“तेरा मुझ से दूर होना”

तेरा मुझ से दूर होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद से दूर होना।

तेरा मुझ में शामिल होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद में शामिल होना।

तेरा मुझ पे ऐतबार होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद पे इख़्तियार होना।

तेरा मुझ को खुशियाँ देना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद को पा लेना।

तेरा मुझ से ज़ुदा होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद से ज़ुदा होना।

तेरा मुझ में साँस लेना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद में ज़िन्दा रहना।

तेरा मुझ पे यक़ीन होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद पे यक़ीन होना।

तेरा मुझ को बेपनाह चाहना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद को बेपनाह चाहना।।

“सुना है कि रात को कभी नींद नहीं आती”

सुना है कि रात को कभी नींद नहीं आती
बस यहीं जानने के लिए कभी सोया नहीं

अंदर ही अंदर, बहुत कुछ है जो बदल जाता है
ज़िन्दगी का सूरज भी बिना बताए ढ़ल जाता है

सुकून की तलाश में, ये पलकें खुली रहती हैं
कभी सो जाती है, तो कभी झपकती रहती हैं

चाँद की तरह हर रात, कोई ना कोई तो जलता है
तब कहीं जाकर इस, दिल का दरवाजा खुलता है

करवटें बदल बदल कर, यूं हर शब गुज़र जाती है
गुज़रे हुए लम्हों में, बातें वो बेनज़ीर नज़र आती है

ख़्वाब में सदा जो दिखता है, सच कहाँ वो होता है
एक तसव्वुर की तलाश में, दिल इतना क्यूं रोता है

अंधेरे के आगोश में ही तो, उजाला ये तमाम रहता है
चुपचाप सहता है सितम, किसी से नहीं कुछ कहता है

सुना है कि दर्द में भी मुस्कुराना पड़ता है
बस यहीं जानने के लिए कभी रोया नहीं ।

“खुद से खुद की, मुलाकातें नसीब हो गई”

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यादें यतीम हो गई, रातें रक़ीब हो गई
फितूर से भरी, कुछ बातें हबीब हो गई

लूट लेता है अक्सर, चैन को शोर यहाँ
कहते कहते यूँ, ख़ामोशी करीब हो गई

सुकूं अता कर, कुछ तो मुझको इलाही
दर्द सहते सहते, ज़िंदगी ग़रीब हो गई

आईने भी अब तो, पहचानते नही सूरत
बहते बहते जब से, आँखें अजीब हो गई

तन्हाई का बयां, है बस यही ‘इरफ़ान’
खुद से खुद की, मुलाकातें नसीब हो गई

‪#‎RockShayar‬ ‘इrफ़aन’

“दिल के कमरे पर ताला लगा रक्खा है”

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दिल के कमरे पर ताला लगा रक्खा है
हमने यादों पर जाला लगा रक्खा है

पहुँच ना सके, कोई भी उस दर तक
संगीन सा वो रखवाला लगा रक्खा है

मुकद्दर की दरारें, हो बुरी नज़र का वार
माथे पर निशान काला लगा रक्खा है

दर्द की तहरीर जो, बयां ना हो पाए तो
ग़म-ए-हिज़्र का हवाला लगा रक्खा है

जज़्बातों में जज़्बाती, ना हो जाये दिल
पहरा वो सबसे आला लगा रक्खा है

सुन ले ना कोई, आहें मेरी ‘इरफ़ान’
लबों पर हमने ताला लगा रक्खा है

‪#‎RockShayar‬ ‘IrFaN’

संगीन – पत्थर के जैसा
मुकद्दर – नसीब, भाग्य
तहरीर – लिखित दस्तावेज
ग़म-ए-हिज़्र – विरह पीङा
बयां – कहना
हवाला – स्पष्टीकरण
जज़्बात – भावना
आला – ऊँचा
लब – होंठ

“तन्हाई में हरदम जलता ही रहा”

