“मेरी रातों की नींद उड़ाने वाली”

मेरी रातों की नींद उड़ाने वाली
कल मैंने तुमसे थोड़ी नींद मांगी थी।

नींद तो नहीं दी तुमने
पर अपना तकिया दे दिया मुझे।

दिनभर मैं जिसका सिरहाना लगाता हूँ
और रात को उसी सिरहाने के नीचे तुम्हारी तस्वीर रखता हूँ।

वही तस्वीर जिस पर ग़ज़ल लिखने की ख़्वाहिश रखता हूँ
वही तस्वीर जिसकी आँखें पढ़ने की कोशिश करता हूँ।

वही गुज़ारिश जिसे सुनकर भी तुम नहीं सुनती हो
हाँ वही बारिश जिसमें भीगकर भी ख़ुश्क़ रहती हो।

इस तकिये से तुम्हारी खुशबू आती है
तुम्हारी खुशबू, जो मुझे दीवाना बनाती है।

दीवाना भी ऐसा, जो कभी किसी ने ना देखा
गर देखा भी हो तो कभी किसी ने ना जाना।

मेरी रातों की नींद उड़ाने वाली
कल मैंने तुमसे थोड़ी नींद मांगी थी।

नींद तो नहीं दी तुमने
पर अपना तकिया दे दिया मुझे।

आज जब मैं उस तकिये से लिपटकर सोया
तो पता चला, के नींद क्या होती है, चैन क्या होता है।

शुक्रिया मुझे मेरी नींद से मिलवाने के लिये
शुक्रिया रोज़ाना मेरे ख़्वाबों में आने के लिये।।

RockShayar.wordpress.com

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“इस बार फिर मुलाक़ात कब होगी”

खुली-खुली वो तेरी गीली जुल्फ़ें
झुकी-झुकी वो तेरी नीली पलकें
मीठी-मीठी वो तेरी प्यारी बातें
याद करके जिन्हें गुज़री मेरी रातें
दिल पूछता है बार-बार यही सवाल
के इस बार फिर मुलाक़ात कब होगी
दिल से दिल की सीधी बात कब होगी
इस बार फिर मुलाक़ात कब होगी।

तुझे देखा तो बस देखता ही रह गया
तेरी लहर के संग-संग मैं भी बह गया
क़तरा भी ना बाक़ी मुझमें मैं रह गया 
एहसास हुआ के तुमसे इश्क़ हो गया
दिल पूछता है बार-बार यही सवाल
के इस बार फिर मुलाक़ात कब होगी
दिल से दिल की सीधी बात कब होगी
इस बार फिर मुलाक़ात कब होगी।

दिलनशीं वो तेरी शोख़ अदाये
दिलकशीं वो तेरी होश उड़ाये
खुशबू वो तेरी मुझको महकाये
देखना चाहे तुझको मेरी निगाहें
दिल पूछता है बार-बार यही सवाल
के इस बार फिर मुलाक़ात कब होगी
दिल से दिल की सीधी बात कब होगी
इस बार फिर मुलाक़ात कब होगी।

जादूभरी वो तेरी मनपसंद बातें 
जादूगरी वो तेरी मुहरबंद यादें
जादू जैसी वो तेरी नज़रबंद आँखें
देखकर जिन्हें जी उठती मेरी साँसें
दिल पूछता है बार-बार यही सवाल
के इस बार फिर मुलाक़ात कब होगी
दिल से दिल की सीधी बात कब होगी
इस बार फिर मुलाक़ात कब होगी।।

“तुम्हें ख़बर तक नहीं मेरे प्यार की”

वो छुप-छुपकर तुम्हें देखना मेरा
वो नज़रों के ख़त तुम्हें लिखना मेरा
वो हद से ज्यादा तुम्हें चाहना मेरा
वो तुमसे ज्यादा तुम्हें सोचना मेरा
मुझे ख़बर है बेख़बर मेरे यार की
तुम्हें ख़बर तक नहीं मेरे प्यार की
तुम्हें ख़बर तक नहीं मेरे प्यार की। 

वो हर चेहरे में तुमको ही देखना मेरा
वो नज़र आने तक पीछा करना मेरा
वो रब से हमेशा तुमको मांगना मेरा
वो तुमसे ज्यादा तुमको जानना मेरा
मुझे ख़बर है इस क़दर मेरे यार की
तुम्हें ख़बर तक नहीं मेरे प्यार की
तुम्हें ख़बर तक नहीं मेरे प्यार की। 

वो कुछ ना कहकर सब कहना मेरा
वो लहरों की तरह साथ बहना मेरा
वो लफ़्ज़ों में तुम्हें ज़िंदा रखना मेरा
वो यादों में तुमको बयां करना मेरा
मुझे ख़बर है हमसफ़र मेरे यार की
तुम्हें ख़बर तक नहीं मेरे प्यार की
तुम्हें ख़बर तक नहीं मेरे प्यार की। 

वो ना चाहकर भी तुमसे दूर होना मेरा
दर्द के दरिया में पल-पल डूबना मेरा
वो हद से ज्यादा खुद को सताना मेरा
अपने हाथों से यादों को जलाना मेरा
मुझे ख़बर है बेसबर मेरे संसार की
तुम्हें ख़बर तक नहीं मेरे प्यार की
तुम्हें ख़बर तक नहीं मेरे प्यार की।।

“मोहब्बत को कभी समझने की कोशिश न करना”

मोहब्बत को कभी समझने की कोशिश न करना
मोहब्बत को दिल से मिटाने की साज़िश न करना।

कौन छुपा सका हैं, जज़्बात अपने अंदर यहाँ
ख़ामोशी से मोहब्बत छुपाने की कोशिश न करना।

बिखर जायेगी ज़िंदगी, पलभर में तुम्हारी
मोहब्बत में खुद को आज़्माने की कोशिश न करना।

होती है तो शिद्दत से होती है, वरना नहीं होती है
मोहब्बत से कभी दिल बहलाने की कोशिश न करना।

आग से दूर रहने में ही भलाई है, ये बात तुम्हें कितनी बार समझाई है
दिलजलों के दिल जलाने की नाकाम कोशिश न करना।

कौन इतना बेवकूफ है, जो आँखों का अनकहा न समझे
अश्क़ों की आड़ में जज़्बात छुपाने की कोशिश न करना।

हम पहले ही बहुत पास आ चुके हैं, खुद को ये एहसास करा चुके हैं
अब इससे ज्यादा और पास आने की कोशिश न करना।

मोहब्बत का क्या है, पलभर में हो या सदियों तक न हो
शोहरत के लिये मोहब्बत करने की कोशिश न करना।।

