“तेरी आँखों से गिरे चंद क़तरे संभालकर रखे हैं मैंने”

तेरी आँखों से गिरे चंद क़तरे
संभालकर रखे हैं मैंने
अपनी आँखों के ऊपर
इस डर से पलकें झपकता नहीं
गिर ना जाये वो कहीं
संग उन ख़्वाबों को लेकर
जो देखे हैं हमने साथ में
जो महकते हैं मुलाक़ात में
जो बरसते हैं बरसात में
जो रहते हैं जज़्बात में
जो बसते हैं हर साँस में

इन क़तरों में रुख़्सत के वो पल नज़र आते हैं
जिन पलों में कुछ भी नज़र नहीं आता है
सिवाय फिर मिलने की आस के
अधूरी एक प्यास के
अलविदा एहसास के
आँखों की अरदास के

तेरी आँखों से गिरे चंद क़तरे
सहेजकर रखे हैं मैंने
अपनी आँखों के ऊपर
इस डर से पलकें झपकता नहीं
बह ना जाये वो कहीं
संग उन लम्हों को लेकर
जिनमें हरघड़ी तू मेरे साथ है
जिनमें हरपल तू मेरे पास है।

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“अलविदा”

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नया दौर तभी आता है, जब पुराना दौर चला जाता है
खुशी और ग़म के इस अमलगम को अलविदा कहा जाता है

दिलों दिमाग़ दोनों हक्के-बक्के रह जाते हैं
समय के अभिनय को वो समझ नहीं पाते हैं

किसी के चले जाने के बाद ही उसकी कमी ख़लती है
दूरियों का ये दस्तूर भी खुद वक़्त के हाथों मज़बूर है

आना-जाना तो ज़िंदगी के चलते रहने की कहानी है
और चलते रहना ही इसके ज़िंदा होने की निशानी है

दोनों ही सूरतों में एक वक़्त ही तो है जो गुज़र जाता है
बाक़ी तो हरएक पल दिल बीती बातों का घर बनाता है

खुशी क्या है, ग़म क्या है, हँसी क्या है, मातम क्या है
ये सब तो सिर्फ जज़्बातों के हाथों की कठपुतलियां हैं

अलविदा कहते हुये अक्सर यह ज़बान लड़खड़ा जाती है
वज़्नी हर्फ़ बोलने का शर्फ़, ठीक उसी वक़्त भूल जाती है

मुलाक़ात से ज्यादा हमेशा रुख़्सत पर ध्यान क्यों दिया जाता है
वक़्त को बार-बार उसके वक़्त होने का एहसास कराया जाता है

इस बार अलविदा को ही अलविदा कहने की सोच रहा हूँ
खुद को पहले से ज्यादा अलहदा बनाने की सोच रहा हूँ।

“तेरी यादों का एक पुतला बनाया मैंने”

तेरी यादों का एक पुतला बनाया मैंने
 दिल के घर से हर जंगला हटाया मैंने

तू ऐसी गयी, के फिर लौटकर ना आयी
 तेरी याद में यादों का डेरा लगाया मैंने

याद है वो अपना मिलना, बारिश का होना
 बाद में जिसे जलना था वही हिस्सा भिगाया मैंने

तुमको क्या पता, मेरे साथ क्या-क्या हुआ
 खुद को ही भूल बैठा, खुद को इतना सताया मैंने

इंतज़ार की हद गुज़री, पर ना गुज़री वो रात
 नागवार उस रात में हर जज़्बात मिटाया मैंने

मेरी मोहब्बत पे नाज़ करने वाली, कहाँ खो गयी तू
 तुझे याद कर-करके हिज़्र का हर एक लम्हा बिताया मैंने

बहाकर न ले जाये कभी, गलती से अपने साथ कहीं
 अश्क़ों से छुपाकर आँखों में तेरा सपना सजाया मैंने

मिलने का इरादा हो तो, चले आना कभी भी
 यादों की पहाड़ी पर घर अपना बनाया मैंने।

 

“कई दिनों से दिल में एक बात है”

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कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से खामोश जज़्बात हैं

