“पहली नज़र का वो असर, अब तक याद है”

पहली नज़र का वो असर, अब तक याद है
नज़रों से नज़रों का सफ़र, अब तक याद है।

इक़रार इंकार तक़रार ऐतबार, और फिर प्यार
जज़्बातों का वो जादुई सफ़र, अब तक याद है।

ख़यालों की एक नदी, यादों के जंगल में बहती थी
एहसास की वो ऊँची लहर, अब तक याद है।

ख़्वाबों का घर लगता था, नहीं जहाँ पर डर लगता था
उम्मीदों का वो उम्दा शहर, अब तक याद है।

कई चेहरे देख लिये, सब रंग सुनहरे देख लिये
पर वो एक चेहरा शाम-ओ-सहर, अब तक याद है।

यादें हैं कि मिटती नहीं, रातें हैं कि कटती नहीं
ज़िंदगी की वो कड़ी दोपहर, अब तक याद है।

नफ़रत जिसके सामने, ज्यादा देर टिक न पाये
मोहब्बत तेरी वो इस क़दर, अब तक याद है।।

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“तुझे भुलाना ही नहीं चाहता हूं मैं”

तुझे अब तक नहीं भुला पाया मैं
तुझे भुलाना ही नहीं चाहता हूं मैं।

हररोज मुझको तेरी याद आती है
तुझे रोज याद करना चाहता हूं मैं।

बात चाहे कोई भी हो कैसी भी हो
एक तेरी ही बात करना चाहता हूं मैं।

ज़िंदगी के सुहाने सफ़र में हमसफ़र
ज़िंदगीभर तेरे साथ रहना चाहता हूं मैं।

तेरे बिन जीना जानाँ मुमकिन नहीं मेरा
तुझसे मिलकर यह कहना चाहता हूं मैं।

दरिया हो तुम, जीने का ज़रिया हो तुम
किनारा बनकर संग बहना चाहता हूं मैं।

ज़िंदगी की धूप में ज़िंदगी जल गयी मेरी
तेरे आँगन की छाँव में सोना चाहता हूं मैं।।

“तेरा मुझ से दूर होना”

तेरा मुझ से दूर होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद से दूर होना।

तेरा मुझ में शामिल होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद में शामिल होना।

तेरा मुझ पे ऐतबार होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद पे इख़्तियार होना।

तेरा मुझ को खुशियाँ देना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद को पा लेना।

तेरा मुझ से ज़ुदा होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद से ज़ुदा होना।

तेरा मुझ में साँस लेना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद में ज़िन्दा रहना।

तेरा मुझ पे यक़ीन होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद पे यक़ीन होना।

तेरा मुझ को बेपनाह चाहना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद को बेपनाह चाहना।।

“ज़िंदगी का बेनज़ीर वो लुत्फ़ हो तुम”

ज़िंदगी की घनेरी कोई जुल्फ़ हो तुम
ज़िंदगी का बेनज़ीर वो लुत्फ़ हो तुम।

जिसे लिखने के बाद, मिले खूब दाद
ग़ज़ल का ऐसा कोई लफ़्ज़ हो तुम।

नज़र से लेकर जिगर तक क्या कहूँ
टूट नहीं सकता वो तिलिस्म हो तुम।

सुनकर जिसे महसूस करने लगे हम
जानाँ गुलज़ार की वो नज़्म हो तुम।

तोड़ने से टूटे ना, छोड़ने से छूटे ना
निभाना लाज़िम जिसे वो रस्म हो तुम।

मैं शायर गुमनाम अंधेरी गलियों का
अदीबों की बाअदब बज़्म हो तुम।

दीदार किया तो पता ये चला इरफ़ान
मोहब्बत का मासूम अक्स हो तुम।।

“मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है”

तेरे साथ बिताया वक़्त बड़ी जल्दी गुज़र जाता है
मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है।

रास्तेभर यही सोचता हूं कि अब आगे क्या?
ज़िंदगी से कुछ लम्हे चुराकर भागे क्या?