“तेरी हर बात से मोहब्बत है मुझे”

तेरी हर बात से मोहब्बत है मुझे
तेरे-मेरे साथ से मोहब्बत है मुझे।

तुझसे मिला तो यूँ लगा, जैसे खुद से मुलाक़ात हो गई
तेरी हर मुलाक़ात से मोहब्बत है मुझे।

बिनकहे सब सुन लेना, मन ही मन मन की बात कहना
तेरे हर जज़्बात से मोहब्बत है मुझे।

पलभर को मिले जो, उम्रभर को जले वो
उन चंद लम्हात से मोहब्बत है मुझे।

मुझे मेरा पता देते हैं, जीने की वज़ह देते हैं
तेरे हर एहसास से मोहब्बत है मुझे।

पहली नज़र में प्यार, नज़रों से दिल पर वार
तेरे हर अंदाज़ से मोहब्बत है मुझे।

जो ख़ामोशी छाई तो पता यह चला इरफ़ान
तेरी हर बात से मोहब्बत है मुझे।।

“ना कोई उसूल, ना कोई तरीका चलता है मोहब्बत में”

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ना कोई उसूल, ना कोई तरीका चलता है मोहब्बत में
सोचने-समझने का सलीक़ा कहाँ होता है मोहब्बत में

बाक़ी रिश्ते सब एक तरफ़, बाक़ी बातें सब एक तरफ़
दिल से दिल का दिलशाद रिश्ता जुड़ता है मोहब्बत में

अपनी-अपनी फिक़्रों में, सब मशगूल हैं, मसरूफ़ हैं
कोई नहीं जानता ये दिल कितना तड़पता है मोहब्बत में

दिल के जिस हिस्से में हम बचाकर रखते हैं यादें अपनी
दिल का वो हिस्सा थोड़ा ज्यादा धड़कता है मोहब्बत में

नींद को गहरी नींद सुलाना, अपने यार की नींद उड़ाना
ये जगना-जगाना आँखों को अच्छा लगता है मोहब्बत में

सदियों से चला आ रहा है, दिल की वादी में कोई गा रहा है
के हर इंसां यहाँ दिल से एक इंसां बनता है मोहब्बत में।

अब और क्या कहें इरफ़ान, चाहे तू ये मान या ना मान
शायर अपने माशूक पर बेइंतहा लिखता है मोहब्बत में।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

“मैं सोने से पहले हर रोज़ तुम्हारी तस्वीर देखता हूँ”

बेशक ये सच है कि तुमसे जुड़ी हर चीज देखता हूँ
मैं सोने से पहले हर रोज़ तुम्हारी तस्वीर देखता हूँ।

ख़्वाब आये तो सिर्फ तुम्हारा आये, वरना ना आये
इसलिये तो तकिये के नीचे रखी तस्वीर देखता हूँ।

ये वक़्त वो वक़्त, पता नहीं कौन ज्यादा सख़्त
हर वक़्त बेवक़्त बस वक़्त की तस्वीर देखता हूँ।

जब भी तेरी याद सताये, रूह मेरी यह फड़फड़ाये
दिल के बंद कमरे में टंगी तुम्हारी तस्वीर देखता हूँ।

नज़रों से क्या छुपा हैं, नज़रों में तो सब छुपा हैं
नज़रों के सफ़र में हमसफ़र तेरी तस्वीर देखता हूँ।

वैसे तो कई तस्वीरें हैं, देखने को इस जहान में
पर ना जाने क्यों मैं तुम्हारी ही तस्वीर देखता हूँ।

जब नींद ना आये इरफ़ान, बेचैनी करने लगे परेशान
तब तसव्वुर की आँखों से तेरी तस्वीर देखता हूँ।।

#RockShayar⁠⁠⁠⁠

“चट्टानों की तरह है वुज़ूद मेरा, लहरों की तरह है वुज़ूद तेरा”

चट्टानों की तरह है वुज़ूद मेरा
लहरों की तरह है वुज़ूद तेरा।

खुश्क़ सहराओं से कोसों दूर
समंदर किनारे अपना बसेरा।

चट्टानों पर खड़ी होकर खुद को निहारती हो
पानी को आईना बनाकर जुल्फ़ें संवारती हो।

चट्टानों की फ़ितरत हैं पथरीला बन जाना
लहरों की तो आदत हैं सब बहा ले जाना।

चट्टानों पर खड़ी होकर दरिया-ए-दिल देखती हो
पानी को स्याही समझकर हाल-ए-दिल लिखती हो।

चट्टानों की किस्मत हैं लहरों के मुस्लसल थपेड़ें सहना
लहरों की तो हसरत हैं चट्टानों के माथे पर बोसा लेना।

चट्टानों के पास आती हो और फिर दूर निकल जाती हो
पानी को हथेलियों में भरकर खुद को महसूस करती हो।

चट्टानों की चाहत हैं लहरों को ठहरना सिखाना
लहरों की तो आदत हैं चट्टानों से रोज टकराना।

चट्टानों पर खड़ी होकर जाने क्या सोचती हो
पानी को ख़त समझकर गीले पन्ने पलटती हो।

चट्टानों की फ़ितरत हैं लहरों को साहिल पर ही रोक देना
लहरों की तो आदत हैं चट्टानों को छूकर फिर लौट जाना।

चट्टानों की मोहब्बत हैं लहरें
लहरों की तो चाहत हैं चट्टानें।

एक दूसरे के बिना, किसी समंदर को न जाने ये दोनों
एक दूसरे से मिलकर, लगे हैं समंदर को पाने ये दोनों।

चट्टानों की तरह है वज़ूद मेरा
लहरों की तरह है वज़ूद तेरा।

इस बार जब मुलाक़ात होगी
दिल के साहिल पर होगा सवेरा।।

-राॅकशायर⁠⁠⁠⁠

“काली-काली जुल्फ़ें तेरी आँखें भी हैं काली-काली”

काली-काली जुल्फ़ें तेरी आँखें भी हैं काली-काली
तेरी बातों के बिना मेरी बातें भी हैं ख़ाली-ख़ाली।

उठते-बैठते हर वक़्त तुम्हारी तस्वीर से बात करता हूँ
जागते-सोते हर वक़्त तुम्हें याद रखकर याद करता हूँ।

हालाँकि बेपनाह चाहता हूँ तुम्हें, लेकिन कभी नहीं बताता हूँ तुम्हें
गुस्से में और भी हसीन लगती हो, इसीलिये तो सताता हूँ तुम्हें।