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शब के अंधेरों में ख़लता ही रहा
गुनाहों में हरदम पलता ही रहा

सीने में सुकून की ख़ाहिश लिए
तन्हाई में हरदम जलता ही रहा

दौर-ए-ख़िज़ा वो जब आई तो
नूर का साया भी ढलता ही रहा

कदम दर कदम खुद से दूर होकर
अजनबी राहों पर चलता ही रहा

तन्हाई का बयां है ये “इरफ़ान”
बैचेनी में हरदम जलता ही रहा

‪#‎RockShayar‬

शब – रात
ख़लना – कमी महसूस होना
गुनाह – पाप
ख़ाहिश – इच्छा
तन्हाई – एकान्त
दौर-ए-ख़िज़ा – पतझङ का मौसम
नूर – प्रकाश
साया – परछाई

“ना मैं सोया रात भर यहाँ”

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अश्क़ भी ना बचे अब तो
इतना रोया रात भर यहाँ

बेवज़ह जाने किसके लिए
मैं था खोया रात भर यहाँ

सूजी सूजी ये आँखें मेरी
लोबान सी है साँसें तेरी

गमगीं निगाहें जर्द़ पनाहें
इतना रोया रात भर यहाँ

पुकारू तुझको या मौला
ना मैं सोया रात भर यहाँ

‪#‎RockShayar‬

“उदासी के बादल”

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रूठी हुई है ज़मीं, रूठा हुआ ये आसमां
छूटी हुई है ख़ुशी, छूटा हुआ ये कारवाँ

हर तरफ फैले है, उदासी के बादल यहाँ
भीगी पलकों से, रिस रहा काजल यहाँ

बेइरादा खताओं में, उलझा लिपटा हूँ
बेतहाशा जफ़ाओं में, ठहरा सिमटा हूँ  

जले बुझे ख़्वाबों की, उड़ रही है राख
अनछुँवे ख़्यालों की, मुड़ रही है शाख

जी रहा हूँ, पर जीने जैसा कुछ भी नहीं
पी रहा हूँ, पर पीने जैसा कुछ भी नहीं

रूठी हुई है ज़मीं, रूठा हुआ ये आसमां
टूटी हुई है कश्ती, टूटा हुआ ये आशियाँ

#RockShayar

“ज़िन्दगी जाने कहाँ छूट गई”

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रिहाई की वो उम्मीद टूट गई
पलकों से फिर नमी छूट गई

अंधेरों के समन्दर में आकर
इक कश्ती थी, वो भी टूट गई

बैचेनीयों से लङते लङते यूँ
तन्हाई मुझे शब भर लूट गई

खुद की तलाश में ‘इरफ़ान’
ज़िन्दगी जाने कहाँ छूट गई

“इस कदर कुशादा, मेरे ज़ज्बात है”

इस कदर कुशादा, मेरे ज़ज्बात है
हिज्र में अब क़ैद, मेरे दिन रात है

# रॉक शायर

कुशादा – विस्तृत, फैला हुआ
ज़ज्बात – संवेदना
हिज्र – विरह
क़ैद – अधीनता, बंधना, दासत्व

“रिहा कर उस दर्द से”


दिन तो जैसे तैसे करके, यूँही गुज़र जाता है
रात होते ही मगर, तन्हा ये दिल घबराता है

जीने की कोई वजह, अब तू ही बता दे खुदाया
या रिहा कर उस दर्द से, सीने में जो बसता है

“रातें मगर कटती नही”

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दिन कट जाता है यूँही, रातें मगर कटती नही
इन्तज़ार में किसके, ये साँसें मगर घटती नही

सितारें भी यहाँ, चाँद भी यहाँ, जुगनू भी यहाँ
सब कुछ है यहाँ, ख़्वाहिशें मगर मिटती नही

नींद के बादलों में, रहता है जो शायर सयाना
लिखता है वो लफ़्ज़ सभी, आहें मगर घटती नही

यूँ तो कट जाता है सफ़र, जागते हुए ‘इरफ़ान’
दीदार के लिए फ़क़त, निगाहें मगर हटती नही

