“पहले तो तेरा ख़याल ही काफ़ी था, जीने के लिये”

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पहले तो तेरा ख़याल ही काफ़ी था, जीने के लिये
और अब तेरा ख़याल भी नाकाफ़ी है, जीने के लिये।

वो गुज़ारिश जो थी मेरी, वो अब भी अधूरी है
वो नवाज़िश जो थी तेरी, वो अब भी ज़रूरी है।

जो दिल से दिल मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हमारे दिल मिल जाते, तो क्या बात होती।

पहले तो तुम तसव्वुर पर खूब बंदिशें लगाती थी
और अब तुम हो कि तसव्वुर में भी नहीं आती हो।

वो सवाल जो था मेरा, वो अब भी वही है
वो जवाब जो था तेरा, वो अब भी नहीं है।

जो लब से लब मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हमारे चेहरे खिल जाते, तो क्या बात होती।

पहले तो तुम बेनज़ीर सी बहुत वो बातें करती थी
और अब तुम हो कि ज़रा भी नहीं याद करती हो।

वो अंदाज़ जो था मेरा, वो अब भी वही है
वो एहसास जो था तेरा, वो अब भी वही है।

जो मन से मन मिल जाते, तो क्या बात होती
जो हम दोनों खिल जाते, तो क्या बात होती।।⁠⁠⁠⁠

“न मुझे इख़्तियार दिया, न मेरा इंतज़ार किया”

न मुझे इख़्तियार दिया, न मेरा इंतज़ार किया
ऐ ज़िंदगी तूने मेरा, क्यों कभी ऐतबार न किया।

मैं मनाता ही रहा, तू रूठती चली गयी
खुद को ढूँढ़ते हुये, बड़ी दूर चली गयी।

वक़्त के वो धारे, जो कि अब धुंधले हो चुके हैं
एहसास की उस नदी में, रेत बनकर जम चुके हैं।

मुसाफ़िर आज भी मिलते हैं, अनजान सफ़र में
हसरतों के आशियाँ लिये हुये, आँखों के घर में।

ऐतबार करना मगर, अब भी बहुत मुश्किल है
तब से लेकर अब तक, सहमा हुआ ये दिल है।

ज़िंदगीभर ऐ ज़िंदगी, मुझको तेरा इंतज़ार ही रहा
मैं जितना पास आता गया, तू उतना दूर होती गयी।

छुप कर बैठी है कहीं, क्यों गर्दिशो में तू अब भी
कभी तो झांक इधर, मैं तन्हा खड़ा हूं अब भी।

सुना है ! कई रंगो से मिलकर बनी है तू
वो सुनहरे सपने तेरे, मुझे कब दिखाएगी तू।

ज़िंदगी तुझसे मेरा, अब वो पहले जैसा रिश्ता न रहा
तू यादें मिटाती चली गयी, मैं फर्यादें लिखता ही रहा।।⁠⁠⁠⁠

“आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है”

आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है
आसमाँ से ज़मीं की सिफ़ारिश हो रही है।

आज फिर से जीने की ख़्वाहिश हो रही है
दिल से दिल की वही गुज़ारिश हो रही है।

आज फिर से ज़िन्दगी मदहोश हो रही है।
हौले-हौले खुद ये अपना होश खो रही है।

आज भी मैं बरसते हुए मौसम का आवारा बादल हूं
आज भी मैं उफनते हुए सागर का बंजारा साहिल हूं।

जब भी तुम मेरे आस-पास होती
बारिश शुरू होने लग जाती।

इशारा था वो कायनात का
फ़साना था वो जज़्बात का।

मैं जिसे बखूबी समझ जाता, मगर तुम बहुत डरती थी
भीगने से, इश्क़ में डूबने से, इसलिए दूर-दूर रहती थी।

आज फिर से वही पहले जैसी बारिश हो रही है
आज फिर से ये कायनात कोई इशारा दे रही है।

आज फिर से बहुत तेज़ बारिश हो रही है
आज फिर से जीने की ख़्वाहिश हो रही है।।

rockshayar.wordpress.com⁠⁠⁠⁠

“पता नहीं वो कौन है”

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बारिशों की तरह वो आती है
घटाओं की तरह वो छाती है
फ़िज़ाओं की तरह वो गाती है
दुआओं की तरह वो जाती है
हाँ, मुझको जो आज़माती है
पता नहीं वो कौन है, पता नहीं वो कौन है।

मुस्कान में एक ताज़गी है
चेहरे पर उसके सादगी है
मरहबा ये तो दीवानगी है
जो देखे वो कहे आफ़रीं है
इस रूह की जो जानशीं है
पता नहीं वो कौन है, पता नहीं वो कौन है।

मैंने हरदम जिसे सोचा
अपने अंदर जिसे पाया
मैंने हरपल जिसे चाहा
जिगर में जिसे बिठाया
वो जो है मुझमें नुमायाँ
पता नहीं वो कौन है, पता नहीं वो कौन है।

बला की जो ख़ूबसूरत है
मासूमियत की मूरत है
जैसी वो उसकी सूरत है 
वैसी ही उसकी सीरत है
इस दिल की जो हसरत है
पता नहीं वो कौन है, पता नहीं वो कौन है।।

© RockShayar

“तेरी साँसों की सरगोशी में नुमायाँ मैं”

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तेरी खुशबुओं से,
खिंचा चला आया मैं
तेरी साँसों की सरगोशी में नुमायाँ मैं।
 