काली-काली जुल्फ़ें तेरी आँखें भी हैं काली-काली
तेरी आँखों के बिना मेरी आँखें भी हैं ख़ाली-ख़ाली।

पता ही नहीं चला कब तुमसे मोहब्बत हो गई
पता ही नहीं चला कब तुम्हारी आदत हो गई।

तुम्हें तो शायद ये भी पता नहीं कि तुम्हें सोचता हूँ मैं
तुम्हें तो शायद ये भी मालूम नहीं कि तुम्हें लिखता हूँ मैं।

काली-काली जुल्फ़ें तेरी आँखें भी हैं काली-काली
तेरी साँसों के बिना मेरी साँसें भी हैं ख़ाली-ख़ाली।

तुम्हें मुझसे ही मोहब्बत करने की कोई बंदिश नहीं
तुम्हें मेरा ही साथ देने की मैं करता गुज़ारिश नहीं।

एक दिन तुम यह जान जाओगी कि तुम्हारा आशिक कौन था
एक दिन तुम यह मान जाओगी कि तुम्हारा साहिल कौन था।

काली-काली जुल्फ़ें तेरी आँखें भी हैं काली-काली
तेरी यादों के बिना मेरी यादें भी हैं ख़ाली-ख़ाली।।⁠⁠⁠⁠

“मैं अब भी तुझको चाहता हूँ”

सबसे अब ख़फ़ा होकर
खुद से खुद ज़ुदा होकर
इश्क़ में तेरे फ़ना होकर
आवारा इक हवा होकर
संग तेरे ही अब बहना चाहता हूँ
जानाँ ये तुझसे कहना चाहता हूँ
मैं अब भी तुझको चाहता हूँ
मैं अब भी तुझको चाहता हूँ।

रब की रहमत अता होकर
अपने घर का पता खोकर
दिल से निकली दुआ होकर
दर्द की तदबीर दवा होकर
संग तेरे ही अब जीना चाहता हूँ
जानाँ ये तुझसे कहना चाहता हूँ
मैं अब भी तुझको चाहता हूँ
मैं अब भी तुझको चाहता हूँ।

ख़्वाब में तुझको देखकर
ख़याल में तुझको सोचकर
दिल में हसरतें पालकर
आँखों में आँखें डालकर
जाम तेरा ही अब पीना चाहता हूँ
जानाँ ये तुझसे कहना चाहता हूँ
मैं अब भी तुझको चाहता हूँ
मैं अब भी तुझको चाहता हूँ।

खुद में खुद को खोकर
तुझमें खुद को पाकर
नहीं है दिल ये बेघर
तुझको दिल ये देकर
तुझमें ही अब धड़कना चाहता हूँ
जानाँ ये तुझसे कहना चाहता हूँ
मैं अब भी तुझको चाहता हूँ
मैं अब भी तुझको चाहता हूँ।।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

“लौटकर तो सिर्फ यादें आती हैं, कभी वो वक़्त नहीं”

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लौटकर तो सिर्फ यादें आती हैं, कभी वो वक़्त नहीं
उसकी कही बातें याद आती हैं, अब वो शख़्स नहीं।

सिर्फ पढ़ने से ही जिसे, जग उठे वो एहसास फिर से
ज़िंदगी सब कुछ लिख देती हैं, मगर वो लफ़्ज़ नहीं।

कह गये वो शायर सयाने, इश्क़ के जो थे दीवाने
मिल जाये जो बड़ी आसानी से, असल वो इश्क़ नहीं।

शिद्दत और मेहनत, शर्त यही के दोनों साथ हो
फिर पूरी न की जा सके जो, ऐसी तो कोई शर्त नहीं।

साये की किस्मत है, सुबह से शाम चलना और ढ़लना
धूप का तिलिस्म है ये तो, साये का अपना कोई अक्स नहीं।

ज़ईफ़ जिस्म का नहीं, जवां रूह का हुस्न है मोहब्बत
देखकर जिसे खुद नैन कहे, कभी देखा ऐसा नक्श नहीं।

वक़्त की बेवक़्त ख़ामोशी का, बयान है यह तो इरफ़ान
एक वक़्त के बाद सब लौट आते हैं, मगर वो वक़्त नहीं।।

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“पहली नज़र का वो असर, अब तक याद है”

पहली नज़र का वो असर, अब तक याद है
नज़रों से नज़रों का सफ़र, अब तक याद है।

इक़रार इंकार तक़रार ऐतबार, और फिर प्यार
जज़्बातों का वो जादुई सफ़र, अब तक याद है।

ख़यालों की एक नदी, यादों के जंगल में बहती थी
एहसास की वो ऊँची लहर, अब तक याद है।

ख़्वाबों का घर लगता था, नहीं जहाँ पर डर लगता था
उम्मीदों का वो उम्दा शहर, अब तक याद है।

कई चेहरे देख लिये, सब रंग सुनहरे देख लिये
पर वो एक चेहरा शाम-ओ-सहर, अब तक याद है।

यादें हैं कि मिटती नहीं, रातें हैं कि कटती नहीं
ज़िंदगी की वो कड़ी दोपहर, अब तक याद है।

नफ़रत जिसके सामने, ज्यादा देर टिक न पाये
मोहब्बत तेरी वो इस क़दर, अब तक याद है।।

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“मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है”

तेरे साथ बिताया वक़्त बड़ी जल्दी गुज़र जाता है
मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है।

रास्तेभर यही सोचता हूं कि अब आगे क्या?
ज़िंदगी से कुछ लम्हे चुराकर भागे क्या?

याद न करने के बहाने से तुम्हे याद कर लेता हूं
मैं नज़रों से दिल की बेचैनी आज़ाद कर देता हूं।

वक़्त के साथ-साथ वक़्त की सिफ़त बदल जाती हैं
बदलते-बदलते इसकी हरएक आदत बदल जाती हैं।

दूरियों के दरवाज़े अक्सर बड़ी देर से खुलते हैं
पर मज़बूरियों के मकान बड़ी जल्दी बन जाते हैं।

ज़ेहन की परछाई से परे होते हैं जज़्बात
दिल की गहराई से जुड़े होते हैं जज़्बात।

अगर एहसास है धागा तो यह मन अपना चरखा हैं
उम्मीद की उँगलियों से हमने दिल को थाम रखा हैं।

तेरे साथ गुज़ारा वक़्त बहुत जल्दी गुज़र जाता है
मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है।।⁠⁠⁠⁠

“पहले तो तेरा ख़याल ही काफ़ी था, जीने के लिये”

