“ख़ामोशी के क़तरे”

10005799_1444116939228011_5295526436853970530_o.jpg

ख़ामोशी के क़तरे
आज़ाद होकर
यहाँ-वहाँ
बस अपना
अधूरापन लिए
हवाओ में बह रहे हैं।

कभी खुद से बहुत दूर चले जाते हैं
तो कभी खुद के बहुत पास आ जाते हैं।

लेकिन जब भी तुम और मैं
हम दोनों साथ होते हैं
तो ये हमारी ओर खिंचे चले आते हैं
एक अनजान कशिश इन्हें अपने पास बुलाती हैं।

जितनी जल्दी
ये हमारी निगाहों में दाखिल होते हैं
उतनी ही जल्दी
ये एक खूबसूरत गुफ़्तगू में शामिल होते हैं।

ख़लाओं के क़तरे
आज़ाद होकर
यहाँ-वहाँ
बस अपना
बंजारापन लिए
फ़िज़ाओ में बह रहे हैं।

कभी खुद से बहुत नाराज़ हो जाते हैं
तो कभी खुद के बहुत पास सो जाते हैं।।⁠⁠⁠⁠

“आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है”

आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है
आसमाँ से ज़मीं की सिफ़ारिश हो रही है।

आज फिर से जीने की ख़्वाहिश हो रही है
दिल से दिल की वही गुज़ारिश हो रही है।

आज फिर से ज़िन्दगी मदहोश हो रही है।
हौले-हौले खुद ये अपना होश खो रही है।

आज भी मैं बरसते हुए मौसम का आवारा बादल हूं
आज भी मैं उफनते हुए सागर का बंजारा साहिल हूं।

जब भी तुम मेरे आस-पास होती
बारिश शुरू होने लग जाती।

इशारा था वो कायनात का
फ़साना था वो जज़्बात का।

मैं जिसे बखूबी समझ जाता, मगर तुम बहुत डरती थी
भीगने से, इश्क़ में डूबने से, इसलिए दूर-दूर रहती थी।

आज फिर से वही पहले जैसी बारिश हो रही है
आज फिर से ये कायनात कोई इशारा दे रही है।

आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है
आज फिर से जीने की ख़्वाहिश हो रही है।।

rockshayar.wordpress.com⁠⁠⁠⁠

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं
प्रेम विरह करूणा तङपन
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।

जो कुछ मैं सोच रहा हूँ
जो कुछ मैं देख रहा हूँ
ज़रूरी तो नहीं वो सच हो
ज़रूरी तो नहीं वो कुछ हो ।

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं
राग द्वेष प्रकृति उपवन
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।

हज़ारों ख़याल आते हैं दिल में
हज़ारों सवाल उठते हैं दिल में
किसे थामू और किसे बुझाऊ ?
हज़ारों मशाल जलते हैं दिल में ।

कभी दर्द अपना सा लगता है
कभी इश्क़ अपना सा लगता है
बदलते रहते हैं मन के मिज़ाज
लिखना कोई सपना सा लगता है ।

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं
नदी पहाङ खेत आँगन
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।

काग़ज़ पर चंद लकीरें
ज़िंदगी को है जो उकेरे
मुझ को रिंझाती है यूँ
जैसे बीन बजाते सँपेरे ।

कभी कोई वजह मिल जाती है
कभी कोई अदा मिल जाती है
मन के अंधेरों से कोसों दूर
रात को जैसे सुबह मिल जाती है ।

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं
जन्म मृत्यु भाग्य जीवन
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।।

@rockshayar.wordpress.com

“कई दिन हो गए है तुझसे मिले हुए”

