत की पहचान यहाँ
तहज़ीब के दरख़्त का, है ये मीठा फल
तालीम ही है सदा, हर समस्या का हल

तो आओं करे, एक कोशिश दिल से
दे सके, कुछ योगदान जो ख़ुशी से
ताकि, ना रहे कोई महरूम शिक्षा से
और, खिल उठे बचपन फिर से

© RockShayar

सरोकार – वास्ता
इल्म – ज्ञान
मुकम्मल – सम्पूर्ण
तहज़ीब – सभ्यता
दरख़्त – पेड़
तालीम – शिक्षा
महरूम – वंचित

“बातिल”

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बारूद के ढेर पर सज रही इक महफ़िल
सरताज़ बनकर जहाँ बैठा अब बातिल

शक़्ल-ओ-सूरत इन्सां सी लगे मगर
ईमान से कबका हो चुका वो ग़ाफ़िल

ताउम्र बस नफ़रत के शोले भड़काए
रहनुमा नहीं वो कोई, हैं इक बुज़दिल

ज़हन में भरा जिसने मज़हबी फ़ुतूर
वो ज़ाहिल अब कहलाता हैं फ़ाज़िल

सुन कभी मासूम ज़िंदगी की पुकार
मत हो गुनाहों के दलदल में शामिल

अब भी गर ना समझें आदमज़ाद तो
ख़ुदा का क़हर ही होगा यहाँ नाज़िल

“फितरत-ए-इन्सां”

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Dedicated to the victims of Gaza Strip Conflict which included mostly children and women…
COME LIGHT, LIGHT OF GOD, GIVE LIGHT TO CREATION
ENLIGHTEN OUR HEARTS AND REMAIN WITH YOUR WORLD

तौबा करके फिर वो गुनाह करता हैं
ज़िन्दगी को बस यूँही फ़ना करता हैं

सियाह आमालों पर पर्दा डालकर
नेकियों की तक़रीर सुना करता हैं

नफ़्स की वहशत में अँधा होकर
कायनात के मन्ज़र तबाह करता हैं

मज़हब के तराज़ू में ना तोलो इसे
शैतान क्यां कभी फ़लाह करता हैं

ताउम्र नफ़रत का सौदागर रहा वो
दहशतगर्द मगफ़िरत की दुआ करता हैं

क़यामत की घड़ी नज़दीक हैं इरफ़ान
इन्सां अब इन्सां को ज़िबह करता हैं

(c) RockShayar

तौबा – Regret फ़ना – Destroy
सियाह – Dark आमाल – Doing
तक़रीर – Speech नफ़्स – Sense
वहशत – Wildness कायनात – Universe
मन्ज़र – Scene फ़लाह – Virtue
दहशतगर्द – Terrorist मगफ़िरत – Forgiveness
क़यामत – Day of Judgement
ज़िबह – Murder

“आखिर कब तक हम यूँही ज़ुल्म सहते रहेंगे”

Dedicate to those who lost their lives in terrorist attacks, war… and those they left behind…………my little poetic effort for humanity, peace, happiness………. “The flame that burns the shiniest is the light of the eternal human spirit; a beacon of love, justice and peace that will never be extinguished. It will triumph over the forces of darkness and illuminate for the whole world. The true path to freedom, through goodness, faith, hope and Love.”
Israeli military offensive aftermath in the Gaza Strip

