“बिना रास्तों के सफ़र सफ़र कहाँ है”

अंदर से अनजान तू बाहर कहाँ है
बिना रास्तों के सफ़र सफ़र कहाँ है।

जिसे ढूँढ रहा है कई बरसों से तू
रेत का वो घरौंदा तेरा वो घर कहाँ है।।
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“गैरों के लिए अपना और अपने लिए पराया बन गया”

साये का पीछा करते-करते खुद एक साया बन गया
अपनी छाया पीछे छोड़कर किसी और की छाया बन गया

सफ़र की दर बदर दास्तान, हमसे ना पूछो इरफ़ान
गैरों के लिए अपना और अपने लिए पराया बन गया।


 

“सोच को अमल में लाने की कोशिश करता हूँ”

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सोच को अमल में लाने की कोशिश करता हूँ
मैं खुद को खोकर खुद को पाने की कोशिश करता हूँ

दुनिया तो तोहमते लगाती आयी हैं, लगाती रहेगी
मैं टूटने से पहले हर रिश्ते को निभाने की कोशिश करता हूँ

मुद्दत से सफ़र में हूँ, थकने लगे हैं पैर आजकल
मैं थके हुए पैरों को फिर से चलाने की कोशिश करता हूँ

जब तक परवाह करता हूँ, बेपरवाह होकर करता हूँ
मैं नाराज़ होकर अक्सर हक़ जताने की कोशिश करता हूँ

वक़्त का तूफ़ान आकर, बिखेरता है जब भी मुझे
मैं धीरे-धीरे फिर से अपने क़दम जमाने की कोशिश करता हूँ

वज़ूद को चट्टान बनाकर, रहना उसमें बहुत मुश्किल है
मैं बेदर्द बन चुके दर्द को पिघलाने की कोशिश करता हूँ

लफ़्ज़ों से मेरा रिश्ता, लफ़्ज़ों में बयां नहीं हो सकता
मैं क्या सोचता हूँ बस यही बताने की कोशिश करता हूँ।

“रात को जब भी हवायें चलती हैं”

रात को जब भी हवायें चलती हैं
तुम्हारे क़दमों की आहट सुनाई देती है

ये हवायें मुझको अपने साथ ले जाती हैं
बादलों के पार आसमान की सैर कराती हैं

मैं किसी परिंदे सा उड़ने लगता हूँ
मन के गगन की ऊँचाई छूने लगता हूँ

ये बादल रूई के ढेर जैसे लगते हैं
तुझको छूते ही बरसने लगते हैं

मैं प्यासी ज़मीन सा टपकते लम्हों की राह देखता हूँ
बस एक क़तरे की आस में पल-पल तरसता हूँ

क़तरा भी वो जो रूह को तर कर दे
लम्हा भी वो जो शाम को सहर कर दे

रात को जब भी हवायें चलती हैं
तुम्हारे मन की मुस्कुराहट दिखाई देती है

ये हवायें मुझको अपने साथ ले जाती हैं
बादलों के पार ख़्वाबों का इक नया जहां दिखाती हैं

रातभर यादों का वास्ता देकर नींद को जगाती हैं
ख़ामोशी में रूपोश है जो, वो आवाज़ देकर तुम्हें बुलाती हैं।

“अलविदा”

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नया दौर तभी आता है, जब पुराना दौर चला जाता है
खुशी और ग़म के इस अमलगम को अलविदा कहा जाता है

दिलों दिमाग़ दोनों हक्के-बक्के रह जाते हैं
समय के अभिनय को वो समझ नहीं पाते हैं

किसी के चले जाने के बाद ही उसकी कमी ख़लती है
दूरियों का ये दस्तूर भी खुद वक़्त के हाथों मज़बूर है

आना-जाना तो ज़िंदगी के चलते रहने की कहानी है
और चलते रहना ही इसके ज़िंदा होने की निशानी है

दोनों ही सूरतों में एक वक़्त ही तो है जो गुज़र जाता है
बाक़ी तो हरएक पल दिल बीती बातों का घर बनाता है

खुशी क्या है, ग़म क्या है, हँसी क्या है, मातम क्या है
ये सब तो सिर्फ जज़्बातों के हाथों की कठपुतलियां हैं

अलविदा कहते हुये अक्सर यह ज़बान लड़खड़ा जाती है
वज़्नी हर्फ़ बोलने का शर्फ़, ठीक उसी वक़्त भूल जाती है

मुलाक़ात से ज्यादा हमेशा रुख़्सत पर ध्यान क्यों दिया जाता है
वक़्त को बार-बार उसके वक़्त होने का एहसास कराया जाता है

इस बार अलविदा को ही अलविदा कहने की सोच रहा हूँ
खुद को पहले से ज्यादा अलहदा बनाने की सोच रहा हूँ।

“मैं आजकल ज़िंदगी जी रहा हूँ”

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बासी लम्हों को पीछे छोड़कर
ताज़ा हवा में साँस ले रहा हूँ
खुद से किये वादे निभा रहा हूँ
मैं आजकल ज़िंदगी जी रहा हूँ

मन की अर्ज़ी सुनकर, मनमर्ज़ी करने लगा हूँ
उधड़ी क़िस्मत सीने, दिल से दर्ज़ी बन गया हूँ

ज़र्रा भी फ़र्क़ नहीं पड़ता, चाहे कोई कुछ भी कहे
आज़ाद हो चुकी हैं राहें, दरिया के जैसे ये अब बहे

दिल की गली को रोशन करके
खुली आँखों से ख़्वाब देख रहा हूँ
आसमां छूने के इरादे बना रहा हूँ
मैं आजकल ज़िंदगी जी रहा हूँ

आज मैं जीने की आदत ने, कल को भुलाने में साथ दिया
फिसलकर जब भी गिरा, अपने साये ने हमेशा हाथ दिया