 1891291_676968972351696_1443802110819097703_n

कई दिन हो गए है तुझसे मिले हुए
अब तो ख़याल में भी नहीं आती हो
जैसे कोई तिलिस्मी बंदिश लगा रखी हो
इससे बड़ी सज़ा क्या होगी आख़िर
कि तुम्हें सोचना तो चाहता हूँ
मगर सोच नहीं पाता हूँ
खुद को हर शब ख़्वाब में
फिर उसी जगह पाता हूँ
मिले थे जहाँ कभी हम आख़िरी बार
और अब आलम ये है कि
वो ख़्वाब तक नहीं आते है
चाहे जितनी भी कोशिश मैं करू
तुम्हारे लिए आसां है शायद, भुलाना मुझे
मगर मेरी तो हर साँस में
तुम ही तुम बसी हो
पता नहीं ये क्या है ? मगर जो भी है यही है
पता नहीं ये क्यूँ है ? मगर जो भी है यही है
इतना जरूर पता है, ये जो भी है बेवजह नहीं है
कई दिनों से छुपा रखा था मैंने इसे
मगर कल जब वो बारिश हुई
तभी कहीं सीने की क़ैद से फिसलकर
वो एहसास चुपके चुपके से
कागज़ की कश्ती पर सवार हो गया
ताज्जुब इस बात का नही
कि तुम्हें इसकी खबर नही
ताज्जुब इस बात का है
कि दिल को इसकी खबर होते हुए भी
ये दावा करता रहा
कई दिनों तक बेखबर होने का
इसे क्या पता ?
तुम्हारा मेरा और बारिश का रिश्ता क्या है ?
गर पता होता तो ये सवाल ना आता
इसकी जगह कुछ अश्क़ छलक आते
लरजते दामन में जिनके
नज़र आती फिर
अधूरी वो गुज़ारिश मेरी
कई दिन हो गए है तुझसे मिले हुए
अब तो ख़याल में भी नहीं आती हो ।।

#RockShayar

“वो शुरूआती दौर”

tumblr_static_writing
कल रात यूँही
देर तक जागते हुए
अपनी कुछ, पुरानी नज़्में पढ़ी मैंने
लिखी थी, जो उस दौर में
जब अल्फ़ाज़ थे कम
और, जज़्बात ज्यादा

कहीं कहीं पर
ख़ामियाँ है बहुत
जो मालूम हुई है अब
यूँ आहिस्ता आहिस्ता
उस दौर में भी थी, ये शायद
मगर छुपी थी, गर्दिशों में कहीं

ज्यादातर लफ्ज़, दर्द में सने हुए है
तब मुझे, वक़्त के दरिया में
यूँ, तैरना भी तो नहीं आता था
एहसास के सागर में, घण्टो तक
बस यूँही, पाँव डुबोये रखता था
डर था, कहीं कोई जूनूनी लहर
खींच कर, ना ले जाये कभी अपनी ओर

नज़्म, ग़ज़ल, रुबाई, अशआर
क़ाफ़िया, मतला, नुक़्ता, शेर
किरदार सब, अजनबी थे मेरे लिए
ना कोई उसूल था, ना कोई आदाब
ना कोई वुज़ूद था, ना कोई अंदाज़
कुछ भी नहीं था, मेरे पास
हाँ, इक दर्द रहता था बस
सीने में कहीं, गहरा सा
जो, दिखता नहीं था
बस, रात में अक्सर
यूँ निकल आया करता था बाहर
दबे पाँव, किसी चोर कि तरह
अश्क़ों की सियाह चादर से
अपना नम चेहरा ढके हुए

रिश्तों के लहू में
डूबा हुआ इक खंज़र
जो अटका रह गया था
भीतर कहीं
नोक से उसकी
टपकते हुए, कतरो को
एक जगह, जमा कर के
फिर जो, लिखना शुरू किया मैंने
तो बस, लिखता ही चला गया
फिर रुका नहीं कभी, किसी मोड़ पे

वो शुरूआती दौर, अब गुज़र चुका है
मगर, कुछ खुरदुरे से निशां
अब भी बाकी है, रूह की पेशानी पर
कहीं कहीं, लाल लाल से चकते बन गए है
जिनका सुर्ख़ रंग, कभी कभी
यूँ उतर आता है, आँखों में
जैसे पलकों की, कट गई हो रग कोई
और हौले हौले, वहाँ से रिस रहा हो खूं