याद न करने के बहाने से तुम्हे याद कर लेता हूं
मैं नज़रों से दिल की बेचैनी आज़ाद कर देता हूं।

वक़्त के साथ-साथ वक़्त की सिफ़त बदल जाती हैं
बदलते-बदलते इसकी हरएक आदत बदल जाती हैं।

दूरियों के दरवाज़े अक्सर बड़ी देर से खुलते हैं
पर मज़बूरियों के मकान बड़ी जल्दी बन जाते हैं।

ज़ेहन की परछाई से परे होते हैं जज़्बात
दिल की गहराई से जुड़े होते हैं जज़्बात।

अगर एहसास है धागा तो यह मन अपना चरखा हैं
उम्मीद की उँगलियों से हमने दिल को थाम रखा हैं।

तेरे साथ गुज़ारा वक़्त बहुत जल्दी गुज़र जाता है
मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है।।⁠⁠⁠⁠

“पहले तो तेरा ख़याल ही काफ़ी था, जीने के लिये”

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पहले तो तेरा ख़याल ही काफ़ी था, जीने के लिये
और अब तेरा ख़याल भी नाकाफ़ी है, जीने के लिये।

वो गुज़ारिश जो थी मेरी, वो अब भी अधूरी है
वो नवाज़िश जो थी तेरी, वो अब भी ज़रूरी है।

जो दिल से दिल मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हमारे दिल मिल जाते, तो क्या बात होती।

पहले तो तुम तसव्वुर पर खूब बंदिशें लगाती थी
और अब तुम हो कि तसव्वुर में भी नहीं आती हो।

वो सवाल जो था मेरा, वो अब भी वही है
वो जवाब जो था तेरा, वो अब भी नहीं है।

जो लब से लब मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हमारे चेहरे खिल जाते, तो क्या बात होती।

पहले तो तुम बेनज़ीर सी बहुत वो बातें करती थी
और अब तुम हो कि ज़रा भी नहीं याद करती हो।

वो अंदाज़ जो था मेरा, वो अब भी वही है
वो एहसास जो था तेरा, वो अब भी वही है।

जो मन से मन मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हम दोनों खिल जाते, तो क्या बात होती।।⁠⁠⁠⁠

“न मुझे इख़्तियार दिया, न मेरा इंतज़ार किया”

न मुझे इख़्तियार दिया, न मेरा इंतज़ार किया
ऐ ज़िंदगी तूने मेरा, क्यों कभी ऐतबार न किया।

मैं मनाता ही रहा, तू रूठती चली गयी
खुद को ढूँढ़ते हुये, बड़ी दूर चली गयी।

वक़्त के वो धारे, जो कि अब धुंधले हो चुके हैं
एहसास की उस नदी में, रेत बनकर जम चुके हैं।

मुसाफ़िर आज भी मिलते हैं, अनजान सफ़र में
हसरतों के आशियाँ लिये हुये, आँखों के घर में।

ऐतबार करना मगर, अब भी बहुत मुश्किल है
तब से लेकर अब तक, सहमा हुआ ये दिल है।

ज़िंदगीभर ऐ ज़िंदगी, मुझको तेरा इंतज़ार ही रहा
मैं जितना पास आता गया, तू उतना दूर होती गयी।

छुप कर बैठी है कहीं, क्यों गर्दिशो में तू अब भी
कभी तो झांक इधर, मैं तन्हा खड़ा हूं अब भी।

सुना है ! कई रंगो से मिलकर बनी है तू
वो सुनहरे सपने तेरे, मुझे कब दिखाएगी तू।

ज़िंदगी तुझसे मेरा, अब वो पहले जैसा रिश्ता न रहा
तू यादें मिटाती चली गयी, मैं फर्यादें लिखता ही रहा।।⁠⁠⁠⁠

“आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है”

आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है
आसमाँ से ज़मीं की सिफ़ारिश हो रही है।

आज फिर से जीने की ख़्वाहिश हो रही है
दिल से दिल की वही गुज़ारिश हो रही है।

आज फिर से ज़िन्दगी मदहोश हो रही है।
हौले-हौले खुद ये अपना होश खो रही है।

आज भी मैं बरसते हुए मौसम का आवारा बादल हूं
आज भी मैं उफनते हुए सागर का बंजारा साहिल हूं।

जब भी तुम मेरे आस-पास होती
बारिश शुरू होने लग जाती।

इशारा था वो कायनात का
फ़साना था वो जज़्बात का।

मैं जिसे बखूबी समझ जाता, मगर तुम बहुत डरती थी
भीगने से, इश्क़ में डूबने से, इसलिए दूर-दूर रहती थी।

आज फिर से वही पहले जैसी बारिश हो रही है
आज फिर से ये कायनात कोई इशारा दे रही है।

आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है
आज फिर से जीने की ख़्वाहिश हो रही है।।

