“तुझे भुलाना ही नहीं चाहता हूं मैं”

तुझे अब तक नहीं भुला पाया मैं
तुझे भुलाना ही नहीं चाहता हूं मैं।

हररोज मुझको तेरी याद आती है
तुझे रोज याद करना चाहता हूं मैं।

बात चाहे कोई भी हो कैसी भी हो
एक तेरी ही बात करना चाहता हूं मैं।

ज़िंदगी के सुहाने सफ़र में हमसफ़र
ज़िंदगीभर तेरे साथ रहना चाहता हूं मैं।

तेरे बिन जीना जानाँ मुमकिन नहीं मेरा
तुझसे मिलकर यह कहना चाहता हूं मैं।

दरिया हो तुम, जीने का ज़रिया हो तुम
किनारा बनकर संग बहना चाहता हूं मैं।

ज़िंदगी की धूप में ज़िंदगी जल गयी मेरी
तेरे आँगन की छाँव में सोना चाहता हूं मैं।।

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“ज़िंदगी का बेनज़ीर वो लुत्फ़ हो तुम”

ज़िंदगी की घनेरी कोई जुल्फ़ हो तुम
ज़िंदगी का बेनज़ीर वो लुत्फ़ हो तुम।

जिसे लिखने के बाद, मिले खूब दाद
ग़ज़ल का ऐसा कोई लफ़्ज़ हो तुम।

नज़र से लेकर जिगर तक क्या कहूँ
टूट नहीं सकता वो तिलिस्म हो तुम।

सुनकर जिसे महसूस करने लगे हम
जानाँ गुलज़ार की वो नज़्म हो तुम।

तोड़ने से टूटे ना, छोड़ने से छूटे ना
निभाना लाज़िम जिसे वो रस्म हो तुम।

मैं शायर गुमनाम अंधेरी गलियों का
अदीबों की बाअदब बज़्म हो तुम।

दीदार किया तो पता ये चला इरफ़ान
मोहब्बत का मासूम अक्स हो तुम।।

“पहले तो तेरा ख़याल ही काफ़ी था, जीने के लिये”

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पहले तो तेरा ख़याल ही काफ़ी था, जीने के लिये
और अब तेरा ख़याल भी नाकाफ़ी है, जीने के लिये।

वो गुज़ारिश जो थी मेरी, वो अब भी अधूरी है
वो नवाज़िश जो थी तेरी, वो अब भी ज़रूरी है।

जो दिल से दिल मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हमारे दिल मिल जाते, तो क्या बात होती।

पहले तो तुम तसव्वुर पर खूब बंदिशें लगाती थी
और अब तुम हो कि तसव्वुर में भी नहीं आती हो।

वो सवाल जो था मेरा, वो अब भी वही है
वो जवाब जो था तेरा, वो अब भी नहीं है।

जो लब से लब मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हमारे चेहरे खिल जाते, तो क्या बात होती।

पहले तो तुम बेनज़ीर सी बहुत वो बातें करती थी
और अब तुम हो कि ज़रा भी नहीं याद करती हो।

वो अंदाज़ जो था मेरा, वो अब भी वही है
वो एहसास जो था तेरा, वो अब भी वही है।

जो मन से मन मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हम दोनों खिल जाते, तो क्या बात होती।।⁠⁠⁠⁠

“आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है”

आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है
आसमाँ से ज़मीं की सिफ़ारिश हो रही है।

आज फिर से जीने की ख़्वाहिश हो रही है
दिल से दिल की वही गुज़ारिश हो रही है।

आज फिर से ज़िन्दगी मदहोश हो रही है।
हौले-हौले खुद ये अपना होश खो रही है।

आज भी मैं बरसते हुए मौसम का आवारा बादल हूं
आज भी मैं उफनते हुए सागर का बंजारा साहिल हूं।

जब भी तुम मेरे आस-पास होती
बारिश शुरू होने लग जाती।

इशारा था वो कायनात का
फ़साना था वो जज़्बात का।

मैं जिसे बखूबी समझ जाता, मगर तुम बहुत डरती थी
भीगने से, इश्क़ में डूबने से, इसलिए दूर-दूर रहती थी।