कल रात यूँही
देर तक जागते हुए
अपनी कुछ, पुरानी यादें टटोली मैंने
सहेजी थी, जो उस दौर में
जब अल्फ़ाज़ थे कम
और, जज़्बात ज्यादा

© RockShayar
(Irfan Ali Khan)

“एक ज़िन्दा नज़्म है वो”

10423965_718923214822938_1373407691201646779_n

सांसों से लिपटी हुई
लफ़्ज़ों में सिमटी हुई
आसमां से आई हुई
रोशनी में नहाई हुई
चाँद से निथरी हुई
रूह में उतरी हुई
एक ज़िन्दा नज़्म है वो

वो इठलाती भी है
वो बलखाती भी है
वो लहराती भी है
वो घबराती भी है
तारीफ जब करू
वो शरमाती भी है
एहसास की स्याही से
दिल पर लिखी हुई
एक ज़िन्दा नज़्म है वो

© रॉकशायर

“ज़िन्दगी में हो बस, रोशनी नुमायां”

1911714_739626939451388_5822372096309730863_n

Happy Diwali to all of you….

रंज-ओ-ग़म का, ना कोई सरमाया
दिलों में रहे सदा, उम्मीद का साया
हर नज़र यहाँ, खुद-ब-खुद चमक उठे
खुशियों का जब, यूँ आंचल लहराया
मन के कोनों से, उतार फेंकों अन्धेरें
ज़िन्दगी में हो अब, रोशनी नुमायां…

भीतर छुपी बुराईयों से, तू युद्ध कर
मैली सी परछाईयों को, तू शुद्ध कर
आँखों में रहे सदा, चरागों सा साया
हर सहर यहाँ, खुद-ब-खुद महक उठे
खुशियों का जब, यूँ सावन घिर आया
रूह के चोगे से, उतार फेंकों अन्धेरें
ज़िन्दगी में हो बस, रोशनी नुमायां
ज़िन्दगी में हो बस, रोशनी नुमायां…

© रॉकशायर

“कल रात यूँही मैं नज़्म लिखते लिखते सो गया”

10365416_673417629373497_8211122413367817093_o

कल रात यूँही मैं 
नज़्म लिखते लिखते सो गया 
कागज़ का वोह पुर्ज़ा 
दबा रह गया, जो सिरहाने के नीचे
उतारे थे, जिस पर कुछ एहसास
दिल की स्याही से मेने 
रात भर ख़्याल, जगाते रहे मुझे
ख्वाबों का, इक जहां दिखाते रहे
कुछ ख़्याल, दर्द में डूबे हुए
कुछ, यादों में भीगे हुए
और कुछ अनछुवे से
छूने की जब कोशिश की
नींद खुल गई उस वक़्त
और बिखर गए सब ख़्याल
बाकी हैं तो, बस इक खुशबू
महफूज़ कर रहा हूँ जिसे
लफ्ज़ो के लिबास में
कल रात यूँही मैं
एहसास बुनते बुनते सो गया
हसरतों का इक बादल
दबा रह गया, जो तकिये के नीचे
ठहरे थे, जिस पर कुछ जज्बात
रूह के, नर्म आगोश में
रात भर अल्फ़ाज़, भिगोते रहे मुझे
नज़्म का, इक मकां बनाते रहे
कुछ हर्फ़, इश्क़ में घुले हुए
कुछ, तन्हाई से धुले हुए
और कुछ मखमली से
पकड़ने की जब कोशिश की
नींद खुल गई उसी वक़्त
और बह गए सब अल्फ़ाज़
बाकी है तो, बस वहीं खुशबू
महसूस कर रहा हूँ जिसे
डायरी के पन्नो पर
कल रात यूँही मैं
नज़्म लिखते लिखते सो गया