“चलते-चलते इतनी दूर आ गये क़दम”

चलते-चलते इतनी दूर आ गये क़दम
के लौटना जहाँ से नामुमकिन है अब।

वैसे भी क़दमों को रुकने की आदत कहाँ
ये तो वहीँ चले जाये, रास्ते ले जाये जहाँ।

जहाँ रास्तेभर रास्तों का सफ़र हो
और मंज़िल से दिल ये बेख़बर हो।

चलते-चलते इतनी दूर आ गये हैं हम
के लौटना जहाँ से नामुमकिन है अब।

वैसे भी हमको अब लौटने की चाहत कहाँ
हम तो वहीँ बस जाये, ज़िंदगी रहती जहाँ।

जहाँ ज़िंदगीभर ज़िंदगी बस एक सफ़र हो
फिर चाहे सामने मौत हो या मंज़िल, ना कोई डर हो। 

चलते-चलते इतनी दूर आ गये क़दम
के लौटना जहाँ से नामुमकिन है अब।।

RockShayar.wordpress.com

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“हिन्दी केवल एक भाषा नहीं”

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
सृजन की यह आभा है
हिन्दी केवल एक गाना नहीं
जीवन की जयगाथा है।

हिन्दी केवल एक वर्ग नहीं
विविधताओं का भंडार है
हिन्दी केवल एक तर्क नहीं
समीक्षाओं का संसार है।

हिन्दी बहुत सरल है
प्रकृति जिसकी तरल है
संवेदनाओं की भूमि में
यह परिपक्व फसल है।

हिन्दी केवल मातृभाषा नहीं
संवैधानिक एक पर्व है
हिन्दी केवल राजभाषा नहीं
गणतांत्रिक यह गर्व है।

हिन्दी केवल एक बोली नहीं
चिंतन की यह उपमा है
हिन्दी केवल एक मोती नहीं
मंथन की यह महिमा है।

अभिव्यक्ति का अंश है
यह न कोई अपभ्रंश है
आदिकाल से भी आदि
सभ्यताओं का वंश है।

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
जीवन की यह ज्वाला है
हिन्दी केवल परिभाषा नहीं
सृजन का यह प्याला है।

हिन्दी केवल एक संकाय नहीं
ज्ञान की यह दृष्टि है
हिन्दी केवल एक पर्याय नहीं
सम्मान की यह सृष्टि है।

इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं
के साहित्यिक पतन रोकती यही
पठन-पाठन अतिसुंदर लेखन
लोक-लुभावनी लोकोक्ति यही।

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
जीवन की जिज्ञासा है
हिन्दी केवल एक आशा नहीं
मन की महत्वाकांक्षा है।

हिन्दी केवल एक मंत्र नहीं
आध्यात्मिक अनुनाद है
हिन्दी केवल एक छंद नहीं
यह आत्मिक अनुवाद है।

अनुदार नहीं बहुत उदार है यह
उद्वेलित मन का उपहार है यह
वैचारिक व्याकरण से सुसज्जित
हृदय का उद्दीप्त उद्गार है यह।

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
जीवन की जिजीविषा है
हिन्दी केवल अभिलाषा नहीं
सृजन की सही दिशा है।

हिन्दी केवल एक मुक्तक नहीं
मर्म की मधुशाला है
हिन्दी केवल एक पुस्तक नहीं
कर्म की पाठशाला है।

राष्ट्रीय गौरव है यह
शासकीय सौरव है यह
क्लिष्ट और कर्कश नहीं
मधुर कलरव है यह।

हिन्दी केवल एक पथ नहीं
चिंतन की उपमा है
हिन्दी केवल एक रथ नहीं
मंथन की महिमा है।

हिन्दी केवल चलचित्र नहीं
अभिव्यक्ति का संगीत है
हिन्दी केवल एक क्षेत्र नहीं
अनुभूति का यह गीत है।

हिन्दी केवल एक प्रदेश नहीं
बल्कि संपूर्ण भारत है
हिन्दी केवल राजआदेश नहीं
बौद्धिक अभिभावक है।