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पहले तो तेरा ख़याल ही काफ़ी था, जीने के लिये
और अब तेरा ख़याल भी नाकाफ़ी है, जीने के लिये।

वो गुज़ारिश जो थी मेरी, वो अब भी अधूरी है
वो नवाज़िश जो थी तेरी, वो अब भी ज़रूरी है।

जो दिल से दिल मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हमारे दिल मिल जाते, तो क्या बात होती।

पहले तो तुम तसव्वुर पर खूब बंदिशें लगाती थी
और अब तुम हो कि तसव्वुर में भी नहीं आती हो।

वो सवाल जो था मेरा, वो अब भी वही है
वो जवाब जो था तेरा, वो अब भी नहीं है।

जो लब से लब मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हमारे चेहरे खिल जाते, तो क्या बात होती।

पहले तो तुम बेनज़ीर सी बहुत वो बातें करती थी
और अब तुम हो कि ज़रा भी नहीं याद करती हो।

वो अंदाज़ जो था मेरा, वो अब भी वही है
वो एहसास जो था तेरा, वो अब भी वही है।

जो मन से मन मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हम दोनों खिल जाते, तो क्या बात होती।।⁠⁠⁠⁠

“आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है”

आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है
आसमाँ से ज़मीं की सिफ़ारिश हो रही है।

आज फिर से जीने की ख़्वाहिश हो रही है
दिल से दिल की वही गुज़ारिश हो रही है।

आज फिर से ज़िन्दगी मदहोश हो रही है।
हौले-हौले खुद ये अपना होश खो रही है।

आज भी मैं बरसते हुए मौसम का आवारा बादल हूं
आज भी मैं उफनते हुए सागर का बंजारा साहिल हूं।

जब भी तुम मेरे आस-पास होती
बारिश शुरू होने लग जाती।

इशारा था वो कायनात का
फ़साना था वो जज़्बात का।

मैं जिसे बखूबी समझ जाता, मगर तुम बहुत डरती थी
भीगने से, इश्क़ में डूबने से, इसलिए दूर-दूर रहती थी।

आज फिर से वही पहले जैसी बारिश हो रही है
आज फिर से ये कायनात कोई इशारा दे रही है।

आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है
आज फिर से जीने की ख़्वाहिश हो रही है।।

rockshayar.wordpress.com⁠⁠⁠⁠

“तेरी साँसों की सरगोशी में नुमायाँ मैं”

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तेरी खुशबुओं से,
खिंचा चला आया मैं
तेरी साँसों की सरगोशी में नुमायाँ मैं।
 
जब भी धड़कता हूँ.
तुझमें धकड़ता हूँ
तेरी धड़कनों में इस क़दर समाया मैं।
 
सबने मुझे बुलाया,
पर मुझको कोई न भाया
जब तूने मुझे बुलाया, दौड़ा चला आया मैं।
 
ज़रा ग़ौर से देखो मुझे,
ऐ जाने जहाँ
तेरी ज़िन्दगी का हसीन सरमाया मैं।
 
तुझे ख़बर नहीं है,
मुझे सबर नहीं है
देख तेरी ख़ातिर क्या-क्या लाया मैं।
 
ये मोहब्बत मेरी,
कम न होगी कभी
तेरी आदतें सब मेरी, तेरा हमसाया मैं।।
 
© RockShayar

“वो अधूरी गुज़ारिश मेरी, अब भी अधूरी है”

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वो अधूरी गुज़ारिश मेरी, अब भी अधूरी है
कम नहीं होती कभी, ये जाने कैसी दूरी है।

तेरा नाम तेरी बातें, तुझसे मेरी वो मुलाकातें
तुझे भुलाने के लिए तुझे याद करना ज़रूरी है।

सुना है ! माशूक, साथ जीते हैं साथ मरते हैं
हमारा यूँ दूर-दूर रहना, कितना ग़ैरज़रूरी है।

हद पार करता हूँ, कभी सरहद पार करता हूँ
जुनून को बढ़ाता है जो, नशा तेरा फितूरी है।

तुझको भुलाना जैसे, खुद को भुलाना लगता है
बेपनाह चाहूँ तुझे, कितनी हसीं ये मज़बूरी है।

जितना सोच पाता हूँ, लिखता चला जाता हूँ
ये कामयाबी तो, कड़ी मेहनत की मज़दूरी है।

तेरी मेरी वो कहानी, डायरी में है जो छुपानी
अभी तो आधी लिखी है, बाक़ी अभी पूरी है।।

“तुझ को भुलाने की, हर नाकाम कोशिश कर चुका हूँ”

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तुझ को भुलाने की, हर नाकाम कोशिश कर चुका हूँ
और हर उस कोशिश को, नाकाम भी मैं ही बनाता हूँ।

बहुत दिनों से मैंने, अपने अंदर एक समंदर छुपा रखा है
दिल के किसी कोने में, तेरी यादों का बवंडर दबा रखा है।

तुम से मुलाक़ात के वक़्त, बस यही ध्यान रखता हूँ मैं
कि तुम्हारे भीतर जो तुम हो, उससे मुलाक़ात हो जाए।

कई बार इस बारे में सोचा है मैंने, कि तुम से ना मिलू
लेकिन हरबार यही लगता है, के आख़िर क्यों ना मिलू।

याद है पिछली दफा, जब तुम मुझ से मिलने आई थी
कई दिनों तक ये ज़िन्दगी, मुसलसल मुस्कुराई थी।

तेरे जाने के बाद, जीना बहुत मुश्किल होता है
तुझे याद कर करके, ये दिल महीनो तक रोता है।

सोच रहा हूँ इस बार तुम्हे, अपनी आँखों में क़ैद कर लू
भूलने से पहले इकदफा तुम्हे अच्छी तरह याद कर लू।

सफ़र में यूँही चलते-चलते, आखिरकार हम मिल ही गए
एक लम्हे के लिए ही सही, आखिरकार हम मिल ही गए।।

“राब्ता”

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कभी-कभी लगता है तुम से, सदियों पुराना कोई वास्ता है
अधूरा है अब तक एहसास कोई, रुह का रूह से ये राब्ता है।
 
न तूने मुझे अपनाया कभी, न मैंने तुझे ठुकराया कभी
मैं जितना याद करता रहा, तू उतना मुझे भुलाती गई।
 
कैसा अजब ये रिश्ता है, दिलों के दरमियां जो पिसता है
न तुम समझ पाए कभी, न हम समझ पाए कभी।
 
मुझ से ज्यादा तुम्हे मेरी, मोहब्बत से मोहब्बत रही हमेशा
और तुम्हे सोचते ही मुझे वो, सुकून-ओ-राहत मिली हमेशा।
 