जब भी धड़कता हूँ.
तुझमें धकड़ता हूँ
तेरी धड़कनों में इस क़दर समाया मैं।
 
सबने मुझे बुलाया,
पर मुझको कोई न भाया
जब तूने मुझे बुलाया, दौड़ा चला आया मैं।
 
ज़रा ग़ौर से देखो मुझे,
ऐ जाने जहाँ
तेरी ज़िन्दगी का हसीन सरमाया मैं।
 
तुझे ख़बर नहीं है,
मुझे सबर नहीं है
देख तेरी ख़ातिर क्या-क्या लाया मैं।
 
ये मोहब्बत मेरी,
कम न होगी कभी
तेरी आदतें सब मेरी, तेरा हमसाया मैं।।
 
© RockShayar

“मैंने तुझे कल याद किया था”

ये कैसे हो सकता है जानाँ
मुझको ज़रा ये तो बताना।
मैंने तो कुछ बोला भी नहीं
राज़ अपना खोला भी नहीं।
फिर तुमने ये सब कैसे जाना
जानाँ ज़रा मुझको ये बताना।
वो कौनसा जादू आता है तुम्हे
ये दिल बेकाबू चाहता है तुम्हे।
दूर होकर भी जो इतना क़रीब हो
हबीब हो रक़ीब हो, या नसीब हो।
तुम्हे महसूस करूं तो कैसे करूं
छू भी ना पाऊं, इतना क़रीब हो।
मैंने तुझे कल याद किया था
बहुत दिनों के बाद किया था।
भूल से नहीं, हाँ जानबूझकर
दिल से बहुत याद किया था।।
© RockShayar

“गर ज़मीं पर कहीं जन्नत है तो बस यहीं है, यहीं है”

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“गर फिरदौस बर-रूऐ ज़मीं अस्त
हमी अस्तो, हमी अस्तो, हमी अस्त”

When you read it…You just feel it…

वादियों का दिलकश जहाँ, जैसे ख़्वाब कोई हसीं है
गर ज़मीं पर कहीं जन्नत है तो बस यहीं है, यहीं है।

कांपती हुई कायनात ने, धुंध की चादर ओढ़ रखी है
बर्फीले कोहसारों में, इश्क़ की अंगीठी सुलग रही है।

देखों तो सही, डल झील में तैर रहे हैं कई शिकारे
ऐसे में कोई अपना दिल, बताओ तो कैसे ना हारे।

सुर्ख़ चिनार के वो शादाब शजर, मुस्कुराते हुए नज़र आते हैं
गुलमर्ग से लेकर पहलगाम तक, गुनगुनाते हुए नज़र आते हैं।

निशात हो या शालीमार, चमन में तो गुल खिलते हैं
दौर-ए-खिज़ा में अक्सर यहाँ, पत्तों के रंग बदलते हैं।

दरिया-ए-झेलम का पानी, अपनी कहानी कह रहा है
कई बरस बीत चुके हैं, मुसल्सल ख़ामोश बह रहा है।

अस्सार-ए-शरीफ़ जहां पर, महफूज़ मो-ए-मुक़द्दस है
हज़रतबल दरगाह तो बेहद, पाकीज़ा और मुक़द्दस है।

फ़िज़ाओं में बसी वो बेनज़ीर, जैसे कोई माहज़बीं है
गर ज़मीं पर कहीं जन्नत है तो बस यहीं है, यहीं है।।

:-RockShayar

“वो अधूरी गुज़ारिश मेरी, अब भी अधूरी है”

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वो अधूरी गुज़ारिश मेरी, अब भी अधूरी है
कम नहीं होती कभी, ये जाने कैसी दूरी है।

तेरा नाम तेरी बातें, तुझसे मेरी वो मुलाकातें
तुझे भुलाने के लिए तुझे याद करना ज़रूरी है।

सुना है ! माशूक, साथ जीते हैं साथ मरते हैं
हमारा यूँ दूर-दूर रहना, कितना ग़ैरज़रूरी है।

हद पार करता हूँ, कभी सरहद पार करता हूँ
जुनून को बढ़ाता है जो, नशा तेरा फितूरी है।

तुझको भुलाना जैसे, खुद को भुलाना लगता है
बेपनाह चाहूँ तुझे, कितनी हसीं ये मज़बूरी है।

जितना सोच पाता हूँ, लिखता चला जाता हूँ
ये कामयाबी तो, कड़ी मेहनत की मज़दूरी है।

तेरी मेरी वो कहानी, डायरी में है जो छुपानी
अभी तो आधी लिखी है, बाक़ी अभी पूरी है।।

“तुझ को भुलाने की, हर नाकाम कोशिश कर चुका हूँ”

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तुझ को भुलाने की, हर नाकाम कोशिश कर चुका हूँ
और हर उस कोशिश को, नाकाम भी मैं ही बनाता हूँ।

बहुत दिनों से मैंने, अपने अंदर एक समंदर छुपा रखा है
दिल के किसी कोने में, तेरी यादों का बवंडर दबा रखा है।

तुम से मुलाक़ात के वक़्त, बस यही ध्यान रखता हूँ मैं
कि तुम्हारे भीतर जो तुम हो, उससे मुलाक़ात हो जाए।

कई बार इस बारे में सोचा है मैंने, कि तुम से ना मिलू
लेकिन हरबार यही लगता है, के आख़िर क्यों ना मिलू।

याद है पिछली दफा, जब तुम मुझ से मिलने आई थी
कई दिनों तक ये ज़िन्दगी, मुसलसल मुस्कुराई थी।

तेरे जाने के बाद, जीना बहुत मुश्किल होता है
तुझे याद कर करके, ये दिल महीनो तक रोता है।

सोच रहा हूँ इस बार तुम्हे, अपनी आँखों में क़ैद कर लू
भूलने से पहले इकदफा तुम्हे अच्छी तरह याद कर लू।

