“अपने अंदर खुद रहा ही ना मैं”

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अपने अंदर उस शख़्स को, बहुत पहले मार चुका हूँ मैं
जिस शख़्स की वज़ह से एक दिन, बहुत रोया था मैं।

मौत के एहसास की तरह था वो एहसास
जिस एहसास ने महीनों तक तड़पाया मुझे।

खुद से इस क़दर नफ़रत हो गयी थी
के कोई और बनकर जीना आदत हो गयी थी।

गुमनामी के अंधेरे से बचने के लिये
अपना नाम तक बदल लिया था मैंने।

मगर सितमगर माज़ी की परछाई, साथ कहां छोड़ती है
जिस तरफ न जाना हो, कदम यह उसी तरफ मोड़ती है।

बरसों लग गये मुझे, खुद को यह समझाने में
के कोई कसर न छोड़ी मैंने, खुद को आज़्माने में।

दर्द था जितना भी दिल में, काग़ज़ पर सब उड़ेल दिया
बद्दुआओं की बुनियाद पर, खड़ा यादों का महल किया।

खुद से भागते-भागते, आ पहुँचा उसी मोड़ पर
जिस मोड़ पर छोड़कर गया था, एक दिन मैं लाश अपनी।

अब किसे दफ़्नाऊं
और किसे जलाऊं
जब अपने अंदर खुद रहा ही ना मैं।

अब किसे सताऊं
और किसे रुलाऊं
जब अपने अंदर कुछ बचा ही ना मैं।।

@RockShayar⁠⁠⁠⁠

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“लौटकर तो सिर्फ यादें आती हैं, कभी वो वक़्त नहीं”

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लौटकर तो सिर्फ यादें आती हैं, कभी वो वक़्त नहीं
उसकी कही बातें याद आती हैं, अब वो शख़्स नहीं।

सिर्फ पढ़ने से ही जिसे, जग उठे वो एहसास फिर से
ज़िंदगी सब कुछ लिख देती हैं, मगर वो लफ़्ज़ नहीं।

कह गये वो शायर सयाने, इश्क़ के जो थे दीवाने
मिल जाये जो बड़ी आसानी से, असल वो इश्क़ नहीं।

शिद्दत और मेहनत, शर्त यही के दोनों साथ हो
फिर पूरी न की जा सके जो, ऐसी तो कोई शर्त नहीं।

साये की किस्मत है, सुबह से शाम चलना और ढ़लना
धूप का तिलिस्म है ये तो, साये का अपना कोई अक्स नहीं।

ज़ईफ़ जिस्म का नहीं, जवां रूह का हुस्न है मोहब्बत
देखकर जिसे खुद नैन कहे, कभी देखा ऐसा नक्श नहीं।

वक़्त की बेवक़्त ख़ामोशी का, बयान है यह तो इरफ़ान
एक वक़्त के बाद सब लौट आते हैं, मगर वो वक़्त नहीं।।

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“सुबह-सुबह नंगे पाँव घास पर चलकर ऐसा लगा”

सुबह-सुबह नंगे पाँव
घास पर चलकर ऐसा लगा
मानो कई दिनों के बाद
आज खुलकर साँस ली है।

पैरों ने बड़ी राहत महसूस की
मगर घास थोड़ी घबरायी हुयी सी लग रही है।

शायद ! इसे अपने कुचल दिये जाने का डर है।

कभी-कभी लगता है कि
ये ज़िन्दगी भी कुछ ऐसी ही है।

कुचल दिये जाने के डर से
खुद को ज्यादा ख़्वाब नहीं देखने देती है।

पता नहीं !
कब कौन आकर कुचल दे
इसके नाजुक ख़्वाबों को
अपनी राहत के लिये।

कुछ चीजे कभी समझ नहीं आती
शायद ! इसीलिए ज़िन्दगी को ज़िन्दगी कहते है।

क्योंकि यह एक पल में पूरी सदी है
और सदियों में सिर्फ एक पल।।

“तेरा मुझ से दूर होना”

तेरा मुझ से दूर होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद से दूर होना।

तेरा मुझ में शामिल होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद में शामिल होना।

तेरा मुझ पे ऐतबार होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद पे इख़्तियार होना।

