“आओ चलें फिर इरफ़ान की गली”

 

लफ़्ज़ों को हँसते मुस्कुराते ग़मगीन हो आंसू बहाते 
किसी ने देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।

समंदर से वसीह दिल में लहरों की तरह जज़्बात उठते 
उन लहरों से उठते जज़्बातों को] लफ़्ज़ों में तब्दील करते
किसी को देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।

रूहानियत की क़लम में स्याही शिद्दत की भरकर
इक कोरे काग़ज़ को अनमोल बनाते 
किसी को देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।

एक शख़्स में छुपी हज़ार शख्सियतें
एक इंसां को एलियन में तब्दील होते
उम्र गुज़ार खुद में अंदाज़ अलहदा पाते
किसी को देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।

गर्दिशों के सियाह अंधेरों में चश्मा-ए-नूर बहाते 
हादसों में खुद ही को खुद का हौसला बढ़ाते
हर ग़म की खुशी मनाकर ग़म को कन्फ्यूज करते
किसी को देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।।

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“दोस्ती” (Unforgettable Day…2nd August 2015)

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दोस्ती का दिन कोई, न कोई वार होता है
दोस्तों के साथ तो, हर वार ही शनिवार होता है।

चाहे माइंड की मिस्ट्री हो, या हसरतों की हिस्ट्री
दोस्तों के दरमियाँ होती हैं, कमाल की कैमिस्ट्री।

सेटिंग चाहे मोबाइल की हो, या फिर दिल की
दोस्तों ने तो इन पर, पूरी पीएचडी हासिल की।

हुस्न देखकर ये फँस जाते हैं, रोज उसकी गली तक जाते हैं
दोस्ती के बिना दोस्तों, ये ज़िंदगी के सफ़र में भटक जाते हैं।

यारों दा ठिकाना कोई, न कोई घरबार होता हैं
यारों के साथ तो, हर लम्हा ही यादगार होता हैं।

मुसीबत हो या मोहब्बत, या हो कोई फड्डा
हर थड़ी पे होता हैं, साड्डे यारों दा अड्डा।

घरवाले जब इन्हें डाँटते हैं, बुरा नहीं ये मानते हैं
दोस्त लोग तो हमेशा, दोस्तों में खुशियाँ बाँटते हैं।

ज़िंदगी ने एक रोज जब, मुझसे मेरी खुशियों का राज़ पूछ लिया
मुस्कुराकर मैंने भी, अपने दिल के काग़ज़ पर दोस्ती लिख दिया।।

rockshayar.wordpress.com