सफ़र में यूँही चलते-चलते, आखिरकार हम मिल ही गए
एक लम्हे के लिए ही सही, आखिरकार हम मिल ही गए।।

“राब्ता”

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कभी-कभी लगता है तुम से, सदियों पुराना कोई वास्ता है
अधूरा है अब तक एहसास कोई, रुह का रूह से ये राब्ता है।
 
न तूने मुझे अपनाया कभी, न मैंने तुझे ठुकराया कभी
मैं जितना याद करता रहा, तू उतना मुझे भुलाती गई।
 
कैसा अजब ये रिश्ता है, दिलों के दरमियां जो पिसता है
न तुम समझ पाए कभी, न हम समझ पाए कभी।
 
मुझ से ज्यादा तुम्हे मेरी, मोहब्बत से मोहब्बत रही हमेशा
और तुम्हे सोचते ही मुझे वो, सुकून-ओ-राहत मिली हमेशा।
 
न तूने मुझे तड़पाया कभी, न मैंने तुझे तरसाया कभी
मैं जितना दर्द छुपाता रहा, तू उतना बेख़बर होती गई।
 
अजीब हालात के चलते, ये ज़िन्दगी भी अजीब हुई
एक पल को अमीर होकर, अगले ही पल ग़रीब हुई।
 
अब ना कहीं तू नज़र आती है, ना तेरा नाम-ओ-निशां
वो दौर ही कुछ और था, फ़क़त पल दो पल का मेहमां।
 
न तूने मुझे जाना कभी, दिल से अपना माना कभी
मैं जितना पास आता गया, तू उतनी दूर होती गई।।
 
 

“पता था”

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तेरी परछाई संभाल कर रखी है मैंने
पता था कि अंधेरा घना होने वाला है।

तुझे ख़बर नहीं थी मेरे आने की
मगर मुझे ख़बर थी तेरे जाने की।

वो पल, जो पल भर के लिए हम को मिले थे
न उनमें कोई शिकवे थे, न उनमें कोई गिले थे।

तेरी आवाज़ सहेज कर रखी है मैंने
पता था कि ख़ामोशी कायम होने वाली है।

तुमने कभी बताया नहीं, कि कौन हो तुम
तफ़्तीश करता रहा, मैं ज़िन्दगी भर यही।

इस बार जब मुलाक़ात होगी, तो पूछूँगा
इस मुलाक़ात में कितने अलविदा छुपे हैं।

हर बार यह अलविदा मेरी जान ही ले लेता है
पता नहीं इसके मुँह, कब मेरा खून लग गया।

तेरी तस्वीर संभाल कर रखी है मैंने
पता था कि याददाश्त जाने वाली है।।

RockShayar

“कभी कभी सोचता हूँ कि ठहर जाऊं”

कभी कभी सोचता हूँ कि ठहर जाऊं
तुम्हारे एहसास को छूकर संवर जाऊं

मगर ये अब मुमकिन कहाँ है जानाँ
पता नहीं हमें संग कहाँ तक है जाना

मन्ज़िल तो रूठी हुई है कब से
और रास्ते भी छूटे हुए हैं तब से

अपने ही कदमों के निशां, कहीं मिलते नहीं है
नज़रों के चेहरे भी तो, आजकल खिलते नहीं है

सीने में तुमने अपने, कई दर्द छुपाएं हैं
उसी दर्द की, मुझ पर भी कुछ अताएं हैं

आवारा एक झोंका हूँ, रुकना कहाँ नसीब में
छूना चाहो गर मुझे तो, गुज़रो कभी करीब से

समंदर किनारे बैठा करो, कुछ देर बस यूँही
लहरों की शक्ल में, छूकर तुम्हें लौट जाऊंगा

कभी कभी चाहता हूँ कि ठहर जाऊं
तुम्हारे एहसास को पीकर निखर जाऊं ।।

“तुम्हारी हँसी की गूँज”

तुम्हारी हँसी की गूँज, अब तलक मेरे कानों में है
तुम्हारी मदहोश महक, अब तलक मेरे गानों में है

तुम्हें सोचना चाहता हूँ, तुम पर लिखना चाहता हूँ
जब भी देखो आईना तुम, तुम में दिखना चाहता हूँ

इश्क़ हो गया है तुमसे, या तुम्हारी कही बातों से
आँखें पढ़ो तो मालूम होगा, सोया नहीं हूँ रातों से

दोस्त कहता हूँ, और मन ही मन मोहब्बत करता हूँ
जमाने से नहीं, फ़क़त तुम्हें खोने के डर से डरता हूँ

डरो नहीं यूँ मुझसे, मैंने भी बहुत से धोखे खाये हैं
यक़ीन करो बस मेरा, हम एक ही रूह के साये है

वादा करता हूँ तुमसे, दिल ना कभी दुखाऊंगा मैं
आज के बाद यूँ हर जगह, तुम्हें नज़र आऊंगा मैं

फिर भी कभी कुछ बुरा लगे, तो बता देना मुझे तुम
आँखों ही आँखों में इस तरह से जता देना उसे तुम

तुम्हारी चूड़ियों की खनक, अब तलक मेरे कानों में है
तुम्हारी आँखों की चमक, अब तलक मेरी आँखों में है ।

@RockShayar

“तुम्हें तो आना ही था न”

तुम्हें तो आना ही था न
फिर इतनी देर क्यों लगा दी आने में
पता है ! कितना बेचैन था मैं इतने बरसों से
तुम्हारी तलाश में दर बदर भटक रहा था
यक़ीन था कि तुम एक न एक दिन मिलोगी ज़रूर
मगर किस शक्ल में मिलोगी ये पता नहीं था ।