तेरा मुझ को खुशियाँ देना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद को पा लेना।

तेरा मुझ से ज़ुदा होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद से ज़ुदा होना।

तेरा मुझ में साँस लेना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद में ज़िन्दा रहना।

तेरा मुझ पे यक़ीन होना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद पे यक़ीन होना।

तेरा मुझ को बेपनाह चाहना
मुझे यूँ लगता है
जैसे मेरा खुद को बेपनाह चाहना।।

“दिन और रात के दरमियाँ पूरी ज़िंदगी गुज़र जाती है”

अलसुबह सुबह से जब गले मिलता हूँ
फिर पूरा दिन उसकी बाहों में रहता हूँ।

सूरज की किरणों से मिलती हैं ताकत मुझे
अपने हरकिरदार से है सच्ची मोहब्बत मुझे।

तपती हुई दोपहर हरपहर बस यही कहती है
धूप-छाँव तो यूँही ज़िंदगीभर चलती रहती है।

हरशाम शाम मुझे अक्सर यूँ थाम लेती है
खुशियों को हरबार नया एक नाम देती हैं।

ख़याल भी तभी आते हैं, जब रात हो जाती है
ख़्वाब भी तभी आते हैं, जब रात सो जाती है।

रात के आगोश में टिमटिमाते हैं कई सितारें
रात के आगोश में पास बुलाते हैं कई सितारें।

दिन और रात के दरमियाँ पूरी ज़िंदगी गुज़र जाती है
पास जाकर जो देखो कभी, ये बड़ी दूर नज़र आती है।

हरपल का मज़ा लो, यहाँ तुम हरपल खुलकर जियो
हरसुबह चाहत की अदरक वाली चाय बनाकर पियो।।

#राॅकशायर⁠⁠⁠⁠

“इस दुनिया से अलग एक दुनिया है मेरी”

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इस दुनिया से अलग
एक दुनिया है मेरी।

जब भी डर लगता है
वहाँ चला जाता हूं।

वहाँ डर नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ घर नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ अपने नहीं हैं, सिर्फ खुशी है
वहाँ सपने नहीं हैं, सिर्फ खुशी है।

वहाँ मक़सद नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ हसरत नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ दीवारें नहीं हैं, सिर्फ खुशी है
वहाँ किनारे नहीं हैं, सिर्फ खुशी है।

वहाँ होड़ नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ दौड़ नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ तड़पना नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ तरसना नहीं है, सिर्फ खुशी है।

वहाँ उम्मीद नहीं है, सिर्फ खुशी है
वहाँ ईद नहीं है, फिर भी खुशी है।

वहाँ हँसी है, सिर्फ हँसी है
वहाँ खुशी है, सिर्फ खुशी है।।

“मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है”

तेरे साथ बिताया वक़्त बड़ी जल्दी गुज़र जाता है
मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है।

रास्तेभर यही सोचता हूं कि अब आगे क्या?
ज़िंदगी से कुछ लम्हे चुराकर भागे क्या?

याद न करने के बहाने से तुम्हे याद कर लेता हूं
मैं नज़रों से दिल की बेचैनी आज़ाद कर देता हूं।

वक़्त के साथ-साथ वक़्त की सिफ़त बदल जाती हैं
बदलते-बदलते इसकी हरएक आदत बदल जाती हैं।

दूरियों के दरवाज़े अक्सर बड़ी देर से खुलते हैं
पर मज़बूरियों के मकान बड़ी जल्दी बन जाते हैं।

ज़ेहन की परछाई से परे होते हैं जज़्बात
दिल की गहराई से जुड़े होते हैं जज़्बात।

अगर एहसास है धागा तो यह मन अपना चरखा हैं
उम्मीद की उँगलियों से हमने दिल को थाम रखा हैं।

तेरे साथ गुज़ारा वक़्त बहुत जल्दी गुज़र जाता है
मेरा हरसफ़र मुझको फिर से तेरे शहर ले आता है।।⁠⁠⁠⁠

“न मुझे इख़्तियार दिया, न मेरा इंतज़ार किया”

न मुझे इख़्तियार दिया, न मेरा इंतज़ार किया
ऐ ज़िंदगी तूने मेरा, क्यों कभी ऐतबार न किया।