आज फिर से वही पहले जैसी बारिश हो रही है
आज फिर से ये कायनात कोई इशारा दे रही है।

आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है
आज फिर से जीने की ख़्वाहिश हो रही है।।

rockshayar.wordpress.com⁠⁠⁠⁠

“वो अधूरी गुज़ारिश मेरी, अब भी अधूरी है”

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वो अधूरी गुज़ारिश मेरी, अब भी अधूरी है
कम नहीं होती कभी, ये जाने कैसी दूरी है।

तेरा नाम तेरी बातें, तुझसे मेरी वो मुलाकातें
तुझे भुलाने के लिए तुझे याद करना ज़रूरी है।

सुना है ! माशूक, साथ जीते हैं साथ मरते हैं
हमारा यूँ दूर-दूर रहना, कितना ग़ैरज़रूरी है।

हद पार करता हूँ, कभी सरहद पार करता हूँ
जुनून को बढ़ाता है जो, नशा तेरा फितूरी है।

तुझको भुलाना जैसे, खुद को भुलाना लगता है
बेपनाह चाहूँ तुझे, कितनी हसीं ये मज़बूरी है।

जितना सोच पाता हूँ, लिखता चला जाता हूँ
ये कामयाबी तो, कड़ी मेहनत की मज़दूरी है।

तेरी मेरी वो कहानी, डायरी में है जो छुपानी
अभी तो आधी लिखी है, बाक़ी अभी पूरी है।।

“राब्ता”

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कभी-कभी लगता है तुम से, सदियों पुराना कोई वास्ता है
अधूरा है अब तक एहसास कोई, रुह का रूह से ये राब्ता है।
 
न तूने मुझे अपनाया कभी, न मैंने तुझे ठुकराया कभी
मैं जितना याद करता रहा, तू उतना मुझे भुलाती गई।
 
कैसा अजब ये रिश्ता है, दिलों के दरमियां जो पिसता है
न तुम समझ पाए कभी, न हम समझ पाए कभी।
 
मुझ से ज्यादा तुम्हे मेरी, मोहब्बत से मोहब्बत रही हमेशा
और तुम्हे सोचते ही मुझे वो, सुकून-ओ-राहत मिली हमेशा।
 
न तूने मुझे तड़पाया कभी, न मैंने तुझे तरसाया कभी
मैं जितना दर्द छुपाता रहा, तू उतना बेख़बर होती गई।
 
अजीब हालात के चलते, ये ज़िन्दगी भी अजीब हुई
एक पल को अमीर होकर, अगले ही पल ग़रीब हुई।
 
अब ना कहीं तू नज़र आती है, ना तेरा नाम-ओ-निशां
वो दौर ही कुछ और था, फ़क़त पल दो पल का मेहमां।
 
न तूने मुझे जाना कभी, दिल से अपना माना कभी
मैं जितना पास आता गया, तू उतनी दूर होती गई।।
 
 

“रूह की गुज़ारिश”

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झुकी हुई ये पलकें तेरी, टूटा सा है दिल मेरा
लोबान सी है साँसे तेरी, रूठा सा ये दिल मेरा

इक दूजे की ख़ाहिश में, जलते रहे यूँही सदा
खिल उठे फिर से हम, ना रहे अब ग़मज़दा

दर्द के सियाह ये घेरे, रूख़ पर ज़ुल्फ़ों के पहरे
निगाहों से पढ़ लेता हूँ, आजकल मैं सब चेहरे

ख़लाओं में क़ैद है तू, तन्हाईयों में गुम हूँ मैं
जफ़ाओं में खोई है तू, बेचैनियों में गुम हूँ मैं

हर नज़र तू ही दिखे, हर बशर जो तू ही मिले   
कायनात के ज़र्रे में, हर पहर अब तू ही खिले

अल्फ़ाज़ उतर आते है यूँ, कागज़ के सीने पर
एहसास मगर होता नहीं, अपने ही जीने पर

जिस्म ये मेरा अब, नक्श में तेरे यूँ गुमशुदा  
रूह की गुज़ारिश है, तुझपे करू मैं जां फ़िदा

सहमी हुई पलके तेरी, टूटा सा है दिल मेरा
सुरमई दो आँखे तेरी, रूठा सा ये दिल मेरा

                © रॉकशायर
            (इरफ़ान अली खान)