रिश्ता चाहे कोई भी हो
एहसास से बड़ा तो कोई एहसास नहीं होता है न
मेरे लिए तो बस इतना ही काफी है
के तुम्हारे होने के ख़याल से ही
इस चेहरे पर खुशी लौट आई है फिर से
हो सकता है तुम्हारी सोहबत में
फिर से जीना सीख जाऊं
थोड़ा थोड़ा फिर से खिलना सीख जाऊं ।

ज़रूरी नहीं कि जो मुझे महसूस हो रहा है
वहीं तुम्हें भी हो
मैं तुम पर कोई बंदिश नहीं लगा रहा
तुम तो आज़ाद हो हमेशा से
मैं तो बस इतना कहना चाह रहा हूँ
के इस बार जब जाओ तो बताकर जाना
खोने का डर बहुत डरावना होता है
एक पल में सब कुछ छीन लेता है
पिछली बार इसने कुछ अश्क़ छीने थे
अब तक नहीं लौटाएं है वो
गर लौटा दे तो दिल हल्का हो जाएगा मेरा ।

तुम्हें तो आना ही था न
फिर इतनी देर क्यों लगा दी आने में
पता है ! कितना बेचैन था मैं इतने बरसों से
तुम्हारी तलाश में दर बदर भटक रहा था ।।

 

“मोहब्बत का हलफ़नामा”

कई मर्तबा अपनी मोहब्बत का
हलफ़नामा पेश कर चुका हूँ
दिल की भरी अदालत में
मगर ये दिमागी वक़ील
हर बार वहीं जिरह करता है
और साबित कर देता है सच अपनी हर बात
मुन्सिफ़ के ज़ेहन में नहीं होते हैं जज़्बात ।

हालांकि कई गवाह भी बुलाए गए
मगर वो सब हालातों के डर के आगे
ऐन वक़्त पर मुकर गए ।

बेचारा दिल
हर बार यादों के कठघरे में
अकेला ही खड़ा रह जाता है
किसी मुज़रिम की तरह
पता नहीं कौनसी दफ़ा के तहत
मोहब्बत को जुर्म करार दिया गया है ।

मुझे पता नहीं था
कि तुम्हारे सूबे को एक ख़ास दर्जा मिला हुआ है
मुल्क़ के काॅन्स्टिट्यूशन के तहत
सियासतदारों के लिए
जो चुनावी बिसात रहा है बरसों से ।

मोहब्बत करने से पहले
कौन इतना सोचता है
ये तो बस हो जाती है
गर सोचकर की जाए तो वो मोहब्बत नहीं
बल्कि सौदेबाजी कहलाएगी ।

अब जबकि जुर्म साबित हो चुका है
तो मुझे मुल्जिम की तरह ज़िन्दगी जीनी पड़ेगी
इस बात का कोई ग़म नहीं है
बल्कि बेहद खुशी है कि तुम्हारे इश्क़ में सजायाफ्ता क़ैदी बन चुका हूँ मैं ।

“बेशक इश्क़ के काॅन्स्टिट्यूशन में
कहीं कोई दफ़ा तीन सौ सत्तर नहीं होती है”

कई मर्तबा अपने फ़ितूर का
अहदनामा पेश कर चुका हूँ
हसरतों की भरी महफ़िल में
मगर ये हालातों का वक़ील
हर बार वहीं सवाल जवाब करता है रूह से
और साबित कर देता है सच अपनी हर बात
मुन्सिफ़ के ज़ेहन में नहीं होते हैं जज़्बात ।।

@RockShayar

 

“यादों की कमीज़”

मेरी यादों की कमीज़ पर
कई दफ़ा तुमने अपनी मुलायम हथेलियों से
एहसास की ज़रदोज़ी की है ।
नूर के रंग में रंगे धागों को जब भी तुम छूती हो
इनका रंग और भी गहरा हो जाता है ।

शायद तुम्हारे हाथों का लम्स पहचानते हैं ये
तभी तो मेरे छूते ही इनका रंग यूँ उड़ जाता है
जैसे शबनम का कोई क़तरा धूप में रखा हो ।

मेरे एहसास में अब तलक
वो दर्द की तपिश बाक़ी है
मगर जब भी ये कमीज़ पहनता हूँ
बारिश होने लगती है रूह पर
और वो तपिश पलभर में गायब हो जाती है ।

इसी कमीज़ की आस्तीन पर
एक फूल बना हुआ है
जो तभी खिलता है
जब तुम्हारी खुशबू की आमद होती है ।

इतनी हमराज़ हो चुकी है ये कमीज़
कि गर इसे उतारने की कोशिश करूँ
तो साथ में रूह भी उतरने लगती है
और वैसे भी इश्क़ का सुर्ख़ लिबास
कभी उतारे नहीं उतरता है ।

मेरी यादों की कमीज़ पर
तुम्हारे एहसास की ज़रदोज़ी
अब भी वैसी ही है
जैसी तुमने की थी
न ये बदली है, न मैं
दोनों वैसे के वैसे ही हैं आज तक ।।

@RockShayar

“Maliqa-e-Firdaus”

फ़िरदौस से आई हो या उस ओर से
जहां बर्फीले पहाड़ आसमां को चूमते हैं
नदियाँ इठलाती हैं, और झरने झूमते हैं