न तूने मुझे तड़पाया कभी, न मैंने तुझे तरसाया कभी
मैं जितना दर्द छुपाता रहा, तू उतना बेख़बर होती गई।
 
अजीब हालात के चलते, ये ज़िन्दगी भी अजीब हुई
एक पल को अमीर होकर, अगले ही पल ग़रीब हुई।
 
अब ना कहीं तू नज़र आती है, ना तेरा नाम-ओ-निशां
वो दौर ही कुछ और था, फ़क़त पल दो पल का मेहमां।
 
न तूने मुझे जाना कभी, दिल से अपना माना कभी
मैं जितना पास आता गया, तू उतनी दूर होती गई।।
 
 

“तू कहीं नहीं है”

उन भूली बिसरी यादों में भी तू कहीं नहीं है
ऐसा भी क्या रूठना, ऐसी भी क्या बेरुखी।

धूप में जब चलता हूँ, परछाई तुम्हारी बनती है
मुझ को अपनी कहानी, सदियों पुरानी लगती है।

कभी तो हटाओ, मेरे तसव्वुर से वो बंदिश
एक अर्सा हो गया है, तुम्हें सोचे हुए जानाँ।

हम को तो मिलना ही था, इसलिए मिले थे हम
वरना यूँ तो ज़िन्दगी में, रोज ही इत्तेफाक़ होते हैं।

दूर रहकर भी मुझ से, एक पल के लिए भी दूर नहीं हो
दर्द को मेरे जिसने महसूस किया, क्या तुम हूर वही हो।

यक़ीन न आए तो, मुझ को आज़माकर देख लो
लफ़्ज़ों में बनाई जो मैंने, तस्वीर अपनी देख लो।

यह वक़्त तो गुज़र जाता है, मगर गुज़रता नहीं वो वक़्त
बड़ी चालाकी से क़त्ल करता है, है क़ातिल बड़ा ही सख्त।

अब तो तेरी तस्वीर में भी तू कहीं नहीं है
ऐसी भी क्या जुदाई, हरपल बस तन्हाई।।

“पता था”

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तेरी परछाई संभाल कर रखी है मैंने
पता था कि अंधेरा घना होने वाला है।

तुझे ख़बर नहीं थी मेरे आने की
मगर मुझे ख़बर थी तेरे जाने की।

वो पल, जो पल भर के लिए हम को मिले थे
न उनमें कोई शिकवे थे, न उनमें कोई गिले थे।

तेरी आवाज़ सहेज कर रखी है मैंने
पता था कि ख़ामोशी कायम होने वाली है।

तुमने कभी बताया नहीं, कि कौन हो तुम
तफ़्तीश करता रहा, मैं ज़िन्दगी भर यही।

इस बार जब मुलाक़ात होगी, तो पूछूँगा
इस मुलाक़ात में कितने अलविदा छुपे हैं।

हर बार यह अलविदा मेरी जान ही ले लेता है
पता नहीं इसके मुँह, कब मेरा खून लग गया।

तेरी तस्वीर संभाल कर रखी है मैंने
पता था कि याददाश्त जाने वाली है।।

RockShayar

“वैसे तो मेरी हर नज़्म में सिर्फ तुम ही रहती हो”

वैसे तो मेरी हर नज़्म में सिर्फ तुम ही रहती हो
पता नहीं क्यों आजकल कहीं दिखती नहीं हो

हालाँकि अब भी तेरा ही ख़याल काफी है जीने के लिए
फिर भी हर ख़याल बेकरार है खुद काग़ज़ पर उतरने के लिए

कलम का तुमसे, न जाने क्या राब्ता है
दिल से जो गुज़रता है, ये वो रास्ता है

मिलती नहीं कभी कोई, नज़ीर बेनज़ीर के आगे
ज़ेहन में उलझते रहे, तन्हाई की तहरीर के धागे

तक़दीर के इन पन्नों पर, कुछ तो है जो ज़रूर लिखा है
तभी तो इस दिल को, दिल पढ़ने का ये शऊर मिला है

जमाने गुज़र गए, पर वक़्त अब भी वहीं है
यादों ने सींचा जिसे, वो दरख़्त अब भी वहीं है

वैसे तो मेरे हर अल्फ़ाज़ में सिर्फ तुम्हारा ही बयां है
पता नहीं क्यों आजकल वो एहसास कहीं खो गया है

हालाँकि अब भी तेरा ही ख़याल काफी है जीने के लिए
फिर भी हर ख़याल मुन्तज़िर है खुद काग़ज़ पर उतरने के लिए ।

क्या तुम अब भी मेरा ब्लॉग पढ़ती हो ?

क्या तुम्हें मैं याद हूँ अब भी
क्या तुम अब भी मेरा ब्लॉग पढ़ती हो ।

कहाँ रहती हो आजकल
किस शहर में
ना मेरे पास तुम्हारा पता है
ना कोई कॉन्टेक्ट नंबर
वो तो अच्छा हुआ कि
थोड़ा बहुत लिखना आ गया
वरना खुद को कैसे तसल्ली देता ।

जब भी तुम्हारी याद आती है
लिख बैठ जाता हूँ फौरन
आख़िर तुमने ही तो कहा था
अपने दिल की बातें
लिख दिया करो जनाब
मैं पढ़ा लिया करूंगी
जहाँ भी रहूंगी ।

एक अर्सा बीत गया है
ना मैं बदला हूँ
ना मेरी गुज़ारिश
आज भी हम दोनों वैसे के वैसे ही हैं
इसीलिए बस यहीं कहना चाहता हूँ
कि
क्या तुम्हें मैं याद हूँ अब भी
क्या तुम अब भी मेरी नज़्में पढ़ती हो ।।

RockShayar

“तुम्हारे साथ आजकल, यूँ हर जगह रहता हूँ मैं”

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तुम्हारे साथ आजकल, यूँ हर जगह रहता हूँ मैं
हद से ज्यादा सोचू तुम्हें, बस यहीं सोचता हूँ मैं

पता नहीं हमारे दरमियान, यह कौनसा रिश्ता है
लगता है के सालों पुराना, अधूरा कोई किस्सा है

तुम्हारी तस्वीरों में मुझे, अपना साया दिखता है
महसूस करता है जो यह मन, वहीं तो लिखता है

तुम्हारी आवाज़ सुनने को, हर पल बेक़रार रहता हूँ
नहीं करूँगा याद तुम्हें मैं, खुद से हर बार कहता हूँ