मैं मनाता ही रहा, तू रूठती चली गयी
खुद को ढूँढ़ते हुये, बड़ी दूर चली गयी।

वक़्त के वो धारे, जो कि अब धुंधले हो चुके हैं
एहसास की उस नदी में, रेत बनकर जम चुके हैं।

मुसाफ़िर आज भी मिलते हैं, अनजान सफ़र में
हसरतों के आशियाँ लिये हुये, आँखों के घर में।

ऐतबार करना मगर, अब भी बहुत मुश्किल है
तब से लेकर अब तक, सहमा हुआ ये दिल है।

ज़िंदगीभर ऐ ज़िंदगी, मुझको तेरा इंतज़ार ही रहा
मैं जितना पास आता गया, तू उतना दूर होती गयी।

छुप कर बैठी है कहीं, क्यों गर्दिशो में तू अब भी
कभी तो झांक इधर, मैं तन्हा खड़ा हूं अब भी।

सुना है ! कई रंगो से मिलकर बनी है तू
वो सुनहरे सपने तेरे, मुझे कब दिखाएगी तू।

ज़िंदगी तुझसे मेरा, अब वो पहले जैसा रिश्ता न रहा
तू यादें मिटाती चली गयी, मैं फर्यादें लिखता ही रहा।।⁠⁠⁠⁠

“जो आज तेरी हँसी उड़ा रही है, वही दुनिया कल तुझे सलाम करेगी”

अकेला चना भी अब भाड़ फोड़ेगा, और एक हाथ से ताली भी बजेगी।
जो आज तेरी हँसी उड़ा रही है, वही दुनिया कल तुझे सलाम करेगी।

जो भी है यहाँ, सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं
दिल के अँधेरे कोनों में, छुपे हुए ये तिलचट्टे हैं।

एक तीर से दो-दो नहीं, दस-दस तू शिकार कर
क़लम का सिपाही है, सो क़लम से ही वार कर।

आठों पहर चौंसठ घड़ी, माशूक़ मौत तेरे सर पर खड़ी
इधर कुआँ उधर खाई, क्योंकि ज़िन्दगी ज़िद पर अड़ी।

छाती पर जो तूने पत्थर रखे हैं, वही तो तेरे यार सगे हैं
तन्हाई की शिद्दत में अक्सर, सोये हुए अरमान जगे हैं।

घाट-घाट का पानी पिया है, हरेक लम्हा सदी सा जिया है
अपने दिल का हर फैसला तूने, ज़िन्दगी के नाम किया है।

कान का बहुत कच्चा है तू, मासूम अब भी बच्चा है तू
जमाना चाहे कुछ भी कहे, पर इंसान बहुत सच्चा है तू।

लोहे के चने भी चबाएगा, और पानी में आग भी लगाएगा
पहचान कर सके खुद अपनी, इसलिए करके भी बताएगाा।।

“बरसों पुरानी, है ये कहानी”

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बरसों पुरानी, है ये कहानी
क़द्र किसी ने, न उसकी जानी।
मज़ाक उड़ाया, जब पूरे जग ने
आख़िर उसने, लड़ने की ठानी।।
 
ख़ामोशी को, हथियार बनाया
दर्द को अपनी तलवार बनाया।
ख़त्म हो गए, जब सारे पैतरे
ज़ेहन को ही, औज़ार बनाया।।
 
ज़माने ने उस को, पागल कहा
दहाड़ता हुआ शेर, घायल कहा।
आसमां ने सीरत, नम देखकर
ज़मीं का आशिक़, बादल कहा।।
 
बरसों पुरानी, है ये कहानी
बात किसी ने, न उसकी मानी।
मज़ाक बनाया, जब पूरे नभ ने
आख़िर उसने, उड़ने की ठानी।।
 
 

“कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी”

मेरे साथ-साथ मुझ में, उस बच्चे की भी मौत हो गई
कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी, तू इतनी बेरहम क्यों हो गई।

हर बार हर दफा, जो तूने चाहा वही मैंने किया
एक तेरी खुशी के लिए, ज़हर भी हँसकर पिया।

फिर भी एक अर्से से नाराज़ हुए बैठी है
खुशी में भी आजकल, तू उदास रहती है।

मेरे साथ-साथ मुझ में, उस अच्छाई की भी मौत हो गई
कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी, तू इतनी बेरहम क्यों हो गई।