जाने ये कैसी, ज़ुल्म की आंधी हैं
हर तरफ ज़मीं पर बस
लहू ही लहू नज़र आता हैं
बेगुनाहों की चींखें, दब गई हैं
अनगिनत लाशों के ढेर में कहीं
कई मासूम चिराग बुझा दिए
वहशत के तूफ़ान ने
फ़िज़ा में बस, गोलियां बरसती हैं
जख्मी हो गई हैं इंसानियत
इक दूसरे के खूं के प्यासे
हैं ये सब भेड़िये
शक्ल से तो ये भी इन्सां लगते हैं
हरकतें मगर जानवर से बदतर
अपनी दरिंदगी को अक्सर ये
मजहब का नाम दे देते हैं
मैं पूंछना चाहता हूँ उनसे
आखिर कब तक, यूँ बदनाम करते रहोगे
इस्लाम के पाक़ीज़ा उसूलो को
अपनी हैवानियत की खातिर
क्या तुम्हे ख़ुदा का, जरा भी ख़ौफ़ नही
आखिर कब तक, लोगो को गुमराह करोगे
यूँ ज़िहाद के नाम पर
क्यां तुम भूल गए हो, अल्लाह का वो पैग़ाम
कुरआन-ए-मज़ीद में, फ़रमाया हैं जिन्होंने
“अगर किसी ने एक बेगुनाह को बेवज़ह क़त्ल किया
तो गोया उसने पूरी इंसानियत को क़त्ल किया”
क्यां तुम भूल गए, सरकार-ए-मदीना की ज़िंदगी
ताउम्र इंसानियत, सच्चाई, नेकी के रहनुमा
आखिर कब तक, हक़ीक़त को यूँ झुठलाओगे
कभी तो अपने गुनाहो पर नज़र डालो
कितनी खौफ़नाक सज़ा होगी इनकी
अभी भी वक़्त हैं, सच्चे दिल से तौबा कर लो
ख़ुदा की मख्लूक़ से, मुहब्बत करना सीखों
बहुत फैला चुके हो, नफरत का ज़हर
ख़ुदा की बनायीं इस क़ायनात पर
बस, अब और नहीं
आओं, मिलकर हम सब
अमन का इक नया जहां बनाये
ज़ुल्म-ओ-दहशत के खिलाफ
एक सुर में, सब आवाज़ उठाये
ना हो, इस ज़मीं पर
अब कहीं भी कोई ख़ून ख़राबा
तब जाकर ही हम
इन्सां होने का अपना, हक़ अदा कर पायेंगे
और शायद मौत के बाद, सुकूं से सो पायेंगे
नहीं तो हर पल, ज़ुल्म का साया
यूँही मंडराता रहेगा
और बेगुनाहों के लहू से
अपनी प्यास बुझाता रहेगा
तो चलो, आज ज़रा ग़ौर-ओ-फ़िक्र करे
आखिर हम यूँही ज़ुल्म सहते रहेंगे
या फिर अपने दिल की आवाज़ सुनेंगे

“नफ़रत का ज़हर”

dahshat

हर तरफ फैला हुआ है, यहाँ नफ़रत का ज़हर
जहाँ देखो नज़र आये, बस दहशत का कहर

यह कैसा दौर आ गया, कुदरत भी है हैरान
इंसान का दुश्मन यहाँ, खुद बन गया इंसान

ना कोई मज़हब है इसका, ना कोई पहचान
इंसान कि शक्ल में, छुप कर बेठा है शैतान

क्यूँ भटक रहे है आज, राहों से ये नौजवान
कोई भी नहीं है यहाँ, ठहर कर अब ये सोचे

मासूम से चेहरे, आखिर कैसे बन रहे हैवान 
किसने बेठा दिया है, इनके ज़ेहन में शैतान

सियासतदारों को भी, कुछ तो सोचना होगा
आतंक के व्यापार को, बस यहीं रोकना होगा

नहीं तो कुछ भी नहीं बचेगा, कल हमारे पास 
इक बारूद का ढेर, दम तोड़ती इंसानियत बस

सबको हक़ अपना मिले, ना हो कोई भेदभाव 
इंसानियत के लिए, मिलकर सब करे प्रयास

“सही क्या है, गलत क्या है” (Sahi kya hai, Galat kya hai)

घनी ज़ुल्फो के साये तले Ghani zulfo ke saaye tale
वो इक चेहरा   Wo ik chehra  
मुझे खींचता रहता है  Mujhe khinchta rahta hai
अपनी ही ओर   Apni hi aur  
गहरी सोच में डूबा हुआ Gahri soch mein dooba hua
ये मन मेरा    Ye man mera  
इश्क़ माने इसे   Ishq maane ise  
या समझे साज़िश  Yaa samjhe sazish
क्या कोई है यहाँ Kya koi hai yahan
जो ये बतलाये   Jo ye batlaye  
सही क्या है, गलत क्या है  Sahi kya hai, Galat kya hai
रिश्तो कि उलझन में Rishto ki uljhan mein
बस जकड़ा हुआ  Bas jakda hua   
डरा सा, सहमा सा Dara sa, Sahma sa
ये अस्तित्व मेरा  Ye wujood mera
समझ नहीं पा रहा अब  Samajh nahi paa raha ab
सच क्या है, फरेब क्या है  Sach kya hai, Fareb kya hai

“वोह पुराना खेत हमारा”(Woh purana khet hamara)