वादी में जब कभी वो बर्फ पिघलती है
ज़िन्दगी मुस्कुराने को फिर मचलती है

हर सू जहां पर चिनार की खुशबू आती है
और हवाएँ मोहब्बत के गीत गुनगुनाती है

दरिया-ए-झेलम भी तुम्हारे संग बहता है
चाँदनी रातों में मन के किस्से कहता है

तेरे इश्क़ का कहवा मैं हर शब पीता हूँ
एक तसव्वुर के सहारे सदियाँ जीता हूँ

दहशतगर्दी भी तुझे बेशक बदल नहीं पाई है
नफ़रत की हवा तुझमें कभी पल नहीं पाई है

फ़िरदौस से आई हो या उस ओर से
जहां झील में दो शिकारे गुफ्तगू करते रहते हैं
फिर से हमारे मिलने की आरज़ू करते रहते हैं ।।

@RockShayar

“आज तुम्हारी याद आ ही गई मुझे”

कई दिनों के बाद आखिरकार
आज तुम्हारी याद आ ही गई मुझे
जब मैंने वो लाल रंग की
छोटी सी डायरी खोली
जो गिफ्ट की थी तुमने मुझे
मेरे पिछले बर्थ डे पर

इसमें केवल ग़ज़ल ही लिखता हूँ
क्योंकि तुम भी तो एक ग़ज़ल ही थी
बलखाती हुई, लहराती हुई, शर्माती हुई

जब तुमने मुझसे अपने प्यार का इज़हार किया
उस वक्त मैं गुज़रे हुए दौर के
एक दौर से गुज़र रहा था
समझ नहीं पाया कि तुम्हें क्या जवाब दू

इसीलिए मैंने तुम्हें बस यूँही कह दिया
कि मैं तुम्हारे लिए वैसा महसूस नहीं करता हूँ
जैसे कि तुम मेरे लिए महसूस करती हो

ये ज़रूरी भी था मेरे लिए
क्योंकि ज़ख्मी दिल अक्सर सहमा सा रहता है

जो भी वक्त मैंने तुम्हारे साथ गुज़ारा
आज वो एक खूबसूरत याद बन चुका है

अच्छा लगता है सोचकर कि
मैंने तुम्हें सब सच सच बता दिया

क्योंकि दिल टूटने की आवाज़ से
मैं अच्छी तरह वाकिफ़ रहा हूँ

तुम जहाँ भी रहो
खुश रहो
मुस्कुराती रहो
एक ग़ज़ल की तरह
बेशक ज़ुबां से निकली वह नेक दुआ तुम थी
आसमान से उतरी फरिश्तों की सना तुम थी

कई दिनों के बाद आखिरकार
आज तुम्हारी याद आ ही गई मुझे
जब मैंने उस लाल रंग की
छोटी सी डायरी का आखिरी पन्ना खोला
जिस पर कुछ लिखा था तुमने अपना नाम
मेरे पिछले बर्थ डे पर ।।

“क्यां है इश्क़”

kyan hai ishq

कोई भी नहीं समझा अब तक, के क्यां है इश्क़
दर्द से नजात है, या फिर दर्द की दुआ है इश्क़

ना कोई है शर्त इसमें, ना है कोई क़रार इसमें
दिल को जो बैचैन कर दे, हाँ वोह अदा है इश्क़

नज़ीर क्यां पेश की जाए, खुद बेनज़ीर है वोह
शहद की तरह कुछ मीठी, उर्दू ज़ुबाँ है इश्क़

कायनात के हर ज़र्रे में, नुमायाँ है नक़्श जो
इंतिहा से लेकर इब्तिदा, सारा जहाँ है इश्क़

हुए हो चाहे इसके यहाँ, दीवाने कई ‘इरफ़ान’
पाया वोह सबने ही, वफ़ा ज़फ़ा और शफ़ा है इश्क़ ।।
————————————————
#RockShayar ‘Irfan’ Ali Khan

नजात – मुक्तिं
क़रार – अनुबंध
नज़ीर – उदहारण
बेनज़ीर – अनुपम, बेजोड़
ज़ुबाँ – भाषा
कायनात – सृष्टि
ज़र्रा – कण
नुमायाँ – प्रकट
नक़्श – चेहरा
इंतिहा – अंत
इब्तिदा – आरम्भ
वफ़ा – विश्वास भाव
ज़फ़ा – अन्याय
शफ़ा – इलाज

“तेरी चाहत जाविदां सी लगती है “

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रंजे उल्फ़त वो रिदा सी लगती है
तेरी चाहत जाविदां सी लगती है

ज़र्रा ज़र्रा यहाँ, है बेक़रार कब से
हर शै तुझ पे फ़िदा सी लगती है

तू ही मेरी ज़ात, तू ही मेरे जज़्बात
दिल को तू मेरे जिदा सी लगती है

ना मिलो जिस घङी, ख़्यालों में तुम
वो घङी तो अलविदा सी लगती है

लब कहे जब भी, हौले से ‘इरफ़ान’
दिल को रूहानी निदा सी लगती है

 #RockShayar

—-शब्द सन्दर्भ—-

रंजे उल्फ़त – प्रणय पीङा, विरह वेदना
रिदा – ओढने की चादर
जाविदां – अमर, कभी ना खत्म होने वाली
ज़र्रा – कण
बेक़रार – अधीर
शै – वस्तु
फ़िदा – मुग्ध
ज़ात – व्यक्तिगत
जज़्बात – भावना
जिदा – स्वच्छ करने वाली
ख़्याल – कल्पना, विचार
अलविदा – बिछुङना
लब – होंठ  
रूहानी – आध्यात्मिक
निदा – पुकारना, आवाज़ देना

“ये मुहब्बत है, आँखों से पढी जाये इरफ़ान”

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चाहकर भी हमसे, नज़रे मिला ना पाओगी
बाद दीदार के यूँ, पलकें झुका ना पाओगी