नाराज़ ना होना कभी, बस यहीं एक गुज़ारिश है
महकी हुई इन साँसों की, साँसों से सिफ़ारिश है

बदल जाएं चाहे सारा जग, पर ना बदलना तुम कभी
ख़्वाबों के खुशनुमा शहर में, मिलने आना तुम कभी

प्यार तो हो गया है, अब क्या किया जा सकता है
अब तो बस एक दूसरे पर, भरोसा किया सकता है

बेनाम रिश्ते को चलो हम, बेनाम ही रहने देते है
खुद को इस तरह से खुद में, आज़ाद बहने देते है

“इतना प्यार करती हो मुझ से”

इतना क्यों डरती हो मुझ से,
शायद प्यार करती हो मुझ से ।

दिल में दबाकर जज़्बात अपने,
रोज इक़रार करती हो मुझ से ।

मना करती हो जिन बातों से,
वहीं हर बार करती हो मुझ से ।

आँखों में देखता हूँ जब भी,
सवाल हज़ार करती हो मुझ से ।

कुछ भी नहीं जब दरमियाँ,
फिर क्यों इज़हार करती हो मुझ से ।

खुद को भुला चुकी हो तुम,
इतना प्यार करती हो मुझ से ।

@राॅकशायर

“मोहब्बत का हलफ़नामा”

कई मर्तबा अपनी मोहब्बत का
हलफ़नामा पेश कर चुका हूँ
दिल की भरी अदालत में
मगर ये दिमागी वक़ील
हर बार वहीं जिरह करता है
और साबित कर देता है सच अपनी हर बात
मुन्सिफ़ के ज़ेहन में नहीं होते हैं जज़्बात ।

हालांकि कई गवाह भी बुलाए गए
मगर वो सब हालातों के डर के आगे
ऐन वक़्त पर मुकर गए ।

बेचारा दिल
हर बार यादों के कठघरे में
अकेला ही खड़ा रह जाता है
किसी मुज़रिम की तरह
पता नहीं कौनसी दफ़ा के तहत
मोहब्बत को जुर्म करार दिया गया है ।

मुझे पता नहीं था
कि तुम्हारे सूबे को एक ख़ास दर्जा मिला हुआ है
मुल्क़ के काॅन्स्टिट्यूशन के तहत
सियासतदारों के लिए
जो चुनावी बिसात रहा है बरसों से ।

मोहब्बत करने से पहले
कौन इतना सोचता है
ये तो बस हो जाती है
गर सोचकर की जाए तो वो मोहब्बत नहीं
बल्कि सौदेबाजी कहलाएगी ।

अब जबकि जुर्म साबित हो चुका है
तो मुझे मुल्जिम की तरह ज़िन्दगी जीनी पड़ेगी
इस बात का कोई ग़म नहीं है
बल्कि बेहद खुशी है कि तुम्हारे इश्क़ में सजायाफ्ता क़ैदी बन चुका हूँ मैं ।

“बेशक इश्क़ के काॅन्स्टिट्यूशन में
कहीं कोई दफ़ा तीन सौ सत्तर नहीं होती है”

कई मर्तबा अपने फ़ितूर का
अहदनामा पेश कर चुका हूँ
हसरतों की भरी महफ़िल में
मगर ये हालातों का वक़ील
हर बार वहीं सवाल जवाब करता है रूह से
और साबित कर देता है सच अपनी हर बात
मुन्सिफ़ के ज़ेहन में नहीं होते हैं जज़्बात ।।

@RockShayar

“न जाने तुम्हारे नाम में ऐसा क्या जादू है”

न जाने तुम्हारे नाम में ऐसा क्या जादू है
जो इतना पसंद है मुझे यह
हर बार इसे किसी न किसी बहाने से
अपनी नज़्मों में दाखिल कर ही लेता हूँ
कई दफ़ा तसव्वुर पर बंदिशें न लगाने की
गुज़ारिश भी कर चुका हूँ
गुज़रे दौर से वाबस्ता ग़ज़लों के ज़रिए ।

जैसे सब नाम होते हैं
कुछ वैसा ही तो है यह
फिर इसमें ऐसी क्या ख़ास बात है
जो मुझे आज तक समझ नहीं आई
हर्फ़ भी वहीं हैं
जो सब नामों में होते हैं
ज़ेर ज़बर और नुक्ता भी वहीं है
और तो और
बोलने का अंदाज़ भी वहीं है
फिर वो आख़िर कौनसी बात है
जो इसे बाक़ी नामों से अलग करती है ।

आज जब मैंने तुम्हारा नाम लिखा
फिर से अपने नाम के साथ
तो पता यह चला कि
कुछ रिश्तों के नाम नहीं हुआ करते हैं
बेनाम रिश्तों की भी
अपनी एक अलग ही दुनिया है ।

न जाने तुम्हारे नाम में ऐसा क्या जादू है
जो इतना पसंद है मुझे यह
हर बार इसे किसी न किसी बहाने से
अपने क़लाम में शामिल कर ही लेता हूँ
कई दफ़ा ख़यालों पर बंदिशें न लगाने की
गुज़ारिश भी कर चुका हूँ
जज़्बातों की ओट में पनपे लफ़्ज़ों के ज़रिए ।।

RockShayar

शब्दकोश:-

नज़्म – कविता
तसव्वुर/ख़याल – कल्पना
गुज़ारिश – विनती
वाबस्ता – संबंधित
ग़ज़ल – नियमबद्ध उर्दू पद्य शैली
हर्फ़ – अक्षर
ज़ेर-ज़बर और नुक्ता – मात्रा व्याकरण
क़लाम – लिखित रचना
जज़्बात – संवेदना
लफ़्ज़ – शब्द

DreamGirl…

गालों पर जब जब तुम्हारे डिम्पल पड़ते हैं
दिल में तो बेशक हमारे कई अरमां मचलते हैं

तुम्हारे आगोश में समाने को जी चाहता है
चाँद के पार तुम्हें ले जाने को जी चाहता है

इन कातिल अदाओं से हमें क़त्ल न किया करो
इतनी खूबसूरती से हमारी नक्ल न किया करो

तुम्हारे लरज़ते हुए लबों को जब कभी चूमता हूँ
सुरूर में यूँ होकर चूर, कई दिनों तक झूमता हूँ

घने गेसुओं के साये में, खुद को न छुपाओ जानाँ
इतनी दूर क्यूँ बैठी हो हमसे, ज़रा पास तो आना