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खम्भे से लग रहे है Khambhe se lag rahe hai
सूखे हुये ये दरख्त Sookhe huye ye darakht
उजङा सा नजर आ रहा Ujda sa nazar aa raha
वोह पुराना खेत हमारा Woh purana khet hamara
इक कुआं था यहीं पे Ik kuaa tha yahi pe
पानी से भरा जो रहता Pani se bhara jo rahta
खूब नहाते हम जहा Khoob nahate hum jaha
मगर अब जाने क्यूं Magar ab jaane kyun
सूखा पङा रहता है Sookha pada rahta hai
कबूतरो का आशियां Kabutaro ka aashiya
बन चुका है बस Ban chuka hai bas
कोई नही जाता वहां Koi nahi jata wahan
फुरसत अब किसे यहां Fursat ab kise yahan
गुजरी यादें समेटने की Guzri yaadein sametne ki
मगर जब मैं यूंही पहुचां  Magar jab main yunhi pahuncha
टहलते आज वहां पर Tahalte aaj waha par
सब लम्हे खुद बाखुद Sab lamhe khud bakhud
ज़िन्दा होने लगे Zinda hone lage
बिखरी यादें मुझसे लिपट गई Bikhri yaadein mujhse lipat gayi
और रोने लगा   Aur rone laga  
ज़ज्बाती होकर   Jajbati hokar  
वोह पुराना खेत हमारा Woh purana khet hamara

“एक नादान परिंदा था वोह “

Pigeon

एक नादान परिंदा था वोह 
पतंग के माँझे से यूँ लटका हुआ 
मेने आज एक कबूतर देखा
कबका मर कर सूख चुका
माँझे से दोनों पंख कटे हुए 
बहुत फड़फड़ाया होगा शायद 
आज़ाद होने को
मगर ना मालूम था उसे
इस जाल के बारे में
इंसान के लिए जो महज खेल
मनोरंजन का साधन है 
परिंदे ने ना सोचा होगा कभी
ये पतंग यूँ मौत का खेल बन जायेगा
वो तो बस शाम को उड़कर
अपने घर लौट रहा था 
पतंगों कि उस बाजी में
जान कि बाजी हार गया
कुछ ना नज़र आया उसे 
बस माँझे में उलझता गया
आखिरी सांस तक फड़फड़ाता रहा 
फिर दम तोड़ दिया 
लटक गया माँझे से यूँ
जेसे हो कोई कटी पतंग 
छत कि मुंडेर से लटकी हुई 
दूर पेड़ो पर बेठे थे चील कौए
बदन को नौंच नौंच कर खा गए
जो बचा उसे धूप सुखा गयी
अब तो सिर्फ मांझा लटका है अकेला
किसी कबूतर के निशान नहीं इस पर 
शायद उसका गुनाह यही के
एक नादान परिंदा था वोह……… 

“खुदी से मेने इश्क़ किया”

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जब तक किया था, इश्क़ हमने शिद्दत से किया 
दिलकश इस ज़िन्दगी को, यूँही हर पल जिया 

कभी खैर कभी ख्वार मिले, हर कदम मुझे जहा 
देर लगी पर अब जाके, इश्क़ हमने खुदी से किया 

“फ़साद:एक हक़ीक़त”

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हर तरफ, हर सूँ यहाँ पर, खौफ़ का है बसेरा
अमन की तलाश में, आहिस्ता हो रहा सवेरा

उजड़े आशियाने यहाँ, गौर से खुदको यूँ देखते
शायद यकीं ना हुआ, अब तक उन्हें फ़साद का

कल तक जो आबाद थी, गुम हुई वो बस्तियाँ
गूंजती रहती जिनमे, मासूम कई किलकारियाँ

कितने घरो को फूंका है, हैवानो की टोली ने
धूं धूं करके यूँ जले है, जेसे जले हो होली में

इक दूजे पर ना रहा, इन्सान को अब भरोसा
नफरत जमी दिलो में, लहू का बना है प्यासा

गहरी साज़िश है यह, उन सियासती फ़नकारो की
चेहरे पे जो लगाये है बेठे, तस्वीर इज्जतदारों की

कारोबार यूँ चलता रहे, आवाम बस पिसती रहे
इसके लिए ही तो रचते है, उंगलियो पर ये फ़साद

मगर इन सबसे बेखबर, कुछ शख्स ऐसे भी है यहाँ
जिन्हे फ़र्क़ नहीं पड़ता है, जात से, धर्म से, नाम से

रहते है सब मिल जुलकर, गुजरे सारे जख्म भुलाकर
यहाँ तो बस एक ही मजहब है, इंसानियत सबके लिए

बन जाये सब इन्सान, कहा बचेगा फिर कोई शैतान
बस इतनी सी गुज़ारिश यहाँ, कर रहा है ये इरफ़ान

हर तरफ, हर सूँ यहाँ पर, खुशहाली का बस हो डेरा
सुकून के लिबास में, चमकता जगे नया इक सवेरा