दबे हो जज़्बात चाहे, दिल के कोनों में कहीं
इश्क़ दा एहसास, दिल में छुपा ना पाओगी

कोशिश कर के देख लेना, वादा है ये मेरा
रूमानी वो यादें, रूह से मिटा ना पाओगी

अलहदा है ज़रा, अंदाज़ भी अल्फ़ाज़ भी
सुरमई वो निगाहें, हमसे हटा ना पाओगी

ये मुहब्बत है, आँखों से पढी जाये ‘इरफ़ान’
छुपा लो लाख यूँ, खुद से छुपा ना पाओगी

‪#‎RockShayar‬

“बेनज़ीर सी वो बातें”

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बेनज़ीर सी वो बातें, रेशम सी वो रातें
दिल ढूँढता है फिर, मखमली मुलाकातें

शोख़ी भरा वो लहज़ा, रूह लगे जो अफ़ज़ा
आँखों ही आँखों में यूँ, मुझसे कहे बह जा

रूख़सार की वो हया, पलकों पर है बयां
नज़रे टकराते ही फिर, क़रार सब गया

ज़ुल्फ़ की घनेरी छाँव, सुकूं देता कोई गांव
रूख़ पे गिरे जब, लगे जैसे दरिया में नाव

साँसों की भीनी खुशबू, बहकाये जो आरज़ू
सितारों की चादर ओढ़े, हो बस मैं और तू

लबों का सुर्ख़ लम्स, सुबह का हो जैसे शम्स
लफ़्ज़ जो भी उतरे वो, लगे सारे उम्दा नज़्म

नाज़-ओ-अन्दाज़ वो, ख़ाहिश-ए-परवाज़ लिए
मयकशी सी दो निगाहें, गहरे सब राज़ पिए

बेनज़ीर सी वो बातें, रेशम सी वो रातें
दिल ढूँढता है फिर, सुनहरी कुछ यादें

‪#‎RockShayar‬

बेनज़ीर – अद्वितीय
लहज़ा – शैली
अफ़ज़ा – प्राणवर्धक
रूख़सार – गाल
ज़ुल्फ़ – बाल
रूख़ – चेहरा
सुर्ख़ – गाढा लाल
लम्स – स्पर्श
शम्स – सूर्य

“इश्क़ दा साया”

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ज़र्रे ज़र्रे में सदा, इश्क़ नुमायां
हर बशर यहाँ, इश्क़ दा साया

बरस रहा हैं हर सू, अब्र-ए-नूर
दामन में जिसके, सुकूं समाया

रूह से रूह का, तारूफ़ हैं ये
जुनून-ए-इश्क़, रब दा साया

उल्फ़त की बातें, रेशम सी रातें
आँखों की जुबां, और हमसाया

रेज़े रेज़े में सदा, इश्क़ नुमायां
हर नज़र यहाँ, इश्क़ दा साया

‪#‎राॅकशायर‬

ज़र्रा – कण
इश्क़ – प्रेम
नुमायां – प्रत्यक्ष, जाहिर
बशर – मनुष्य
साया- परछाई
सू – जगह, तरफ
अब्र – बादल
नूर – प्रकाश, रौशनी
तारूफ़ – परिचय
उल्फ़त – प्रेम
रेज़ा – कण

“कुछ कहना है मुझे अब तुमसे”

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कुछ कहना है मुझे अब तुमसे
नहीं रहना यूँ चुप अब खुद से
तुमसे बेपनाह मुहब्बत करता हूँ
तुम पर बेइंतहा मैं अब मरता हूँ
शब के अंधेरों में तुम्हें पुकारता हूँ
दिन के उजालों में तुम्हें निहारता हूँ
नज़र आकर भी नज़र नहीं आती हो
दूर होकर यूँ कितना मुझे तड़पाती हो
तुम्हारे साथ कुछ पल जीना चाहता हूँ
तुम्हारे दर्द को मैं अब पीना चाहता हूँ
अल्फ़ाज़ सजाकर रोज तुम्हें याद करता हूँ
एहसास छुपाकर हर दिन ही आहें भरता हूँ
नहीं होकर भी कहीं तुम मुझमें कहीं हो
ज़ुदा होकर भी कहीं तुम मुझमें बसी हो
बस इतना कहना है मुझे ये तुमसे
ज़िंदा हूँ मैं हर पल, तेरे ख़्याल से

“बेनज़ीर हो तुम”

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नज़ीर क्यां पेश करू, खुद बेनज़ीर हो तुम
फ़क़त रूह-ए-दिल की, अब वज़ीर हो तुम

जी करे सुनता जाऊ, मैं सब बातें तुम्हारी
महफ़िल-ए-अदब की, नेक तक़रीर हो तुम

रुख पर लिखा है, पाकीज़ा सा इक कलाम
आयत-ए-कुरआन सी, वो तफ़सीर हो तुम

जलतरंग से बनी हुई, इश्क़ रंग में सनी हुई
रूह पतंग में बसी हुई, एक तसवीर हो तुम

इबादत में अक्सर, होता है दीदार तुम्हारा
दुआओं से हासिल हुई, मेरी तक़दीर हो तुम

हयात के सफ़र की, यूँ दास्तां है ‘इरफ़ान’
साँसों पर लिखी हुई, ज़िंदा तहरीर हो तुम

© रॉकशायर
(इरफ़ान अली खान)