हुई मुझसे ऐसी कौनसी ख़ता, बोल तो सही, कुछ तो बता
मुँह फेर ले तू चाहे मुझसे, मगर पहले थोड़ा हक़ तो जता।

तुझे भी तो मेरी याद आती होगी न, कभी न कभी
तुझे भी तो दर्द महसूस होता होगा न, कहीं न कहीं।

मेरे साथ-साथ मुझ में, उस इंसान की भी मौत हो गई
कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी, तू इतनी बेरहम क्यों हो गई।

खुद को पाने की ज़िद में, सब कुछ कितना बदल गया
अंधेरे से लड़ते लड़ते, वो सूरज भी एक दिन ढ़ल गया।

एक तेरे ही तो इंतज़ार में, मैं अब तक वहीं ठहरा हुआ हूँ
यादों का सब्ज़ जंगल जलाकर, वीरान एक सहरा हुआ हूँ।

मेरे साथ-साथ मुझ में, उस शख़्स की भी मौत हो गई
कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी, तू इतनी बेरहम क्यों हो गई।।

RockShayar

“ये कैसा वहम है”

ये कैसा वहम है
जो मुझे होता है
हरपल हरघड़ी
ये कैसा वहम है।

कभी सच झूठ लगता है
कभी झूठ सच
तो कभी दोनों ही बेमानी लगते हैं।

जो डर इतना डराता है
असल में वो है ही नहीं
ये मन है कि उससे छुपता रहता है
हरपल यहाँ से वहाँ भागता रहता है।

सच और झूठ के तराजू का भी तो
एक तराजू होना चाहिए
अपने बनाए उसूलों को ही सब सही मान लेते हैं
बेशक कई सिक्कों के दो पहलू नहीं हुआ करते हैं।

मन को जो अच्छा लगता है
मन उसे ही हक़ीक़त मान लेता है
और जो इसकी समझ से परे होता है
उसे वहम का नकाब ओढ़ाकर
यह डर की पोटली में बंद कर देता है
डर को भी शायद खुद से डर लगता है
तभी तो यह अंधेरों में पलता है
और उजालों से जलता है।

कभी कभी जो सामने होता है
असल में वो होता ही नहीं है
और कभी कभी जो नहीं होता है
असल में वहीं हो जाता है।

वैसे ये ज़िन्दगी भी तो एक वहम ही है
जिसे मौत की आहट से ही डर लगता है
तभी तो ये खुद को इतना उलझाए रखती है
के ज़िन्दगी भर अपने ज़िन्दा होने के वहम में
यूँही तन्हा तन्हा सी गुज़रती चली जाती है।

ये कैसा वहम है
जो मुझे होता है
हरपल हरघड़ी
ये कैसा वहम है।।

@rockshayar.wordpress.com

“ज़िन्दगी के बदलते हुए रंग”

ज़िन्दगी हर रोज नये रंग बदलती है
उन्ही बदलते रंगों के साथ
वक़्त भी बदल जाता है ।
और बदल जाता है वो नज़रिया
जो हमें हर चीज़ का एहसास दिलाता है ।
पहले जो डर डराता है बहुत
वहीं बाद में हँसाता है बहुत ।

अक्सर जिसे हम कल कहते है
दरअसल वो कल नहीं होता है
बल्कि हमारे आज का ही अक्स होता है
मन के शीशों में जो साफ़ नज़र आता है ।

लोग कहते है कि सब कितने बदल गए हैं
मगर वो खुद को नहीं देख पाते हैं कभी
क्योंकि मन के शीशों में
सिर्फ मन का ही अक्स दिखाई देता है
अनगिनत गहराइयों के राज़ छुपे हैं जिसमें
बदलते हुए रंगों की रंगत
चेहरे पर नज़र आ ही जाती है।

कोई खुश होकर भी खुश नहीं है
तो कोई उदास होकर भी खुश है।
पता नहीं खुशी का रंग ग़मों के रंग से
इतना क्यों हमराज़ होता है
कि जब एक आता है तो
दूसरा पीछे पीछे खिंचा चला आता है।