कई दिनों से आँखें सोई नहीं हैं
कई दिनों से आँखें रोई नहीं हैं

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से बंजर ये बरसात है

कई दिनों से यादें याद आ रही हैं
कई दिनों से यादें दिल जला रही हैं

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से बेचैन यह रात है

कई दिनों से सुकून खो गया है
कई दिनों से जुनून गुमशुदा है

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से गुमसुम आवाज़ है

कई दिनों से मैं कहीं और हूँ
कई दिनों से मैं कोई और हूँ

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से बेअसर अल्फ़ाज़ हैं

कई दिनों से सफ़र की सोच रहा हूँ
कई दिनों से लहर को खोज रहा हूँ

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से अजनबी अंदाज़ है

कई दिनों से साँस नहीं ले पा रहा हूँ
कई दिनों से कुछ नहीं कह पा रहा हूँ

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से मुसल्सल ये रात है

कई दिनों से सूरज निकला नहीं है
कई दिनों से वक़्त ये बदला नहीं है

शायद इसीलिए मैं बदल गया
और वक़्त वहीँ पर ठहर गया

खुद को बदलने की कोशिश में
दिल का कच्चा घर जल गया

ज़हन की सयानी साज़िश में
दिल का बच्चा घर जल गया

कई दिनों से दिल में एक बात है
लगता है वही मेरी असल ज़ात है

एक बात जो अब हर घड़ी मेरे साथ है
एक बात जो अब हर पल मेरे पास है।

“उदास नहीं होता मैं अब, खुश रहने की आदत हो गई”

उदास नहीं होता मैं अब, खुश रहने की आदत हो गई
एहसास नहीं होता ये अब, दिल को ये आदत हो गई

अपने आप से पूछता हूँ, आजकल मैं कई सवाल
वही सवाल, जिनके जवाब मुझको भी नहीं पता

दिल का दिल बैठ जाता है, जब भी वो वक़्त आता है
वही वक़्त, जिसमें कि खुद वक़्त भी ठहर जाता है

तुमसे मिलने की उम्मीद अब भी क़ायम है 
और उम्मीद पर तो दुनिया क़ायम है

उदास होने पर एक जगह बैठ जाता हूँ
सोचना-समझना सब बंद कर देता हूँ

मेरे अंदर जो शख़्स है, उसे मेरी बड़ी फिक्र है
एक वही तो है, जो हमेशा मेरा ख्याल रखता है

कभी-कभी वो मुझको गले से लगा लेता है
और कभी-कभी अपना मुँह फेर लेता है

शिकायत है उसे तो बस उस उदासी से
जो कभी मिटती नहीं इस वक़्त के साथ।

“तेरी परछाई संभाल कर रखी है मैंने”

तेरी परछाई संभाल कर रखी है मैंने
पता था कि अंधेरा घना होने वाला है

तुम्हे ख़बर नहीं थी मेरे आने की
मगर मुझे ख़बर थी तेरे जाने की

वो पल, जो पल भर के लिए हम को मिले थे
न उनमें कोई शिकवे थे, न उनमें कोई गिले थे

तेरी आवाज़ सहेज कर रखी है मैंने
पता था कि ख़ामोशी कायम होने वाली है

तुमने कभी बताया नहीं, कि कौन हो तुम
तफ़्तीश करता रहा, मैं ज़िन्दगी भर यही

इस बार जब मुलाक़ात होगी, तो पूछूँगा
इस मुलाक़ात में कितने अलविदा छुपे हैं

हर बार यह अलविदा मेरी जान ही ले लेता है
पता नहीं कब इसके मुँह, मेरा खून लग गया

तेरी तस्वीर संभाल कर रखी है मैंने
पता था कि याददाश्त जाने वाली है।।

#RockShayar

“बिन तेरे ख़यालों का क्या करूँ”

मुझे नहीं पता कि मैं क्या करूँ
बिन तेरे ख़यालों का क्या करूँ।

मुझे नहीं पता कि मैं क्या कहूँ
बिन तेरे लफ़्ज़ों को कैसे लिखूँ।

मुझे नहीं पता कि तुम किस गली में रहती हो
मुझे इतना पता है कि तुम मुझमें ही रहती हो।

मुझे नहीं पता कि तुम मुझे कितना चाहती हो
मुझे इतना पता है कि तुम उड़ना चाहती हो।

मुझे नहीं पता कि तुम मेरे बारे में क्या सोचती हो
मुझे इतना पता है कि तुम कुछ अच्छा सोचती हो।

मुझे नहीं पता कि तुम मेरे मन की डायरी पढ़ती हो 
मुझे इतना पता है कि तुम मेरी हर शायरी पढ़ती हो।