वक़्त से जो भी वक़्त मिला, उसे जी लिया
दर्द को हमदर्द मानकर, गले से लगा लिया

बासी लम्हों को पीछे छोड़कर
ताज़ा हवा में साँस ले रहा हूँ
खुद से किये वादे निभा रहा हूँ
मैं आजकल ज़िंदगी जी रहा हूँ।

“पानी का जो रंग है, वही मेरा रंग है”

पानी का जो रंग है, वही मेरा रंग है
मिट्टी सा मटमैला, हवाओं सा मलंग है

ज्यादा देर एक जगह रुकता हूँ तो काई जम जाती है
मुझमें किसी और की परछाई नज़र आती है

पानी का जो ढंग है, वही मेरा ढंग है
बर्फ़ सा सख़्त, भाप सा पतंग है

रहने-बहने को जो मिल जाये उसी में ढल जाता हूँ
मैं एहसास की गर्मी पाकर पिघल जाता हूँ

पानी का जो रंग है, वही मेरा रंग है 
आकाश सा नीला, बादलों सा बदरंग है

नदी तालाब झील समंदर, क्या कुछ नहीं है मेरे अंदर
जितना बाहर फैला हुआ हूँ, उतना ही मैं गहरा हूँ अंदर

पानी का जो रंग है, वही मेरा रंग है
मिट्टी सा मटमैला, हवाओं सा मलंग है।

“चलते रहना ही ज़िंदगी है”

 

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हर तरफ घना कोहरा है
कुछ भी नज़र नहीं आ रहा है

ऐसे वक़्त में आगे बढ़ना बहुत मुश्किल है
लेकिन मुश्किल के ठीक आगे खड़ी मंज़िल है

धीरे-धीरे क़दमों को आगे बढ़ाना है
धुंध में चलने का एक यही सलीक़ा है

जब कुछ भी नज़र ना आये
तब चलते रहना ही बेहतर है

कई बार वक़्त को भी वक़्त लगता है
नूर का दरख़्त बनने में, धुंध छटने में

जब सोचने-समझने की आदत काम ना आये
तब क़दमों के चलने की आदत ही काम आती है

कोहरे का असर ज्यादा देर नहीं रहता है
रौशनी के आते ही यह गायब हो जाता है

धुंध में एक बात सीखी है
चलते रहना ही ज़िंदगी है।

“निगाहें क़दमों को रोकने की कोशिश करती हैं”

जाते वक़्त पलटकर ना देखा करो
निगाहें क़दमों को रोकने की कोशिश करती हैं

रुख़्सत के वक़्त अलविदा कहना, 
पल में पलकों को गीला कर देना
हो न हो मुझे यह वक़्त की साज़िश लगती है

तुझे याद करने का बहाना,
इतना हसीन है ये फ़साना
के भरी दोपहरी में बेमौसम बारिश बरसती है

वैसे तो ज़िंदगी को फ़ुर्सत नहीं, 
ज्यादा किसी से ये मिलती नहीं
पर जब भी मिलती है जीने की गुज़ारिश करती है

नज़रों की इतनी ख़ता हैं, 
नज़रें तो दिल का पता हैं
बिछुड़ते वक़्त फिर से मिलने की ख़ाहिश रखती हैं

चार दिन की ज़िंदगी,
रूह की यह तिश्नगी
रब से थोड़ी और मोहलत की सिफ़ारिश करती है

कहीं कोई कमी न रह जाये, 
घाव कोई ज़ख़्मी न रह जाये
हर बार हर कोशिश बस यही कोशिश करती है।

“क्या बादलों पे चलना चाहते हो”

क्या बादलों पे चलना चाहते हो
तुम गिरके फिर संभलना चाहते हो

तो खोल दो अपने वो पंख सारे
गर परिंदों के जैसे उड़ना चाहते हो

पहले अपने दिल को रौशन करो
गर रौशनी के जैसे दिखना चाहते हो

बेतहाशा सब्र रखो और दर्द चखो
गर आग के जैसे जलना चाहते हो

मिटा दो मन के अँधेरे वो सारे
गर सूरज के जैसे बनना चाहते हो

थमना नहीं है कहीं, बात यही है सही
गर सफ़र के जैसे चलना चाहते हो

ज़िन्दगी को हँसकर गले लगाओ, नाचो गाओ ख़ुशी मनाओ
गर ज़िन्दगी के जैसे जीना चाहते हो।

“दिल की बेचैनी का अक्स अश्क़ों में नज़र आता है”

यह किसका असर है जो लफ़्ज़ों में नज़र आता है
दिल की बेचैनी का अक्स अश्क़ों में नज़र आता है

बारिश को बाहों में भरकर भी जो प्यासा रहता है
बेसब्र सा वो अब्र तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में नज़र आता है

कभी पल में गुज़र जाता है, कभी गुज़रता ही नहीं
वक़्त का यह हसीं सितम किश्तों में नज़र आता है

तक़्दीर का एक तूफ़ान, सब कुछ तबाह कर गया
दिल का दरख़्त उजड़ा कई हिस्सों में नज़र आता है

जिन रिश्तों की बुनियाद, यक़ीन पर टिकी होती हैं
अपनेपन का एहसास उन रिश्तों में नज़र आता है

ये दुनियावाले हैं, दुनियादारी की ही बातें करेंगे
रूह का साया भी इन्हें तो जिस्मों में नज़र आता है

शायर की डायरी में, छुपे हैं कई अनछुए से जज़्बात
बंजर दिल का मंज़र उसकी नज़्मों में नज़र आता है।

 

 

 

 

 

 

“वो रास्ता”

जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं
तब एक रास्ता खुलता है
देखने में जो अजनबी लगता है
पर वो रास्ता इंतज़ार करता है
हमारा और हम उसका
दोनों की मुलाक़ात कब होगी कोई नहीं जानता।

ज़िंदगी की भूल भुलय्या में कई रास्ते हैं
आने-जाने के लिये
लेकिन सही रास्ता कौनसा हैं
यह तो उस पर चलने के बाद ही पता चलता है।

क़दमों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
इस बात से के रास्ता कौनसा हैं
ये तो बस चलना जानते हैं
आगे बढ़ना जानते हैं।

सो मैंने भी इस बार क़दमों को रुकने नहीं दिया
बल्कि चलने दिया
आगे बढ़ने दिया
अपना रास्ता खुद चुनने दिया
शायद वो इंतज़ार ख़त्म होने वाला है
मेरा और मेरे रास्ते का।

“मन तो मन है बेवज़ह सोचता है”

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क्या चाहता है ये क्या बोलता है
मन तो मन है बेवज़ह सोचता है

पल में राज़ी पल में उदास
नहीं रहता इसे होशो हवास

समझदार होकर भी नादान है, ये खुद से ही परेशान है
सबकी ख़बर रखने वाला ये मन खुद से ही अनजान है

प्यार भी यही है, तक़रार भी यही है
ना उतरे जो वो खुमार भी यही है

आवारा होके हर जगह घूमता है
मन तो मन है बेवज़ह झूमता है

बेकाबू मन को जिसने भी काबू किया
दिलो दिमाग़ पर उसी ने जादू किया

अभी इधर तो अभी उधर
नहीं इसकी कोई अपनी डगर

बंजारा बनके यहाँ वहाँ डोलता है
मन तो मन है बेवज़ह सोचता है।

“कुछ ऐसे मिले वो हमसे के हमारी दुनिया बन गये”

कुछ लम्हे लम्हे ही रहे, कुछ लम्हे सदियाँ बन गये
कुछ ऐसे मिले वो हमसे के हमारी दुनिया बन गये

कई दिनों से इंतज़ार, कर रही है ज़िंदगी धूप का
रंजो ग़म में डूबे लम्हे ठिठुरती हुई सर्दियाँ बन गये

हिज़्र-ए-दिलबर का असर, दिल पर कुछ ऐसा हुआ
के नज़रों के ख़ामोश ख़त बहती हुई नदियाँ बन गये

नज़र नहीं आता कुछ भी, दिल को अपने ही घर में
दर्द से सराबोर अल्फ़ाज़ दिल की अँखियाँ बन गये

सालों बीत गए हैं, नींद को सोये हुए, नैनों को रोये हुए
बचाकर रखे जो ख़्वाब वो नींद का तकिया बन गये

पहले जिससे मोहब्बत थी, उससे अब नफ़रत हो गई
दिल के सब अरमान मानो जलता हुआ दिया बन गये

दोनों ने बहुत कोशिश की, रिश्ते को बचाने की खातिर
पता नहीं ऐसा क्या हुआ जो फ़ासले दरमियाँ बन गये।

 

 

 

 

 

“किसे होता यहाँ खुद पे गुमान नहीं”

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यह तज़ुर्बा भी इतना आसान नहीं
किसे होता यहाँ खुद पे गुमान नहीं

किराये की बस्ती है, ये दुनिया ये महफ़िल
यहाँ किसी का अपना मकान नहीं

चुरा के शख़्सियत, पहन लेता हूँ अक्सर
मेरी अपनी कोई पहचान नहीं

पहले लुटा, फिर टूटा, फिर रूठा
दिल अब पहले सा नादान नहीं

हँसते हुये जलना, सीख लिया है इसने
यूँ होता आजकल परेशान नहीं

चंद पल मिले हैं, गुज़र जायेंगे
मेहमान हैं ये पल मेजबान नहीं

तीर तो तैयार है कब से, दिल चीरने को
कसी हुई मगर नज़रों की कमान नहीं।

“कई दिनों से दिल में एक बात है”

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कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से खामोश जज़्बात हैं

कई दिनों से आँखें सोई नहीं हैं
कई दिनों से आँखें रोई नहीं हैं

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से बंजर ये बरसात है

कई दिनों से यादें याद आ रही हैं
कई दिनों से यादें दिल जला रही हैं

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से बेचैन यह रात है

कई दिनों से सुकून खो गया है
कई दिनों से जुनून गुमशुदा है

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से गुमसुम आवाज़ है

कई दिनों से मैं कहीं और हूँ
कई दिनों से मैं कोई और हूँ

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से बेअसर अल्फ़ाज़ हैं

कई दिनों से सफ़र की सोच रहा हूँ
कई दिनों से लहर को खोज रहा हूँ

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से अजनबी अंदाज़ है

कई दिनों से साँस नहीं ले पा रहा हूँ
कई दिनों से कुछ नहीं कह पा रहा हूँ

कई दिनों से दिल में एक बात है
कई दिनों से मुसल्सल ये रात है

कई दिनों से सूरज निकला नहीं है
कई दिनों से वक़्त ये बदला नहीं है

शायद इसीलिए मैं बदल गया
और वक़्त वहीँ पर ठहर गया

खुद को बदलने की कोशिश में
दिल का कच्चा घर जल गया

ज़हन की सयानी साज़िश में
दिल का बच्चा घर जल गया

कई दिनों से दिल में एक बात है
लगता है वही मेरी असल ज़ात है

एक बात जो अब हर घड़ी मेरे साथ है
एक बात जो अब हर पल मेरे पास है।

“बर्फ़ से ढके हुये पहाड़ मुस्कुरा उठते हैं”

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बर्फ़ से ढके हुये पहाड़ मुस्कुरा उठते हैं
जब भी इनसे कोई मिलने आता है