© रॉकशायर

“मैं जब जज़्बाती होता हूँ, रो लेता हूँ”

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निगाहों को अश्क़ो से भिगो लेता हूँ 
मैं जब जज़्बाती होता हूँ, रो लेता हूँ 

रातभर चाँद को निहारते हुए 
ख्वाबों के आग़ोश में फिर सो लेता हूँ

यादों की नदी जब छलकती हैं 
जुनूं में बहकर पलकें धो लेता हूँ 

जुदाई में तुम्हे यूँ सोचते हुए 
दूर होकर भी तेरे पास हो लेता हूँ 

साँसों की माला जब टूटती हैं
हयात के बिखरे मोती पिरो लेता हूँ 

ग़मों की बंजर ज़मीं खुरच कर यूँ 
मैं ख़ुशी के बीज फिर बो लेता हूँ 

” मेरी तन्हाई “

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कोई भी ना समझ पाया अब तक मेरी तन्हाई को
महफ़िल में ये मुस्कुराती, रातभर रूह को जलाती
जाने किस मिटटी का बना है, बेवक़ूफ़ ये दिल मेरा 
जब भी इसको मना किया, याद बस तुमको किया
बहुत याद आता है, गुजरा हुआ वोह एक एक पल
नज़रो से नज़रे मिलाना, इशारो में रूठना मनाना
ऐसा भी क्या जादू किया, तेरी इक मासूम अदा ने 
कभी पागल, कभी दीवाना, कभी शायर कहती रही 
शिद्दत से मैं करता ही रहा, उस चाहत की इबादत
पर क्यूँ तुम जान ना पायी, टूटे दिल की गहराई को 
कितने ख्वाब यूँ बिखर गए, मुहब्बत की लहरो से
कच्चे मकान सब ढहते गए, उल्फत की बारिश में 
आवारा सी ये फितरत, जाने क्यूँ इतना सताती है 
हर लम्हा यूँ तड़पाती है, पल पल मुझे रुलाती है 
हौंसला फिर भी ना कम हुआ, हर दिन बढ़ता गया 
अब तो आदत सी हुई है, दर्द में यहाँ मुस्कुराने की

“मेरी लौ”

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लौ मेरी भभक रही, धीमे जल रहा हूँ मैं
सीने में सौ दर्द लिये, बस चल रहा हूँ मैं
ना कोई हमसफ़र है, ना कोई रहनुमा
अंधेरो में बस यहाँ, किस छोर है जाना
कोई नहीं यहाँ, बना सके जो राह आसां
लोग कहते है मुझे, इतना सीधा क्यूँ है
मेने कहा, रूह में सच्चाई ऐसे है घुली
जेसे लब से दुआ, रुख से अदा है जुडी
चाहे कितनी भी ठोकरें खायी हो मेने
दिल में वो ‘इरफ़ान’ अब तक है ज़िंदा
जिसे देखकर, मैं जी रहा हूँ तन्हाई में
जो भी मिला है यहाँ, अपना उसे माना
बगैर जाने हुये, सोहबत में रंग जाता
रेशमी वो अदा, कुछ इस तरह से भायी
दिल पर निगाहे, फिर बादलों सी छायी
मगर यह गुमां कहा, वो था सिर्फ ख्वाब
जिसे कभी ना कभी तो बिखरना ही था
उसे भुला ना पाया, खुद को मिटा रहा हूँ
नादान तब था, कीमत अब चुका रहा हूँ
लौ मेरी भभक रही, धीमे जल रहा हूँ मैं
सीने में सौ दर्द लिये, बस चल रहा हूँ मैं

“तन्हा दिल”

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दिन भर तो हँसते मुस्कुराते गुजर जाता है
रात होते ही मगर तन्हा ये दिल घबराता है

जीने कि इक वजह अब तूही बता दे खुदाया
या रिहा कर उस फितूर से दिल में जो बसता है