मुझे नहीं पता कि तुम्हें सच कैसे पता चलेगा
मुझे इतना पता है कि तुम्हें जल्द पता चलेगा।

जिस रोज़ पता चल जाये, दौड़ी चली आना
उस रोज़ ना चलेगा जानाँ, फिर कोई बहाना।

तब मुझे पता चलेगा कि मैं क्या हूँ
तब मुझे पता चलेगा कि मैं तेरा हूँ।

तब मुझे पता चलेगा कि मैं क्या कहूँ
लफ़्ज़ों के लबों पे नाम तुम्हारा लिखूँ।

मुझे नहीं पता कि मैं क्या करूँ
बिन तेरे अब अपना क्या करूँ।

मुझे नहीं पता कि मैं क्या कहूँ
बिन तेरे एक लम्हा कैसे जिऊँ।।

“सब अल्फ़ाज़ ख़त्म हो गये”

सब एहसास ख़त्म हो गये
सब जज़्बात ख़त्म हो गये।

ये किस दौर में आ गये हम
सब अल्फ़ाज़ ख़त्म हो गये।

ज़िन्दगी मजाक बनकर रह गयी
मजाक भी वो जिसपे न आये हंसी।

ख़ुशी के नाम से ही चिढ होती है
चिढ भी वो जो कम न होती कभी।

हद से ज्यादा बहुत गुस्सा आता है
गुस्सा भी वो जो खुद को जलाता है।

वफ़ा के नाम से ही ख़फ़ा हो जाते है
ख़फ़ा भी ऐसे के जैसे ज़फ़ा हो जाते है।

सब उम्मीदें ख़त्म हो गयी
सब हसरतें भस्म हो गयी।

अब उस दौर में आ गये हम
जहाँ मोहब्बतें रस्म हो गयी।।⁠⁠⁠⁠

“हर बार की तरह इस बार भी बहुत दूर हैं हम”

हर बार की तरह इस बार भी बहुत दूर हैं हम
हर बार की तरह इस बार भी बहुत मज़बूर हैं हम।

दूर जाने की चाहत, न तुम्हे है न मुझे है
पास न आने की हसरत, न तुम्हे है न मुझे है।

कोशिश ने भी अब तो कोशिश करना छोड़ दिया है
दिल के बेइरादा इरादे समझ चुकी है वो।

लेकिन हम हैं कि समझने को तैयार नहीं
आवारा मन हैं कि बदलने को तैयार नहीं।

हर बार की तरह इस बार भी वही गलती दोहरायेंगे हम
हर बार की तरह इस बार भी खुद को भूल जायेंगे हम।

गलती सुधारने की चाहत, न तुम्हे है न मुझे है
गलती न करने की हसरत, न तुम्हे है न मुझे है।

उम्मीद ने भी अब तो उम्मीद का साथ छोड़ दिया है
दिल के बेपरवाह इरादे समझ चुकी है वो।

लेकिन हम हैं कि समझने को तैयार नहीं
आवारापन हैं कि बदलने को तैयार नहीं।

हर बार की तरह इस बार भी वही भूल दोहरायेंगे हम
हर बार की तरह इस बार भी खुद को भूल जायेंगे हम।

यादों से मिटाने की चाहत, न तुम्हे है न मुझे है
दोबारा न मिलने की हसरत, न तुम्हे है न मुझे है।

किस्मत ने भी अब तो किस्मत का साथ छोड़ दिया है
दिल के बेमिसाल बहाने समझ चुकी है वो।

लेकिन हम हैं कि समझने को तैयार नहीं
बंजारापन हैं कि बदलने को तैयार नहीं।

मगर इस हर बार की तरह नहीं कुछ अलग होगा
मोहब्बत हो गयी है, सो दुश्मन ये सारा जग होगा।

अब जुदा-जुदा जीने की चाहत, न तुम्हे है न मुझे है
मोहब्बत में न लुटने की हसरत, न तुम्हे है न मुझे है।

ज़िंदगी ने भी अब तो ज़िंदगी का हाथ थाम लिया है
दिल के बेपनाह इरादे समझ चुकी है वो।

इसीलिए तो अब हम बहुत दूर रहने को तैयार नहीं
इसीलिए तो अब हम यह दूरी सहने को तैयार नहीं।।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

“लौटकर तो सिर्फ यादें आती हैं, कभी वो वक़्त नहीं”