यह अलग बात है कि लोग यहाँ पर घूमने आते हैं
पर इन्हें लगता हैं, इनका हालचाल पूछने आते हैं

सर्दियों में सूरज से इनकी दोस्ती हो जाती है
इसी ख़ुशी में शबनम की बूँदें छलक आती हैं

बर्फ़ की सफ़ेद चादर के नीचे एक और चादर है
तन्हाई की काली चादर, दर्द छुपाने की ख़ातिर

पहाड़ों पर जो पेड़ हैं, वो तिरछे से लगते हैं
शायद वो काली चादर को चूमना चाहते हैं

बरसों से जिसने इन्हें आपस में बांध रखा हैं
बिना किसी डोर के, ख़ामोश से उस शोर से

बर्फ़ से लदे हुये पहाड़ मुस्कुरा उठते हैं
जब भी इन पे कोई क़दम रखता है

यह अलग बात है कि वो ऊपर चढ़ता है
पर इन्हें लगता है ये नीचे उतर रहे हैं

बर्फ़ से ढके हुये पहाड़ मुस्कुरा उठते हैं
जब भी इनसे कोई मिलने आता है।

“तुम मेरा सफ़र हो”

वादियों के जहान में रहने वाली, क्या तुझे मैं याद नहीं
ऐसा तो कोई लम्हा नहीं, जिसमें तू होती मेरे साथ नहीं

यह बात अलग है कि मोहब्बत मेरी इकतरफ़ा है
मगर यह क्या कम है कि अंदाज़ मेरा अलहदा है

बहुत दिन हो गये हैं, ख़्वाब में भी तुम्हारा ख़्वाब नहीं आया
बिना बहाने के भी कभी-कभी मुलाक़ात हो सकती है, हैं ना !

न कोई तसव्वुर पे बंदिश, न कोई ख़यालों में जुंबिश
कोई तो इशारा दो, चाहे वो गुज़ारिश या हो वो बारिश

बेनज़ीर सी वो बातें, मुझे तो अब तक सब याद हैं
यह अलग बात है कि तुम्हें मेरी याद ही नहीं आती

न शाम में हो न सहर में हो, मालूम नहीं किधर को हो
आख़िर मैंने भी यह मान लिया, कि तुम मेरा सफ़र हो
आख़िर मैंने भी यह जान लिया, कि तुम मेरा सफ़र हो

मेरे दिल के घर में रहने वाली, क्या तुझे मैं याद नहीं
ऐसा तो कोई पल नहीं, जिसमें तू होती मेरे साथ नहीं।

 

“उदास नहीं होता मैं अब, खुश रहने की आदत हो गई”

उदास नहीं होता मैं अब, खुश रहने की आदत हो गई
एहसास नहीं होता ये अब, दिल को ये आदत हो गई

अपने आप से पूछता हूँ, आजकल मैं कई सवाल
वही सवाल, जिनके जवाब मुझको भी नहीं पता

दिल का दिल बैठ जाता है, जब भी वो वक़्त आता है
वही वक़्त, जिसमें कि खुद वक़्त भी ठहर जाता है

तुमसे मिलने की उम्मीद अब भी क़ायम है 
और उम्मीद पर तो दुनिया क़ायम है

उदास होने पर एक जगह बैठ जाता हूँ
सोचना-समझना सब बंद कर देता हूँ

मेरे अंदर जो शख़्स है, उसे मेरी बड़ी फिक्र है
एक वही तो है, जो हमेशा मेरा ख्याल रखता है

कभी-कभी वो मुझको गले से लगा लेता है
और कभी-कभी अपना मुँह फेर लेता है

शिकायत है उसे तो बस उस उदासी से
जो कभी मिटती नहीं इस वक़्त के साथ।

“अपने अंदर खुद रहा ही ना मैं”

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अपने अंदर उस शख़्स को, बहुत पहले मार चुका हूँ मैं
जिस शख़्स की वज़ह से एक दिन, बहुत रोया था मैं।

मौत के एहसास की तरह था वो एहसास
जिस एहसास ने महीनों तक तड़पाया मुझे।

खुद से इस क़दर नफ़रत हो गयी थी
के कोई और बनकर जीना आदत हो गयी थी।

गुमनामी के अंधेरे से बचने के लिये
अपना नाम तक बदल लिया था मैंने।

मगर सितमगर माज़ी की परछाई, साथ कहां छोड़ती है
जिस तरफ न जाना हो, कदम यह उसी तरफ मोड़ती है।

बरसों लग गये मुझे, खुद को यह समझाने में
के कोई कसर न छोड़ी मैंने, खुद को आज़्माने में।

दर्द था जितना भी दिल में, काग़ज़ पर सब उड़ेल दिया
बद्दुआओं की बुनियाद पर, खड़ा यादों का महल किया।

खुद से भागते-भागते, आ पहुँचा उसी मोड़ पर
जिस मोड़ पर छोड़कर गया था, एक दिन मैं लाश अपनी।

अब किसे दफ़्नाऊं
और किसे जलाऊं
जब अपने अंदर खुद रहा ही ना मैं।

अब किसे सताऊं
और किसे रुलाऊं
जब अपने अंदर कुछ बचा ही ना मैं।।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

“लौटकर तो सिर्फ यादें आती हैं, कभी वो वक़्त नहीं”

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लौटकर तो सिर्फ यादें आती हैं, कभी वो वक़्त नहीं
उसकी कही बातें याद आती हैं, अब वो शख़्स नहीं।

सिर्फ पढ़ने से ही जिसे, जग उठे वो एहसास फिर से
ज़िंदगी सब कुछ लिख देती हैं, मगर वो लफ़्ज़ नहीं।

कह गये वो शायर सयाने, इश्क़ के जो थे दीवाने
मिल जाये जो बड़ी आसानी से, असल वो इश्क़ नहीं।

