“सुबह-सुबह नंगे पाँव घास पर चलकर ऐसा लगा”

सुबह-सुबह नंगे पाँव
घास पर चलकर ऐसा लगा
मानो कई दिनों के बाद
आज खुलकर साँस ली है।

पैरों ने बड़ी राहत महसूस की
मगर घास थोड़ी घबरायी हुयी सी लग रही है।

शायद ! इसे अपने कुचल दिये जाने का डर है।

कभी-कभी लगता है कि
ये ज़िन्दगी भी कुछ ऐसी ही है।

कुचल दिये जाने के डर से
खुद को ज्यादा ख़्वाब नहीं देखने देती है।

पता नहीं !
कब कौन आकर कुचल दे
इसके नाजुक ख़्वाबों को
अपनी राहत के लिये।

कुछ चीजे कभी समझ नहीं आती
शायद ! इसीलिए ज़िन्दगी को ज़िन्दगी कहते है।

क्योंकि यह एक पल में पूरी सदी है
और सदियों में सिर्फ एक पल।।

“खिल उठे बचपन फिर से: एक कोशिश”

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My little poetic feel for the Team Pallavan: Blooming Lives

“A Small Donation For a Big Smile”.

गरीबी की मार ने, बस्ता छुड़ा दिया
पेट की आग ने, बचपन जला दिया
वक़्त की मार, खिलौनों पर ऐसी पड़ी
कि, हाथ में कारखानों का औज़ार थमा दिया

वैश्विक दौर में शिक्षा, बन गई बस व्यापार
अशिक्षा से ना रहा, समाज का कोई सरोकार
विलासिता की होड़ ने, अलगाव ही बढ़ाया
मनुष्य को सदैव यहाँ, मनुष्य से लड़वाया

इल्म ही से बनता है, मुकम्मल इंसान यहाँ
कर पाये जो खुद, सही गलत की पहचान यहाँ
तहज़ीब के दरख़्त का, है ये मीठा फल
तालीम ही है सदा, हर समस्या का हल

तो आओं करे, एक कोशिश दिल से
दे सके, कुछ योगदान जो ख़ुशी से
ताकि, ना रहे कोई महरूम शिक्षा से
और, खिल उठे बचपन फिर से

© RockShayar

सरोकार – वास्ता
इल्म – ज्ञान
मुकम्मल – सम्पूर्ण
तहज़ीब – सभ्यता
दरख़्त – पेड़
तालीम – शिक्षा
महरूम – वंचित

“पतंग”

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नीले आसमाँ के आगोश में, बादलों से टकराती हुई
इठलाती बलखाती ये पतंग, बाहें खोले यूँ उड़ रही

कभी यहाँ, कभी वहाँ, हवा के संग चली जाने कहाँ
अल्हड़ जवानी सी मचलती, बुलंदी पर यूँ जा पहुँची

भूल कर उस डोर को, थामा जिसको किसी और ने
इसे नचाता हैं जो, उँगलियों के कुछ इशारो पर

इंसान भूले जा रहा है वेसे, अपने परवर दिगार को
जिसने इसे रचाया बस, मिटटी के चन्द ज़र्रो से

कच्चे ये धागे है, इरादे मगर मजबूत है इनके
पतंग को इतना यकीं, जाना है सितारो से आगे

इन्सान और पतंग कि फितरत कुछ एक सी है
दोनों बंधे इक डोर से, होंसले मगर आज़ाद है

खुले आकाश में देखा, कई तितलियाँ नज़र आई
गौर किया जब मेने, रंग बिरंगी पतंगे उभर आई

साथ उड़ती है इक दूजे के, मिलकर ये सभी पतंगे
बारी आई कटने कि, पराई सी फिर क्यूँ वो लगती

हवाओ कि ज़ुम्बिश में, खुशियाँ सब फैलाती हुई
लहराती झूमती ये पतंग, बंदिशे तोड़े यूँ उड़ रही है

नीले आसमाँ के आगोश में, बादलों से टकराती हुई
इठलाती बलखाती ये पतंग, बाहें खोले यूँ उड़ रही