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लौटकर तो सिर्फ यादें आती हैं, कभी वो वक़्त नहीं
उसकी कही बातें याद आती हैं, अब वो शख़्स नहीं।

सिर्फ पढ़ने से ही जिसे, जग उठे वो एहसास फिर से
ज़िंदगी सब कुछ लिख देती हैं, मगर वो लफ़्ज़ नहीं।

कह गये वो शायर सयाने, इश्क़ के जो थे दीवाने
मिल जाये जो बड़ी आसानी से, असल वो इश्क़ नहीं।

शिद्दत और मेहनत, शर्त यही के दोनों साथ हो
फिर पूरी न की जा सके जो, ऐसी तो कोई शर्त नहीं।

साये की किस्मत है, सुबह से शाम चलना और ढ़लना
धूप का तिलिस्म है ये तो, साये का अपना कोई अक्स नहीं।

ज़ईफ़ जिस्म का नहीं, जवां रूह का हुस्न है मोहब्बत
देखकर जिसे खुद नैन कहे, कभी देखा ऐसा नक्श नहीं।

वक़्त की बेवक़्त ख़ामोशी का, बयान है यह तो इरफ़ान
एक वक़्त के बाद सब लौट आते हैं, मगर वो वक़्त नहीं।।

http://www.rockshayar.wordpress.com⁠⁠⁠⁠

“तेरा मुझ से दूर होना”

तेरा मुझ से दूर होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद से दूर होना।

तेरा मुझ में शामिल होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद में शामिल होना।

तेरा मुझ पे ऐतबार होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद पे इख़्तियार होना।

तेरा मुझ को खुशियाँ देना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद को पा लेना।

तेरा मुझ से ज़ुदा होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद से ज़ुदा होना।

तेरा मुझ में साँस लेना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद में ज़िन्दा रहना।

तेरा मुझ पे यक़ीन होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद पे यक़ीन होना।

तेरा मुझ को बेपनाह चाहना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद को बेपनाह चाहना।।

“सुना है कि रात को कभी नींद नहीं आती”

सुना है कि रात को कभी नींद नहीं आती
बस यहीं जानने के लिए कभी सोया नहीं

अंदर ही अंदर, बहुत कुछ है जो बदल जाता है
ज़िन्दगी का सूरज भी बिना बताए ढ़ल जाता है

सुकून की तलाश में, ये पलकें खुली रहती हैं
कभी सो जाती है, तो कभी झपकती रहती हैं

चाँद की तरह हर रात, कोई ना कोई तो जलता है
तब कहीं जाकर इस, दिल का दरवाजा खुलता है

करवटें बदल बदल कर, यूं हर शब गुज़र जाती है
गुज़रे हुए लम्हों में, बातें वो बेनज़ीर नज़र आती है

ख़्वाब में सदा जो दिखता है, सच कहाँ वो होता है
एक तसव्वुर की तलाश में, दिल इतना क्यूं रोता है

अंधेरे के आगोश में ही तो, उजाला ये तमाम रहता है
चुपचाप सहता है सितम, किसी से नहीं कुछ कहता है

सुना है कि दर्द में भी मुस्कुराना पड़ता है
बस यहीं जानने के लिए कभी रोया नहीं ।

“खुद से खुद की, मुलाकातें नसीब हो गई”

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यादें यतीम हो गई, रातें रक़ीब हो गई
फितूर से भरी, कुछ बातें हबीब हो गई

लूट लेता है अक्सर, चैन को शोर यहाँ
कहते कहते यूँ, ख़ामोशी करीब हो गई

सुकूं अता कर, कुछ तो मुझको इलाही
दर्द सहते सहते, ज़िंदगी ग़रीब हो गई

आईने भी अब तो, पहचानते नही सूरत
बहते बहते जब से, आँखें अजीब हो गई

तन्हाई का बयां, है बस यही ‘इरफ़ान’
खुद से खुद की, मुलाकातें नसीब हो गई

‪#‎RockShayar‬ ‘इrफ़aन’

“दिल के कमरे पर ताला लगा रक्खा है”

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दिल के कमरे पर ताला लगा रक्खा है
हमने यादों पर जाला लगा रक्खा है