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“गर ज़मीं पर कहीं जन्नत है तो बस यहीं है, यहीं है”

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“गर फिरदौस बर-रूऐ ज़मीं अस्त
हमी अस्तो, हमी अस्तो, हमी अस्त”

When you read it…You just feel it…

वादियों का दिलकश जहाँ, जैसे ख़्वाब कोई हसीं है
गर ज़मीं पर कहीं जन्नत है तो बस यहीं है, यहीं है।

कांपती हुई कायनात ने, धुंध की चादर ओढ़ रखी है
बर्फीले कोहसारों में, इश्क़ की अंगीठी सुलग रही है।

देखों तो सही, डल झील में तैर रहे हैं कई शिकारे
ऐसे में कोई अपना दिल, बताओ तो कैसे ना हारे।

सुर्ख़ चिनार के वो शादाब शजर, मुस्कुराते हुए नज़र आते हैं
गुलमर्ग से लेकर पहलगाम तक, गुनगुनाते हुए नज़र आते हैं।

निशात हो या शालीमार, चमन में तो गुल खिलते हैं
दौर-ए-खिज़ा में अक्सर यहाँ, पत्तों के रंग बदलते हैं।

दरिया-ए-झेलम का पानी, अपनी कहानी कह रहा है
कई बरस बीत चुके हैं, मुसल्सल ख़ामोश बह रहा है।

अस्सार-ए-शरीफ़ जहां पर, महफूज़ मो-ए-मुक़द्दस है
हज़रतबल दरगाह तो बेहद, पाकीज़ा और मुक़द्दस है।

फ़िज़ाओं में बसी वो बेनज़ीर, जैसे कोई माहज़बीं है
गर ज़मीं पर कहीं जन्नत है तो बस यहीं है, यहीं है।।

:-RockShayar

“तुझ को भुलाने की, हर नाकाम कोशिश कर चुका हूँ”

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तुझ को भुलाने की, हर नाकाम कोशिश कर चुका हूँ
और हर उस कोशिश को, नाकाम भी मैं ही बनाता हूँ।

बहुत दिनों से मैंने, अपने अंदर एक समंदर छुपा रखा है
दिल के किसी कोने में, तेरी यादों का बवंडर दबा रखा है।

तुम से मुलाक़ात के वक़्त, बस यही ध्यान रखता हूँ मैं
कि तुम्हारे भीतर जो तुम हो, उससे मुलाक़ात हो जाए।

कई बार इस बारे में सोचा है मैंने, कि तुम से ना मिलू
लेकिन हरबार यही लगता है, के आख़िर क्यों ना मिलू।

याद है पिछली दफा, जब तुम मुझ से मिलने आई थी
कई दिनों तक ये ज़िन्दगी, मुसलसल मुस्कुराई थी।

तेरे जाने के बाद, जीना बहुत मुश्किल होता है
तुझे याद कर करके, ये दिल महीनो तक रोता है।

सोच रहा हूँ इस बार तुम्हे, अपनी आँखों में क़ैद कर लू
भूलने से पहले इकदफा तुम्हे अच्छी तरह याद कर लू।

सफ़र में यूँही चलते-चलते, आखिरकार हम मिल ही गए
एक लम्हे के लिए ही सही, आखिरकार हम मिल ही गए।।

“राब्ता”

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कभी-कभी लगता है तुम से, सदियों पुराना कोई वास्ता है
अधूरा है अब तक एहसास कोई, रुह का रूह से ये राब्ता है।
 
न तूने मुझे अपनाया कभी, न मैंने तुझे ठुकराया कभी
मैं जितना याद करता रहा, तू उतना मुझे भुलाती गई।
 
कैसा अजब ये रिश्ता है, दिलों के दरमियां जो पिसता है
न तुम समझ पाए कभी, न हम समझ पाए कभी।
 
मुझ से ज्यादा तुम्हे मेरी, मोहब्बत से मोहब्बत रही हमेशा
और तुम्हे सोचते ही मुझे वो, सुकून-ओ-राहत मिली हमेशा।
 
न तूने मुझे तड़पाया कभी, न मैंने तुझे तरसाया कभी
मैं जितना दर्द छुपाता रहा, तू उतना बेख़बर होती गई।
 
अजीब हालात के चलते, ये ज़िन्दगी भी अजीब हुई
एक पल को अमीर होकर, अगले ही पल ग़रीब हुई।
 