सीने से मेरे लग जाओ, इन बाहों में सिमट जाओ
खुद को यूँ भुलाकर, आओ मुझ से लिपट जाओ

ख़्वाब में तो हर रोज तुम, मिलने आती हो मुझसे
फिर रूबरू होने पर, नज़रें क्यूँ चुराती हो मुझसे

पलकों पर जब जब तुम्हारे हया झलकती है
दिल की तो बेशक हमारी धड़कन मचलती है ।।

#RockShayar

“हिमनदी हो तुम”

हिमालय की हिमनदी हो तुम
थार का बंजर रेगिस्तान हूं मैं
संगम हुआ जब इक दिन तो
मुझ में यूं समा गई फिर तुम
हौले हौले यह महसूस हुआ
तुम्हारा सब कुछ मेरा हुआ ।

वो एहसास
इस तरह लगा
कि जैसे
अंधेरे में उजाला हो
अधरों पर हाला हो
ज़िंदगी का बयां हो
पलकों पर हया हो
बरसता सावन हो
लरज़ता यौवन हो
अधूरी प्यास हो
जीने की आस हो ।

आत्मा सी ठंडी सफ़ेद हो तुम
गुनाहों का सियाह देवता हूं मैं
संगम हुआ जब इक दिन तो
मुझ में यूं समा गई फिर तुम
के शरतचंद्र ने लिखी हो जैसे
प्रेम की वहीं पावन परिभाषा ।।

“बस यही कामना है मेरी”

तुम तो शायद मुझे पहचानती भी नहीं होगी,
पर मैं तुम्हें आज भी हर पल याद करता हूं।

तुम्हें पता भी कैसे होगा मेरे बारे में ?
मैंने कभी इज़हार भी तो नहीं किया था
तुमसे अपनी मोहब्बत का।

तुम्हें तो ये भी नहीं पता होगा
कि मेरा नाम क्या है ?
मैं कौनसी ब्रांच में था ?

चलो तो फिर !
आज तुम्हें अपने बारे में बता ही देता हूं ।

याद है ! वो पाॅलिटेक्निक का दौर
जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा था
फर्स्ट ईयर की कम्बाइंड क्लास में।

जैसे कल ही की बात लगती है,
मैं तुम्हें यूं घूरता ही जा रहा था।
दोस्तों से तफ़्तीश में पता चला कि,
गर्ल्स पाॅलिटेक्निक की
इलेक्ट्रॉनिक्स ब्रांच की
क्लासेज भी
हमारे साथ ही लगेगी,
दो साल तक
फर्स्ट ईयर और फाइनल ईयर में।

ये सुनकर मुझे जितनी खुशी मिली थी
आज तक वैसी दुबारा नहीं मिली कभी।

चुपके चुपके यूं देखना तुम्हें, मेरी आदत बन गई,
मासूम चेहरे की मुस्कान, रूह की राहत बन गई।

वक़्त के साथ साथ, चाहत भी बढ़ती चली गयी
तेरे मेरे इश्क़ की, ये कहानी भी गढ़ती चली गयी

आज तक यह मालूम नहीं चला,
कि मैं तुम्हें क्यों पसंद करता था ?

मोहब्बत यूं कभी एकतरफ़ा नहीं होती है,
ये वो नींद है, जो सोकर भी नहीं सोती है।

फिर न जाने क्या हुआ, इक रोज यूंही तुम्हें
दूर चली गई कहीं, उदास हो गए वो सब लम्हें।

मैंने दिल को जितना समझाया,
दिल ने मुझ को उतना तङपाया।

आज जब तुम्हारी डीपी देखी
सोशल मीडिया पर
तो जज़्बात खुद बखुद ही उतर आए
अल्फ़ाज़ की शक्ल लिए
एहसास के काग़ज़ पर
दिल-ए-नादान की दास्तान समेटे हुए।

अब तो पता चल गया न !
मैं कौन हूं ?

ख़ैर ! जो भी हो
मुझे जो कहना था
कह दिया मैंने आज सब कुछ
अब दिल पर कोई बोझ नहीं है मेरे।

तुम तो शायद मुझे पहचानती भी नहीं होगी,
पर मैं तुम्हें आज भी हर लम्हा याद करता हूं।

बस यही कामना है मेरी,
जहाँ भी रहो,
हमेशा खुश रहो तुम।।

“तेरा एहसास”

लबों पर तेरे रखे थे जो, नूर के हसीं क़तरे पी गया
उस एक लम्हें में, जाने कितनी ज़िंदगियां जी गया

तूने छुआ तो यूं लगा, जैसे बारिश हुई हो बंजर में
खिल गई मुरझाई कली, उस खुशनुमा से मंज़र में

सीने में जो सांसें जमी थी, लोबान सी जलने लगी फिर
जीने में जो इतनी कमी थी, एक एक कर मिलने लगी फिर

कानों के झुमके तेरे, जैसे धुन कोई गुनगुना रहे हैं
ज़ुल्फों के बादल घने, यूं मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं

चाँद से उतरी है चाँदनी, बन के हया रूख़सार पर
लबों से लरज़ती हुई वो, बन के दुआ दिलदार पर

आँखों से जब आँखें मिली, बात हुई मुलाक़ात हुई
धीरे से जब ये पलकें झुकी, लगा के जैसे रात हुई

भर लिया है मैंने तुम्हें, अपनी बाहों की गिरफ़्त में
तस्वीर तेरी यूं उभर आई, खुद बख़ुद इस नज़्म में

रूह ने तेरी चखे थे जो, नूर के हसीं क़तरे पी गया
उस एक लम्हें में, जाने कितनी ज़िंदगियां जी गया
।।

‪#‎RockShayar‬

“मोहब्बत की है तुमसे जिसका कोई हिसाब नहीं”

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एक सवाल है मेरा, जिसका कोई जवाब नहीं
मोहब्बत की है तुमसे, जिसका कोई हिसाब नहीं

पता नहीं तुम्हारी कौनसी आदत दिल को छू गई ?
पता नहीं तुम्हारी कौनसी अदा दिल में उतर गई ?

ना मैंने तुम्हारी आँखें देखी, ना कोई अंदाज़ छुआ
ना मैंने तुम्हारी बातें सुनी, ना कोई अल्फ़ाज़ सुना

हिज़ाब से ढ़का वो एक चेहरा, था जिस पर पहरा
खुशबू से महसूस किया फिर, अहसास वो गहरा

पता नहीं तुम्हारी मौज़ूदगी क्यों अच्छी लगती है?
पता नहीं तुम्हारी सादगी क्यों सच्ची लगती है ?