पहुँच ना सके, कोई भी उस दर तक
संगीन सा वो रखवाला लगा रक्खा है

मुकद्दर की दरारें, हो बुरी नज़र का वार
माथे पर निशान काला लगा रक्खा है

दर्द की तहरीर जो, बयां ना हो पाए तो
ग़म-ए-हिज़्र का हवाला लगा रक्खा है

जज़्बातों में जज़्बाती, ना हो जाये दिल
पहरा वो सबसे आला लगा रक्खा है

सुन ले ना कोई, आहें मेरी ‘इरफ़ान’
लबों पर हमने ताला लगा रक्खा है

‪#‎RockShayar‬ ‘IrFaN’

संगीन – पत्थर के जैसा
मुकद्दर – नसीब, भाग्य
तहरीर – लिखित दस्तावेज
ग़म-ए-हिज़्र – विरह पीङा
बयां – कहना
हवाला – स्पष्टीकरण
जज़्बात – भावना
आला – ऊँचा
लब – होंठ

“तन्हाई में हरदम जलता ही रहा”

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शब के अंधेरों में ख़लता ही रहा
गुनाहों में हरदम पलता ही रहा

सीने में सुकून की ख़ाहिश लिए
तन्हाई में हरदम जलता ही रहा

दौर-ए-ख़िज़ा वो जब आई तो
नूर का साया भी ढलता ही रहा

कदम दर कदम खुद से दूर होकर
अजनबी राहों पर चलता ही रहा

तन्हाई का बयां है ये “इरफ़ान”
बैचेनी में हरदम जलता ही रहा

‪#‎RockShayar‬

शब – रात
ख़लना – कमी महसूस होना
गुनाह – पाप
ख़ाहिश – इच्छा
तन्हाई – एकान्त
दौर-ए-ख़िज़ा – पतझङ का मौसम
नूर – प्रकाश
साया – परछाई

“ना मैं सोया रात भर यहाँ”

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अश्क़ भी ना बचे अब तो
इतना रोया रात भर यहाँ

बेवज़ह जाने किसके लिए
मैं था खोया रात भर यहाँ

सूजी सूजी ये आँखें मेरी
लोबान सी है साँसें तेरी

गमगीं निगाहें जर्द़ पनाहें
इतना रोया रात भर यहाँ

पुकारू तुझको या मौला
ना मैं सोया रात भर यहाँ

‪#‎RockShayar‬

“उदासी के बादल”

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रूठी हुई है ज़मीं, रूठा हुआ ये आसमां
छूटी हुई है ख़ुशी, छूटा हुआ ये कारवाँ

हर तरफ फैले है, उदासी के बादल यहाँ
भीगी पलकों से, रिस रहा काजल यहाँ

बेइरादा खताओं में, उलझा लिपटा हूँ
बेतहाशा जफ़ाओं में, ठहरा सिमटा हूँ  

जले बुझे ख़्वाबों की, उड़ रही है राख
अनछुँवे ख़्यालों की, मुड़ रही है शाख

जी रहा हूँ, पर जीने जैसा कुछ भी नहीं
पी रहा हूँ, पर पीने जैसा कुछ भी नहीं

रूठी हुई है ज़मीं, रूठा हुआ ये आसमां
टूटी हुई है कश्ती, टूटा हुआ ये आशियाँ

#RockShayar

“ज़िन्दगी जाने कहाँ छूट गई”

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रिहाई की वो उम्मीद टूट गई
पलकों से फिर नमी छूट गई

अंधेरों के समन्दर में आकर
इक कश्ती थी, वो भी टूट गई

बैचेनीयों से लङते लङते यूँ
तन्हाई मुझे शब भर लूट गई

खुद की तलाश में ‘इरफ़ान’
ज़िन्दगी जाने कहाँ छूट गई

“इस कदर कुशादा, मेरे ज़ज्बात है”

इस कदर कुशादा, मेरे ज़ज्बात है
हिज्र में अब क़ैद, मेरे दिन रात है

# रॉक शायर

कुशादा – विस्तृत, फैला हुआ
ज़ज्बात – संवेदना
हिज्र – विरह
क़ैद – अधीनता, बंधना, दासत्व

“रिहा कर उस दर्द से”


दिन तो जैसे तैसे करके, यूँही गुज़र जाता है
रात होते ही मगर, तन्हा ये दिल घबराता है

जीने की कोई वजह, अब तू ही बता दे खुदाया
या रिहा कर उस दर्द से, सीने में जो बसता है

“रातें मगर कटती नही”

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दिन कट जाता है यूँही, रातें मगर कटती नही
इन्तज़ार में किसके, ये साँसें मगर घटती नही