नज़ीर – उदहारण
बेनज़ीर – अनुपम, बेमिसाल
फ़क़त – सिर्फ
रूह-ए-दिल – ह्रदय और आत्मा
वज़ीर – मंत्री
महफ़िल-ए-अदब – साहित्यिक सभा
तक़रीर – भाषण
रुख – चेहरा
पाकीज़ा – पवित्र
कलाम – लिखित रचना, गीत
आयत-ए-कुरआन – पवित्र ग्रन्थ कुरआन शरीफ में क्रमानुसार लिखे वाक्यांश
तफ़सीर – व्याख्या
इबादत – पूजा
दीदार – दर्शन
हयात – ज़िंदगी
तहरीर – लिखित दस्तावेज

“ग़ज़ल सा सुकूं कहूँ, या कहूँ नज़्म सा ख़ुमार”

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ग़ज़ल सा सुकूं कहूँ, या कहूँ नज़्म सा ख़ुमार
मुझमें हर लम्हात यहाँ, तू ही तू अब बेशुमार

आसमां से उतरी है, फरिश्तों की इक जमात
नूर की बारिश से यूँ, कर रही वो मुझे सलाम

पलकों के पर्दे से, झांक रही दो आँखें गुलाबी
हया का वो सुर्ख़ हिज़ाब, देता है पहरा शबाबी

साँसे करती रहे सज़दा, बातों में है नज़ाकत
लबों को यूँ छूकर फिर, रातें हुई मेरी इबादत

निदा है उर्दू ज़ुबान सी, सुबह की अज़ान सी
रूह से आती रहती बस, खुशबू ज़ाफ़रान सी

सादगी है ज़ीनत तेरी, बंदगी इनायत तेरी
दिल पे मेरे लिखी हुई, ज़िंदगी इबारत तेरी

हुस्न से वाबस्ता, माहताब रूख़ पे लिए हुए
चाहत की वादियों में, यूँ आफ़ताब लिए हुए

फ़िज़ाओं में बहार तुमसे, हवाओं में है नमी
दुआओं में करार तुमसे, ख़लाओं में है कमी

मुहब्बत की अलामत ये, इश्क़ की नेअमत ये
फ़िरदौस से नाज़िल हुई, ख़ुदा की रहमत है ये

शबनम के कतरे सा, नरम ये एहसास तेरा
शोखियों में लिपटा हुआ, सर्द ये अंदाज़ तेरा

इस कदर शैदा हूँ तुझ पर, हर घड़ी हर पहर
नक़्श मैं तेरा, और मुझमें तू शाम-ओ-शहर

इश्क़ का जुनूं कहूँ, या कहूँ मुश्क़ का ख़ुमार
मेरे हर अल्फ़ाज़ में, तू ही तू अब बेशुमार

“एहसास-ए-इश्क़”

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एहसास वो तेरा, यूँ हर पल मुझे होने लगा
दूर होकर भी सदा, तू पास मेरे होने लगा

इश्क़ का ख़ुमार, इस कदर सर पे चढ़ा
रातों से मेरी, चैन-ओ-सुकूं सब खोने लगा

मुझमें मुझसा तो, कुछ भी अब ना रहा
जो भी था शख्स वो, सब तेरा होने लगा

जुड़ा है जब से ये, बावरा जो मन तुझसे
अंधेरों में कहीं, सवेरा वो इक होने लगा

दिल-ए-नादां की, बातों में यूँ आके फिर
हुआ था जो ना कभी, वो अब होने लगा

एहसास-ए-इश्क़ का, है बस इतना बयां
ना होकर तू यहाँ, मुझमें कहीं होने लगा

© इरफ़ान अली खान ‘रॉकशायर’

“इश्क़-ख़ुमारी”

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कुछ इस कदर है छाई, इश्क़-ख़ुमारी
सांसों से आये बस, खुशबू तुम्हारी

अल्फ़ाज़, खुद-ब-खुद महकने लगे
दिल में उतर गई, वो शायरी तुम्हारी

हैरां है आज, खुद लफ़्ज़ तराश भी
देखकर मयकदा सी, आँखें तुम्हारी

चाँद तारें सब, करते रश्क तुमसे
गिरती है रूख़ पे, जब ये ज़ुल्फ़ें तुम्हारी

पल भर में गायब, हो जाती उदासी
याद आती है जब, वो बातें तुम्हारी

हो जाये बंजर, फिर से सब्ज़ाज़ार
उठती है जहाँ आहिस्ता, पलकें तुम्हारी

छुपा लो खुद को, कहीं भी ऐ नाज़नीन
महफूज़ है ग़ज़ल में, अब तस्वीर तुम्हारी

© RockShayar

“तारीफ”


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रूख़ पे मासूमियत का पहरा
पलकों का रंग भी है सुनहरा
लबों पे ठहरी हुस्न की घटायें
आँखों से बयां होती है अदायें
तारीफ कहूँ इसे, या कुछ और
जो भी हो, ये बेहद खुशनुमा है
अन्दाज़ में कुछ अलग है बात
एहसास हो जैसे चाँदनी रात
सांसों में घुली रूह की वफ़ायें
निगाहों से पूरी होती है दुआयें
तारीफ कहूँ इसे, या कुछ और
जो भी हो, ये बेहद खुशनुमा है

© रॉकशायर

“शैदाई”

 

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शरीक हैं तेरा साया मुझमें इस कदर
ज़र्रे ज़र्रे में अब तू ही तू शाम-ओ-सहर

साँसों की खुशबू तेरे होने का एहसास
सोहबत यूँ पाकर ज़िंदा हुए अल्फ़ाज़

मुहब्बत कहूँ इसे या कहूँ मैं इबादत
इक रूह के लिए शैदाई मेरा किरदार

नुमाया हैं तेरा वज़ूद मुझमें इस कदर
ज़िस्म-ओ-जां में तू ही तू अब हर पहर..