अब ना कहीं तू नज़र आती है, ना तेरा नाम-ओ-निशां
वो दौर ही कुछ और था, फ़क़त पल दो पल का मेहमां।
 
न तूने मुझे जाना कभी, दिल से अपना माना कभी
मैं जितना पास आता गया, तू उतनी दूर होती गई।।
 
 

“वैसे तो मेरी हर नज़्म में सिर्फ तुम ही रहती हो”

वैसे तो मेरी हर नज़्म में सिर्फ तुम ही रहती हो
पता नहीं क्यों आजकल कहीं दिखती नहीं हो

हालाँकि अब भी तेरा ही ख़याल काफी है जीने के लिए
फिर भी हर ख़याल बेकरार है खुद काग़ज़ पर उतरने के लिए

कलम का तुमसे, न जाने क्या राब्ता है
दिल से जो गुज़रता है, ये वो रास्ता है

मिलती नहीं कभी कोई, नज़ीर बेनज़ीर के आगे
ज़ेहन में उलझते रहे, तन्हाई की तहरीर के धागे

तक़दीर के इन पन्नों पर, कुछ तो है जो ज़रूर लिखा है
तभी तो इस दिल को, दिल पढ़ने का ये शऊर मिला है

जमाने गुज़र गए, पर वक़्त अब भी वहीं है
यादों ने सींचा जिसे, वो दरख़्त अब भी वहीं है

वैसे तो मेरे हर अल्फ़ाज़ में सिर्फ तुम्हारा ही बयां है
पता नहीं क्यों आजकल वो एहसास कहीं खो गया है

हालाँकि अब भी तेरा ही ख़याल काफी है जीने के लिए
फिर भी हर ख़याल मुन्तज़िर है खुद काग़ज़ पर उतरने के लिए ।

क्या तुम अब भी मेरा ब्लॉग पढ़ती हो ?

क्या तुम्हें मैं याद हूँ अब भी
क्या तुम अब भी मेरा ब्लॉग पढ़ती हो ।

कहाँ रहती हो आजकल
किस शहर में
ना मेरे पास तुम्हारा पता है
ना कोई कॉन्टेक्ट नंबर
वो तो अच्छा हुआ कि
थोड़ा बहुत लिखना आ गया
वरना खुद को कैसे तसल्ली देता ।

जब भी तुम्हारी याद आती है
लिख बैठ जाता हूँ फौरन
आख़िर तुमने ही तो कहा था
अपने दिल की बातें
लिख दिया करो जनाब
मैं पढ़ा लिया करूंगी
जहाँ भी रहूंगी ।

एक अर्सा बीत गया है
ना मैं बदला हूँ
ना मेरी गुज़ारिश
आज भी हम दोनों वैसे के वैसे ही हैं
इसीलिए बस यहीं कहना चाहता हूँ
कि
क्या तुम्हें मैं याद हूँ अब भी
क्या तुम अब भी मेरी नज़्में पढ़ती हो ।।

RockShayar

“दी कॉलेज डेज (The College Days)”


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ज़िन्दगी में है, गर कुछ रियल क्रेज़
तो वो है, ऑनली दी कॉलेज डेज
ख़्वाबों ख़ाहिशों की, ये दुनिया गज़ब
पलभर में जाने यूँ, गुज़र जाती है कब
नये नये चेहरों से, होता है इन्ट्रो यहाँ
कोई इक्का, तो कोई छुपा मैस्ट्रो यहाँ
बर्थडे पार्टी मस्ती धमाल, जब भी छाये
घर से ज्यादा मन को, हॉस्टल ही भाये
क्लास में बैठना है, हमेशा लास्ट राॅ में
ध्यान मगर, अटका रहता फर्स्ट राॅ में
सोचते रहते, ऊफ्फ कब ऑवर होगा ये लेक्चर
लंच में आख़िर, देखनी भी है वो अधूरी पिक्चर
कैन्टीन ही है यहाँ, सबका फेवरेट अड्डा
रोज तैयार मिलता जहाँ, नया एक फड्डा
फर्स्ट ईयर में, सीनियर्स का ख़ौफ़ सताये
फ्रेशर्स में मगर, वोही सब तो गले लगाये
एग्जाम्स के दिनों में, नक्शा ही बदल जाता
एन्टी ग्रुप हर वक़्त, साथ साथ नज़र आता
किताबें नोट्स, हर तरफ रहता जिनका बोलबाला
पेपर ज्योंही खत्म हुए, लग जायेगा इन पर ताला
मस्तियाँ शरारतें, तूफ़ानिया अदावतें
शैतानियाँ हिमाकतें, लड़कपन वो चाहतें
कॉलेज लाईफ, मिक्सचर है इन सबका
हो गर बात से मेरी, आप सब जो एग्री
तो दिल से बोलो, फिर एक बार ये भी
ज़िन्दगी में है, गर कुछ रियल क्रेज़
तो वो है, ऑनली दी कॉलेज डेज
© RockShayar