शिद्दत और मेहनत, शर्त यही के दोनों साथ हो
फिर पूरी न की जा सके जो, ऐसी तो कोई शर्त नहीं।

साये की किस्मत है, सुबह से शाम चलना और ढ़लना
धूप का तिलिस्म है ये तो, साये का अपना कोई अक्स नहीं।

ज़ईफ़ जिस्म का नहीं, जवां रूह का हुस्न है मोहब्बत
देखकर जिसे खुद नैन कहे, कभी देखा ऐसा नक्श नहीं।

वक़्त की बेवक़्त ख़ामोशी का, बयान है यह तो इरफ़ान
एक वक़्त के बाद सब लौट आते हैं, मगर वो वक़्त नहीं।।

http://www.rockshayar.wordpress.com⁠⁠⁠⁠

“सुबह-सुबह नंगे पाँव घास पर चलकर ऐसा लगा”

सुबह-सुबह नंगे पाँव
घास पर चलकर ऐसा लगा
मानो कई दिनों के बाद
आज खुलकर साँस ली है।

पैरों ने बड़ी राहत महसूस की
मगर घास थोड़ी घबरायी हुयी सी लग रही है।

शायद ! इसे अपने कुचल दिये जाने का डर है।

कभी-कभी लगता है कि
ये ज़िन्दगी भी कुछ ऐसी ही है।

कुचल दिये जाने के डर से
खुद को ज्यादा ख़्वाब नहीं देखने देती है।

पता नहीं !
कब कौन आकर कुचल दे
इसके नाजुक ख़्वाबों को
अपनी राहत के लिये।

कुछ चीजे कभी समझ नहीं आती
शायद ! इसीलिए ज़िन्दगी को ज़िन्दगी कहते है।

क्योंकि यह एक पल में पूरी सदी है
और सदियों में सिर्फ एक पल।।

“तेरा मुझ से दूर होना”

तेरा मुझ से दूर होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद से दूर होना।

तेरा मुझ में शामिल होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद में शामिल होना।

तेरा मुझ पे ऐतबार होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद पे इख़्तियार होना।

तेरा मुझ को खुशियाँ देना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद को पा लेना।

तेरा मुझ से ज़ुदा होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद से ज़ुदा होना।

तेरा मुझ में साँस लेना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद में ज़िन्दा रहना।

तेरा मुझ पे यक़ीन होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद पे यक़ीन होना।

तेरा मुझ को बेपनाह चाहना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद को बेपनाह चाहना।।

“दिन और रात के दरमियाँ पूरी ज़िंदगी गुज़र जाती है”

अलसुबह सुबह से जब गले मिलता हूँ
फिर पूरा दिन उसकी बाहों में रहता हूँ।

सूरज की किरणों से मिलती हैं ताकत मुझे
अपने हरकिरदार से है सच्ची मोहब्बत मुझे।

तपती हुई दोपहर हरपहर बस यही कहती है
धूप-छाँव तो यूँही ज़िंदगीभर चलती रहती है।

हरशाम शाम मुझे अक्सर यूँ थाम लेती है
खुशियों को हरबार नया एक नाम देती हैं।

ख़याल भी तभी आते हैं, जब रात हो जाती है
ख़्वाब भी तभी आते हैं, जब रात सो जाती है।

रात के आगोश में टिमटिमाते हैं कई सितारें
रात के आगोश में पास बुलाते हैं कई सितारें।

दिन और रात के दरमियाँ पूरी ज़िंदगी गुज़र जाती है
पास जाकर जो देखो कभी, ये बड़ी दूर नज़र आती है।

हरपल का मज़ा लो, यहाँ तुम हरपल खुलकर जियो
हरसुबह चाहत की अदरक वाली चाय बनाकर पियो।।

#राॅकशायर⁠⁠⁠⁠

“इस दुनिया से अलग एक दुनिया है मेरी”

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इस दुनिया से अलग
एक दुनिया है मेरी।

जब भी डर लगता है
वहाँ चला जाता हूं।

वहाँ डर नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ घर नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ अपने नहीं हैं, सिर्फ खुशी है
वहाँ सपने नहीं हैं, सिर्फ खुशी है।

वहाँ मक़सद नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ हसरत नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ दीवारें नहीं हैं, सिर्फ खुशी है
वहाँ किनारे नहीं हैं, सिर्फ खुशी है।

वहाँ होड़ नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ दौड़ नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ तड़पना नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ तरसना नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ उम्मीद नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ ईद नहीं है, फिर भी खुशी है।

वहाँ हँसी है, सिर्फ हँसी है
वहाँ खुशी है, सिर्फ खुशी है।।

“मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है”

तेरे साथ बिताया वक़्त बड़ी जल्दी गुज़र जाता है
मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है।

रास्तेभर यही सोचता हूं कि अब आगे क्या?
ज़िंदगी से कुछ लम्हे चुराकर भागे क्या?