आँखों की रंगत होश खोने का इक़रार
ख्वाबों पर हक़ीक़त से ज्यादा ऐतबार

चाहत कहूँ इसे या कहूँ मैं अक़ीदत
इक शख़्स के लिए दिल रहे बेक़रार

शामिल हैं तेरा अक्स मुझमें इस कदर
हर बशर में यहॉं तू ही तू शाम-ओ-सहर

 

“इब्तिदा-ए-इश्क़”

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तेरा दूर होकर भी मेरे पास होना
आँखों आँखों में वो सब कह देना
तन्हाई में रेशमी ख़्वाब बुन लेना
चाँदनी को रूख़ पर यूँ सजा देना
इब्तिदा-ए-इश्क़ का आलम हैं ये

ज़िस्म को छूकर रूह महकने लगी
पल पल हर पल साँसे बहकने लगी
तू जब मुस्कुराये खिल उठे बहार
खामोश लम्हे फिर जी उठे हर बार
मेरे सब अल्फ़ाज़ तुमसे ही ज़िंदा हैं
तेरा वो एहसास मुझमें यूँ जाविदां हैं

ज़ुदा होकर भी तेरा मेरे साथ होना
बातों बातों में यूँही हक़ जता देना
दिल में गहरे ज़ज्बात छुपा लेना
हयात को मेरी जन्नत बना देना
इब्तिदा-ए-इश्क़ का आलम हैं ये

“इक शख्स मुझे फिर जीना सीखा रहा”

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इक शख्स मुझे फिर जीना सीखा रहा
जागते सुनहरे कई ख्वाब दिखा रहा 

ज़ख्मो पर इश्क़ का मरहम लगाकर 
चाहत के मुझमें वो अरमां जगा रहा 

ख्यालों में मेरे हरपल महफूज़ होकर
मुहब्बत के फ़साने मुझमें सजा रहा 

तन्हाई मे हरदम यूँ साथ निभाकर 
मुलाकात में फिर वो नजरे चुरा रहा 

खुशीयों के चहकते लम्हे ओंढकर 
गमों की वोह तपती धूप हटा रहा 

उल्फत से अपनी मुझे नवाज़ कर 
शिद्दत से मेरे वो सब दर्द मिटा रहा

“कुछ इस तरह, नुमायाँ तू मुझमें” (Kuch is tarah, Numaya tu mujhmein)

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कितनी घनी है, ये जुल्फ़े तेरी Kitni ghani hai, ye zulfe teri    
साये में है इनके, बेइन्तहा सूकूं Saaye me hai inke, Beinteha Sukoon  
दो आँखें तक रही है, चुपके से Do Aankhe tak rahi hai, Chupke se  
जेसे कहना हो, शायद उन्हे कुछ Jese kahna ho, shayad unhe kuch  
नज़रो कि ज़ुबां, दिल समझता है Nazro ki zubaa, dil samajhta hai  
आहिस्ता बिखरती, मद्धम मुस्कान Aahista bikhrti, Maddhham muskan  
दामन में अपने, इश्क को लपेटे हुये Daaman me apne, Ishq ko lapete huye  
नाजुक डगर पर, अब चल रही है Nazuk dagar par, ab chal rahi hai  
काँपते हुये, घबराते हुये, शरमाते हुये Kaampte huye, Ghabrate huye, Sharmate huye
हया के सुर्ख लिबास में, सिमटते हुये Hayaa ke surkh libas me, simat te huye  
बिखर रही है, आज हर तरफ यहाँ Bikhar rahi hai, Aaj har taraf yahan  
हुस्न-ओ-ज़माल कि, दिलकश अदाये Husn-o-zamal ki, Dilkash adaye  
मुहब्बत में भींगकर, मन हो गया बावरा Muhabbat me bhigkar, Man ho gaya baawra
लफ्ज़ो को संग अपने, यूं डूबो रहा है Lafzo ko sang apne, yoon doobo raha hai  
इश्क के दरिया में, जेसे तूफान उठा हो Ishq ke dariya me, Jese toofan utha ho  
जब कभी, पहली बारिश शुरू होती है Jab kabhi, Pahli barish shuru hoti hai  
और सारा जहां, खिल उठता है फिर Aur sara jahan, khil uthta hai phir  
कुछ इस तरह, नुमायाँ है अब तू मुझमें Kuch is tarah, Numaya hai ab tu mujhme..

“चट्टानों के बगीचे में”

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चट्टानों के बगीचे में
इक बहार मिली थी मुझे 
वीरान जज़ीरे सा ये दिल
फिर से धड़कने लगा
कई अर्से से चुप सा बेठा
तन्हा दिल बात करने लगा
कभी आँखों से, कभी होंठो से, कभी लफ्ज़ो से 
अंदर छुपे ज़ज्बात जाहिर करने लगा है 
मगर थोडा डरता भी है
बीते हुए उस मंज़र का खौफ 
अब तक सुर्ख दीवारो पर लिपटा है 
लहू कि सोहबत में लाल भी हो चुका
पर कभी कभी वो स्याह रंगत 
फिर से आ जाती है
नादाँ दिल कि ये बेबसी
उसको दूर से बस देखना है
नज़दीक जाने से हिचकिचाता
कुछ जख्मो के निशान
अभी भी कायम है दिल पर 
शायद इसीलिए आज मैं 
उस खुशबू को महसूस करता हुआ 
अल्फ़ाज़ों के दरमियाँ यूँ खो रहा हूँ 
जेसे उस दिन खो रहा था
चट्टानों के बगीचे में
जब इक बहार मिली थी मुझे