“वो पोस्ट ग्रेजुएट यादें” (Memories of M.Tech.)

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कॉलेज डेज की मस्तियाँ, कुछ मीठी नमकीन बातें
ज़िंदा हों रही है आज फिर, वो पोस्ट ग्रेजुएट यादें
मचता जो हर वीकेंड पर, असाइनमेंट्स का शोर
लास्ट डेट को ही लगाते, सब अपना अपना ज़ोर
एम. टेक. स्टूडेंट्स की, दास्तां ये सबसे निराली
सिर पे रहती हर वक़्त, प्रेशर की बन्दूक दुनाली
इक हाथ में जॉब थे पकड़े, दूजे में डिग्री की थाली
एग्जाम्स के दिनों में, करते थे वो सब रातें काली
थीसिस अप्रूव हो जाये बस, हो तभी अपनी दिवाली
गुस्से में अक्सर, लाल पीला हो जाता ये दिल
क्लासेज का शिड्यूल, जब भी करता संडे किल
बावज़ूद इनके मगर, लाजवाब था वो दौर अपना
ज़िंदगी के सफ़र का, है जो सबसे प्यारा सपना
खुशियाँ बिखेरते लम्हें, और कुछ खूबसूरत वादें
ज़िंदा हों रही आज फिर, वो पोस्ट ग्रेजुएट यादें

© RockShayar

“सौंधे ज़ज़्बात”

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सौंधे ज़ज़्बात सब यूँ बह गये
मिट्टी के वो दिये जब ढह गये

रोशनी में डूबे हुए चन्द कतरे
आये और अलविदा कह गये

मन में छुपे है जो राज़ गहरे
तन्हाई वो चुपचाप सह गये

उजाले तो है, हर तरफ ‘इरफ़ान’
दिलों में फिर क्यूँ अन्धेरें रह गये

“जाने वो कौनसी फिल्म है”

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जाने वो कौनसी फिल्म है
ज़िन्दगी की
जो अब तक
धुल नही पाई है
बस, इक नेगेटिव
क़ैद है, कई बरसो से
ख़यालों के कैमरे में
धूल सी जम गई है, उस पर
कुछ तस्वीरों की शक्ल
बदल चुकी है, पूरी तरह
वक्त की धूप में रखने से
मगर, वो इक पिक्चर
आज भी, वैसी ही है
जैसी, उस दौर में थी
जब, मैं सीख रहा था
तसव्वुर के फ्रेम में यूँ
एहसास का शाॅट लेना
और, रील थी कागज़ की

© RockShayar

” बस तुमको ही पुकारा हैं “

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निगाहों ने हर लम्हा, इक चेहरे को तलाशा है
तन्हाई के आलम में, बस तुमको ही पुकारा हैं

गीली गीली सी खामोशियाँ, बहुत कुछ कह रही
ख्वाबो कि वादियों में, इक साथ तेरा गंवारा है

पल पल ये दिल-ए-नादाँ, बेकाबू सा होने लगा
मदहोशी के आगोश में, यूँ तुमको ही संवारा है

ज़ज्बात मेरे बिखरे से, टूटे हुए कांच कि तरह
समेट ले इन्हे दामन में, अब तेरा ही सहारा है

इश्क़ कि क़ैफियत, फ़िज़ा में नज़र आने लगी
तुम मानो या ना मानो, क़ायनात का इशारा है

ख़लाओं में, दुआओ में, सदाओ में, वफाओ में
हर मौसम में अब यहाँ, बस तेरा ही नज़ारा है

निगाहों ने आज यहाँ, तेरे चेहरे को तलाशा है
तन्हाई के आलम में, इक तुमको ही पुकारा हैं

“आज फिर मैं सो नहीं पाया हूँ”