हिन्दी केवल शब्दकोश नहीं
विधाओं का विस्तार है
हिन्दी केवल ज्ञानकोश नहीं
मेधाओं का मल्हार है।

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
कवि की कविता है
हिन्दी केवल एक आशा नहीं
रवि की सविता है।

हिन्दी केवल एक अक्षर नहीं
यह विशिष्ट योग्य वर्ण है
हिन्दी केवल हस्ताक्षर नहीं
अपितु हृदय का दर्पण है।

हिन्दी केवल मातृभाषा नहीं
सृजन की यह आभा है
हिन्दी केवल राष्ट्रभाषा नहीं
जीवन की महागाथा है।।

-राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान⁠⁠⁠⁠

“आओ चलें फिर इरफ़ान की गली”

 

लफ़्ज़ों को हँसते मुस्कुराते ग़मगीन हो आंसू बहाते 
किसी ने देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।

समंदर से वसीह दिल में लहरों की तरह जज़्बात उठते 
उन लहरों से उठते जज़्बातों को] लफ़्ज़ों में तब्दील करते
किसी को देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।

रूहानियत की क़लम में स्याही शिद्दत की भरकर
इक कोरे काग़ज़ को अनमोल बनाते 
किसी को देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।

एक शख़्स में छुपी हज़ार शख्सियतें
एक इंसां को एलियन में तब्दील होते
उम्र गुज़ार खुद में अंदाज़ अलहदा पाते
किसी को देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।

गर्दिशों के सियाह अंधेरों में चश्मा-ए-नूर बहाते 
हादसों में खुद ही को खुद का हौसला बढ़ाते
हर ग़म की खुशी मनाकर ग़म को कन्फ्यूज करते
किसी को देखा है कभी 
गर ना देखा तो चलो मेरे यार की गली 
आओ चलें फिर इरफ़ान की गली।।

“डायरी से निकलकर, बाहर आ गई वो नज़्म”

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पढ़ रहा था कल
मैं जब
अपनी इक नज़्म को
दिलवालों के शहर की
सब्ज़ हसीन वादियों में
टाईटल था जिसका
“एक ज़िंदा नज़्म है वो”
उसे पढ़ते हुए, मैने वहाँ
एक नज़्म और देखी
ठीक सामने बैठी हुई
मद्धम हल्की मुस्कान
निगाहें मयक़दा जाम
लब यूँ ख़ामोश पैग़ाम
ज़ुल्फ़ें वो लहराती शाम
ना जाने क्यूँ
मेरी नज़्म की
वो सारी खूबियां
मैच हो रही थी
उसमें एकदम
यूँ लग रहा था
मानो
डायरी से निकलकर
बाहर आ गई वो नज़्म
कुछ देर धूप सेंकने
बड़े दिनों से
जो क़ैद थी
कागज़ की पनाहों में
इसीलिए शायद
जगह जगह से
सिकुड़ गए है
पन्नें सभी

मुख़्तलिफ़ चेहरे बैठे थे
हुजूम बना कर यहाँ वहाँ
मगर, ज़हन में मेरे
बस, वो ही एक चेहरा
तैर रहा था यूँ
जैसे, आसमां में
तैरता है चाँद
और, रोशनी में जिसकी
ओझल हो जाते है
सब सितारें

नज़्म पूरी हुई
तो ख़्याल आया
अरे, ये तो वही नज़्म है
अक्सर
ख़्वाबों में आकर
हर रोज मुझसे
जो बातें करती है
बाद उसके
एक ग़ज़ल, और पढ़ी मैंने
जिक्र था जिसमे
अपनी तन्हा रातों का

सब कुछ वैसे ही हुआ
जैसा सोचा था मैंने
बस, एक करिश्मा
पहली दफ़ा देखा
अपनी नज़्म को
यूँ, अपने से ही
नज़रें चुराते देखा
दिल मेरा
फिसल गया
उस वक़्त
वही पर कहीं
जब डायरी से निकलकर
बाहर आ गई वो नज़्म
और मैं यूँही
टकटकी बाँधे
बस
देखता ही जा रहा था उसे
तकता ही जा रहा था उसे

© RockShayar
(Irfan Ali Khan)