ना मैंने तुम्हारा ख़्वाब देखा, ना कोई ख़याल बुना
ना मैंने तुम्हारा जवाब पढ़ा, ना कोई सवाल बुना

तुम्हारे साथ जब होता हूँ, बारिश होने लगती है
आसमां से ज़मीं की यूँ, सिफ़ारिश होने लगती है

पता नहीं तुम्हारे लिए, दिल ये बेक़रार क्यों है ?
पता नहीं तुम्हारे लिए, दिल में इंतज़ार क्यों है ?

ना मैंने तुम्हारा कल देखा, ना कोई आज पूछा
ना मैंने तुम्हारा मन पढ़ा, ना कोई सवाल पूछा

हाँ एक आमाल है मेरा, जिसका कोई सवाब नहीं
मोहब्बत की है तुमसे, जिसका कोई हिसाब नहीं ।।

#RockShayar

“तुम्हारी तस्वीर”

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तन्हाई में अक्सर यूँही
देर तक बैठे हुए
मैं आजकल
देखता रहता हूँ
तुम्हारी तस्वीर को
हर बार, पहले से ज्यादा अच्छी लगती है
अलग अलग रंगों में लिपटी हुई
अनगिनत ख़्यालों में सिमटी हुई
सावन की तरह बरसती हुई
सांसों की तरह लरजती हुई
हर घङी, हर लम्हा
टकटकी बान्धे
बस यूँ, तकता रहता हूँ
पलक झपकने को
राज़ी ही नही होती
जाने कौनसा जादू है
इन सुरमई निगाहों में
जब भी झांकता हूँ
क़ैदी बना लेती है ये
शायद तुम्हारी तस्वीर
नज़्म का ही अक्स है कोई

© RockShayar

“रहनुमा”

 

Mandy Moore Shane West A  Walk To Remember 001

चाहत का बादल, पलकों पर ठहर जाता हैं
मुझको तेरा साया, हर शै में नज़र आता हैं

साँसों में महफूज़ हैं, अब तक वो एहसास
जब भी मैं सोचता हूँ, रूह में उतर आता हैं

दर बदर भटका बहुत, ना मिल पाया सुकूं
दिल को जाने क्यूँ, बस तेरा शहर भाता हैं

सितारों का शामियाना, रातभर ओढ़े हुए
चाँद तेरे दीदार को, ज़मीं पर उतर आता हैं

सुरमई इन निगाहो में, जब कभी डूबता हूँ
रौशनी से धुला, इक रहनुमा उभर आता हैं

ग़ज़ल की ज़ुबां में, बयां कर रहा इरफ़ान
मुझको तेरा नक्श, हर लफ्ज़ में नज़र आता हैं

“मुहब्बत के वो ज़माने”

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मुहब्बत के वो ज़माने, फिर से याद आने लगे
ठहरे थे दिल में कही, ज़ेहन पर अब छाने लगे

नीले आसमां के तले, परिंदे से उड़ रहे है ख्वाब
झूमती हवाओ के संग, बादल बन बरसने लगे 

महकती हुई फ़िज़ा ने, खोला जो आँचल अपना 
नन्हे नन्हे अंकुर, दिल कि ज़मीं पर उगने लगे

मौसम का मिज़ाज़, रूमानी हर दिन होता नहीं
इश्क़ के चमन में यहाँ, फूल हजार खिलने लगे

गुजरते वक़्त कि नदी में, तैर रहे है कई लम्हे
यादों कि कश्तियों में, अब वो सवार होने लगे

उठती गिरती लहरे जहाँ, यूँ बाहें खोले मिलती
तसव्वुर के निशान भी, अब रूह पर छपने लगे

निगाहो के वो फ़साने, मुझे फिर आजमाने लगे 
पलकों से छलक कर, रूख पर अश्क़ बहने लगे 

मुहब्बत के वो ज़माने, फिर से याद आने लगे
ठहरे थे दिल में कही, ज़ेहन पर अब छाने लगे

“इज़हार”

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मालूम भी ना हो सका, दिल में कब तू उतर गया
इश्क़ सूफियाना जब हुआ, पलकों पर नज़र आया

धड़कने वाकिफ ऐसे, जानती हो सदियो से जेसे
इंतज़ार में ये अब तक, बस यूँही धड़क रही थी

कुछ बेखबर सी रही, वक़्त कि उन सलवटो से
जिनके अधूरे निशान, चाहकर भी मिटते नहीं

सोहबत मखमली सी, करती बेक़रार दिल को
हसरत अनकही, ना जुदा हो मुझसे तुम कभी

कितनी शिद्दत से, मेरी आशिक़ी तुम बन गये
ख्वाबो में तलाशा है, अल्फाज़ो में अब बस गये

कह ना सका जो कभी, शायरी में बयां कर दिया
इजहार मेने ना किया, तू जाने कहा चला गया

याद हुई है बस धुँआ, ख्यालो से कुछ पिघल रहा
रफ्ता रफ्ता ही सही, ख्वाब फिर से मैं बुन रहा

एहसास भी ये ना हुआ, रूह में कब तू उतर गया
इस मुहब्बत ने जब छुआ, चेहरे पर संवर आया

मालूम भी ना हो सका, दिल में कब तू उतर गया
इश्क़ सूफियाना जब हुआ, पलकों पर नज़र आया

“चाहा है जब से तुम्हे”

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होश अजनबी यूँ हुआ, चाहा है जब से तुम्हे
आँखे बस झुकती गई, देखा है जब से इन्हे

लम्हे कुछ रेशमी से, साँसों में ख़ामोश सी
मिट गई है तन्हाई, छाई इक मदहोशी सी

इश्क़ का दरिया है गहरा, डूबते बहते गये
ख्वाबो के जहाँ में, खुदको यूँ भिगोते गये

मख़मली एहसास है, हो रहा इस खुमारी में
महसूस करले जो इसे, जी उठे वो बेज़ारी में

पाना चाहू सदा तुझे, ख्यालो में, उजालो में
दूर होते ही मन मेरा, तलाशे तुझे सवालो में

तेरे पास जब आता हूँ, दिल में उठता है समंदर
हाथो में जो हाथ थामे, लहरो पर बनते है मंज़र

मेरी हर इक शायरी में, अकस तेरा ही समाया
अल्फाज़ो में अब यहाँ, वुज़ूद है मेरा नुमायाँ

सूफियाना इश्क़ यूँ हुआ, सोचा है जब से तुम्हे
क़ैफ़ियत बस बढ़ती गई, पाया है जब से तुम्हे

होश अजनबी यूँ हुआ, चाहा है जब से तुम्हे
आँखे बस झुकती गई, देखा है जब से इन्हे