ज़िन्दगी हर रोज नये रंग बदलती है
उन्ही बदलते रंगों के साथ
हम भी बदल जाते हैं ।
कहने को तो बदलाव ही नियम है कुदरत का
पर अगर कोई बदलना ना चाहे
तो उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

इस बार खुद को इस तरह बदलना चाहता हूँ
कि फिर कभी कोई बदलाव मुमकिन ही ना हो ।।

– RockShayar

“पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, ये देखो किस्मत का खेल”

पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, ये देखो किस्मत का खेल
एमबीए करे चाकरी, और मालिक है दसवीं फेल

घोर कलियुग है भय्या आप ही बताओ कहाँ जाये
कौआ चुगे हैं मोती आजकल, और हंस दाना खाये

बचपन से ही सपनों के ऊँचे झाड़ पर चढ़ा दिया
पढ़ाई पूरी हुई तो, नौकरी के नाम पर ठेंगा दिया

एक पोस्ट के लिए फिर, मचती है तगड़ी मारामारी
एक दूसरे को देख देखकर, डरती है ये भीड़ सारी

जहाँ देखो इंजीनियर ही इंजीनियर नज़र आते हैं
पहले लाखों खर्च करते हैं, बाद में वो पछताते हैं

कोई सपनों का गला घोंट रहा है, तो कोई खुद का
यहीं एकमात्र सच है, इस सोशल मीडिया युग का

ज़िन्दगी से ज्यादा हमें, सरकारी नौकरी प्यारी है
बिना इसके तो जीना, हाँ एक लम्हा भी दुश्वारी है

पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, ये देखो किस्मत का खेल
पीएचडी बने क्लर्क, और मंत्रीजी है दसवीं फेल ।

@RockShayar

“अजनबी अहसास”

बहुत कुछ ऐसा है जो बताया न जा सके
अहसास तो है मगर जताया न जा सके

सोच के दायरे में जब भी कोई सवाल आता है
उड़ने को फिर ख़याल अपने पंख फड़फड़ाता है

हाथ खुद-ब-खुद क़लम तक पहुँच जाते हैं
जज़्बात खुद-ब-खुद हम तक पहुँच जाते हैं

हर लफ़्ज़ की अपनी एक अलग ही दुनिया है
जैसे इस दुनिया में हम सबकी एक दुनिया है

कोई जिस्म लिखता है, कोई रूह लिखता है
जो देखना चाहे जितना, हाँ उसे वहीं दिखता है

हर सिक्के के दो पहलू हैं, किसे सच किसे झूठ कहे
जो दिल में है पर ज़ुबां पे नहीं, उसे कहे बिन कैसे रहे

अजनबी अहसास को बताओ क्या नाम दे
ये तो पवन के झोंके हैं, कैसे इन्हें थाम ले

बहुत कुछ ऐसा है जो महसूस न किया जा सके
ख़यालात तो है मगर महफूज़ न किया जा सके ।।

– RockShayar

“ज़िंदगी की धूप”

दर्द का पहरा हटाकर, ग़मों का कोहरा मिटाकर
दिल के आँगन में कहीं, ज़िंदगी की धूप निकली है

अंधियारे सब जल गए, उजियारे अब मिल गए
मनचले इस मन के वो, गलियारे सब खिल गए

चाहत की उस ज़मीं पर, नूर की पहली बारिश हुई
दिल में कई अंकुर फूटे, हूर सी उजली ख़ाहिश हुई

अनजान था जिन रंगों से, वो रंग मुझमें अब खिले हैं
अनजान था जिन लम्हों से, वो लम्हें मुझको अब मिले हैं

पलकों पर जितनी नमी थी, सीने में उतनी कमी थी
अब जाकर मालूम हुआ ये, जीने में कितनी कमी थी

मन के वो बंद किवाङ, एक एक कर खुलने लगे हैं
यादों के वो मैले पहाङ, एक एक कर धुलने लगे हैं

साँसों की गर्म आहट, मुझको सुनाई देती हैं अब
रातों की नर्म राहत, मुझको दिखाई देती हैं अब

वक्त की शाख़ों पर, अहसास कई खिलने लगे हैं
रूह की आँखों पर, अल्फ़ाज़ कई फलने लगे हैं

हर तरफ खुशियाँ है फैली, बन गई मन की सहेली
मुस्कुराना सीखा है जब से, हल हुई मन की पहेली

