“शर्त यही थी के कोई शर्त न हो”

 

शर्त यही थी के कोई शर्त न हो
रुख़्सत के वक़्त कोई दर्द न हो।

सहेजकर रखी है जिसे दिल में
उस तस्वीर पर कोई गर्द न हो।

नफ़रत की ज़हरीली आँधी में
सब्ज़ पत्तों का रंग ज़र्द न हो।

बड़ा तड़पाता है, बड़ा सताता है
दर्द का मौसम कभी सर्द न हो।

तसव्वुर में तकब्बुर आ जाता है
जज़्बाती जब कोई फ़र्द न हो।

न जीने दे, न मरने दे
ज़िंदगी इतनी भी बेदर्द न हो।

दिल को बहुत बुरा लगता है
हमदर्द ही जब हमदर्द न हो।।

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