याद न करने के बहाने से तुम्हे याद कर लेता हूं
मैं नज़रों से दिल की बेचैनी आज़ाद कर देता हूं।

वक़्त के साथ-साथ वक़्त की सिफ़त बदल जाती हैं
बदलते-बदलते इसकी हरएक आदत बदल जाती हैं।

दूरियों के दरवाज़े अक्सर बड़ी देर से खुलते हैं
पर मज़बूरियों के मकान बड़ी जल्दी बन जाते हैं।

ज़ेहन की परछाई से परे होते हैं जज़्बात
दिल की गहराई से जुड़े होते हैं जज़्बात।

अगर एहसास है धागा तो यह मन अपना चरखा हैं
उम्मीद की उँगलियों से हमने दिल को थाम रखा हैं।

तेरे साथ गुज़ारा वक़्त बहुत जल्दी गुज़र जाता है
मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है।।⁠⁠⁠⁠

“न मुझे इख़्तियार दिया, न मेरा इंतज़ार किया”

न मुझे इख़्तियार दिया, न मेरा इंतज़ार किया
ऐ ज़िंदगी तूने मेरा, क्यों कभी ऐतबार न किया।

मैं मनाता ही रहा, तू रूठती चली गयी
खुद को ढूँढ़ते हुये, बड़ी दूर चली गयी।

वक़्त के वो धारे, जो कि अब धुंधले हो चुके हैं
एहसास की उस नदी में, रेत बनकर जम चुके हैं।

मुसाफ़िर आज भी मिलते हैं, अनजान सफ़र में
हसरतों के आशियाँ लिये हुये, आँखों के घर में।

ऐतबार करना मगर, अब भी बहुत मुश्किल है
तब से लेकर अब तक, सहमा हुआ ये दिल है।

ज़िंदगीभर ऐ ज़िंदगी, मुझको तेरा इंतज़ार ही रहा
मैं जितना पास आता गया, तू उतना दूर होती गयी।

छुप कर बैठी है कहीं, क्यों गर्दिशो में तू अब भी
कभी तो झांक इधर, मैं तन्हा खड़ा हूं अब भी।

सुना है ! कई रंगो से मिलकर बनी है तू
वो सुनहरे सपने तेरे, मुझे कब दिखाएगी तू।

ज़िंदगी तुझसे मेरा, अब वो पहले जैसा रिश्ता न रहा
तू यादें मिटाती चली गयी, मैं फर्यादें लिखता ही रहा।।⁠⁠⁠⁠

“जो आज तेरी हँसी उड़ा रही है, वही दुनिया कल तुझे सलाम करेगी”

अकेला चना भी अब भाड़ फोड़ेगा, और एक हाथ से ताली भी बजेगी।
जो आज तेरी हँसी उड़ा रही है, वही दुनिया कल तुझे सलाम करेगी।

जो भी है यहाँ, सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं
दिल के अँधेरे कोनों में, छुपे हुए ये तिलचट्टे हैं।

एक तीर से दो-दो नहीं, दस-दस तू शिकार कर
क़लम का सिपाही है, सो क़लम से ही वार कर।

आठों पहर चौंसठ घड़ी, माशूक़ मौत तेरे सर पर खड़ी
इधर कुआँ उधर खाई, क्योंकि ज़िन्दगी ज़िद पर अड़ी।

छाती पर जो तूने पत्थर रखे हैं, वही तो तेरे यार सगे हैं
तन्हाई की शिद्दत में अक्सर, सोये हुए अरमान जगे हैं।

घाट-घाट का पानी पिया है, हरेक लम्हा सदी सा जिया है
अपने दिल का हर फैसला तूने, ज़िन्दगी के नाम किया है।

कान का बहुत कच्चा है तू, मासूम अब भी बच्चा है तू
जमाना चाहे कुछ भी कहे, पर इंसान बहुत सच्चा है तू।

लोहे के चने भी चबाएगा, और पानी में आग भी लगाएगा
पहचान कर सके खुद अपनी, इसलिए करके भी बताएगाा।।

“बरसों पुरानी, है ये कहानी”

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बरसों पुरानी, है ये कहानी
क़द्र किसी ने, न उसकी जानी।
मज़ाक उड़ाया, जब पूरे जग ने
आख़िर उसने, लड़ने की ठानी।।
 
ख़ामोशी को, हथियार बनाया
दर्द को अपनी तलवार बनाया।
ख़त्म हो गए, जब सारे पैतरे
ज़ेहन को ही, औज़ार बनाया।।
 
ज़माने ने उस को, पागल कहा
दहाड़ता हुआ शेर, घायल कहा।
आसमां ने सीरत, नम देखकर
ज़मीं का आशिक़, बादल कहा।।
 
बरसों पुरानी, है ये कहानी
बात किसी ने, न उसकी मानी।
मज़ाक बनाया, जब पूरे नभ ने
आख़िर उसने, उड़ने की ठानी।।
 
 

“कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी”

मेरे साथ-साथ मुझ में, उस बच्चे की भी मौत हो गई
कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी, तू इतनी बेरहम क्यों हो गई।

हर बार हर दफा, जो तूने चाहा वही मैंने किया
एक तेरी खुशी के लिए, ज़हर भी हँसकर पिया।

फिर भी एक अर्से से नाराज़ हुए बैठी है
खुशी में भी आजकल, तू उदास रहती है।

मेरे साथ-साथ मुझ में, उस अच्छाई की भी मौत हो गई
कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी, तू इतनी बेरहम क्यों हो गई।

हुई मुझसे ऐसी कौनसी ख़ता, बोल तो सही, कुछ तो बता
मुँह फेर ले तू चाहे मुझसे, मगर पहले थोड़ा हक़ तो जता।

तुझे भी तो मेरी याद आती होगी न, कभी न कभी
तुझे भी तो दर्द महसूस होता होगा न, कहीं न कहीं।

मेरे साथ-साथ मुझ में, उस इंसान की भी मौत हो गई
कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी, तू इतनी बेरहम क्यों हो गई।

खुद को पाने की ज़िद में, सब कुछ कितना बदल गया
अंधेरे से लड़ते लड़ते, वो सूरज भी एक दिन ढ़ल गया।

एक तेरे ही तो इंतज़ार में, मैं अब तक वहीं ठहरा हुआ हूँ
यादों का सब्ज़ जंगल जलाकर, वीरान एक सहरा हुआ हूँ।

मेरे साथ-साथ मुझ में, उस शख़्स की भी मौत हो गई
कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी, तू इतनी बेरहम क्यों हो गई।।