आहों के बादल हटाकर, रंज़ का काजल मिटाकर
दिल के आँगन में कहीं, ज़िंदगी की धूप खिली है ।।

“खुद ही से हर घड़ी भागता है तू”

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खुद ही से हर घड़ी भागता है तू
ज़िंदगी से ज़िंदगी मांगता है तू

ख़्वाब नहीं आते हर शब फिर भी
ख़्वाबों के दरमियां जागता है तू

खुदी से इश्क़ के करता है दावे हजार
और अंगारे रूह पर दागता है तू

जानता है ये फ़ना हो जाएगी इक दिन
फिर भी छूने इसको भागता है तू ।।

“लाइफ की तो, लगी पड़ी हैं”

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लाइफ की तो, लगी पड़ी हैं
किस्मत साली, गले पड़ी हैं

बेतुकी सी, ख़्वाहिश लिए
कब से यूँ, ज़िद पर अड़ी हैं

देखा जब से, ख़्वाब इसने
तब से, इक टांग पे खड़ी हैं

ख़ुशी ग़म की, मिज़ वेज   
कभी ताज़ा, कभी ये सड़ी हैं

गुज़रे लम्हें, याद कर फिर
खुद से यूँ, हर रोज लड़ी हैं

बेवजह नहीं ये ‘रॉकशायर’
तज़ुर्बे में, बड़े बड़ों से बड़ी हैं

“वो ज़िन्दगी ही क्यां, जिसमें ख़्वाब ना हो”

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वो ज़िन्दगी ही क्यां, जिसमें ख़्वाब ना हो
वो बन्दगी ही क्यां, जिसमें आदाब ना हो

मुतमईन हो जाये रूह, देखकर यूँ ज़ीनत
वो सादगी ही क्यां, जिसमें हिजाब ना हो

मुतासिर है निगाहें, मुसाफिर ये सब राहें
वो सब्ज़गी ही क्यां, जिसमें शादाब ना हो

महदूद सी ख़्वाहिश, महबूब की आराइश
वो पेशगी ही क्यां, जो यूँ बेहिसाब ना हो

मुख़्तसर से लम्हें, मुन्तज़र है सब रस्मे
वो बानगी ही क्यां, जिसमें इन्तिख़ाब ना हो

मुहब्बत में नज़ाकत, मुरव्वत सी नफ़ासत
वो तशनगी ही क्यां, जो खुद सैराब ना हो

मरासिम है टूटे हुए, मुहाफ़िज सब रूठे हुए
वो आवारगी ही क्यां, जिसमें सैलाब ना हो

सुनकर दिल की निदा, कह रहा यूँ ‘इरफ़ान’
वो तीरगी ही क्यां, जिसमें इन्क़िलाब ना हो

“नाद”

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व्यवधान से, ना विवाद से
आरंभ तू कर, शंखनाद से

मन के भीतर, अंकुर जगा
अब आत्मबल की, खाद से

गूँज उठे, चहुँ लोक यहाँ जो
अलौलिक, धर्म निनाद से

तमस छवि, को मिटा दे
गुज़रें समय की, याद से

अटल रहता है, सदा ही
सत्य, बस अपने वाद से

जीवन में यूँ , फिर से उगा
कुछ पुष्प तू अब, शाद से

© रॉकशायर

नाद – ध्वनि
तमस – अँधेरा
शाद – खिला हुआ, प्रसन्नचित

“ज़िंदगी का फ़लसफा”

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ज़िंदगी का फ़लसफा, किसी मसखरे सा
कभी मुस्कुराये जो, कभी मुँह बनाये यहाँ

सुख है सावन ऋतु, दुख ऋतु पतझङ सी
पल पल हर घङी, दौङ रही यूँ भगदङ सी

श्वेत रंग की पोर ये, मन मलंग की भोर ये
समर्पण की वेदी पर, प्रेम पतंग की डोर ये

सौन्दर्य की प्रीत पर, मधुर इक संगीत पर
खनक रहा है साज़ ये, काल के अतीत पर

ज़िन्दगी का ये तमाशा, किसी मसखरे सा
कभी आज़माये जो, कभी मुँह चिढ़ाये यहाँ ।।