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आज फिर मैं सो नहीं पाया हूँ
तुम्हारी वो इक तस्वीर मिली है
पुरानी अलमारी के दराज में रखी
छुपाया था जिसे कभी मेने किताब में
इस डर से कि कोई देख ना ले
या खुद देख कर याद में ना रोने लगू

रुखसती के वक़्त वादा किया था मेने
नहीं बिखरुंगा अब कभी तेरे ख्याल से
मगर ज्योंही कागज़ पर साया नज़र आया
वादा यूँ टूट गया जेसे कोई बिखरा कांच

बहुत कोशिश कि है मेने
सख्त दिल बनने कि यहाँ
मगर ना जाने क्यूँ फितरत बदलती नहीं
बस तुझे ही बेइंतेहा चाहती रही है
कई दफा तेरे नाम को भी
अपने नाम से जोड़ता रहता हूँ मैं
अपने तख़ल्लुस में भी तेरा शुमार कर लिया
मगर हयात में तू फिर साथ क्यूँ नहीं है

शब् में गहरा सन्नाटा रहने लगा
मेरी तरह ये भी तन्हाई में जल रही
शायद इसे वो नूर याद आ गया
जिसके लिए मैं कभी यूँ दीवाना था
जेसे बरसते मौसम का आवारा बादल

जब भी तुम मेरे आसपास होती थी
बारिश शुरू होने लग जाती
इशारा था वोह कायनात का
मैं जिसे बखूबी समझ जाता
मगर तुम बहुत डरती थी
भीगने से नहीं, इश्क़ में डूबने से

अश्क़ यूँ रुख को नम कर रहे है
जेसे बारिश में छत से रिसता है पानी
बहुत रोया मैं उन तन्हा रातो में
जब तुम कही दूर चली गयी थी
और मुझे जरुरत थी हमसफ़र कि

हर नक्श में मेने तेरा चेहरा तलाशा
आज तक भी क्यूँ मुझे यकीं ना हो पाया
कि तुम तो जा चुके हो कब के दूर
मगर यह दिल अब भी कहता है
वोह गुज़ारिश मेरी कभी तो पूरी होगी
आज फिर मैं सो नहीं पाया हूँ
शायद तेरी तस्वीर रूह में बसी है !!

 

” वोह लम्हें “

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हर घड़ी याद आते है, बीते हुये वोह लम्हें
कुछ गुज़री यादें, तलाश रहा जिनमें तुम्हें
सुरमई दो आँखें, सुनाती मीर कि ग़ज़ल
लब पर सजे थे, बेशुमार दिलक़श तराने
क्यूँ नैनो से अब, खामोश नदी बहने लगी
उफ़नती लहरे जिसकी, रुख़ को भिगो रही
ख्वाब देखे थे कई, पलकों से छुपकर हमने

शब् में जिनके निशान, आज तक कायम है
रात भर अब ये आँखें, अधजगी सी रहती है
शायद यकीं है इन्हे, ख्वाब में बस दीदार का
क्यूँ करता हूँ तुमसे, मैं इतनी मुहब्बत यहाँ
इस सवाल का जवाब, अब तक मिला नहीं
गर जवाब है, बता देना चुपके से ख्वाब में
अगर ना हो तो भी, यूँही मिलने चले आना
बहुत दिन हो गये है, नाम से नाम जोड़े हुये
हयात में ना सही, लफ्ज़ो में तो हक़ दो मुझे

जब तुमसे मिला, इक दौर से गुजर रहा था
थामा जब यूँही कहीं, तुमने बस हाथ मेरा
आज तक वो दिन, सबसे प्यारा है लगता
मन मेरा ज़िद्दी बंजारा, आज भी वही ठहरा
सिफत यूँ आवारा, जेसे कोई जलता सहरा
कोई शैदाई, कोई दीवाना, कोई शायर कहता
इस दिल का हाल, मगर कोई नहीं समझता

मेरे ज़िस्म में, रूह में, लफ्ज़ में, अकस में
दिल के हर हिस्से में, उल्फ़तों के किस्से में
जज्बातों के एहसास में, तू आज भी रहती है
क्यूँ इतना सताते है, सुनहरे से हसीं वक्फ़े
उम्दा महकती यादें, पा रहा तुमको जिनमें
हर घड़ी याद आते है, बीते हुये वोह लम्हें
कुछ गुज़री यादें, तलाश रहा जिनमें तुम्हें