RockShayar

“ये कैसा वहम है”

ये कैसा वहम है
जो मुझे होता है
हरपल हरघड़ी
ये कैसा वहम है।

कभी सच झूठ लगता है
कभी झूठ सच
तो कभी दोनों ही बेमानी लगते हैं।

जो डर इतना डराता है
असल में वो है ही नहीं
ये मन है कि उससे छुपता रहता है
हरपल यहाँ से वहाँ भागता रहता है।

सच और झूठ के तराजू का भी तो
एक तराजू होना चाहिए
अपने बनाए उसूलों को ही सब सही मान लेते हैं
बेशक कई सिक्कों के दो पहलू नहीं हुआ करते हैं।

मन को जो अच्छा लगता है
मन उसे ही हक़ीक़त मान लेता है
और जो इसकी समझ से परे होता है
उसे वहम का नकाब ओढ़ाकर
यह डर की पोटली में बंद कर देता है
डर को भी शायद खुद से डर लगता है
तभी तो यह अंधेरों में पलता है
और उजालों से जलता है।

कभी कभी जो सामने होता है
असल में वो होता ही नहीं है
और कभी कभी जो नहीं होता है
असल में वहीं हो जाता है।

वैसे ये ज़िन्दगी भी तो एक वहम ही है
जिसे मौत की आहट से ही डर लगता है
तभी तो ये खुद को इतना उलझाए रखती है
के ज़िन्दगी भर अपने ज़िन्दा होने के वहम में
यूँही तन्हा तन्हा सी गुज़रती चली जाती है।

ये कैसा वहम है
जो मुझे होता है
हरपल हरघड़ी
ये कैसा वहम है।।

@rockshayar.wordpress.com

“ज़िन्दगी के बदलते हुए रंग”

ज़िन्दगी हर रोज नये रंग बदलती है
उन्ही बदलते रंगों के साथ
वक़्त भी बदल जाता है ।
और बदल जाता है वो नज़रिया
जो हमें हर चीज़ का एहसास दिलाता है ।
पहले जो डर डराता है बहुत
वहीं बाद में हँसाता है बहुत ।

अक्सर जिसे हम कल कहते है
दरअसल वो कल नहीं होता है
बल्कि हमारे आज का ही अक्स होता है
मन के शीशों में जो साफ़ नज़र आता है ।

लोग कहते है कि सब कितने बदल गए हैं
मगर वो खुद को नहीं देख पाते हैं कभी
क्योंकि मन के शीशों में
सिर्फ मन का ही अक्स दिखाई देता है
अनगिनत गहराइयों के राज़ छुपे हैं जिसमें
बदलते हुए रंगों की रंगत
चेहरे पर नज़र आ ही जाती है।

कोई खुश होकर भी खुश नहीं है
तो कोई उदास होकर भी खुश है।
पता नहीं खुशी का रंग ग़मों के रंग से
इतना क्यों हमराज़ होता है
कि जब एक आता है तो
दूसरा पीछे पीछे खिंचा चला आता है।

ज़िन्दगी हर रोज नये रंग बदलती है
उन्ही बदलते रंगों के साथ
हम भी बदल जाते हैं ।
कहने को तो बदलाव ही नियम है कुदरत का
पर अगर कोई बदलना ना चाहे
तो उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

इस बार खुद को इस तरह बदलना चाहता हूँ
कि फिर कभी कोई बदलाव मुमकिन ही ना हो ।।

– RockShayar

“पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, ये देखो किस्मत का खेल”

पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, ये देखो किस्मत का खेल
एमबीए करे चाकरी, और मालिक है दसवीं फेल

घोर कलियुग है भय्या आप ही बताओ कहाँ जाये
कौआ चुगे हैं मोती आजकल, और हंस दाना खाये

बचपन से ही सपनों के ऊँचे झाड़ पर चढ़ा दिया
पढ़ाई पूरी हुई तो, नौकरी के नाम पर ठेंगा दिया

एक पोस्ट के लिए फिर, मचती है तगड़ी मारामारी
एक दूसरे को देख देखकर, डरती है ये भीड़ सारी

जहाँ देखो इंजीनियर ही इंजीनियर नज़र आते हैं
पहले लाखों खर्च करते हैं, बाद में वो पछताते हैं

कोई सपनों का गला घोंट रहा है, तो कोई खुद का
यहीं एकमात्र सच है, इस सोशल मीडिया युग का

ज़िन्दगी से ज्यादा हमें, सरकारी नौकरी प्यारी है
बिना इसके तो जीना, हाँ एक लम्हा भी दुश्वारी है

पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, ये देखो किस्मत का खेल
पीएचडी बने क्लर्क, और मंत्रीजी है दसवीं फेल ।

@RockShayar

“अजनबी अहसास”

बहुत कुछ ऐसा है जो बताया न जा सके
अहसास तो है मगर जताया न जा सके

सोच के दायरे में जब भी कोई सवाल आता है
उड़ने को फिर ख़याल अपने पंख फड़फड़ाता है

हाथ खुद-ब-खुद क़लम तक पहुँच जाते हैं
जज़्बात खुद-ब-खुद हम तक पहुँच जाते हैं

हर लफ़्ज़ की अपनी एक अलग ही दुनिया है
जैसे इस दुनिया में हम सबकी एक दुनिया है

कोई जिस्म लिखता है, कोई रूह लिखता है
जो देखना चाहे जितना, हाँ उसे वहीं दिखता है

हर सिक्के के दो पहलू हैं, किसे सच किसे झूठ कहे
जो दिल में है पर ज़ुबां पे नहीं, उसे कहे बिन कैसे रहे