सितारें भी यहाँ, चाँद भी यहाँ, जुगनू भी यहाँ
सब कुछ है यहाँ, ख़्वाहिशें मगर मिटती नही

नींद के बादलों में, रहता है जो शायर सयाना
लिखता है वो लफ़्ज़ सभी, आहें मगर घटती नही

यूँ तो कट जाता है सफ़र, जागते हुए ‘इरफ़ान’
दीदार के लिए फ़क़त, निगाहें मगर हटती नही

© रॉकशायर

“मैं जब जज़्बाती होता हूँ, रो लेता हूँ”

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निगाहों को अश्क़ो से भिगो लेता हूँ 
मैं जब जज़्बाती होता हूँ, रो लेता हूँ 

रातभर चाँद को निहारते हुए 
ख्वाबों के आग़ोश में फिर सो लेता हूँ

यादों की नदी जब छलकती हैं 
जुनूं में बहकर पलकें धो लेता हूँ 

जुदाई में तुम्हे यूँ सोचते हुए 
दूर होकर भी तेरे पास हो लेता हूँ 

साँसों की माला जब टूटती हैं
हयात के बिखरे मोती पिरो लेता हूँ 

ग़मों की बंजर ज़मीं खुरच कर यूँ 
मैं ख़ुशी के बीज फिर बो लेता हूँ 

” मेरी तन्हाई “

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कोई भी ना समझ पाया अब तक मेरी तन्हाई को
महफ़िल में ये मुस्कुराती, रातभर रूह को जलाती
जाने किस मिटटी का बना है, बेवक़ूफ़ ये दिल मेरा 
जब भी इसको मना किया, याद बस तुमको किया
बहुत याद आता है, गुजरा हुआ वोह एक एक पल
नज़रो से नज़रे मिलाना, इशारो में रूठना मनाना
ऐसा भी क्या जादू किया, तेरी इक मासूम अदा ने 
कभी पागल, कभी दीवाना, कभी शायर कहती रही 
शिद्दत से मैं करता ही रहा, उस चाहत की इबादत
पर क्यूँ तुम जान ना पायी, टूटे दिल की गहराई को 
कितने ख्वाब यूँ बिखर गए, मुहब्बत की लहरो से
कच्चे मकान सब ढहते गए, उल्फत की बारिश में 
आवारा सी ये फितरत, जाने क्यूँ इतना सताती है 
हर लम्हा यूँ तड़पाती है, पल पल मुझे रुलाती है 
हौंसला फिर भी ना कम हुआ, हर दिन बढ़ता गया 
अब तो आदत सी हुई है, दर्द में यहाँ मुस्कुराने की

“मेरी लौ”

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लौ मेरी भभक रही, धीमे जल रहा हूँ मैं
सीने में सौ दर्द लिये, बस चल रहा हूँ मैं
ना कोई हमसफ़र है, ना कोई रहनुमा
अंधेरो में बस यहाँ, किस छोर है जाना
कोई नहीं यहाँ, बना सके जो राह आसां
लोग कहते है मुझे, इतना सीधा क्यूँ है
मेने कहा, रूह में सच्चाई ऐसे है घुली
जेसे लब से दुआ, रुख से अदा है जुडी
चाहे कितनी भी ठोकरें खायी हो मेने
दिल में वो ‘इरफ़ान’ अब तक है ज़िंदा
जिसे देखकर, मैं जी रहा हूँ तन्हाई में
जो भी मिला है यहाँ, अपना उसे माना
बगैर जाने हुये, सोहबत में रंग जाता
रेशमी वो अदा, कुछ इस तरह से भायी
दिल पर निगाहे, फिर बादलों सी छायी
मगर यह गुमां कहा, वो था सिर्फ ख्वाब
जिसे कभी ना कभी तो बिखरना ही था
उसे भुला ना पाया, खुद को मिटा रहा हूँ
नादान तब था, कीमत अब चुका रहा हूँ
लौ मेरी भभक रही, धीमे जल रहा हूँ मैं
सीने में सौ दर्द लिये, बस चल रहा हूँ मैं

“तन्हा दिल”

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दिन भर तो हँसते मुस्कुराते गुजर जाता है
रात होते ही मगर तन्हा ये दिल घबराता है

जीने कि इक वजह अब तूही बता दे खुदाया
या रिहा कर उस फितूर से दिल में जो बसता है