“मेघ की तरह हैं केश तुम्हारे, मृग की तरह हैं नयन”

मेघ की तरह हैं केश तुम्हारे, मृग की तरह हैं नयन
जब भी तुम चलती हो, बस तब ही चलती है पवन।

मौन के अनंत अंतरिक्ष में, गूँज रही है तुम्हारी वाणी
तारों की तरणी है तू, मन-मरुस्थल की हरित ढ़ाणी।

नेत्र तुम्हारे हैं अचूक धनुर्धर, हृदयभेदी बाण चलाते हैं
अधर तुम्हारे हैं मधु-सरोवर, नीर की प्यास बुझाते हैं।

मुखमंडल की आभा, अहर्निश सूर्य के जैसी लगती है
कंठ में एक स्वरमाला, सदैव संगीत बनकर बहती है।

आभूषण तुम्हारे नक्षत्र, यह वसुंधरा है वस्त्र
गगन तुम्हारा शस्त्र, एवं पवन अमोघ अस्त्र।

स्वप्नलोक में प्रतिदिन तुमसे भेंट होती है
प्रतीत होता है मानो स्वयं से भेंट होती है।

मन-कानन में बरसती हुई, प्रेम की पावन पावस हो तुम
निर्बल को जो बल देता है, मन में छुपा वो साहस हो तुम।

चपला कहूँ कि चंचला, या फिर कहूँ तुम्हें मैं कादंबिनी
दामिनी के सौदामिनी, या फिर चंद्रसुशोभित यामिनी।

कौन हो तुम, कोरी कल्पना हो, या हो कोई सुंदरी
अनामिका में धारण की मैंने, तुम्हारे नाम की मुँदरी।।⁠⁠⁠⁠

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