अजनबी अहसास को बताओ क्या नाम दे
ये तो पवन के झोंके हैं, कैसे इन्हें थाम ले

बहुत कुछ ऐसा है जो महसूस न किया जा सके
ख़यालात तो है मगर महफूज़ न किया जा सके ।।

– RockShayar

“ज़िंदगी की धूप”

दर्द का पहरा हटाकर, ग़मों का कोहरा मिटाकर
दिल के आँगन में कहीं, ज़िंदगी की धूप निकली है

अंधियारे सब जल गए, उजियारे अब मिल गए
मनचले इस मन के वो, गलियारे सब खिल गए

चाहत की उस ज़मीं पर, नूर की पहली बारिश हुई
दिल में कई अंकुर फूटे, हूर सी उजली ख़ाहिश हुई

अनजान था जिन रंगों से, वो रंग मुझमें अब खिले हैं
अनजान था जिन लम्हों से, वो लम्हें मुझको अब मिले हैं

पलकों पर जितनी नमी थी, सीने में उतनी कमी थी
अब जाकर मालूम हुआ ये, जीने में कितनी कमी थी

मन के वो बंद किवाङ, एक एक कर खुलने लगे हैं
यादों के वो मैले पहाङ, एक एक कर धुलने लगे हैं

साँसों की गर्म आहट, मुझको सुनाई देती हैं अब
रातों की नर्म राहत, मुझको दिखाई देती हैं अब

वक्त की शाख़ों पर, अहसास कई खिलने लगे हैं
रूह की आँखों पर, अल्फ़ाज़ कई फलने लगे हैं

हर तरफ खुशियाँ है फैली, बन गई मन की सहेली
मुस्कुराना सीखा है जब से, हल हुई मन की पहेली

आहों के बादल हटाकर, रंज़ का काजल मिटाकर
दिल के आँगन में कहीं, ज़िंदगी की धूप खिली है ।।

“खुद ही से हर घड़ी भागता है तू”

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खुद ही से हर घड़ी भागता है तू
ज़िंदगी से ज़िंदगी मांगता है तू

ख़्वाब नहीं आते हर शब फिर भी
ख़्वाबों के दरमियां जागता है तू

खुदी से इश्क़ के करता है दावे हजार
और अंगारे रूह पर दागता है तू

जानता है ये फ़ना हो जाएगी इक दिन
फिर भी छूने इसको भागता है तू ।।

“लाइफ की तो, लगी पड़ी हैं”

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लाइफ की तो, लगी पड़ी हैं
किस्मत साली, गले पड़ी हैं

बेतुकी सी, ख़्वाहिश लिए
कब से यूँ, ज़िद पर अड़ी हैं

देखा जब से, ख़्वाब इसने
तब से, इक टांग पे खड़ी हैं

ख़ुशी ग़म की, मिज़ वेज   
कभी ताज़ा, कभी ये सड़ी हैं

गुज़रे लम्हें, याद कर फिर
खुद से यूँ, हर रोज लड़ी हैं

बेवजह नहीं ये ‘रॉकशायर’
तज़ुर्बे में, बड़े बड़ों से बड़ी हैं

“वो ज़िन्दगी ही क्यां, जिसमें ख़्वाब ना हो”

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वो ज़िन्दगी ही क्यां, जिसमें ख़्वाब ना हो
वो बन्दगी ही क्यां, जिसमें आदाब ना हो

मुतमईन हो जाये रूह, देखकर यूँ ज़ीनत
वो सादगी ही क्यां, जिसमें हिजाब ना हो

मुतासिर है निगाहें, मुसाफिर ये सब राहें
वो सब्ज़गी ही क्यां, जिसमें शादाब ना हो

महदूद सी ख़्वाहिश, महबूब की आराइश
वो पेशगी ही क्यां, जो यूँ बेहिसाब ना हो

मुख़्तसर से लम्हें, मुन्तज़र है सब रस्मे
वो बानगी ही क्यां, जिसमें इन्तिख़ाब ना हो

मुहब्बत में नज़ाकत, मुरव्वत सी नफ़ासत
वो तशनगी ही क्यां, जो खुद सैराब ना हो

मरासिम है टूटे हुए, मुहाफ़िज सब रूठे हुए
वो आवारगी ही क्यां, जिसमें सैलाब ना हो

सुनकर दिल की निदा, कह रहा यूँ ‘इरफ़ान’
वो तीरगी ही क्यां, जिसमें इन्क़िलाब ना हो

“नाद”

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व्यवधान से, ना विवाद से
आरंभ तू कर, शंखनाद से

मन के भीतर, अंकुर जगा
अब आत्मबल की, खाद से

गूँज उठे, चहुँ लोक यहाँ जो
अलौलिक, धर्म निनाद से

तमस छवि, को मिटा दे
गुज़रें समय की, याद से

अटल रहता है, सदा ही
सत्य, बस अपने वाद से

जीवन में यूँ , फिर से उगा
कुछ पुष्प तू अब, शाद से

© रॉकशायर

नाद – ध्वनि
तमस – अँधेरा
शाद – खिला हुआ, प्रसन्नचित

“ज़िंदगी का फ़लसफा”

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ज़िंदगी का फ़लसफा, किसी मसखरे सा
कभी मुस्कुराये जो, कभी मुँह बनाये यहाँ

सुख है सावन ऋतु, दुख ऋतु पतझङ सी
पल पल हर घङी, दौङ रही यूँ भगदङ सी

श्वेत रंग की पोर ये, मन मलंग की भोर ये
समर्पण की वेदी पर, प्रेम पतंग की डोर ये

सौन्दर्य की प्रीत पर, मधुर इक संगीत पर
खनक रहा है साज़ ये, काल के अतीत पर

ज़िन्दगी का ये तमाशा, किसी मसखरे सा
कभी आज़माये जो, कभी मुँह चिढ़ाये यहाँ ।।